Asmitaaz's accounts of piercing and flickering memories - Book Review in Hindi Book Reviews by Neelam Kulshreshtha books and stories PDF | अस्मिताज़ के चुभती-झिलमिलाती यादों के वृतांत - Book Review

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अस्मिताज़ के चुभती-झिलमिलाती यादों के वृतांत - Book Review

नरेश गुलाटी

अस्मिता अहमदाबाद महिला लेखकों का ऐसा संगठन है जो अपनी उपस्थिति काफ़ी सक्रियता से दर्ज करता रहता है।गुजरात के इस बहुभाषी महिला साहित्यिक मंच की प्रथम स्थापना नीलम कुलश्रेष्ठ व अन्य सहयोगी महिला लेखिकाओं ने 1990में वड़ोदरा(गुजरात) में की थी। वहां अस्मिताके सफ़ल संचालन के बाद जब सन 2009 में नीलम सपरिवार अहमदाबाद आईं तो उन्होने यहां डॉ.रंजना अरगड़े के साथ मिलकर अस्मिता, अहमदाबाद की स्थापना की। 

 अहमदाबाद आने के बाद नीलम ने 'घर की देहरी लांघती स्त्री कलम'पुस्तक संपादित कर गुजरात की कवयित्रियों की विशेष प्रतिभा से देश को परिचित करवाया। इसी क्रम में इन लेखिकाओं को उन्होने राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं से जोड़ा व इनकी प्रतिभा राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत हुई।

 अस्मिता की मासिक गोष्ठियां इसकी अध्यक्ष डॉ .सुधा श्रीवास्तव के निवास स्थान पर होतीं रहीं हैं। इन साहित्यिक गोष्ठियों में नई पुस्तकों पर चर्चा-विमर्श,बधाईओं का आदान प्रदान या रचनाओं का पाठ और मिलना-जुलना हो जाता है। कुछ उचित अवसरों पर सभा स्थलों पर बड़े कार्यक्रम भी किए जाते हैं। छः वर्ष पहले एक मित्र की पुस्तक के विमोचन के लिए मुझे भी अस्मिता का सहयोग मिला था। 

 फ़िलहाल अस्मिता से जुड़ी 16 लेखिकाओं के संस्मरणों का एक संकलन संदर्भ में है जिसका शीर्षक है: “जीवन की कुछ चुभती, कुछ झिलमिलाती यादें”। अहमदाबाद में अस्मिता के सोलह वर्ष पूरे होने के उपलक्ष में नीलम ने ये पुस्तक संपादित की है जिसमें सायास 16 लेखिकाओं के लेख समाविष्ट हुए।वैसे तो अस्मिता से जुड़ी लेखिकाएं अलग-अलग विधाओं खासकर तीन प्रमुख विधाओं कविता, कहानी और उपन्यास में स्वयं को अभिव्यक्त करने में सिद्ध और समर्थ हैं, परंतु इस संकलन में सम्मिलित हुई लेखिकाओं ने अपने-अपने जीवन के बहुत ख़ास समय को संस्मरण लेखन के लिए चुना और इसे याद किया है। 

 यह समय या तो उनके जीवन के कठिन दौर का था या कुछ खुशनुमा यात्राओं आदि का था, या किसी सामाजिक शोध कार्य या फ़िल्म निर्माण से जुड़ा हुआ भी था। सभी सूरतों में समय याद रह जाने वाला तो था ही, इसीलिए इसे `जीवन की यादें `से जुड़ा शीर्षक मिला और अस्मिता की वरिष्ठ सदस्य और अभी भी पत्रकार और साथ ही बहुविध लेखिका नीलम कुलश्रेष्ठ जी ने पहल करके यह संस्मरण लिखवाए और फिर संपादन-संकलन करके वनिका प्रकाशन, दिल्ली से इस पुस्तक को छपवाया।  उन्हें कुछ लोगों  ने कहा कि किसी एक लेखक के तो संस्मरण की पुस्तकें  तो प्रकाशित हुईं हैं किन्तु  अलग अलग लेखिकाओं के संस्मरणों का संकलन संभवतः कहीं प्रकाशित नहीं हुआ है। 

 पुस्तक में कुल 16 लेखिकाओं के 17 संस्मरण और एक अट्ठाहरवाँ हास्य में पगा हुआ संस्मरण है। नीलम जी और शिल्पा श्रीवास्तव ने दो-दो आलेख लिखे हैं।

 इन संस्मरणात्मक आलेखों में व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों और जियोपोलिटिकल परिदृश्य की अभिव्यक्ति हुई है। यह अभिव्यक्ति किसी भी व्यक्ति या समूह को लेकर हुई हो, मानवीय संवेदना का स्वर इन सभी आलेखों में प्रमुखता से अंतर्निहित है और बड़ी मार्मिकता से लक्षित होता है, पाठक तक पहुंचता है। 

 उदाहरणार्थ नीना अंदोत्रा के आलेख “मेरी अरदास” में मातृत्व प्राप्ति को लेकर चली इनकी लंबी जद्दो-जहद का वृतांत अपनी संवेदना में वैयक्तिक-परिवारिक से सामूहिक हो जाता है, खासकर तब जब उनकी एक मित्र प्रकृति से उनकी इस लड़ाई में उनका हाथ पकड़ लेती हैं। यहाँ न केवल व्याधि से मुक्ति का सुखान्त होता है, बल्कि सफल संतानोत्पत्ति में आयुर्वेद सहायक होता है यह एक अतिरिक्त सुखद प्रतीति बन जाती है। 

 इसी तरह नयना डेलीवाला की छोटी बहन की विकलांगता संबंधी उनकी लंबी लड़ाई, मल्लिका मुखर्जी के बेटे की एस्पर्ज़र्स रोग की जानकारी से परिवार में आई चुनौती और बदलाव का वृतांत तथा कविता पंत के पिता और माता दोनों की गंभीर व्याधियों से उनकी स्वयं की तथा उनके परिवार की लड़ाई के हृदयस्पर्शी वृतांत पाठकों को दूसरे का दुख महसूस करने की समझ देते हैं। मल्लिका की स्वयं की कैंसर से लड़ाई के बारे में वह पिछले दो तीन वर्षों में अलग से लिखती रही हैं जिससे पता चलता है कि वह दोहरे मोर्चों पर सफलता से लड़ती रही हैं। 

 रोग और उससे जुड़ी तकलीफ़ की इन पारिवारिक स्थितियों से आगे अन्य लेखिकाएं अपने विदेश प्रवास अथवा विदेश यात्राओं-भ्रमण के हवाले से हमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुई मानवीय त्रासदियों और संघर्षों के परिचय देते  हमारी संवेदनाओं को जागृत कर देती हैं चाहे वह नियति सप्रे  का इराक़ संबंधी लेख हो या प्रभा मजूमदार का आयरलैंड और बेलफास्ट की यात्रा का वृतांत। 

 इराक़ वाले आलेख से पता चलता है कि आम जीवन में इस धरती के सभी मनुष्य कितने सीधे और निश्छल हो सकते हैं, यदि उन्हें धर्म और सत्ता की अफ़ीम चटाकर रेडिक्लाइज़ न किया जाए तो। 

 बेलफास्ट वाले आलेख में स्थानीय लोक आख्यानों और आयरलैंड की स्वतंत्रता के संघर्ष के साथ साथ प्रभा जी रोचक बात बताती हैं कि टाइटेनिक जहाज़ बेलफास्ट से निकट पड़ते समुद्र में डूबा था और इस हादसे और इस जहाज़ को लेकर एक संग्रहालय इस शहर में स्थापित है। 

