the pain of a girl in Hindi Short Stories by Vandna Sharma books and stories PDF | मेहमान

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स्टेशन पर काफी भीड़ थी। सुबह साढ़े 9 बजे भी दिल्ली दौड़ रही थी। यात्री अपनी ट्रेन पकड़ने के लिए भागे जा रहे थे। रिया का टिकट बुक था लेकिन दिल्ली का प्लेटफार्म ही इतना बड़ा है आधा घंटा तो प्लेटफार्म पर ही निकल जाता है। रिया अपने दस वर्षीय बेटे के साथ मायके जा रही थी राखी पर। लड़कियों को बहुत भाग-दौड़ करनी पड़ती है राखी पर। एक ही दिन ससुराल और मायके दोनों जगह राखी निभाने के चक्कर में लड़की कितना संघर्ष करती है ये वो महिलाएं अच्छी तरह समझ सकती हैं जिन्हें हर साल राखी पर यह भाग दौड़ करनी पड़ती है।

ससुराल में पति के निहोरे करती है जल्दी पहुंचा दो मुझे मायके, मेरी भाभी इंतजार कर रही होगी, उन्हें भी तो मायके जाना है अपने। जो महिलाएं अलग शहर में रहती हैं उनका तो बुरा हाल हो जाता है राखी वाले दिन। ससुराल और मायके दोनों को खुश करने में स्त्री कितना मानसिक तनाव झेलती है। जबकि खुश कोई होता ही नहीं है। दोनों तरफ से ताने सुनने पड़ते हैं।

रिया को सीट मिल गई थी। रिया को भी अपने मायके भाई को राखी बांध जल्दी ही ससुराल निकलना था अपनी ननद से राखी बंधवाने। सोच रही थी। यह गलत चलन किसने चलाया भाभी को राखी बांधने का। बहने अपने भाई को राखी बांधे तो इतनी भागमभाग ना करनी पड़े।

रिया खिड़की से बाहर प्रकृति के नजारों में खोई अतीत की यादों में पहुंच जाती है। खिड़की के बाहर जितनी तीव्रता से पेड़ पौधे आ-जा रहे थे। उसी तेजी से उसका मन अतीत की यादों से गति कर रहा था एक गोताखोर की तरह यादों की लहरों से सामना कर रहा था ।

रिया बहुत खुश थी अपने भाई की शादी में। सब काम दौड़-दौड़ कर निपटा रही थी। घर की सारी जिम्मेदारी उसने संभाली हुई थी। कौन सी चीज कहां रखी है सब उसी से पूछ रहे थे। लेकिन उसे उस समय बहुत धक्का लगा जब शाम को भाभी ने अपने कमरे का दरवाजा उसके मुंह पर ही बंद कर दिया। अलमारी की चाबी भी उससे ले ली। घर में अभी मेहमान रुके हुए थे। सब अपनी बातों में व्यस्त अपने सोने की जगह ले चुके थे। और रिया बरामदे में खड़ी यह सोच रही थी, किसी को मेरी चिंता नहीं है, मैंने खाया ही या नहीं। माता-पिता भी अत्यधिक थकान के कारण पहले ही सो गए। किसी ने रिया से पूछा भी नहीं कहां सोएगी। उसकी आंखों से आंसू निकल आए। पहली बार घर में उसे पराया महसूस हो रहा था। वो अपने आंसू पोंछकर ऊपर छत पर बने कमरे में गई जहां उसकी बुआ और चाची सो रहे थे। वहां भी सोने के लिए उसे जगह न मिली। एक कोने में बैठ रोती रही, रोते-रोते आंख लग गई। कब सुबह हुई पता ही न चला।

ट्रेन अपने गंतव्य पर पहुंच गई थी। रिया ने स्टेशन से बाहर आकर रिक्शा लिया और अपने घर पहुंची। उसने अपना बैग बाहर ही बरामदे में रखा, देखा कि उसकी भाभियां भी अपने मायके जाने के लिए तैयार खड़ी थीं। रिया सबके लिए उपहार लाई थी। अपने भाई, भाभी के लिए, भतीजों के लिए। छोटी भाभी चिढ़ते हुए बोली, अपना घर देखकर चला करो दी, क्यों फिजूलखर्ची करती हो, हमने कोई मांगे तो न थे तुमसे उपहार। अब लाई हो तो यहीं रख दो, कल आकर देख लेंगे।

जल्दी आया करो अपने घर से, हमें भी जाना होता है अपने मायके। "जी भाभी" रिया ने बड़ी मुश्किल से अपने आंसुओं को रोका। उसका बैग भी बाहर बरामदे में पड़ा उसे आंखें दिखा रहा था। जब दोनों भाभियां चली गई रिया ने सोचा कि बैग उठाकर कमरे में रख देती हूं, जैसे ही बैग उठाकर कमरे में जाने लगी तो उसके पिता ने टोक दिया - यहीं पड़ा रहने दे बैग को, एक दिन मेहमानदारी करने आई है शाम को चली जाएगी। अब रिया खुद को रोक नहीं पाई और सामान वहीं छोड़ कमरे में जाकर सिसक-सिसक कर रोने लगी। सोच रही थी ससुराल जाओ तो वहां भी सास-नंद के ताने सुनो। जल्दी नहीं आ सकती, ये नहीं लाई, वो नहीं लाई। 

ईश्वर तुमने एक विवाहित लड़की की किस्मत में कोई घर नहीं लिखा क्या। माँ-बाप कहते हैं तुम मेहमान हो ये तुम्हारा घर नहीं है। सास और पति कहते हैं इसे सारी बात मत बताओ पराय घर से आई है। मेरा कौन-सा घर है।

रिया शाम को ही अपने ससुराल चली जाती है। वहां भी जाते ही रसोई में लग जाती है खाना बनाने में। जैसे सब उसका ही इंतजार कर रहे हो कब रिया आएगी। कब खाना बनाएगी। किसी ने एक गिलास पानी को भी नहीं पूछा। सबको खाना खिलाया, बाद में बचा-खुचा ठंडा पड़ा खाना खाकर बर्तन साफ करने लगी। बर्तन करते उसे चक्कर आ गए वो रसोई में ही गिर गई। उसके पति ने उसे उठाया तो सास ताना मारने लगी। ये देखो जोरू का गुलाम, अरे कुछ न हुआ इसे नाटक कर रही है। रिया का पति शांत खड़ा सुनता रहा, उसने कुछ न कहा। रिया से बोला चुप रहना, एक दिन की ही बात है कल चले जाएंगे दिल्ली। क्लेश मत करो। रिया को अब त्योहारों से नफरत होने लगी।

त्योहारों पर उसे खुशी नहीं होती, मानसिक शोषण झेलना पड़ता। अपनी किस्मत को कोस रही थी कि न मायके का सुख मिला न ससुराल का प्यार। बस एक मेहमान है वो इस दुनिया में। एक दिन इस दुनिया से भी चले जाना है। अपना किरदार निभाना है।

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डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली