Lau ko ehsaas nahin mome ke dard ka in Hindi Women Focused by Rakesh Kaul books and stories PDF | लौ को एहसास नहीं मोम के दर्द का

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लौ को एहसास नहीं मोम के दर्द का

लौ को एहसास नहीं मोम के दर्द का   

 

आज काफ़ी कोशिशों के बावजूद भी घर से निकलने में काफी देर हो गई थी | यह तो अच्छा था कि गर्मियों की तेज़ धूप की वजह से सड़कें कमोबेश सूनी ही थीं जिसके कारण समीर ने तेज़ी से बाइक दौड़ाते हुए घड़ी के काँटे पर मुझे बस स्टैंड पहुँचा ही दिया | उस वक़्त मेरी बस गेट तक पहुँच ही चुकी ही थी | चलती गाड़ी में ही किसी तरह बस में चढ़ी | समीर ने बमुश्किल बैग मेरे हवाले किया ही था कि बस रवाना हो गई | मैंने ईश्वर का शुक्रिया अदा किया कि किसी तरह सही-सलामत बस में दाख़िल हो सकी थी | बैग वगैरह व्यवस्थित रखकर अपनी नियत सीट पर बैठकर मैंने चैन की साँस ली | थोड़ी ही देर में बस हाईवे पर सरपट दौड़े जा रही थी | सूरज के ढलते ही तपिश कुछ कम हो गई थी और खिड़की से भीतर आते हवा के झोके भी अब थोड़ा सुकून दे रहे थे | सड़क के किनारे लगे पेड़ों को देखकर ऐसा जान पड़ता था मानो वे वक़्त के ख़िलाफ़ तेज़ी से दौड़ लगा रहे हों | शायद मेरी तरह वे भी कुछ ऐसा पाने की कोशिश कर रहे थे जो वक़्त के तेज़ बहाव में कहीं पीछे छूट गया था | पिछले एक हफ़्ते में मेरी ज़िंदगी में जो कुछ इतनी तेज़ी से घटा है उसने मेरी सोच को उलट-पलट कर रख दिया है | पिछले बीस बरसों से मैंने अपने ज़ेहन में जो इतनी नफ़रत और कड़वाहट भर रखी थी वह एकाएक मोम की तरह पिघल कर बह गई थी लेकिन इस वजह से मैंने ज़िंदगी में बहुत कुछ खोया है जिसकी भरपाई कर पाना नामुमकिन नज़र आता है |            

अभी पिछले शुक्रवार तक सब कुछ अपने पुराने ढर्रे पर चल रहा था | दफ्तर में वह दिन बहुत गहमा-गहमी भरा था | सुबह दस बजे से लेकर शाम तक सुकून का एक पल भी नसीब नहीं हुआ था | दिन भर काम के बोझ के कारण सिर बुरी तरह से दर्द कर रहा था हालाँकि दूसरी तरफ ज़ेहन में एक हल्केपन का एहसास भी था कि अगले दो दिन छुट्टी थी जिन्हें मैं भरपूर जीना चाहती थी | समीर का फोन आ गया था | वह नीचे गाड़ी में मेरा इंतज़ार कर रहा था | घर के लिए रवाना होने से पहले मैं फ़ोन, लंच बॉक्स, लैपटॉप वगैरह ज़रुरी सामान समेट ही रही थी कि अचानक टेबल पर रखा इंटरकॉम फ़ोन घनघना उठा | दूसरी तरफ़ मेरी ही एक सहयोगी सीमा बोल रही थी |

सीमा – कीर्ति, मेरी मालूमात के मुताबिक तू कानपुर की रहने वाली है, राइट |

मैं – हाँ |

सीमा – यह बता कि तेरे मायके का सरनेम क्या है ?

मैं – तुझे मेरे मायके के सरनेम की ज़रूरत क्यों आन पड़ी है?

सीमा – ज़रुरत है तभी तो पूछ रही हूँ |

मैं – निगम |

सीमा – अब तू लगे हाथों अपने पिताजी का नाम भी बता दे |

मैं - क्या तुझे मेरी कुण्डली निकलवानी है ?

सीमा – हाँ, ज़रुरत हुई तो वह भी निकालूँगी लेकिन अभी जल्दी से अपने पिताजी का नाम बता |

मैं – जितेन्द्र कुमार निगम |

सीमा – इसका मतलब है कि मैं सही इंसान से बात कर रही हूँ | दरअसल कल रात एक शादी समारोह में मेरी मुलाक़ात एक बुज़ुर्ग आँटी से हुई थी | बातों ही बातों में मालूम हुआ कि वे लम्बे अरसे से तुम्हारी ही तलाश में हैं | उनके पास तुम्हारे लिए किसी का भेजा हुआ पैग़ाम है जो वह तुम्हें देना चाहती हैं | मुझे शक था कि जिस शख्स को वे ढूँढ़ रही हैं वो तुम्हीं हो लेकिन पूरा यकीन नहीं था | अगर यकीन होता भी तो भी बिना तुम्हारी इजाज़त के मैं तुम्हारा फोन नंबर किसी और को कैसे दे सकती थी | अब अगर तुम मुनासिब समझो तो मैं उन्हें तुम्हारा नंबर दे दूँ |

मैं – लेकिन आख़िर वह महिला हैं कौन ? और वे किसका पैग़ाम लेकर आई हैं ?

सीमा – वे दूर के रिश्ते में मेरी बुआ लगती हैं | हम उन्हें रमा बुआ कहते हैं | वे झाँसी में रहती हैं और यहाँ उनका मायका है | इससे ज़्यादा जानकारी फिलहाल मेरे पास नहीं है | तुम कहो तो मैं पता करके बता सकती हूँ |

मैं – इसकी ज़रुरत नहीं है | तुम मेरा फोन नंबर उन्हें दे सकती हो | चलो बाबा, अब चलते हैं | बहुत देर से समीर नीचे मेरा इंतज़ार कर रहे हैं |

सीमा – ओके, बाय |

दूसरे दिन सुबह करीब ग्यारह बजे का वक़्त था | नाश्ता करने के बाद मैंने कपड़े धोने का मन बना लिया था | ड्रम में पड़े एक हफ़्ते के मैले कपड़ों का ढेर एक बोझे की तरह दिखाई दे रहा था | वाशिंग मशीन चालू करके मैं उसमें कपड़े भिगो ही रही थी कि अचानक मोबाइल की हल्की सी घन्टी सुनाई पड़ी | खोज की तो देखा कि जनाब बिस्तर पर औंधे मुँह पड़े लगातार चीखे जा रहे थे लेकिन उल्टे होने की वजह से उनकी आवाज़ काफ़ी हल्की आ रही थी | स्क्रीन पर नज़र डाली तो वह एक अंजान नंबर से कॉल था | इन दिनों मोबाइल पर बढ़ती अपराधिक वारदातों की वजह से में अंजान नम्बरों को उठाने से परहेज़ करती हूँ लेकिन पिछले दिन सीमा से हुई बात अभी तक दिमाग़ में ताज़ा थी | मुझे उम्मीद थी कि वह कॉल उसकी आँटी का हो सकता था | इसलिए किसी तरह डरते-डरते मैंने वह कॉल उठाया | मेरा अंदाजा सही निकला | वह कॉल उन्ही का था |

महिला – क्या मैं कीर्ति निगम से बात कर रही हूँ |

मैं – जी हाँ | आप कौन ?

