Questions and Answers on Astrological Remedies in Hindi Spiritual Stories by yeash shah books and stories PDF | Astrological Remedies पर प्रश्नउत्तर

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Astrological Remedies पर प्रश्नउत्तर



(1)  *प्रश्न : क्या टोने टोटके काम करते है?* 

उत्तर: टोने टोटके, शगुन अपशगुन, यह सब पारंपरिक लोकवाद के आधार पर समाज में प्रचलित है। और इसके पीछे केवल मान्यताओं का प्रभाव है। जब कोई एक समाज किसी एक बात पर सामूहिक रूप से विश्वास करता है, तो वहीं बाते परंपरा के रूप में आने वाली पीढ़ियों को भी बताता है, इस तरह से पीढ़ियों से अंधविश्वास चलता आ रहा है।
          मूल रूप से टोने टोटके के पीछे इंसान का भय और लोभ काम करता है। रावण संहिता, लाल किताब, काली किताब जैसे कुछ ग्रन्थ जो ऐसे टोटको का समर्थन करते है। अब यह किताबें जिस समय में लिखी गई उस समय जन सामान्य में तर्क और विज्ञान का बहुत प्रभाव नहीं था, और श्रद्धा के आधार पर समाज में बहुत सारे नियम और आचार व्याप्त थे।
अब आप टोटके करोगे तो उसमें सफलता की संभावना महतम 50-50% रहेगी।
मतलब १० लोग अगर यह करेंगे तो ज्यादा से ज्यादा 5 लोगों को लाभ होगा, इस संभावना के आधार पर टोने,टोटके की दुकान चलती है, जो पूर्ण रूप से विश्वास योग्य नहीं है।


(2) *प्रश्न : दान की महिमा क्या है? वास्तव में ग्रहों के दान से भाग्य बदलता है?

उत्तर : दान और कर दोनों ही जीवन और समाज की उन्नति के लिए आवश्यक है। कर सुविधाओं का सृजन करता है और दान वंचित वर्ग के लिए आपूर्ति करता है।
दान और ग्रहों का सीधा कोई संबंध नहीं है परन्तु धान्य और खाद्य पदार्थों को ग्रहों के साथ जोड़ा गया है। और उसी से ग्रहों के लिए दान का पारंपरिक लोकवाद प्रारंभ हुआ।
 यज्ञ यानी सामूहिक उन्नति के लिए किया जाने वाला पुरुषार्थ, तप यानी सामूहिक उन्नति के लिए सार्थक योग्यता प्राप्त करने का परिश्रम और अभ्यास। और तप और यज्ञ से दान उत्पन्न होता है। जैसे एक योद्धा सैनिक देश की सेवा के लिए ट्रेनिंग प्राप्त करता है,वह उसका तप है। फिर वह अपनी पूरी ताकत से देश की सरहदों की रक्षा करता है वह उसका यज्ञ है। और जरूरत पड़ने पर वह शत्रुओं का विनाश करता है ,कभी कभी खुद की जान खतरे में डाल कर बलिदान करता है यह उसका दान है, दूसरों के हित के लिए कुछ भी निस्वार्थ भाव से देना या समर्पित करना दान है। 
      भौतिक वस्तुओं का, समय का, ज्ञान का ,सहायता का ,दान बहुत प्रकार का होता है। इसी दान से समाज और कुदरत का चक्र संतुलित है। 
    पशु पक्षियों की सेवा , चींटीओ की सेवा भी दान की श्रेणी में आता है। योग्य व्यक्ति को दिया जानेवाला दान जीवन रक्षक और पोषक है। प्रसन्नता और सुकून में वृद्धि करने वाला स्वाभाव, विचार और जीवन ऊर्जा को सुख ,शांति प्रदान करने वाला और पीड़ा का शमन करने वाला भी है, कभी कभी यह दान आपके प्रभाव और प्रतिष्ठा में वृद्धि भी करता है और यश भी प्राप्त होता है इसी लिए ग्रहों की पीड़ा के निवारण हेतु दान का विशेष महत्व है।

(3) प्रश्न : व्रत या उपवास के नियम पालन से ग्रह पीड़ा निवारण होता है?

