An Unfinished Book - Season 2 - Episode 42 in Hindi Horror Stories by kajal jha books and stories PDF | अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 42

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अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 42

 अधूरी किताब – सीजन 2
एपिसोड 42 अनलिखा अस्तित्व
मंदिर के भीतर सुनहरी और नीली रोशनी एक-दूसरे में घुल चुकी थी।
अनन्या की सुनहरी कलम...
और आरव की जागृत पहले पाठक की शक्ति...
एक साथ मिलकर एक ऐसा प्रकाश बना रही थीं, जिसे देखकर स्वयं अनलिखित ग्रंथ भी पीछे हट गई।
लेकिन...
अगले ही पल पूरा मंदिर भयंकर तरीके से काँप उठा।
धड़ाम...!
मंदिर के बाहर धरती फटने लगी।
आसमान में बिजली नहीं...
बल्कि काले अक्षर चमक रहे थे।
हर अक्षर हवा में बनता...
और तुरंत गायब हो जाता।
सत्यलेखक ने काँपती आवाज़ में कहा,
"नहीं..."
"यह नहीं हो सकता..."
अनन्या ने उसकी ओर देखा।
"क्या हुआ?"
सत्यलेखक की आँखें डर से फैल चुकी थीं।
"वह जाग गया है..."
"जिसका ज़िक्र किसी किताब में नहीं है।"
आरव ने पूछा,
"कौन?"
वृद्ध रक्षक ने गहरी साँस ली।
फिर धीमे स्वर में बोला—
"अनलिखा अस्तित्व।"
पूरे मंदिर में सन्नाटा छा गया।
पहली कहानी भी एक कदम पीछे हट गई।
"लेकिन..."
"वह तो केवल एक कथा थी।"
वृद्ध ने सिर हिलाया।
"नहीं..."
"वह हर कहानी से पहले था।"
"हर लेखक से पहले..."
"हर पाठक से पहले..."
"और..."
"हर किताब से पहले भी।"
अचानक मंदिर की दीवार पर एक विशाल दरार पड़ी।
दरार के भीतर से कोई चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
सिर्फ़ गहरा अंधकार।
लेकिन उस अंधकार से आती आवाज़ पूरे मंदिर में गूँज उठी।
**"तुम लोग..."
"अब भी कहानी बचाना चाहते हो?"**
आवाज़ शांत थी।
लेकिन इतनी भारी कि सबके शरीर काँप उठे।
अनन्या ने साहस जुटाकर कहा,
"तुम कौन हो?"
कुछ पल तक मौन रहा।
फिर उत्तर मिला—
**"मैं..."
"वह हूँ..."
"जिसके बारे में कभी लिखा ही नहीं गया।"**
**"क्योंकि..."
"जिसे लिखा जाए..."
"वह कहानी बन जाता है।"**
**"और मैं..."
"कभी कहानी बना ही नहीं।"**
इतना कहते ही मंदिर के बीचों-बीच अंधकार का एक विशाल स्तंभ खड़ा हो गया।
धीरे-धीरे उस अंधकार ने मानव का आकार लेना शुरू किया।
लेकिन...
उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
जहाँ चेहरा होना चाहिए था...
वहाँ केवल खालीपन था।
उसके शरीर पर कोई रंग नहीं था।
न काला...
न सफेद...
बस शून्य।
अनलिखित ग्रंथ पहली बार घुटनों पर बैठ गई।
उसने सिर झुका दिया।
"स्वामी..."
यह देखकर सभी चौंक गए।
अनन्या ने अविश्वास से पूछा,
"यह..."
"तुम्हारा स्वामी है?"
अनलिखित ग्रंथ बोली,
"मैं केवल एक किताब हूँ..."
"लेकिन..."
"इन्होंने ही मुझे जन्म दिया था।"
अनलिखा अस्तित्व ने धीरे-धीरे अपना हाथ उठाया।
उसके हाथ में न कलम थी...
न किताब।
सिर्फ़ खाली हथेली।
उसने कहा—
"मैंने..."
"पहले शून्य की रचना की।"
"फिर शून्य से विचार पैदा हुए।"
"विचारों से शब्द बने।"
"शब्दों से कहानियाँ।"
"और..."
"कहानियों से लेखक।"
"लेकिन..."
"लेखकों ने खुद को सृष्टिकर्ता समझ लिया।"
"यहीं से गलती शुरू हुई।"
आरव ने आगे बढ़कर कहा,
"अगर तुम इतने शक्तिशाली हो..."
"तो फिर सामने क्यों नहीं आए?"
अनलिखा अस्तित्व हल्का-सा हँसा।
"क्योंकि..."
"जिसे कोई जान ले..."
"वह रहस्य नहीं रहता।"
"और..."
"हर कहानी का सबसे बड़ा आधार रहस्य ही होता है।"
उसी समय...
अधूरी किताब अपने-आप हवा में उठ गई।
उसके सारे पन्ने तेज़ी से पलटने लगे।
पहला अध्याय...
दूसरा...
तीसरा...
सैकड़ों अध्याय...
हजारों अध्याय...
और अंत में...
खाली पन्ने।
वृद्ध रक्षक चौंक उठा।
"नहीं..."
"यह अपने सारे अध्याय स्वयं खोल रही है।"
अनलिखा अस्तित्व ने उसकी ओर देखा।
"समय आ गया है।"
"अब यह तय होगा..."
"कि अधूरी किताब जीवित रहेगी..."
"या..."
"हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगी।"
अनन्या ने अपनी सुनहरी कलम कसकर पकड़ ली।
"मैं इसे समाप्त नहीं होने दूँगी।"
अनलिखा अस्तित्व ने पहली बार उसकी ओर ध्यान से देखा।
कुछ क्षण तक वह मौन रहा।
फिर बोला—
"तुम्हारे भीतर..."
"पहले लेखक की जिद है।"
फिर उसने आरव की ओर देखा।
"और..."
"तुम्हारे भीतर..."
"पहले पाठक का विश्वास।"
"लेकिन..."
उसकी आवाज़ अचानक भारी हो गई।
"क्या तुम जानते हो..."
"अधूरी किताब का अंतिम अध्याय लिखने के बाद..."
"लेखक और पाठक दोनों का क्या होता है?"
आरव और अनन्या दोनों चुप रहे।
वृद्ध रक्षक ने आँखें बंद कर लीं।
मानो वह उत्तर पहले से जानता हो।
अनलिखा अस्तित्व बोला—
"जो अंतिम अध्याय लिखता है..."
"...वह कहानी से बाहर हो जाता है।"
"और..."
"जिसने उसे पढ़ा..."
"...वह भी कहानी की स्मृतियों से मिट जाता है।"
पूरा मंदिर स्तब्ध रह गया।
अरोही के होंठ काँपने लगे।
"मतलब..."
"अगर अंतिम अध्याय लिखा गया..."
"तो अनन्या और आरव..."
"...हमेशा के लिए गायब हो जाएँगे?"
अनलिखा अस्तित्व ने बिना किसी भाव के उत्तर दिया—
"हाँ।"
"हर अधूरी कहानी की कीमत..."
"उसके लेखक और उसके पहले पाठक को चुकानी पड़ती है।"
अनन्या और आरव ने एक-दूसरे की ओर देखा।
दोनों की आँखों में डर भी था...
और दृढ़ निश्चय भी।
उसी क्षण...
अधूरी किताब का अंतिम खाली पन्ना चमकने लगा।
उस पर धीरे-धीरे एक वाक्य उभरने लगा—
"अंतिम अध्याय लिखने वाले का चयन शुरू हो चुका है..."
और उसी पल...
अनन्या की सुनहरी कलम अपने-आप हवा में उठ गई।