महिला – आप मुझे नहीं जानती है | मेरा नाम रमा महरोत्रा है | मुझे आपका फ़ोन नंबर सीमा कपूर से मिला है जो रिश्ते में मेरी भतीजी लगती है | दरअसल एक लम्बे अरसे से मैं आपकी तलाश में थी | कहीं से उड़ती-उड़ती ख़बर मिली थी कि इन दिनों आप भोपाल में हैं | भोपाल में मेरा मायका है और इसलिए मेरा यहाँ आना-जाना लगा ही रहता है | किस्मत देखिए कल सुबह ही मैं यहाँ आई हूँ | कल रात एक शादी समारोह में मेरी मुलाक़ात सीमा से हुई और आज उसकी मार्फत आपसे बात हो पा रही है | दरअसल आपकी मम्मी मेरी बहुत करीबी सहेली हैं | मेरे पास आपके लिए उनका एक पैग़ाम है जो उन्होंने आप तक पहुँचाने के लिए मुझे दिया है | अब आप बताइए मैं यह ख़त आप तक कैसे पहुँचा सकती हूँ |

मैं (सख्त लहज़े में) – आँटी, मम्मी से अब मेरा कोई रिश्ता नहीं रह गया है | इसलिए मुझे उनके ख़त में कोई दिलचस्पी नहीं है |

मेरी बात सुनकर आँटी की आवाज़ कुछ देर के लिए ख़ामोश हो गई | थोड़ी देर रुक कर उन्होंने फिर बोलना शुरू किया |

आँटी – मैं तुम्हारी नाराज़गी अच्छी तरह समझ सकती हूँ | यह तुम लोगों का ज़ाती मसला है जिसमें मेरा किसी तरह का दख़ल देना मुनासिब नहीं है | चलो इस मसले को फिलहाल दरकिनार कर देते हैं | तुम उम्र में मेरी बेटी जैसी हो | तुम्हें पहले कभी नहीं देखा है | मेरी ख्व़ाहिश है कि आज शाम को हम साथ चाय पिएँ | मम्मी की सहेली से न सही, माँ समान आँटी से तो मिल ही सकती हो | यकीन मानों मैं बहुत अच्छी चाय बनाती हूँ | तुम्हें ज़रुर पसंद आएगी |

आँटी ने यह बात इतनी मुहब्बत और अपनेपन से कही थी कि मैं एकाएक इंकार न कर सकी |

मैं – ठीक हैं आँटी | आज शाम को मिलते हैं |

आँटी – बहुत खुशी हुई बेटा | शाम पाँच बजे मैं घर पर तुम्हारा इंतज़ार करुँगी | अपने शौहर के साथ आना | मैं तुम्हें अपनी लोकेशन भेज रही हूँ | खुश रहो, आबाद रहो |

आँटी के बात करने के लहज़े में न जाने क्या कशिश थी कि कुछ ही मिनट की गुफ़्तगू में ही मैं उनकी मुरीद हो गई थी | मुझे हैरानी हो रही थी कि किस तरह से एक इंसान की ज़ुबाँ सामने वाले शख्स को अपना रुख नर्म करने पर मजबूर कर सकती है |    

शाम को नियत वक़्त पर हम दोनों तैयार होकर आँटी से मिलने के लिए घर से रवाना हो गए | सही लोकेशन साथ होने की वजह से पता ढूँढ़ने में कोई ख़ास दिक्कत नहीं हुई | थोड़ी-बहुत दरियाफ़्त के बाद हम ठीक समय पर उनकी दहलीज़ पर पहुँच गए थे | घर का दरवाज़ा आँटी ने ही खोला था | आँखों पर नज़र के चश्मे के भीतर से बोलती हुई उनकी आँखें और मुस्कुराते हुए चेहरे में एक गज़ब का आकर्षण था जो पहली नज़र में ही किसी ग़ैर को भी अपना बना सकता था | करीब साठ-पैंसठ बरस की उम्र रही होगी उनकी | बाल आधे पक चुके थे | इस्त्री की हुई साधारण सी सूती साड़ी में वे बहुत ही सौम्य नज़र आ रही थीं |

आँटी और उनके परिवार ने हमारा गर्मजोशी से स्वागत किया | चाय के साथ जो बातों का सिलसिला शुरू हुआ तो काफ़ी देर तक चलता ही रहा | ज़्यादातर वक़्त आँटी ही बोलती रहीं | उनके पास कहानी-किस्सों का बड़ा खज़ाना था | एक ख़त्म होने से पहले ही दूसरा शुरू हो जाता और दूसरे से पहले तीसरा | ऐसा महसूस ही नहीं हो रहा था कि हम उनसे पहली मर्तबा मिल रहे थे | करीब डेढ़-दो घंटे वहाँ गुज़ारने के बाद हमने वापिस जाने की इजाज़त माँगी | चलते वक़्त उन्होंने हमें बेटी-दामाद की तरह शगुन देकर विदा किया – मुझे एक रेशमी साड़ी और समीर को एक लिफ़ाफ़े में कुछ रुपए | रुख्सती के समय उन्होंने मुझे गले लगाते हुए कहा, “भई, तुम लोगों के संग बहुत मज़ा आया | दो घंटे कैसे गुज़र गए एहसास ही नहीं हुआ | अभी मन तो नहीं भरा है लेकिन मजबूरी है बेटी को रोक भी तो नहीं सकते हैं | फ़ोन करते रहना | आँटी को भूलना नहीं | याद रखना तुम्हारा एक और घर है झाँसी में | अगर कभी वहाँ आओ तो मिलना मत भूलना |” यह मेरे लिए पहला ऐसा अनुभव था जब किसी ने मुझे बेटी होने का एहसास दिलाया था | आँटी के इस आत्मीय व्यवहार से मेरी आँखों में आँसू आ गए थे और मैं बहुत देर उनके गले लग कर सुबकती रही |

उस रात बहुत देर तक मैं आँटी के बारे में ही सोचती रही | वे हमसे जिस तरह अपनेपन से मिलीं और एक माँ की तरह हमें शगुन वगैरह देकर विदा किया उससे ज़ाहिर था कि उनका मम्मी से बहुत ही करीबी नाता होगा | इसके बावजूद भी उन्होंने दो घंटे की मुलाक़ात के दौरान एक मर्तबा भी मम्मी का कोई ज़िक्र नहीं किया था | अपनी पहली फोन पर हुई बातचीत में मैंने जिस बेरुख़ी से मम्मी के मुतल्लिक अपनी राय ज़ाहिर की थी उससे उन्हें अंदाज़ा हो गया होगा कि मेरे भीतर मम्मी के लिए कितनी कड़वाहट भरी हुई है | शायद इसीलिए उन्होंने मेरे साथ बातचीत में मम्मी का कोई भी ज़िक्र करना मुनासिब नहीं समझा था |

मम्मी का ख्याल आते ही ज़ेहन में एकाएक कसैला सा भाव भर गया | एक माँ होते हुए भी उन्होंने कौन सा माँ का फ़र्ज़ निभाया है | पापा की बेवक्त मौत के बाद वे जिस तरह से हमें बेसहारा छोड़ कर दूसरी शादी करके चली गई थीं उसकी यादें अभी भी मेरे ज़ेहन में ताज़ा हैं | ज़िंदगी के हर मोड़ पर हमें अपनी हर छोटी से छोटी ज़रुरत के लिए जद्दोजहद करना पड़ा है जबकि वे अपने ने शौहर के साथ रईसी ज़िंदगी गुज़ार रही थीं | उनकी वजह से ही भइया को कम उम्र में ही फ़ौज में जाना पड़ा | अब जब हम ज़िंदगी में पाएदार हो गए हैं तो उन्हें हमारी याद सता रही है | शायद बुढ़ापे में अकेलेपन का डर सताने लगा होगा | अब जैसा बोया है, वैसा ही  काटें | दिमाग़ में ऐसे ख्याल आते ही मन न चाहते हुए भी बचपन की यादों की जानिब मुड़ने लगा | मैंने कई मर्तबा उन्हें झटक कर सोने की नाकाम कोशिशें कीं लेकिन ये यादें थीं कि पीछा छोड़ने को तैयार ही नहीं थीं | मैं उन कड़वाहट भरे दिनों को ख़्वाबों में भी नहीं जीना चाहती हूँ | जब भी उन दिनों का ख्याल ज़ेहन में आता है मेरा रोम-रोम सिहर उठता है | बड़ी मशक्कतों से ही मैं इनसे उबर कर एक नई ज़िंदगी की शुरूआत कर पाई हूँ |

एक वक़्त ऐसा भी था जब मैं अपने छोटे से परिवार में एक ख़ुशनुमा ज़िंदगी जी रही थी | परिवार में दादी, मम्मी-पापा और एक बड़ा भाई था | मेरी शुरुआती परवरिश एक प्यार-मुहब्बत के माहौल में हुई थी | पापा एक फैक्टरी में फोरमैन थे जबकि मम्मी एक गृहिणी थीं | मुझसे दो बरस बड़ा भाई मोहल्ले के ही एक स्कूल में पढ़ता था | जब मैं चार बरस की हुई तो मेरा भी दाख़िला उसी स्कूल में करा दिया गया | सुबह ग्यारह बजे हम दोनों भाई-बहन तैयार होकर स्कूल चले जाते थे | मैं जल्दी घर वापिस आ जाती थी जबकि भइया दोपहर में वापिस आता था | उसके बाद दिन भर हम दोनों जमकर धमा-चौकड़ी मचाते रहते थे | पिता जी शाम को घर वापिस आते वक़्त हम दोनों के लिए कुछ न कुछ ज़रूर लेकर आते थे | कभी मिठाई, कभी फल और कभी कोई छोटे-मोटे खिलौने | पिता जी को फ़िल्में देखने का बहुत शौक था | हर महीने कम से कम दो फ़िल्में तो देखने जाते ही थे | फिल्म वाले दिन घर में सुबह से ही एक त्यौहार का माहौल रहता था | मम्मी सुबह जल्दी-जल्दी सब काम निपटा लेती थीं फिर दोपहर का खाना खाकर हम सब मिलकर करीब के ही एक सिनेमा हॉल में फिल्म देखने जाते थे | सिनेमा हाल इतना नज़दीक था कि हम चारों पैदल ही चले जाते थे | कुल मिलाकर हमारे परिवार की गाड़ी बड़े मज़े से चल रही थी | उस वक़्त हमें ख्व़ाब में भी गुमान नहीं था कि हमारी ज़िंदगी में एक ऐसा बवंडर आने वाला है जो सब कुछ तितर-बितर करके रख देगा |

मुझे हल्की सी याद है उस बदनसीब दिन की जब हमारे पड़ोस में रहने वाले चाचाजी अचानक हमारी कक्षा में दाख़िल हुए थे | उन्हें देखते ही मैं खुशी से पुकारने लगी थी | उस दिन वे रोज़ की तरह ख़ुश नज़र नहीं आ रहे थे | उन्होंने मेरी टीचर से धीमी आवाज़ में न जाने क्या कहा कि टीचर ने मुझे चाचाजी  के साथ घर जाने की इजाज़त दे दी | इसी तरह चाचाजी ने भइया के टीचर से भी बात करके उसकी छुट्टी करा ली | उस उम्र में मुझे समझ नहीं आ रहा कि चाचाजी हमें जल्दी घर क्यों ले जा रहे थे लेकिन शायद भइया को कुछ अनहोनी का एहसास हो गया था | मैं आने वाली मुसीबत से अंजान हँसते-कूदते चली जा रही थी | दूर से ही हमें घर के सामने बहुत सारे लोग खड़े नज़र आए | जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते जा रहे थे घर से आने वाली रोने-चिल्लाने की आवाजें साफ़ सुनाई देने लगी थीं | भीड़ के बीच से रास्ता बनाते हुए चाचाजी हम दोनों को लेकर घर में दाख़िल हुए | आगे के कमरे में एक सफ़ेद चादर में लिपटा हुआ पापा का मुर्दा जिस्म फर्श पर लेटा हुआ था और करीब ही मम्मी और दादी के साथ मोहल्ले की कई महिलाएँ रो रही थीं | उन सबको यूँ रोता-बिलखता देखकर मैं सन्न रह गई थी और मेरी आँखों से भी ख़ुद-ब-ख़ुद आँसुओं की धारा बहने लगी थी | हमें देखते ही मम्मी हम दोनों को गले से लगा कर फूट-फूट कर रोने लगी थीं | मेरे लिए यह पहला मौका था जब मैंने परिवार में किसी करीबी की मौत देखी थी | बाद में मुझे बताया गया कि पापा की मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई थी |

पापा की मौत के बाद घर के हालात काफ़ी बदल से गए थे | शायद पैसों की भी काफ़ी तंगी थी | हम लोग एक छोटे से घर में शिफ्ट हो गए थे | मम्मी दूसरों के कपड़े सिलने लगी थीं और उससे हुई कमाई से ही घर चलता था | एक दफ़ा फीस न चुका पाने की वजह से हम दोनों का स्कूल से भी नाम कट गया था | मुझे अब ज़्यादा तो कुछ याद नहीं लेकिन ऐसा याद पड़ता है कि उन दिनों हमारी दूर की रिश्तेदार बिज्जी मौसी हमारे घर में काफ़ी आया करती थीं और वे मम्मी के साथ बंद कमरे में काफ़ी लंबी बातें करती रहती थीं | एकाएक हमारी ज़िंदगी में चीज़ें बदलने लगीं | हमारा रहन-सहन बेहतर हो गया | हमारा फिर से स्कूल में दाख़िला करा फिया गया | एक दिन रात के वक़्त जब हम खाना खा कर बैठे ही थे कि माँ हमें रसोई में ले गई थीं | थोड़ी हिचकिचाहट के बाद मम्मी ने चेहरे पर संजीदा भाव लाते हुए बोलना शुरू किया -

माँ: पिछले कुछ दिनों से क्या तुम दोनों घर में कुछ बदलाव महसूस कर रहे हो ?

मैं और भइया: आजकल हमें बहुत अच्छा लग रहा है | अब हम भरपेट खाना खा रहे हैं, अच्छे-अच्छे कपड़े पहन रहे हैं | अब तो हमारी पढ़ाई-लिखाई भी अच्छी चल रही है |

माँ: ये सब बदलाव तुम्हारी बिज्जी मौसी की मदद की बदौलत ही हो पा रहा है और आगे भी वह हमारी यूँ ही मदद करती रहेंगी | इस मदद के बदले में वह चाहती हैं कि मैं उनके भाई से ब्याह कर लूँ जो कि एक अमीर और रसूखदार शख्स हैं | इसमें बस एक दिक्कत है कि शादी के बाद मुझे उनके घर में रहना होगा और तुम दोनों दादी के साथ इसी घर में रहोगे |

मम्मी की बात सुनकर हम दोनों भाई-बहन अवाक् रह गए थे | हमें समझ नहीं आ रहा था कि अचानक ये सब क्या हो रहा है ? मम्मी हमें यूँ बेसहारा छोड़ कर कैसे दूसरे के घर रहने जा सकती हैं ? हम दोनों बच्चे यहाँ अकेले कैसे रह पाएँगे ? क्या मम्मी को हमारी कोई भी परवाह नहीं है या उन्हें हम अब बोझ लगने लगे हैं ? हम दोनों मम्मी के पैरों से लिपट कर रोने लगे | 

मैं और भइया: मम्मी, हमें अकेला छोड़ कर मत जाओ | पापा तो वैसे भी हमें छोड़ कर जा चुके हैं | अब सिर्फ़ एक तुम ही तो हो हमारे साथ | अगर तुम भी दूसरे के घर चली जाओगी तो हम किसके सहारे जीएँगे ? हम सब कैसे भी जी लेंगे | गरीबी में रह लेंगे | हमें नहीं चाहिए अच्छे-अच्छे कपड़े और स्वादिष्ट खाना | हमें तो बस तुम चाहिए |

हमें यूँ रोता-बिलखता देखकर एकाएक मम्मी का दिल भी पिघल गया था और उनकी आँखों से आँसुओं की धारा बहने लगी | उन्होंने हमें अपने सीने से लगा लिया | काफ़ी देर तक हम तीनों यूँ ही गले लगकर रोते रहे |

उस दिन रात को मैं ठीक से सो नहीं पाई | जब भी थोड़ी देर के लिए नींद लगती तो बुरे-बुरे ख्व़ाब आते लग | कभी ऐसा लगता मानों मैं अकेली जंगल में रास्ता भटक गई हूँ और चारों तरफ से जानवरों की आवाजें आ रही हैं और कभी यूँ लगता जैसे कोई अंजान शख्स मुझे मुँह में कपड़ा ठूँस कर एक बोरी में भरकर लिए जा रहा हो और मैं आज़ाद होने के लिए चिल्लाने की भरसक कोशिशें कर रही हूँ लेकिन हलक से आवाज़ निकल ही नहीं पा रही थी |

ऐसे ही उहापोह की हालत में कई दिन निकल गए | कुछ दिनों बाद बिज्जी मौसी फिर हमारे घर आईं और वे मम्मी के साथ बंद कमरे में काफ़ी देर तक बातें करती रहीं | उस दिन रात को मम्मी ने हम सबके सामने अपने फैसले का ऐलान कर दिया | दादी तो यह सुनकर बहुत नाराज़ हुई थीं | झुकने के बजाय मम्मी यह समझाने की कोशिश करती रहीं कि उनका यह फ़ैसला परिवार की बेहतरी के लिए है | घर में पैसा आने से सभी सुख से जी पाएँगे और बच्चों के भविष्य के लिए भी यह बेहतर होगा | उन्होंने वादा किया था कि वे थोड़े-थोड़े दिनों में घर आकर हमसे मिलती रहेंगी और जब भी ज़रुरत हो हम उनसे फ़ोन के ज़रिए बात कर सकते हैं | उनकी ये दलीलें हमारी समझ के बाहर थीं | हमें तो बस ये समझ में आ रहा था कि माँ हमें हमेशा के लिए अकेला छोड़ कर दूसरे के घर रहने जा रही थीं | हम दोनों ने उन्हें मनाने की लाख़ कोशिश की लेकिन इस बार वे अपने फैसले से टस से मस होने के लिए तैयार नही थीं |

कुछ दिनों बाद मम्मी शादी करके अपने घर रुख्सत हो गईं और घर में रह गए मैं, भइया और सत्तर बरस की दादी | शुरुआत में मम्मी करीब-करीब एक दिन छोड़ कर हमसे मिलने आती थीं और जिस दिन वे नहीं आ पाती थी उस दिन वे हमसे फ़ोन पर बात ज़रुर करती थीं | अब उनको एक नई बेटी मिल गई थी – मीनू | कभी-कभी वे उसको लेकर भी आती थीं | आहिस्ता-आहिस्ता उनका आने का सिलसिला कम होने लगा | हालाँकि उन्होंने हमारी माली ज़रूरतों का हमेशा पूरा-पूरा ख्याल रखा लेकिन हमारे दिल में उनके लिए जो कड़वाहट पैदा हो गई थी वह कभी भी कम न हो सकी | हमें पैसों की नहीं मम्मी के साथ और उनकी मुहब्बत की ज़रुरत थी जिसे शायद वे कभी समझ ही नहीं पाईं | शादी करने से पहले उन्होंने एक बार भी यह नहीं सोचा कि उनके बिना उनके छोटे-छोटे बच्चे कैसे जी पाएँगे | उनके लिए बच्चों से ज़्यादा पैसों की अहमियत थी | यह बात फाँस की तरह हमेशा हमारे दिल में चुभती रही | जैसे-जैसे हम बड़े हुए हमने उनसे बात-चीत करना बंद कर दिया | उन्होंने हमसे बात करने की कई मर्तबा कोशिशें की लेकिन हर बार हम उनको नज़रंदाज़ करते हुए बाहर चले जाते थे |

