*कलयुग का सच*
जुलाई की सुबह थी। रीना ने बच्चों को स्कूल भेजा, किचन समेटा और फिर अपनी माँ को फोन लगाया।
फोन उठते ही माँ की आवाज सुनकर रीना चौंक गई। माँ बहुत दुखी और भारी स्वर में बोल रही थी।
"क्या हुआ माँ? आपकी आवाज ऐसी क्यों है?" रीना ने घबराकर पूछा।
माँ ने लंबी सांस ली और कहा, "बेटा हमारे सामने वाले शर्मा जी के बेटे की... अचानक हृदय गति रुकने से रात को मृत्यु हो गई। मैं अभी उनके घर से ही आ रही हूं। बहुत बुरा हाल है उनका।"
रीना का दिल बैठ गया। शर्मा जी का बेटा अभय। रीना उसे अच्छी तरह जानती थी। सामने ही घर था, आना-जाना लगा रहता था। अभय की तो अगले महीने शादी भी तय थी।
"कैसे हुआ माँ? वो तो बिल्कुल ठीक था ना?" रीना ने आश्चर्य से पूछा।
"क्या बताऊं बेटा," माँ का गला भर्रा गया, "देहरादून में अच्छी जॉब करता था। किसी लड़की के साथ अफेयर था। जब माँ-बाप को पता चला तो उन्होंने डाँट दिया और कहा 'पहले कुछ बन जा, फिर ये सब करना'। बस इतनी सी बात पर गुस्से में अपने कमरे में बंद हो गया। रात को ना जाने कौन सी दवाई खा ली। सुबह दरवाजा तोड़ा तो बेजान पड़ा मिला।"
फोन रखकर रीना देर तक सोचती रही। 24 साल का लड़का। मां-बाप की डांट सहन नहीं कर पाया।
शाम को जब पति ऑफिस से आए तो रीना ने सारी बात बताई। पति ने कहा, "यही हो रहा है आजकल। बच्चों में सहनशक्ति खत्म हो गई है।"
माँ ने भी फोन पर यही कहा था, "कैसा कलयुग आ गया है। एक हमारा जमाना था। माँ-बाप दो थप्पड़ भी लगा देते थे तो बच्चे बुरा नहीं मानते थे। उल्टा समझते थे कि भलाई के लिए डांटा है। आज तीन-चार साल का बच्चा भी माँ-बाप को जवाब देता है।"
रीना को माँ की बातें सच लग रही थीं। पहले संयुक्त परिवार होते थे। 12-15 लोग एक घर में रहते थे। दादा-दादी, चाचा-ताऊ सब होते थे। कोई डांटता था तो दूसरा समझाता था। गलती करने पर सबक भी मिलता था और प्यार भी।
अब न्यूक्लियर फैमिली का जमाना है। पति-पत्नी, एक या दो बच्चे। बस। घर में कोई बड़ा नहीं जो बच्चे को रोक-टोक करे, संस्कार दे। और रही-सही कसर मोबाइल ने पूरी कर दी।
बच्चे सुबह से रात तक फोन में घुसे रहते हैं। माँ-बाप भी फ्री होने के लिए बच्चे के हाथ में फोन पकड़ा देते हैं। बातचीत खत्म, साथ खाना खत्म, पार्क जाना खत्म। सामाजिकता ही नहीं रही।
रीना को याद आया, पिछले हफ्ते ही उसके बेटे ने होमवर्क के लिए डांटने पर कहा था, "तुम्हें कुछ पता ही नहीं है।" रीना उस दिन बहुत दुखी हुई थी।
माँ ने सही कहा, "गलती हमारी ही है। ज्यादा लाड-प्यार में हम बच्चों को संस्कार देना ही भूल गए हैं। उन्हें मुश्किलें सहना नहीं सिखाया। हर बात पर 'कोई बात नहीं बेटा' कहकर उनकी हर जिद पूरी कर दी।"
अगले दिन रीना शर्मा जी के घर गई। माहौल बहुत गमगीन था। अभय की माँ बार-बार कह रही थी, "काश उस दिन डांटा न होता। चुप हो जाती।"
रीना ने उनका हाथ पकड़कर कहा, "आंटी, आपकी कोई गलती नहीं है। आपने तो बस फर्ज निभाया। गलती इस सिस्टम की है जिसने हमें बच्चों से बात करना ही नहीं सिखाया।"
घर आकर रीना ने सबसे पहले अपना और बच्चों का फोन एक डिब्बे में रख दिया। रात को खाने की टेबल पर सब साथ बैठे। खूब बातें हुईं। हंसी-मजाक हुआ।
उस रात रीना ने डायरी में लिखा, "मोबाइल जरूरी है, लत नहीं। डांट जरूरी है, नफरत नहीं। और सबसे जरूरी है - बातचीत। अगर आज हमने बच्चों को सुनना और समझना शुरू नहीं किया, तो कल बहुत देर हो जाएगी।"
कलयुग का सच यही है - रिश्ते बचाने हैं तो पहले वक्त देना होगा। वरना फोन की स्क्रीन पर उंगली घिसते-घिसते हम अपनों को ही खो देंगे।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली