1926 ki Amavas ki wo Khouffnak raat in Hindi Horror Stories by RAAHULL SHARMA books and stories PDF | 1926 की अमावस की वो खौफनाक रात - 9

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1926 की अमावस की वो खौफनाक रात - 9

जब महाराज देववर्धन की मुख्य चिता पूरी तरह तैयार हो गई, तब महारानी रुक्मिणी ने अपनी जिंदगी का सबसे कठिन और कलेजा चीर देने वाला कार्य किया। 


उन्होंने अपने 3 महीने के मासूम, तेजस्वी राजकुमार को अपनी गोदी में उठाया, उसे आखिरी बार छाती से लगाया और उसके माथे को चूमकर अपनी आँखों के आंसुओं से उसे नहला दिया।


महारानी ने मुड़कर अपनी दूसरी सबसे प्रिय और महल की सबसे वफादार महिला (दासी) की तरफ देखा, जिसने उसी खौफनाक रात अपने सैनिक पति को खोया था।


महारानी ने उस रोती हुई महिला के हाथों में अपने नवजात शिशु को सौंपते हुए रुंधे गले से कहा, "बहन! आज से तुम सिर्फ दासी नहीं, इस बच्चे की माँ हो। 


तुमने अपनी परवाह किए बिना मेरे बेटे का लालन-पालन करना है। 


इसे ऐसे उच्च संस्कार देना और इसके भीतर एक सच्चे राजा के ऐसे गुण भरना, ताकि यह बड़ा होकर कभी अपनी प्रजा को परेशान न करे, उन पर कोई अत्याचार न करे।"



वह वफादार महिला फूट-फूटकर रोते हुए राजकुमार को अपने सीने से लिपटा लेती है।


उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपने पति की मृत्यु का शोक मनाए या अपनी स्वामिनी के इस महात्याग पर विलाप करे।



इतना कहने के बाद, महारानी रुक्मिणी के कदम बिना डगमगाए चिता की ओर चल पड़ते हैं।


उनके पैरों में पायल नहीं थी, पर उनके कदमों की थाप में एक सती का अटूट बल था। पूरी जनता हाथ जोड़कर घुटनों के बल बैठ गई।


महारानी धीरे-धीरे चिता पर चढ़ीं और अत्यंत शांत भाव से अपने मृत पति महाराज देववर्धन के शीश को अपनी गोदी में बिठाकर बैठ गईं। 


उन्होंने अपनी आँखें बंद कीं और नारायण का ध्यान करने लगीं, मानो वे धधकती आग में नहीं, 


बल्कि फूलों की शय्या पर बैठने जा रही हों।
पुजारी के हाथ कांप रहे थे, जैसे ही चिता को अग्नि दी जाने वाली थी,


ठीक उसी पल दूर रास्ते से धूल उड़ाता हुआ पंडित विश्वनाथ दीनानाथ त्रिवेदी का रथ राजमहल के मुख्य द्वार की ओर तेज़ी से बढ़ता हुआ दिखाई दिया।


जैसे ही पुजारी के हाथ में पकड़ी हुई मशाल महाराज देववर्धन की मुख्य चिता को छूने ही वाली थी,


ठीक उसी पल राजमहल के विशाल सिंहद्वार से एक ऐसी गगनभेदी और कड़कती हुई आवाज़ गूंजी, जिसने सबके हाथों को वहीं का वहीं जमा दिया—


"रुक जाओ! रुक जाओ!! अनर्थ हो जाएगा!"
उस गूंजती हुई आवाज़ में ऐसा अलौकिक प्रभाव था कि हवा की सरसराहट भी थम गई। 


मैदान में मौजूद लाखों की भीड़, सैनिक, बड़े-बड़े राजा और यहाँ तक कि रोते-बिलखते नागरिक भी चौंककर पीछे मुड़ गए।


सबकी नज़रें महल के मुख्य दरवाज़े पर टिक गईं कि आखिर इस महा-अंतिम संस्कार को रोकने का साहस किसने किया है?


तभी धूल उड़ाता हुआ वह दिव्य रथ मैदान के भीतर प्रवेश करता है। 


जैसे ही रथ रुका और उसमें से भगवा वस्त्र पहने, माथे पर त्रिपुंड लगाए और हाथ में कमंडल लिए एक तेजस्वी सन्यासी नीचे उतरे, वहां खड़े हर एक व्यक्ति की आँखें फटी की फटी रह गईं।



वहां उपस्थित सभी लोग घुटनों के बल बैठ गए। दूर खड़े क्रूर अंग्रेज अफसर, जो कभी किसी हिंदुस्तानी के आगे सिर नहीं झुकाते थे,


वे भी पंडित जी के अलौकिक तेज को देखकर उनके सम्मान में झुक गए। 


क्योंकि आने वाले कोई साधारण साधु नहीं, बल्कि नासिक के प्रसिद्ध ज्योतिर्मठ के मठाधीश, तंत्र-मंत्र और वेदों के परम विद्वान पंडित विश्वनाथ दीनानाथ त्रिवेदी थे।


पंडित जी के शिष्यों का काफिला पीछे खड़ा रहा और पंडित विश्वनाथ अपने भारी कदमों से सीधे उस स्थान की ओर बढ़े जहाँ धधकने के लिए चिताएं सजी थीं। लोगों ने स्वतः ही उनके लिए रास्ता छोड़ दिया।


पंडित जी सीधे महाराज देववर्धन की चिता के पास पहुंचे, जहाँ महारानी रुक्मिणी अपने पति का शव गोदी में लिए बैठी थीं। 


उन्होंने अपने कमंडल से पवित्र जल हाथ में लिया और पुजारियों व सैनिकों की तरफ देखकर गंभीर स्वर में कहा, "रुक जाओ! कोई भी इस चिता को अग्नि नहीं देगा!"