मम्मी की शादी के करीब आठ-दस बरस बाद दादी का भी इंतकाल हो गया था | उस वक़्त मैं ग्रेजुएशन कर रही थी और भइया एम.बी.ए करने के साथ नौकरी भी तलाश रहा था | दादी के मौत के बाद साथ हमारे और मम्मी के बीच का एक मात्र पुल भी ढह गया था | इसके बावजूद मम्मी पहले की ही तरह हर महीने किराना और ज़रुरी सामान भिजवा देती थीं | मेरे कॉलेज की फीस वक़्त पर ख़ुद-ब-ख़ुद जमा हो जाती थी और महीने के खर्च के लिए ज़रुरी रक़म किसी के मार्फ़त हमारे पास पहुँच जाती थी | इन सबके बावजूद हमारे दिल में उनके लिए जो नफ़रत थी वह जस की तस बनी हुई थी | हम जल्द से जल्द अपने पैरों पर खड़े हो जाना चाहते थे जिससे कि आगे मम्मी की ओर से मदद न लेनी पड़े |

इस बीच भइया का फ़ौज में सलेक्शन हो गया था | ट्रेनिंग के बाद उसकी पहली पोस्टिंग सिक्किम में हुई थी | भइया के जाने के बाद मैं पूरी तरह से अकेली हो गई थी लेकिन वक़्त के थपेड़े खा-खा कर मैं दिमाग़ी और जिस्मानी तौर पर काफ़ी मज़बूत हो चुकी थी | बी.बी.ए करने के बाद मुझे एक कंपनी में नौकरी मिल गई थी | पहली पोस्टिंग भोपाल में मिली थी | शुरुआती तनख्वाह कुछ ज़्यादा नहीं थी लेकिन इस नौकरी ने मुझे अपना एक वजूद दिया है | अब मैं किसी के रहमो-करम पर नहीं बल्कि अपने पैरों पर खड़ी थी | अपनी मेहनत के बूते मैं दो-तीन बरस में ही मैनेजर एच.आर के ओहदे पर पहुँच गई हूँ | इस बीच कम्पनी में ही काम कर रहे समीर से मेरी शादी हो गई | नौकरी मिलने के बाद से मैंने हर वह ज़रिया खत्म कर लिया है जिससे मम्मी को मेरे ठौर-ठिकाने की मालूमात मिल सके | इस वजह से मैंने न केवल अपना फोन नंबर बदल लिया है बल्कि मैं सोशल मीडिया से भी दूरी बना कर रखती हूँ | इन तमाम कोशिशों के बावजूद भी मैं अपनी पिछली ज़िंदगी की यादों को भुला नहीं पाई हूँ | दरअसल मैं ख़ुद को बाहर से जितना सख्त दिखाने की कोशिश करती हूँ उतना भीतर से हूँ नहीं | मम्मी से अलगाव के इतने लम्बे वक़्त के बावजूद दिल के किसी कोने में उनके साथ बिताए गए मीठे दिनों की महक आज भी मौजूद है | शाम को आँटी से मिलने के बाद न चाहते हुए भी ज़ेहन में एक नई उत्सुकता पैदा हो गई थी – “न जाने मम्मी अब किस हाल में होंगी ? होंगीं भी या नहीं होंगी | उन्होंने अपने ख़त में मेरे लिए क्या लिखा है ? वगैरह, वगैरह ....” कई मर्तबा मुझे ख़ुद भी हैरानी होती है कि मम्मी के ख़िलाफ़ इतनी कड़वाहट और नफ़रत के बावजूद भी मेरे दिल में उनके लिए नर्म-गोशा क्यों मौजूद है | यह सब सोचते-सोचते मेरी कब आँख लग गई कि एहसास ही नहीं हुआ |

इस हफ़्ते बुधवार को फिर एक छुट्टी का दिन पड़ा था | ईद की वजह से बाज़ार में काफ़ी चहल-पहल थी लेकिन मेरा कहीं बाहर जाने की इरादा नहीं था | दरअसल, कामकाजी औरतें हफ़्ते भर दफ़्तर और घर साथ सँभालते-सँभालते इस कद्र थक जाती हैं कि वे हर छुट्टी के दिन को घर के सुकून में बिताना ज़्यादा पसंद करती हैं | शाम के करीब पाँच बज रहे थे और मैं शाम की चाय बनाने की तैयारी कर रही थी कि अचानक फ़ोन पर आँटी का फोन देखकर मैं चौंक गई | फ़ोन उठाते ही दूसरी तरफ से आँटी की जानी-पहचानी आवाज़ सुनाई दी –

आँटी – कैसी हो बेटा ?

मैं – अच्छी हूँ आँटी | ईद मना रहे हैं | सेवैंयाँ खानी हैं तो घर आ जाइए |

आँटी – इस वक़्त मैं तुम्हारे घर के करीब ही हूँ | यहाँ न्यू मार्केट आई हूँ कुछ खरीदारी करने | सोचा क्यों न तुम्हें परेशान किया जाए |

मैं – इसमें परेशानी की क्या बात है | उल्टे हमें तो बहुत खुशी होगी आपसे मिलकर | मैं अभी अपनी लोकेशन साझा कर रही हूँ आपसे | हम दोनों यहाँ आपका इंतज़ार कर रहे हैं |

थोड़ी देर बाद ही कॉलबेल बज उठी | उम्मीद के मुताबिक़ दरवाज़े पर मुस्कुराती हुई आँटी खड़ी थीं | उनके दोनों हाथों में कपड़ों के कई बैग लटके हुए थे | भीतर आते ही वे अपने मज़ाकिया अंदाज़ में बोलीं –

आँटी – बहुत देर से न्यू मार्केट में खरीदारी कर रही थी | अब लौटने का वक़्त हो रहा है | लिहाज़ा बहू-बेटों, पोते-पोतियों सभी के लिए कुछ न कुछ लेकर जाना है | खरीदारी करते-करते सारा पैसा चुक गया है | अब चाय की तेज़ तलब लगी हुई है और जेब है खाली | सो अचानक ख्याल आया कि कीर्ति का घर तो यहाँ से करीब है | क्यों न उसके घर पर धावा बोला जाए | शर्मा-शर्मी में चाय तो पिला ही देगी |

मैं – आप भी कैसी बात करती हैं | यह आपका घर है | चाय क्या, खाना खाकर जाइएगा |

आँटी – नहीं बेटा | बेटी को पहली बार में ही इतना तंग नहीं करना चाहिए कि अगली बार वह दरवाज़ा भी न खोले |

चाय-नाश्ते के दौरान ऐसी ही हल्की-फुल्की गपशप का सिलसिला चलता रहा | करीब एक घंटे बैठने के बाद आँटी उठने को हुईं क्योंकि साढ़े सात बजे उनका कोई रिश्तेदार मिलने आने वाला था | रवानगी के वक़्त उन्होंने मुहब्बत से मुझे गले लगाते हुए आशीर्वाद दिया | उस वक़्त न जाने क्यों मुझे मम्मी की याद हो आई और मैं अपने आँसू रोक न पाई | किसी तरह मैंने ख़ुद को संभालते हुए आँटी से हाथ जोड़कर प्रार्थना की – “प्लीज़ मुझे मम्मी का ख़त दे दीजिए |” मेरी अवस्था देखकर आँटी की आँखें भी कुछ नम हो गई थीं | पर्स से लिफ़ाफ़ा निकालकर मेरे तरफ़ बढ़ाते हुए वे दबी आवाज़ में बुदबुदाई, “बेचारी की हालत अच्छी नहीं है | शायद ज़्यादा न चल पाए | अपने बच्चों को बहुत याद करती है | हो सके तो उससे जल्दी बात कर लेना |” ऐसा कह कर वे आँसू पोंछते हुए तेज़ कदमों से घर के बाहर निकल गईं |

आँटी की बात सुनकर मैं अवाक् रह गई थी | फ़ौरन लिफाफा खोलकर खत निकाला | ख़त करीब तीन महीने पहले लिखा गया था | ख़त का मजमून कुछ यूँ था –

“प्यारी बेटी गुड्डी (मेरा घर का नाम),

उम्मीद हैं कि तुम जहाँ भी होगी ख़ैरियत से होगी | मेरी दुआ है कि ईश्वर तुम्हें दुनिया की हर खुशी से नवाज़े और तुम हमेशा हँसती-मुस्कुराती रहो | बच्चे माँ से चाहे कितने भी नाराज़ क्यों न हों, माँ हमेशा उनकी भलाई की ही दुआ करती है |

यह तुम्हें मेरा पहला ख़त है और शायद आख़िरी भी हो | इन दिनों मैं काफ़ी बीमार चल रही हूँ | दिल की बीमारी ने काफ़ी परेशान कर रखा है | काफी लम्बे अरसे से इलाज़ चल रहा है और अब तो मैं पूरी तरह से नाउम्मीद हो चुकी हूँ | शायद अब ज़्यादा न जी पाउँगी | बहुत दिनों से सोच रही थी कि कम से कम जाने से पहले तुम तक अपने दिल की बात पहुँचा सकूँ | इसी उम्मीद से यह ख़त अपनी करीबी सहेली और हमदर्द रमा के हाथों में सौंप रही हूँ | भगवान जाने यह तुम तक पहुँच पाएगा कि नहीं और पहुँच भी गया भी तो तुम इसे कुबूल करोगी कि नहीं | यह भी हो सकता कि जब तक तुम्हें यह ख़त मिले तब मैं इस जहाँ से रुख्सत हो चुकी हूँ |

बेटा मैं वह बदनसीब माँ हूँ जिसे उसकी ज़िंदगी में कभी बच्चों की मुहब्बत नसीब नहीं हुई है | जिन्हें मैंने हमेशा अपना समझा वे ही मुझसे नफ़रत करते रहे | मुझे इस बात का एहसास है कि इसमें तुम दोनों की कोई ख़ता नहीं है | जिस वक़्त मैंने दूसरी शादी का मुश्किल फ़ैसला लिया था उस वक़्त तुम दोनों इतने छोटे थे कि मेरी विवशताओं को भली-भाँति समझ नहीं सकते थे | मुझे उम्मीद थी कि शायद बड़े होने पर तुम्हें माँ की मजबूरियों का एहसास हो जाएगा लेकिन इस दरमियाँ हमारे बीच के फासले इस कद्र बढ़ चुके थे कि मैं चाह कर भी अपनी आवाज़ तुम तक पहुँचा न सकी | मैंने कई बार तुम दोनों से बात करने की कोशिश की लेकिन मेरे हाथ हमेशा बेरुख़ी ही आई | आहिस्त्ता-आहिस्ता कारवाँ निकलता गया और मैं ग़ुबार देखती रही | आज मैं ज़िंदगी के आख़िरी पड़ाव पर पहुँच चुकी हूँ और मेरे ज़ेहन में इकट्ठा हो रहे अनकहे जज़्बातों ने अब नासूर की शक्ल अख्तियार कर ली है | मेरे आस-पास ऐसा कोई भी हमदर्द नहीं है जिससे मैं अपने दिल की पीड़ा साझा कर सकूँ | शायद तुम तक अपने जज़्बात पहुँचा कर दिल पर पड़ा बोझ कुछ कम हो सके -  