उत्तर: व्रत या उपवास कुदरत और जीवन का स्वभाव नहीं है। समय ,ऋतु और शरीर के हिसाब से पोषणयुक्त और संतुलित आहार और विहार की ही महिमा है। रोग या स्वास्थ्य की तकलीफों के वक्त उपवास एक औषधि की तरह काम करता है जो चिकित्सक की सलाह अनुसार आप की मूल प्रकृति के अनुकूल होना चाहिए।
जहां तक व्रत और संकल्प की बात है इसका ग्रह पीड़ा निवारण से कोई लेना देना नहीं है। यह मान्यता और श्रद्धा आधारित नियम पालन है, इसका ज्योतिष से संबध ना बराबर है।

(4) प्रश्न : मंत्र ,तंत्र और यंत्र का क्या प्रयोजन है? यह उपाय के तौर पर ठीक है?

उत्तर : मंत्र का अर्थ है Code, तंत्र यानी System, यंत्र का अर्थ है Machine. Code , System and Machine इन तीनों के संयोजन से एक टेक्नोलॉजी का निर्माण होता है। यह टेक्नोलॉजी किसी विशेष प्रयोजन के लिए होती है। 
परन्तु टेक्नोलॉजी का यह अर्थ बाह्य संसाधनों के विकास के लिए है।
          पारंपरिक अर्थ के रूप में मंत्र,तंत्र,और यंत्र का उपयोग स्वभाव, विचार और कर्मों को दिशा देने के लिए होता था।
       जो बाद में अलग अलग प्रकार की साधना,उपासना,अनुष्ठान और क्रियाकांड में बदल कर विकृत हो गया, और इसका प्रयोग इष्ट देवी या देवता को सात्विक ,राजसी और तामसिक रूप से प्रसन्न करने और इच्छा पूर्ति के लिए होने लगा। यज्ञ और होम हवन के लिए भी होने लगा। इसके बाद विविध प्रकार के सांप्रदायिक उपचारों हेतु ग्रहों और उसके कारकत्व के साथ मंत्र ,तंत्र,यंत्र को जोड़ दिया। और इसका प्रभाव बहुत समय तक समाज में रहा, बाद में यह केवल देवी देवताओं तक सीमित न रह कर नाग,किन्नर, अप्सरा, यक्षिणी,भूत ,प्रेत, गण, भैरव,पिशाच, डाकिनी, शाकिनी, बैताल, ब्रम्हराक्षस, पीर, फकीर, महात्माओं, संतो , वीर,जोगिनी की विशिष्ट कृपा प्राप्ति हेतु किए जाने वाले अभिचारिक प्रयोगों का माध्यम बन गया और यहां से और विकृत हो कर विविध प्रकार के अंधविश्वासी विचारों को फैलाने का निमित्त बन गया, जिनसे बहुत प्रकार के मानसिक रोगों का जन्म हुआ, और समाज में आज भी इसका भय फैला हुआ है। 
ज्योतिष में ग्रह पीड़ा के निवारण के लिए, रत्नों को सिद्ध करने हेतु , दान के संकल्प के लिए एवं और भी बहुत तरह से आज भी इसका प्रयोग किया जाता है, जो मेरी दृष्टि में अंधविश्वास ही है।
     यह कर्म और पुरुषार्थ की जगह चमत्कार और जादू की मानसिकता को बढ़ावा देता है, गुणों में वृद्धि की जगह स्थूल और शुष्क आराधनाओं को और आडम्बरों को जन्म देता है। इसी लिए उपाय के तौर पर केवल श्रद्धा से ही इसका उपयोग ठीक है परन्तु इस से किसी विशेष लाभ की प्राप्ति पर संशय है।


(5) प्रश्न : किसी विशेष देवी देवताओं के नाम का जप क्या फल देता है? क्या वह ग्रहों को नियंत्रित करता है?

