Scene 1
शाम के 7:45 pm हुए थे कृष्ण मंदिर के बाहर बेंच पर शौनक, दुष्यंत, रेवती, रवि, नूपुर, श्रीधर , गायत्री और सारिका सब दोस्त बैठे हुए थे ,15 दिन के बाद भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा थी जिसमें सुभद्रा, बलराम और भगवान जगन्नाथ जी गुंडीचा जाते हैं जिसके लिए रथ यात्रा के लिए भगवान की मूर्ति को तैयार करना और यात्रा का आयोजन भी इन लोगों को करना था | सभी लोग हेरा पंचमी के दिन एक खास नाटक करने के लिए इकट्ठा हुए हैं जिसमें भगवान जगन्नाथ से लक्ष्मी जी नाराज हो जाती हैं और वहाँ छोटा सा झगड़ा भी करते हैं यही नाटक को लेकर उन सब मे चर्चा हो रही थी तभी दुष्यंत बोलता है :
दुष्यंत (अफसोस से) : दोस्तों, आप लोग यात्रा की तैयारी कर लेना मैं नहीं आ पाउंगा!
नूपुर : क्यूँ? क्यूँ नहीं आ पाओगे?
दुष्यंत : अरे मेरा M. A Indian Knowledge system सेम 2 की परीक्षा है!
रवि : कोई बात नहीं तेरी परीक्षा पूरी होने के बाद थोड़ी प्रैक्टिस कर लेना |
रेवती : हाँ नाटक तो करना ही है, मजा आयेगा, एक काम करते हैं, दुष्यंत तुम exam के बाद जॉइन कर लेना, प्रैक्टिस कर लेंगे, तुम थोड़ी ज्यादा मेहनत कर लेना लेकिन करना तो है ही (खुशी से)
दुष्यंत : हाँ वैसे भी चार सब्जेक्ट है, हो जाएगा चल मैं जॉइन करूंगा तुम लोगों को |
Scene 2
दुष्यंत के सिवा बाकी के दोस्त तैयारी कर रहे थे, तभी दुष्यंत आता है, उसे देखकर नूपुर बोलती है,
नूपुर : अरे दुष्यंत! कैसी रही तुम्हारी IKS परीक्षा?
दुष्यंत : हाँ अच्छी रही, ( मंदिर की तरफ हाथ जोड़ते हुए) भगवान जगन्नाथ की कृपा रही |
वहां फिर सबने प्रेक्टिस करी और अब सब लोग ग्रुप में बट गए थे, तय हुआ था कि शौनक, दुष्यंत, रेवती और रवि ये चार लोग हेरा पंचमी के दिन भगवान जगन्नाथ का पक्ष लेंगे जब कि नूपुर, श्रीधर, गायत्री और सारिका ये लोग मंदिर में ही रहेंगे और हेरा पंचमी के दिन लक्ष्मी जी का पक्ष लेंगे |
Scene 3
रथ यात्रा का दिन था, सभी भक्त और सेवक यात्रा के रथ को खिंच कर अपनी भक्ति और समर्पण के साथ आगे बढ़ा रहे थे | गुंडीचा मंदिर में तीनों रथ के आगमन हुआ भगवान जगन्नाथ जी, बलराम और सुभद्रा का भव्य स्वागत किया गया | सबने पूजा अर्चना के बाद प्रसाद एवं भोजन किया गया | प्रसाद मे छप्पन भोग लगाया गया था | यहां इन लोगों के साथ लक्ष्मी जी नहीं है, जब कि महल में लक्ष्मी जी इन तीनों को ढूंढने लगती है तब रुक्मणी अपनी सहेली नूपुर से कहती है,
लक्ष्मी जी : नूपुर, मैं सुबह से प्रभु, और बलराम को ढूंढ रही हूँ लेकिन वो लोग सुबह से गायब है |
नूपुर : सुभद्रा को भी नहीं देखा मैंने, वो भी सुबह से दिख नहीं रही है कहीं |
लक्ष्मी जी सारिका और गायत्री को बुलाती है,
लक्ष्मी जी : आप लोगोंने प्रभु और बलराम - सुभद्रा को देखा क्या?
गायत्री और सारिका : नहीं लक्ष्मी जी !!
लक्ष्मी जी :मुजे चिंता हो रही है, भगवान जगन्नाथ कहीं किसीके साथ द्वंद्व करने तो नहीं पहुंच गए होंगे ना? और सुभद्रा भी नहीं है |
इतने में श्रीधर आता है, और बोलता है कि
श्रीधर : लक्ष्मी जी!! भगवान, सुभद्रा और बलराम ये तीनों गुंडीचा गए है, अपनी "मौसी माँ" के यहां |
लक्ष्मी जी (गुस्से में) : क्या??!!! वो लोग गुंडीचा गए हैं और वो भी मुजे अपने संग लिए बिना ?!!
श्रीधर : जी हाँ, आपको साथ लिए बिना ही चले गए वो |
गायत्री : एसा नहीं करना चाहिए था उन्हें!!
श्रीधर : लेकिन एसा हुआ है, अब क्या करना चाहिए हमे?
लक्ष्मी जी : वापिस आने दो उन्हें, एसा सबक सिखाएँगे की याद रखेंगे |
नूपुर : हाँ एसा ही करिए |
लक्ष्मी जी : सुनो आप लोग
सब ध्यान देते हैं
लक्ष्मी जी : ये लोग जैसे ही वापिस आते हैं, हवेली का मुख्य द्वार ही बंद कर दो, आने ही मत देना उन्हें |
सारिका : हाँ हाँ एसा ही करते हैं चलो |
लक्ष्मी जी : बाहर रहेंगे पता चलेगा |
Scene 4
हेरा पंचमी का दिन, जब भगवान, बलराम और सुभद्रा वापिस आने के लिए गुंडीचा मंदिर से प्रस्थान करते हैं | भगवान जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा के साथ वापिस आ रहे बाकी के लोग रवि, दुष्यंत, रेवती और शौनक को ये नहीं पता था कि वापिस आने के बाद क्या होने वाला है | तीनों रथ वापिस मंदिर के पास रखे, नगर सेवकों ने आरती की और स्वागत किया, लेकिन जब वापिस आए लोगों ने देखा तो उन्हें आश्चर्य हुआ कि मंदिर का मुख्य द्वार बंध कर दिया गया है और सारी खिड़कियाँ भी बंद है और मुख्य द्वार पर लक्ष्मी जी की सहेलियाँ नूपुर, गायत्री, सारिका और श्रीधर डट कर खड़े हैं | दुष्यंत और रवि भगवान की मूर्ति को मंदिर की और ले जाते हैं तब भी उन्होंने दरवाजा नहीं खोला, तभी शौनक बोलता है :
शौनक : कृपया द्वार खोले, प्रभु को अंदर आना है |
नूपुर : हाँ तो जाओ ना अन्दर, किसने रोका है?
दुष्यंत : अरे मुख्य द्वार ही बंद है तो कैसे अन्दर जाएंगे हम?
गायत्री (क्रोध में) : द्वार नहीं खुलेगा |
रेवती : अरे लेकिन आप हमे अन्दर आने से क्युं रोक रहे हो? इस देवलोक में हमारा कुछ मान सन्मान है, आप लोग एसा करेंगे तो हमारी बेइज्जती होगी |
नूपुर ( गुस्से में) : ये सब बिना लक्ष्मी माता को साथ लिए गुंडीचा मंदिर चले गए थे तब सोचना चाहिए था!!!
तभी वहाँ भगवान जगन्नाथ आते हैं, उनको देखते ही सब लोग उन्हें प्रणाम करते हैं
भगवान जगन्नाथ : आप लोग हमे मंदिर में प्रवेश करने से क्यूँ रोक रहे हैं?
तभी वहां लक्ष्मी जी आती है, वो गुस्से में है और नाराज भी बहुत है | पांच दिनों के बाद अपने प्रियतम जगन्नाथ को देख कर मन ही मन में प्रसन्न तो होती है किन्तु वे अभी भी गुस्से में ही है |
लक्ष्मी जी : वाह प्रभु!! आ गए वापिस, आनंद प्रमोद किया होगा ना?!! मेरे बिना!!!
जगन्नाथ जी : ना देवी, आपके बिना मैं आनंद मे कैसे रह सकता हूं भला |
लक्ष्मी जी : ना ना, हमे सन्देशा मिला था कि आप, सुभद्रा और बलराम जी, आप लोगों ने बहुत आनंद किया, बहुत प्रेम और लाड प्यार मिला आपको |
आगे कहती है
आप मुजे साथ लिए बिना जा ही कैसे सकते हो!!!
जगन्नाथ जी : अरे ना देवी, यदि हम सब चले जाते तो इतनी विशाल सृष्टि का संचालन कैसे होता भला, आप इधर थी तो मैं निश्चिंत था कि आप संचालन के लिए पर्याप्त है, इसीलिए हम लोग निश्चिंत होकर गए थे |
लक्ष्मी जी : हाँ तो अब भी क्यूँ आए हैं आप? वापिस जाइए न!! हम सृष्टि का संचालन देख लेंगे!!
जगन्नाथ जी : आपका क्रोध सही है देवी लेकिन मैं आपको पंसद है वो सारी मिठाई, गहने और वस्त्र लाया हूँ,कृपया ग्रहण करे देवी |
लक्ष्मी जी (नाराज होकर) : मुजे आप से बात ही नहीं करनी, अब आप पूरी रात बाहर ही रहिए |
इतना बोलकर लक्ष्मी जी भीतर चली जाती है, अब फिर से दरवाजा बंद हो जाता है और श्रीधर, नूपुर, गायत्री और बाकी के लोग फिर से डटकर खड़े हो जाते हैं, रेवती बोलती है
रेवती : देखिए, हमे अन्दर आने दीजिए, हम सब यात्रा करके थक गए हैं -
सारिका ( बीच में बात काटकर) : हाँ तो बाहर ही सो जाइए, जाइए करिए विश्राम |
दुष्यंत : एसा करना पाप है, पाप लगेगा आप सबको, माँ लक्ष्मी का तो क्रोध है लेकिन आप लोग तो अंदर आने दीजिए हमे |
गायत्री : जी नहीं!! बाहर मतलब बाहर, और दुष्यंत कर्तव्य का पालन करना पाप कब से हो गया?!!
श्रीधर : सही कहा गायत्री ने, जैसे भगवान जगन्नाथ हमारे स्वामी है वैसे ही लक्ष्मी माता भी हमारी स्वामिनी है, उनका दिया गया आदेश हमारे लिए कर्तव्य पालन है, और कर्तव्य पालन पाप रहित होता है एसा स्वयं भगवान जगन्नाथ जी ने ही कहा है ना??!!
नूपुर और श्रीधर एक साथ : रहो अभी बाहर!!
इतना कहकर वो लोग मंदिर मे जाते हैं, शौनक, दुष्यंत, रेवती और रवि और बाकी सब लोग वही बाहर बैठते हैं | रात का समय था लोग भगवान जगन्नाथ की आरती कर रहे थे |
Scene 5
मंदिर के अंदर नूपुर, श्रीधर, सारिका और बाकी के लोग लक्ष्मी जी के साथ बैठे हैं,तभी लक्ष्मी जी बोलती है
लक्ष्मी जी : मैंने द्वार बंध तो करवा दिए लेकिन मुजे प्रभु की चिंता हो रही है, वे यात्रा करके थक गए होंगे |
नूपुर : माता , वे सब कुशल है, बाहर रहने की व्यवस्था नगरजनों ने कर दी है |
गायत्री : हाँ और खाने का भी तो प्रबंध हो गया है |
लक्ष्मी जी : नूपुर, यहाँ उपर से देखना ज़रा, उन लोगों को खास कर सुभद्रा को कुछ समस्या तो नहीं है ना?!!
नूपुर जाती है,
सारिका : चिंता मत करिए माँ, मैंने दास दासियों को बोल दिया है वे प्रभु की सेवा में रहेंगे |
मंदिर के बाहर बैठे लोगों मे तनाव था, शौनक और रवि बात करते हैं,
रवि : ये समस्या सुबह होने के बाद भी नहीं खत्म होगी तो??!!
शौनक (श्रध्दा पूर्वक) : अब वही हमारी समस्या का समाधान कर सकते हैं!!
रवि : कौन?
शौनक : भगवान शिव!! ( बैकग्राउंड मे शंखनाद होता है) हम भगवान शिव की अराधना करते हैं अभी जाते हैं, और उन्हें ये समस्या का समाधान करने के लिए विनति करते हैं!!
रवि : हाँ चल |
रवि और शौनक के साथ बाकी के सब लोग भी भगवान शिव की पूजा करते हैं, और उन्हें समस्या का हल करने के लिए विनति करते हैं |
Scene 6
सुबह की पहली किरण फूटते ही मंदिर परिसर में एक दिव्य प्रकाश छा जाता है। भगवान शिव और माता पार्वती का आगमन होता है। सोये हुए लोग उठते हैं तब उन्हें शिव - पार्वती दिखते हैं, वे सब उन्हें प्रणाम करते हैं |
शिव पार्वती के आने के समाचार मिलते ही मंदिर में से तैयार होकर लक्ष्मी जी और बाकी के लोग भी आते हैं, सभी नगरजनों , सेवकों, सब उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम करते हैं | भगवान जगन्नाथ वहाँ आते हैं, शिव जी, जगन्नाथ जी को प्रणाम करते हैं | शिव, लक्ष्मी जी से कहते हैं,
शिव : हे देवी लक्ष्मी, आपने स्वयं जगत पिता को भीतर आने से रोका है, ये घटना से पूरी सृष्टि का संतुलन बिगड़ चुका है |
लक्ष्मी जी : हे महादेव, मैं इस बात से अवगत हूं, किन्तु मैं गुस्से में थी, इसलिए मैंने ये कर्म किया है |
पार्वती : हाँ देवी , आप सही हो किन्तु अब आप कृपया प्रभु जगन्नाथ को भीतर आने दे |
इतने में प्रभु जगन्नाथ बोलते हैं,
जगन्नाथ जी: देवी, मैं फिर से क्षमा मांगता हूँ। मैं आपके लिए वे सभी उपहार और मिठाइयाँ लाया हूँ जो आप पसंद करती हैं।
लक्ष्मी जी ये सुनकर प्रेम भरी मुस्कान के साथ प्रभु को देखती है |
पार्वती : अब आप दोनों समाधान कर लीजिए और इस झगड़े का अंत कीजिए |
भगवान जगन्नाथ अपने साथ रसगुल्ले लाए हैं उसमे से एक रसगुल्ला लक्ष्मी जी को खिलाते है |
शिव : हे देवी लक्ष्मी! आप जिसे 'क्रोध' और 'दूरी' समझ रही हैं, वह मात्र एक भ्रम है। ज्ञान परंपरा में प्रेम का अर्थ केवल 'आसक्ति' नहीं, बल्कि 'अद्वैत' है—जहाँ 'मैं' और 'तुम' का भेद मिटकर केवल 'परमात्मा' का अस्तित्व शेष रहता है
(मंदिर के द्वार पूरी तरह खुल जाते हैं। दोनों पक्षों के मित्र (दुष्यंत, रेवती, नूपुर, गायत्री, सारिका, रवि, शौनक, श्रीधर) एक-दूसरे को गले लगाते हैं। उनके बीच का सारा तनाव खत्म हो जाता है।)
सभी लोग एक साथ : हर हर महादेव!! जय माँ लक्ष्मी जी!! जय भगवान जगन्नाथ!!
समाप्त