इस खबर ने कमरे में मौजूद हर शख्स को पत्थर बना दिया। पंडित शास्त्री केवल एक पुजारी नहीं थे,
वे कोलकाता की आस्था और सांप्रदायिक एकता का स्तंभ थे। उन्हें शहर का 'सत्यवादी' पुरुष माना जाता था।
दिग्विजय का चेहरा पीला पड़ गया।
"यह... यह तो दंगा करवा देगा। अगर लोगों को पता चला कि किसी ने पुजारी जी की हत्या की है, तो कोलकाता जल उठेगा।"
अंधक' का रक्त-अभिषेक और विनाश की उल्टी गिनती
मंदिर के पुजारी पंडित देवनाथ शास्त्री की हत्या ने पूरे शहर को सुन्न कर दिया था।
लेकिन लालबाजार मुख्यालय के उस बंद कमरे में, अंकुर के शब्दों ने जो सन्नाटा पैदा किया, वह किसी बम धमाके से कम नहीं था। कमिश्नर भाटी,
अग्निश और दिग्विजय—तीनों ही इस बात से हैरान थे कि अंकुर इसे केवल एक हत्या नहीं, बल्कि किसी 'शक्ति' के उदय से जोड़ रहा था।
अंकुर ने अपनी जेब से एक पुराना, मटमैला सिक्का निकाला, जिस पर एक अजीब सी आकृति बनी थी। उसने उसे मेज पर पटका और सबकी आँखों में झाँकते हुए बोला:
"आप लोग जिसे सत्ता की लड़ाई या गैंगवार समझ रहे हैं, वह दरअसल एक प्राचीन और खौफनाक 'रक्त-अनुष्ठान' की शुरुआत है।
वह जिसे आप 'अंधक' कह रहे हैं, वह केवल एक अपराधी नहीं है। वह खुद को 'माया का पुत्र' मानता है। और उसने पंडित शास्त्री को क्यों चुना? क्योंकि पुजारी जी इस शहर के सबसे बड़े 'सत्यवादी' पुरुष थे।"
दिग्विजय सिंह ने ठहाका मारना चाहा, पर अंकुर की आंखों की गंभीरता देख कर रुक गए। "अंकुर, तुम होश में तो हो? तुम कह रहे हो कि यह कोई तंत्र-मंत्र का खेल है?"
अंकुर ने मेज पर झुकते हुए कहा, "मंत्री जी, यह अंधविश्वास नहीं, एक 'साइकोलॉजिकल और स्पिरिचुअल' युद्ध है।
अंधक का मानना है कि यदि वह 100 ऐसे पुरुषों और महिलाओं का रक्त पी ले जो सत्य के मार्ग से कभी नहीं भटके, तो वह अजेय बन जाएगा।
पुजारी जी उसकी उस सूची के पहले व्यक्ति थे। उनका सत्यवादी होना ही उनकी मौत का कारण बना।"
99 की दहलीज पर खड़ा विनाश
अंकुर की आवाज़ अब और भी भारी हो गई थी। "अंधक ने अभी केवल एक को मारा है। अभी 99 सत्यवादी लोगों का कत्ल होना बाकी है।
जिस दिन यह गिनती पूरी हुई, उस दिन यह अपराधी एक ऐसी सत्ता और शक्ति हासिल कर लेगा कि न आपकी पुलिस उसे पकड़ पाएगी, न आपकी अदालतें।
वह इस धरती के विनाश का कारण बनेगा क्योंकि वह सत्य की नींव को ही उखाड़ फेंकना चाहता है।"
अग्निश चट्टोपाध्याय, जो अब तक केवल गोलियों की भाषा समझते थे, पहली बार कांप उठे। "तो नजीमा... और भवनीश? क्या वे भी इस सूची का हिस्सा थे?"
"नहीं," पंखुड़ी ने बीच में टोकते हुए कहा। "वे केवल बाधाएँ थीं। नजीमा ने शायद अंधक को उस रूप में देख लिया था जिसे वह छिपाना चाहता था।
लेकिन पुजारी जी की मौत एक 'बलि' है। वह अब अपनी शक्तियों को बढ़ाने के रास्ते पर निकल चुका है।"
एक भयावह चेतावनी
अंकुर ने खिड़की की ओर देखा जहाँ दूर हुगली की लहरों पर चाँद की रोशनी पड़ रही थी, पर वह रोशनी भी आज खूनी लग रही थी।
"अंधक अब और भी ताकतवर होगा," अंकुर ने शांत स्वर में कहा। "अगली बार जब वह सामने आएगा, तो वह कोई इंसान नहीं,
बल्कि एक 'असुर' की तरह व्यवहार करेगा। उसने चिंकी को इसीलिए अगवा किया है क्योंकि वह उसे मारना नहीं चाहता, वह उसे अपना 'अंतिम मोहरा' बनाना चाहता है।
सुजॉय मजूमदार की बेटी का इस्तेमाल वह पूरे शहर में अफरा-तफरी फैलाने के लिए करेगा ताकि उस शोर के बीच वह अपनी 99 और बलियां पूरी कर सके।"कमिश्नर भाटी ने पसीना पोंछते हुए पूछा, "अंकुर, इसे रोकने का कोई तो रास्ता होगा?"