नीलम जी अपने पहले संस्मरण में बच्चों के जीवन में उनकी पैदाइश के समय पर घुट्टी पिलाने से शुरू होने वाली दादा-दादी और नाना-नानी की उपस्थिति और महता के मुद्दे को रेखांकित करती हैं जबकि अपने दूसरे संस्मरण में वह अपनी थाइलैंड यात्रा के वृतांत सुनाती हैं। 

 यात्राओं के क्रम में तीन लेखिकाओं निशा चंद्रा, डॉ .अंजना संधीर और निकुंज जानी अपनी अमेरिका यात्राओं के अनुभव और किस्से सुनाती हैं। तीनों के आलेखों से समान बात यह निकल कर आती है कि वहाँ सार्वजनिक जीवन में अनुशासन और सभ्याचार एक आम पर अहम बात है जिसका अनुसरण हमारे जैसे उच्छृंखल समाज को भी करना चाहिए। 

 एक रोचक तथ्य यह भी सामने आता है कि अंजना जी हिंदी फिल्मों के गानों के माध्यम से अमेरिका में हिंदी पढ़ाने का काम सफलता से सरंजाम देती रही हैं। नियति जी के आलेख से आप  लॉस  वेगास, लेक तहो और योस्मिते जैसे स्थानों की आनंदमय यात्रा में साथ हो लेते हैं।निशा जी के वृतांत का सबसे आनंदमय क्षण वह है जब वह अपने प्रवास के शहर की एक लाइब्रेरी के हिंदी विभाग में अपनी दो पुस्तकों को सामने देखती हैं और फिर एक भारतीय महिला उन्हें इस बात की सूचना देती हैं कि उन्होंने निशा जी की पुस्तकें पढ़ी हैं। 

सामाजिक जीवन और पुलिस की नौकरी के अनुभवों को लेकर मीरा रामनिवास का आलेख पठनीय है, ख़ास तौर पर पीड़ित और प्रताड़ित महिलाओं के संबंध में। पोरबंदर की डॉन कुख्यात संतोष बेन जाड़ेजा  ,जिस पर फ़िल्म`गॉड मदर ` बनी थी ,से मीरा जी यानी एक महिला आई पी एस अधिकारी की टक्कर एक रोमांच पैदा करती है।

इसी तरह सामाजिकता के वर्ग में शिल्पा श्रीवास्तव का आलेख कमाठीपुरा और थर्ड जेंडर के मनोविज्ञान, कटु यथार्थ और समस्याओं की पड़ताल करता है-सूचित करता है जबकि उन्हीं का दूसरा आलेख धर्मशाला , मैक्लोडगंज  में तिब्बती बौद्ध प्रवासियों के मुख्यालय के प्रसंग में वहाँ बदलती हवा और परायेपन के संदर्भ उठाता है। 

कोरोना के समय के डर के आगे जीत की मिसाल मिलती है साधना भट्ट के आलेख में, जो बताती हैं कि कैसे उन्होंने उस समय में न केवल अपनी प्रिय विधा कविता-गीत आदि में चार पुस्तकों की रचना की अपितु फ़िल्मी गीतकार शैलेंद्र के गीतों का अध्ययन-विश्लेषण करते हुए इस विषय पर भी एक अलग पुस्तक लिख डाली!! और फिर इसके आगे भी सार्वजनिक मंचों पर कुछ और द्वार खुलते चले गए। 

इस नव द्वार के शेष विवरण और अन्य अचर्चित छूट रहे तृप्ति अय्यर, सुधा जी और स्वाति मेढ़ के कहानी नुमा या हास्य लेख नुमा संस्मरण और वास्तव में समूची पुस्तक की पठनीयता का पूर्ण आस्वाद लेने के लिए आपको स्वयं यह संकलन पढ़ना चाहिए।

 

पुस्तक -`जीवन की कुछ चुभती :कुछ झिलमिलाती यादें ` [संस्मरण  संकलन ]

संपादक--नीलम कुलश्रेष्ठ 

प्रकाशक -- वनिका पब्लिकेशंस

मूल्य –270 रु.

समीक्षक -नरेश गुलाटी ,मो.---8630766612