पंडित जी की कड़क आवाज़ सुनकर महारानी रुक्मिणी ने अपनी बंद आँखें खोलीं।


मठाधीश पंडित विश्वनाथ को अपने सामने देखकर उनकी आँखों से आंसुओं का नया सैलाब उमड़ पड़ा। उन्होंने चिता पर बैठे-बैठे ही पंडित जी को प्रणाम किया।


पंडित विश्वनाथ ने महारानी की तरफ देखा, उनके चेहरे पर करुणा और थोड़ा क्रोध था।


वे बोले, "महारानी जी! आप यह कैसा घोर पाप करने जा रही थीं?


आप साक्षात लक्ष्मी का रूप हैं, इस देवपुर की आन-बान और शान हैं।

समाज के कुछ मूर्ख और कायर लोगों के झूठे लांछनों के भय से, आप अपने इस पवित्र शरीर को अग्नि की भेंट चढ़ाने जा रही थीं?

क्या आपको अपने इस 3 महीने के अबोध बालक पर भी दया नहीं आई?"


तभी पंडित जी की बात सुनकर चारों तरफ खड़े मंत्रियों और नागरिकों के सिर शर्म से झुक गए, जिन्होंने महारानी के चरित्र पर उंगली उठाई थी।


महारानी रुक्मिणी ने रोते हुए कहा, "हे महाज्ञानी! मेरे पति देव का अचानक प्राणांत हो गया। 


महल के सारे पुरुष मारे गए। इस पापी समाज ने मुझ पर ही अपने सुहाग और सैनिकों की हत्या का नीच इल्जाम लगा दिया।


मेरे राजपूती आत्मसम्मान को ठेस पहुँची है भगवन! इस लांछन के साथ जीने से बेहतर मैंने अपने पति के साथ सती होना समझा।

आप ही बताइए, मैं क्या करती?"

पंडित विश्वनाथ ने एक गहरी सांस ली, उनकी आँखें क्रोध से लाल हो गईं। 


उन्होंने पूरी जनता और बाहर से आए राजाओं की तरफ देखा और गरजते हुए बोले, "महारानी निर्दोष हैं! 


इस राजमहल में जो कुछ भी हुआ, वह किसी साज़िश का हिस्सा नहीं, बल्कि इस देवपुर के राजा के अपने ही कर्मों का भयानक प्रतिशोध था!"



यह सुनते ही पूरी प्रजा में कानाफूसी शुरू हो गई। लोग हैरान थे कि पंडित जी महाराज देववर्धन को लेकर क्या कह रहे हैं। असली रहस्य अब सबके सामने आने वाला था।


पंडित विश्वनाथ दीनानाथ त्रिवेदी के मुख से यह सुनते ही कि "यह राजा को उसके अपने कर्मों की सजा मिली है", पूरी सभा में मानो एक ज़बरदस्त विस्फोट हो गया।


चारों तरफ खड़े नागरिकों, मंत्रियों और बाहर से आए राजा-राजकुमारों में भारी कानाफूसी शुरू हो गई।


कुछ अज्ञानी और अंधभक्त लोग दबी ज़ुबान में बड़बड़ाने लगे, "यह पंडित जी हमारे भगवान जैसे राजा के बारे में क्या अनाप-शनाप बक रहे हैं?

राजा साहब ने तो पूरी जिंदगी प्रजा की सेवा में लगा दी!"


परंतु, वहीं खड़े कुछ समझदार लोग और बड़े-बड़े संत-महात्मा तुरंत समझ गए। वे आपस में कहने लगे, "शांत रहो! 


पंडित विश्वनाथ ज्योतिर्मठ के मठाधीश हैं। उन्होंने निश्चित ही अपनी दिव्य दृष्टि और कठोर साधना की सिद्धि से कुछ ऐसा देखा है, जो हम साधारण मनुष्यों की आँखों से ओझल है।


" पंडित जी के अलौकिक तेज के सामने किसी की खुलकर बोलने की हिम्मत नहीं हो रही थी।


तभी पंडित विश्वनाथ ने महारानी रुक्मिणी की ओर देखा और अत्यंत गंभीर किंतु सौम्य स्वर में कहा, "महारानी!


आप सबसे पहले इस चिता के ऊपर से नीचे उतरिए। इस राजमहल में जो कुछ भी हुआ है, वह किसी जीवित इंसान का काम नहीं है। 


ना ही यह कोई साधारण हत्या है और ना ही यह राज्य या धन-दौलत के लालच में रचा गया कोई बड़ा षड्यंत्र है!


किसी ने भी अपने वजूद या गद्दी के लिए इन सैकड़ों लोगों को नहीं मारा है।"