तुम्हारे पापा के बेवक्त इंतकाल के बाद घर के हालात बुरी तरह प्रभावित हो गए थे | वे परिवार में कमाई का एक मात्र ज़रिया थे | हालाँकि उनकी कमाई मामूली ही थी लेकिन उन दिनों हमारी ज़रूरतें भी बहुत सीमित हुआ करती थीं – न फोन, न टीवी, न फ्रिज, न स्कूटर, न कूलर, और न ही लंबी-चौड़ी स्कूल की फीसें | लिहाज़ा घर की गाड़ी सुचारू रूप से चल रही थी लेकिन उनके जाने के बाद हालात तेज़ी से बिगड़ने लगे | खर्च का बोझ कम करने के लिए हम एक छोटे मकान में शिफ्ट हो गए थे | सहारे के नाम पर उनका एक बचत खाता था जिसमें कुछ मामूली रक़म जमा थी | कुछ दिन तो बचत खाते से पैसे निकाल-निकाल कर मैं घर के ज़रुरी खर्चे निपटाती रही लेकिन वह छोटी सी रक़म आख़िर कब तक साथ निभाती | आहिस्ता-आहिस्ता हम पाई-पाई को मोहताज होने लगे | मेरी आँखों के सामने हमारा हँसता-खेलता परिवार मुसीबतों के बोझ तले दबे जा रहा था | उस गर्दिश के आलम में सभी करीबी दोस्तों और रिश्तेदारों ने भी हमसे किनारा कर लिया था | मैं दिमाग़ी और जिस्मानी तौर पर एक कमज़ोर इंसान रही हूँ | ऊपर से बूढ़ी सास और दो बच्चों की ज़िम्मेवारी | ज़्यादा पढ़ी-लिखी न होने की वजह से मेरे लिए बाहर कहीं नौकरी मिलने की गुँजाइश भी काफ़ी कम थी | हार कर मैंने घर में ही सिलाई का छोटा-मोटा काम शुरू किया था | इस काम में आमदनी के मुकाबले मेहनत काफ़ी ज़्यादा थी | रात-दिन मेहनत करने के बाद भी जो थोड़ी-बहुत कमाई होती थी वह ज़्यादातर उधार चुकाने में चली जाती थी और हाथ खाली के ख़ाली ही नज़र आते थे | रोज़ कोई न कोई दुकानदार कर्ज़ के तकाज़े के लिए ड्योडी पर खड़ा रहता था | महीने-दर-महीने यही हालात बने रहते थे | स्कूल की फीस वक़्त पर अदा न कर पाने की वजह से तुम दोनों का नाम स्कूल से कट गया था | उस स्याह रात का कोई छोर नज़र नहीं आ रहा था | कहीं से कोई उम्मीद की रोशनी दिखाई नहीं पड़ती थी | ऐसे हालात में मैं आहिस्ता-आहिस्ता अवसाद में डूबती जा रही थी | कई मर्तबा ऐसी ख़स्ता-हाल ज़िंदगी से तंग आकर मैं रात भर फूट-फूट कर रोती रहती थी |

ऐसे मुश्किल हालात में हमारी एक करीबी रिश्तेदार बिज्जी दिद्दा मेरे लिए अपने दूर के भाई का रिश्ता लेकर आई थीं | उनके भाई की पत्नी की कैंसर से मौत हो चुकी थी | उनको पहली बीवी से एक चार बरस का बेटी थी | परिवार काफ़ी रईस था | उन्होंने पेशकश की थी कि शादी के बदले वे हमारे परिवार का पूरा कर्ज़ा उतार देंगे और आइंदा भी परिवार की ज़रूरतों का पूरा-पूरा ख्याल रखेंगे | साथ में उनकी यह शर्त भी थी कि मैं अपने बच्चों को अपने साथ लेकर नहीं जाऊँगी | इसका मतलब साफ़ था कि शादी के बाद दोनों बच्चों को दादी के साथ ही रहना पड़ेगा | उस वक़्त तक मैं ज़िंदगी की जद्दो-जहद से इस कद्र परेशान हो चुकी थी कि किसी भी तरह से रोज़-रोज़ की दुश्वारियों से बाहर निकलना चाहती थी लेकिन मैं किसी भी सूरत में अपनों बच्चों से अलग होने को तैयार नहीं थी | कोई भी औरत दूसरे की औलाद को तो अपना सकती है लेकिन उसके लिए अपने बच्चों से अलग होकर रहना आसान नहीं होता है | दूसरी तरफ समाज की यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि मर्द अपनी दूसरी बीवी से तो यह उम्मीद करता है कि वह उसकी औलादों को अपना समझ कर पाले-पोसे लेकिन वह ख़ुद उसके बच्चों को अपनाने के लिए तैयार नहीं होता है | अपने बच्चों से दूर रहने की शर्त मुझे कतई मंज़ूर नहीं थी और मैंने बिज्जी दिद्दा को इस रिश्ते के लिए साफ लफ़्ज़ों में इंकार कर दिया |

दूसरी तरफ हमारी दुश्वारियाँ लगातार बढ़ती ही जा रही थीं | बड़ी मुश्किल से हम चारों के दो वक़्त के खाने का बंदोबस्त हो पाता था | उस वक़्त एक ऐसा भी दौर आया जब तुम दोनों भाई-बहन तेज़ बुखार से तप रहे थे और मेरे हाथ में तुम्हारी दवा-दारू के लिए ज़रुरी पैसे भी नहीं थे | तुम्हें यूँ दयनीय हालत में देखकर मैं अक्सर रात-दिन रोती रहती थी लेकिन कहीं कोई हमदर्द नज़र नहीं आता था | अपने बच्चों को आहिस्ता-आहिस्ता यूँ मौत के मुँह में जाते हुए देखना किसी भी माँ के लिए बहुत मुश्किल होता है | मैं ख़ुद को बहुत बेबस महसूस कर रही थी | यही वह वक़्त था जब मैंने न चाहते हुए भी बिज्जी दिद्दा की पेशकश कुबूल कर ली थी | इसके पीछे मेरी केवल एक ही मंशा थी - अगर मुझसे दूर रहकर भी मेरे बच्चों का वर्तमान और भविष्य सुधर सकता है तो मैं इसके लिए अपने जज्बातों की कुर्बानी देने के लिए तैयार हूँ चाहे इसके लिए दुनिया मेरे ऊपर कोई भी लांछन क्यों न लगाए | मेरी रज़ामंदी मिलते ही दूसरे दिन से तुम दोनों का बाकायदा इलाज शुरू हो गया | सही इलाज मिलने से आहिस्ता-आहिस्ता तुम्हारी सेहत में भी सुधार होने लगा और करीब एक हफ़्ते में तुम दोनों पूरी तरह से स्वस्थ हो गए थे | इसके साथ ही हमारा खान-पान और रहन-सहन भी बेहतर होने लगा था | अब एक बार फिर से तुम लोग साफ-सुथरे कपड़े पहनने लगे थे और खाना भी भरपेट मिलता था | तुम्हारा स्कूल में दुबारा दाख़िला हो गया था | इस तरह से घर के हालात पटरी पर वापिस आ रहे थे लेकिन परिवार के बाक़ी सदस्य पर्दे के पीछे छुपी कहानी से पूरी तरह से अंजान थे | अपने बच्चों को छोड़कर जाते वक़्त मेरी जो दशा थी उसे लफ़्ज़ों में बयाँ नहीं किया जा सकता है | मैं बाहर से तो ख़ुद को संयत दिखाने की कोशिश कर रही थी लेकिन भीतर ही भीतर मेरा दिल एक बच्चे की तरह फूट-फूट कर रो रहा था | दुनिया को मेरा शानो-शौक़त वाला रहन-सहन तो दिखाई दे रहा था लेकिन किसी को इस बात का ज़रा भी इल्म नहीं था कि मैं किस तकलीफ़ से गुज़र रही थी | इंसान दूसरों की उपेक्षा और आलोचना तो किसी तरह बर्दाश्त कर सकता है लेकिन अपनों से मिले तिरस्कार उसे बहुत गहरे ज़ख्म दे जाते हैं | तुम लोगों ने जब मुझसे नाता तोड़ लिया तो मैं बुरी तरह से टूट गई थी | धीरे-धीरे इस निराशा ने गहरे अवसाद का रूप ले लिया है जिसकी वजह से तमाम बीमारियों ने मुझे घेर रखा है | अब बस ऊपर वाले के बुलावे का ही इंतज़ार है |