अंकुर पलटा और अपनी पिस्तौल की मैगजीन चेक करते हुए बोला, "सिर्फ एक। हमें उस 'अंधक' से पहले उन 99 लोगों तक पहुँचना होगा जो उसकी सूची में हैं।
हमें साये से लड़ने के लिए खुद साया बनना होगा। और याद रखिये, अगर हमने एक भी और 'सत्यवादी' खोया, तो अंधक की शक्ति दुगनी हो जाएगी।"
कोलकाता का कांपता हुआ सीना
बाहर, सुजॉय मजूमदार के चैनल पर पुजारी जी की मौत की खबर ने आग लगा दी थी। सड़कों पर लोग जमा होने लगे थे। पुलिस की गाड़ियां दौड़ रही थीं,
लेकिन किसी को नहीं पता था कि असली दुश्मन सड़कों पर नहीं, बल्कि इंसानी रूह के अंधेरों में छिपा हुआ है।
कोलकाता का आक्रोश – मंदिर की दहलीज पर कयामत
जैसे-जैसे पंडित देवनाथ शास्त्री की हत्या की खबर जंगल की आग की तरह फैली,
वैसे-वैसे कोलकाता का हृदय कहे जाने वाले उस प्राचीन मंदिर की ओर जाने वाले सारे रास्ते बंद हो गए। ऐसा लग रहा था मानो पूरा शहर एक ही दिशा में बह रहा हो।
उमड़ता जनसैलाब और सत्ता का जमावड़ा
मंदिर के ऊंचे शिखरों पर लगा भगवा ध्वज आज झुका हुआ सा लग रहा था। मंदिर के मुख्य द्वार पर हज़ारों की भीड़ उमड़ पड़ी थी।
आम जनता ही नहीं, बल्कि शहर के नामी-गिरामी चेहरे भी वहां पहुंचने लगे थे। बड़ी-बड़ी गाड़ियों का तांता लगा था। फिल्मी सितारे, जो कल तक पुजारी जी से आशीर्वाद लेने आते थे, आज अपनी आंखों में आंसू लिए खड़े थे।
देश के बड़े उद्योगपति, जो मंदिर के ट्रस्टी थे, सदमे में थे।
मिलिट्री की दो टुकड़ियों को तुरंत तैनात कर दिया गया था क्योंकि स्थानीय पुलिस के बस की बात नहीं रही थी।
चारों तरफ 'अमर रहे' के नारों और 'न्याय करो' की गूँज के बीच एक ऐसा सन्नाटा भी था, जो किसी बड़े विस्फोट से पहले की खामोशी जैसा लग रहा था।
एक ज्वालामुखी पर खड़ा शहर
हवा में केवल भारीपन था। लोगों के चेहरों पर दुःख कम और गुस्सा ज़्यादा था। हर कोई एक ही सवाल पूछ रहा था—"जब मंदिर के अंदर भगवान के सबसे प्रिय भक्त सुरक्षित नहीं हैं, तो इस शहर में कौन सुरक्षित है?"
अग्निश चट्टोपाध्याय और दिग्विजय सिंह जब मंदिर पहुँचे, तो उन्हें जनता के भारी विरोध का सामना करना पड़ा। लोग उन्हें 'नाकाम सरकार' और 'कमजोर प्रशासन' कहकर कोस रहे थे।
पुलिस कमिश्नर भाटी अपनी पूरी फोर्स के साथ वहां मौजूद थे, लेकिन उनकी वर्दी का रौब आज लोगों के गुस्से के सामने फीका पड़ रहा था।
अंकुर और पंखुड़ी का गुप्त निरीक्षण
इस हंगामे और भीड़ के बीच, दो साये चुपचाप मंदिर के पिछले हिस्से से दाखिल हुए। अंकुर ने अपनी टोपी को नीचे झुकाया हुआ था और पंखुड़ी ने एक साधारण दुपट्टे से अपना सिर ढक लिया था। वे यहाँ शोक मनाने नहीं, बल्कि उस 'पवित्र गुनहगार' के सुराग ढूंढने आए थे।
अंकुर को कैसे पता चला कि अंधक की सूची में कुल 100 'सत्यवादी' लोग हैं और पुजारी जी उसमें पहले नंबर पर थे? क्या अंकुर के पास उस सूची के बाकी 99 लोगों के नाम या कोई सुराग मौजूद है?