उत्तर: नाम एक विशेष पहचान की और संकेत करता है, नाम की एक छवि है। ॐ भी वैसे तो नाम है परन्तु फिर भी उसकी प्रतीकात्मक आकृति है। और जिसकी भी प्रतीकात्मक आकृति या चिन्ह है , वह दिमाग के लिए केवल एक विषय है।
      इसे जरा शांति से देखे, हमारा दिमाग विचार करने और प्रतिक्रिया करने के लिए बना है, वह लगातार शरीर की गतिविधियों को भी नियंत्रित करता है। विचार शब्द,चित्र ,अनुभव और स्मृति के सामूहिक अर्थघटन से बनते है। हमारा दिमाग अन्वेषण, पृथकरण और चिंतन करता रहता है। समझिए कि उसमें अलग शब्दों और चित्रों का एक अव्यस्थित समूह है। जो इधर उधर भटक रहा है जैसे कोई बंजारा बिना किसी मंजिल के भटक रहा है। 
अब जब भी हम जप करते है तो वह विचार रूपी जो बंजारा होता है वह कुछ समय के लिए किसी एक रस्ते पर केंद्रित हो जाता है, और यदि उस नाम जप का कोई अर्थ है ,कोई छवि है, कोई कथा, प्रभाव या मूर्ति है तो वह बंजारा उस दिशा में वह ढूंढता है। जैसे अगर में महाकाली के मंत्र का जाप करता हूं,तो मेरा दिमाग और विचार महाकाली के बारे में ,उनके स्वरूप और स्मृति में एकाग्र हो जाता है। और यदि वह विचार एकाग्र हो जाता है तो उसी से जुड़े हुए अनुभव भी हो सकते है। जो आगे चल के भ्रामक बीमारी भी बन सकते है।
   बहुत से लोग रोज जप करने के बाद भी दिमाग को एकाग्र नहीं कर पाते। वह व्यथित हो जाते है। और प्रश्न करते है कि उनका मन भटक जाता है, एक बंजारा ही है विचार उसका काम है भटकना।
              महर्षि महेश योगी, और श्री श्री रविशंकर की एक पद्धति है जिसको को ट्रान्सेंडैंटल मेडिटेशन या सहज ध्यान कहते है । हाला की उनकी पद्धति में बीज मंत्र जैसे "ऐं", "श्रीं", "क्लीं" का उपयोग होता है और जिसका एक अर्थ होता है जो भगवती के स्वरूप का नाद मूल है। वह व्यक्ति को ध्यान में बैठने को कहते है और जब भी विचार रूपी बंजारा इधर उधर भटके उसको वापस इसी मंत्र पर लाने को बोलते है । जहां बीज मंत्र का उपयोग एक साधन की तरह भटके विचार को ठीक एकाग्र करने हेतु होता है।
        अब एक और पद्धति है जिसमें दिए जाने वाला अक्षर न ही कोई मंत्र है और उसका न ही कोई प्रतीक ,अर्थ या चित्र होता है ,उसका न ही कोई अर्थ निकाला जा सकता है। जैसे "पुक", " डूस"। अब ऐसे शब्द का जप और ध्यान करने को कहा जाता है अब यह शब्द का दिमाग कोई अर्थघटन नहीं कर सकता, न ही यह किसी शास्त्र, पुराण,पूजा या विशेष देवी देवताओं से जुड़े है। तो दिमाग इस पर अर्थघटन नहीं कर सकता और कुछ समय बाद विचारों की गति धीमी हो जाती है और मन को शांति का अनुभव होता है।
इसका ज्योतिष या ग्रहों से कुछ भी लेना देना नहीं है। यह केवल मन की शांति और एकाग्रता के लिए है।