शीर्षक - *देश के सच्चे नायक और हमारी खामोशी*
क्या आप जानते हैं, सोनम वांगचुक जी ने इस देश को क्या दिया है? और वे आज क्यों भूख हड़ताल पर बैठे हुए हैं?
अगर नहीं, तो क्यों नहीं? क्या उनकी आवाज़ सरकार को सुनाई नहीं दे रही?
यह आज का एक बहुत ही गंभीर प्रश्न बनता जा रहा है। आज दिनांक 17 जुलाई 2026 हो चुकी है और उन्हें भूख हड़ताल पर बैठे हुए करीब 18-19 दिन हो गए हैं। लेकिन, अभी तक सरकार की तरफ से कोई जवाब नहीं आया है। क्या सरकार सोनम वांगचुक जी की मांगों को स्वीकार करेगी या नहीं? न तो कोई सरकारी प्रतिनिधि उनसे मिलने जा रहा है और न ही उनकी सुध ली जा रही है।
सोनम वांगचुक जी अत्यंत शांतिपूर्ण ढंग से एक आंदोलन पर बैठे हुए हैं। लेकिन मुझे यह देखकर गहरा दुख होता है कि दिल्ली प्रशासन उनका समर्थन करने के बजाय उनके साथ भेदभाव का व्यवहार कर रहा है।
कुछ लोग शायद यह कहें कि ऐसा कुछ नहीं हुआ है; लेकिन मैं आप सभी को बता दूँ कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 में साफ-साफ शब्दों में लिखा गया है कि देश के हर नागरिक को शांतिपूर्ण आंदोलन और जीवन जीने का अधिकार है। इसके बावजूद प्रशासन उन्हें आंदोलन करने से रोकना चाहता है। इस कड़कती धूप और वर्षा के मौसम में उन्हें बुनियादी सुविधाएं तक नहीं दी जा रही हैं। कम से कम एक त्रिपाल की सुविधा तो दी जानी चाहिए थी, पर प्रशासन समय पर वह भी नहीं दे पाया; और जब दिया, तो उसे भी हटाने की मांग की जाने लगी।
आप स्वयं सोच सकते हैं कि पुलिस प्रशासन का ऐसा व्यवहार क्या सीधे तौर पर संविधान का उल्लंघन नहीं है? शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर इस प्रकार का दबाव बनाना बेहद निंदनीय है। आज 18-19 दिन बीत जाने के बाद भी सरकार का कोई मंत्री उनसे मिलने तक नहीं गया। हम लोग लोकतंत्र की बड़ी-बड़ी बातें तो करते हैं, लेकिन इसे तानाशाही के रवैये से बचाने का कोई प्रयास नहीं करते।
सोनम जी ने देश को क्या दिया है?
कृत्रिम ग्लेशियर (आइस स्तूप): वर्ष 2013-14 में लद्दाख जैसे ठंडे रेगिस्तान में गर्मियों में पानी की कमी को दूर करने के लिए उन्होंने कृत्रिम ग्लेशियर बनाने की अद्भुत तकनीक खोजी, जिसे 'आइस स्तूप' कहा गया।
ऑपरेशन न्यू होप (1994: सरकारी स्कूलों की लचर व्यवस्था को सुधारने और उसमें स्थानीय समुदाय की भागीदारी बढ़ाने के लिए उन्होंने 'ऑपरेशन न्यू होप' की शुरुआत की।
क्लाइमेट फास्ट आंदोलन 2023: पर्यावरण और हिमालय को बचाने के लिए उन्होंने 21 दिनों तक भूख हड़ताल की थी ताकि दुनिया का ध्यान जलवायु परिवर्तन पर जा सके।
औद्योगिक लॉबी का विरोध: उन्होंने लद्दाख में बड़े उद्योगों को अंधाधुंध तरीके से लगाने का विरोध किया। उनका मानना है कि फैक्ट्रियों के धुएं से हिमालय के ग्लेशियर पिघलेंगे, जिससे भविष्य में भयानक जल संकट पैदा हो जाएगा।
छठी अनुसूची की मांग: लद्दाख के पर्यावरण और वहां की स्थानीय संस्कृति को कानूनी सुरक्षा देने के लिए वे लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग कर रहे हैं। इस कानून के लागू होने से बाहरी उद्योगपतियों द्वारा लद्दाख के जल, जंगल और जमीन के दोहन पर रोक लग सकेगी।
सैनिकों के लिए सौर-गर्म टेंट: उन्होंने देश के वीर जवानों के लिए ऐसे टेंट का निर्माण किया जो बेहद ठंडी रातों में भी सौर ऊर्जा से गर्म रहते हैं। इससे न केवल हमारे जवानों की सुरक्षा सुनिश्चित हुई, बल्कि ईंधन की भी भारी बचत हुई।
इतना सब कुछ उन्होंने बिना मांगे इस देश को दिया है। लेकिन आज हम उनका साथ देने के बजाय उन्हें अनदेखा कर रहे हैं।
मैं आप सभी से एक सीधा सवाल पूछना चाहूँगा—क्या यह सब उन्होंने अपने निजी स्वार्थ के लिए किया है?
अगर नहीं, तो फिर देश के इस सच्चे नायक का समर्थन करने में हमें क्या हर्ज है? आइए, अपनी खामोशी तोड़िए और सत्य के साथ खड़े होइए।
- *एस.टी.डी. मौर्य*