तुम्हें यह ख़त लिखकर मेरा मन कुछ हल्का हो गया है | तुम दोनों को माँ का प्यार और आशीर्वाद | ख़ुश रहो, आबाद रहो |”

मम्मी की व्यथा पढ़कर दिल भर आया | मुझे एहसास होने लगा था कि मम्मी ने ख़ुद ज़हर पीकर हमें अमृत दिया था लेकिन बदले में हमने उन्हें क्या दिया ? न केवल उन्हें हमेशा गलत समझा बल्कि उनका तिरस्कार भी किया | कभी उनके हाले-दिल को समझने की कोशिश ही नहीं की हमने | एक औरत होने का नाते कम से कम मुझे तो उनकी हालत का अंदाजा होना चाहिए था | उनका कृतज्ञ होने के बजाय हम उन्हें असहनीय पीड़ा देते रहे | दूसरी तरफ़ वे खामोशी से अपने बच्चों के ज़ुल्म बर्दाश्त करती रहीं | आज हमारे दिए हुए ज़ख्मों ने उन्हें मौत के मुहाने तक पहुँचा दिया है | हमारे पाप अक्षम्य हैं | ईश्वर भी हमें कभी माफ़ नहीं करेगा | ज़ेहन में ये ख्याल आते ही आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली | उसी लम्हे मैंने फ़ौरन मम्मी से मिलने का फैसला कर लिया | पहले दिमाग़ में ख्याल आया कि फोन पर मम्मी से बात कर लूँ लेकिन दिल ने इसे फ़ौरन ख़ारिज कर दिया | मैं उनके चेहरे की वह खुशी और आँखों की चमक रूबरू देखना चाहती थी जो उन्हें अपनी बेटी को बरसों बाद अपने सामने देखकर पैदा होगी | इतनी जल्दी ट्रेन में रिज़र्वेशन मिलना तो नामुमकिन था, लिहाज़ा बस से ही जाने का फैसला कर लिया | समीर ने रात में ही टिकट बुक करा दिए थे |

पूरी रात ज़ेहन में यूँ ही ख़्यालों की आवाजाही चलती रही | पुराने दिनों के कई किस्से दिमाग़ में घूमते रहे | पापा, मम्मी और भइया के साथ गुज़ारे हुए हसीं लम्हों की भीनी-भीनी खुशबू अभी भी यादों में तरो-ताज़ा थी | अब मुझे बेसब्री से उस लम्हे का इंतज़ार था जब मैं मम्मी के गले लगकर उनसे अपनी गुस्ताखियों के लिए माफी माँग सकू़ँगी | न जाने मम्मी किस हाल में मिलेंगी ? क्या वे मुझे पहचान भी पाएँगी या नहीं ? .... ऐसा सोचते-सोचते न जाने कब आँख लग गई एहसास ही नहीं हुआ | अचानक एक झटके के साथ बस रुकने से मेरी आँख खुल गई | उस वक़्त सुबह के पाँच बज रहे थे | खिड़की से बाहर झाँक कर देखा तो बस जाने-पहचाने फैज़लगंज बस स्टैंड पर खड़ी थी | एक अरसे बाद ख़ुद को अपने शहर कानपुर में पाकर दिल रोमांचित हो उठा | बिना वक़्त गँवाए मैं फौरन ऑटो-रिक्शा लेकर माँ के घर की तरफ रवाना हो गई | करीब आध-पौन घंटे में मैं मम्मी के घर के बाहर ख़ड़ी थी | मम्मी से मिलने की घड़ी करीब आते ही दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था | किसी तरह ख़ुद को संभालते हुए कॉलबेल बजाई | थोड़ी देर तक भीतर से कोई जवाब नहीं मिला | मेरा अंदाजा था अभी तक मम्मी सो रही होंगी | दो-तीन बार घंटी बजाने के बाद भीतर से एक महिला की तल्ख़ आवाज़ सुनाई दी, “अरे भई, इस मुँह अँधेरे कौन इतनी ज़ोर से घंटी बजाए जा रहा है ? किससे मिलना है?”  शायद गहरी नींद से जाग जाने की वजह से वे थोड़ा झुंझलाई हुए थीं | मैंने बाहर से ही शान्ति से जवाब दिया, “मैं गुड्डी हूँ | मम्मी से मिलने आई हूँ |” मेरी आवाज़ सुनकर चश्मा लगाए हुए एक वृद्ध महिला ने काँपते हाथों से किवाड़ खोले | वे मेरे नज़दीक आकर मेरे चेहरे को पहचानने की कोशिश करने लगीं | उनकी बोलती हुई बड़ी-बड़ी आँखें देखकर मैं मम्मी को पहचान गई थी | वे अब काफ़ी कमज़ोर और उम्र-दराज़ नज़र आ रही थीं | मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “मम्मी, तू अपनी गुड्डी को पहचान नहीं पा रही है ? मेरी जानी-पहचानी आवाज़ सुनकर अचानक उनके चेहरे पर खुशी की रोशनी चमक उठी और वे “मेरी गुड्डी, मेरी बेटी, कहाँ चली गई थी तू माँ को छोड़ कर ?” कहकर रोते हुए मेरे गले से लिपट गईं | मैं भी अपने आँसुओं को और अधिक देर तक आँखों में कैद न रख सकी | बहुत देर तक हम दोनों यूँ ही सड़क किनारे गले लगकर रोते रहे | उन आँसुओं में वह सुख था जिसके सामने दुनिया की तमाम दौलत मिट्टी समान थी | यही वह लम्हा था जिसका हमें एक लम्बे अरसे से इंतज़ार था | मम्मी के इस प्यार और दुलार को मैं बरसों से तरस रही थी और दूसरी तरफ मम्मी का भी यही हाल था | ऐसा एहसास हो रहा था जैसे मैं माँ के प्यार की बारिश में सिर से पाँव तक तर-बतर हुई जा रही हूँ | इस खूबसूरत लम्हे को हम दोनों जी भर कर जी लेना चाहते थे | हमारे गले आँसुओं से रूँध गए थे और चाह कर भी बोल हलक से बाहर नहीं आ पा रहे थे | हम दोनों के पास कहने के लिए बहुत कुछ था लेकिन इस वक़्त जज़्बातों के तेज़ बहाव में हमारे अल्फाज़ न जाने कहाँ बह गए थे | शायद इनकी अब ज़रुरत भी नहीं बची थी क्योंकि अब हमारे आँसू ही ज़ुबाँ का काम कर रहे थे |