Adhuri Kitaab: Ek Ruhaani Daastaan in Hindi Horror Stories by kajal jha books and stories PDF | अधूरी किताब: एक रूहानी दास्तान। - एपिसोड 59

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अधूरी किताब: एक रूहानी दास्तान। - एपिसोड 59

अधूरी किताब: एक रूहानी दास्तान


एपिसोड 59  लेखकों का निषिद्ध पुस्तकालय


रक्तचंद्र महल की टूटी हुई मीनार के नीचे छिपा वह विशाल पत्थर का द्वार धीरे-धीरे खुलने लगा।


सदियों से बंद पड़े पत्थरों के खिसकने की आवाज़ पूरे महल में गूँज उठी।


धूल का घना बादल हवा में फैल गया।


द्वार के भीतर केवल अंधकार था।


ऐसा अंधकार जिसमें रोशनी भी प्रवेश करने से डरती हो।


अनन्या ने जीवन-लेखनी को कसकर पकड़ लिया।


उसकी धड़कनें तेज़ थीं।


आदि कथाधीश ने गहरी साँस ली।


"आज तक..."


"इस पुस्तकालय में प्रवेश करने वाले अधिकांश लेखक लौटकर नहीं आए।"


समर ने आश्चर्य से पूछा,


"क्यों?"


महर्षि ग्रंथेश ने उत्तर दिया,


"क्योंकि यहाँ किताबें नहीं..."


"लेखकों की आत्माएँ रहती हैं।"


सभी कुछ क्षण के लिए मौन हो गए।


धीरे-धीरे सभी उस विशाल द्वार के भीतर प्रवेश करने लगे।


जैसे ही अनन्या ने पहला कदम रखा...


उसे लगा मानो समय रुक गया हो।


अंदर एक असीमित पुस्तकालय था।


जहाँ तक नज़र जाती...


बस अलमारियाँ ही अलमारियाँ थीं।


हर अलमारी आसमान जितनी ऊँची।


हर रैक पर हजारों पुस्तकें।


कुछ चमक रही थीं।


कुछ धूल में दबी थीं।


कुछ जंजीरों से बंधी हुई थीं।


और कुछ स्वयं हवा में तैर रही थीं।


पूरा पुस्तकालय जीवित प्रतीत हो रहा था।


एकांश ने धीमे स्वर में कहा,


"यहाँ कितनी किताबें हैं?"


आदि कथाधीश मुस्कुराए।


"जितने संसार हैं..."


"उतनी कहानियाँ।"


उसी समय...


कहीं दूर से पन्ने पलटने की आवाज़ आई।


फड़...


फड़...


फड़...


फिर एक धीमी आवाज़ सुनाई दी—


"नई लेखिका..."


"स्वागत है..."


अनन्या ने चारों ओर देखा।


कोई दिखाई नहीं दिया।


अचानक सामने रखी एक पुरानी पुस्तक अपने आप खुल गई।


उसके पन्नों से सुनहरी रोशनी निकली।


और उस रोशनी से एक वृद्ध महिला का रूप बन गया।


उनके बाल पूरी तरह सफेद थे।


आँखों में अपार शांति थी।


उन्होंने मुस्कुराकर कहा—


"मैं हूँ..."


"सरस्विनी।"


"इस निषिद्ध पुस्तकालय की अंतिम संरक्षिका।"


आदि कथाधीश ने आदर से सिर झुका दिया।


"गुरुमाता..."


सरस्विनी ने उन्हें आशीर्वाद दिया।


फिर उनकी नज़र अनन्या पर ठहरी।


"तो..."


"जीवन-लेखनी ने तुम्हें चुन लिया।"


अनन्या ने विनम्रता से कहा,


"मैं अभी सीख रही हूँ।"


सरस्विनी मुस्कुराईं।


"सच्चा लेखक वही होता है..."


"जो स्वयं को कभी पूर्ण न माने।"


इतने में पुस्तकालय की दीवारें हल्का-हल्का काँपने लगीं।


सरस्विनी का चेहरा गंभीर हो गया।


"वह भी यहाँ पहुँच चुका है।"


अनन्या समझ गई।


"छाया लेखक..."


सरस्विनी ने सिर हिलाया।


उन्होंने सभी को पुस्तकालय के मध्य स्थित एक विशाल कक्ष में पहुँचाया।


वहाँ एक गोलाकार पत्थर की मेज़ रखी थी।


उस पर सात प्राचीन पुस्तकें रखी थीं।


हर पुस्तक पर अलग प्रतीक बना था—


अग्नि।


जल।


वायु।


पृथ्वी।


आकाश।


प्रकाश।


और...


अंधकार।


सरस्विनी बोलीं,


"ये सात मूल ग्रंथ हैं।"


"इन्हीं से हर कथा जन्म लेती है।"


अनन्या ने देखा—


अंधकार वाला ग्रंथ आधा खुला हुआ था।


उसके पन्नों पर काली स्याही फैल रही थी।


महर्षि ग्रंथेश चौंक पड़े।


"किसी ने इसे छुआ है!"


उसी क्षण...


पूरे पुस्तकालय में ज़ोरदार धमाका हुआ।


सैकड़ों अलमारियाँ हिलने लगीं।


हजारों पुस्तकें हवा में उड़ गईं।


काले धुएँ के बीच छाया लेखक प्रकट हुआ।


इस बार उसके चेहरे पर पहले से अधिक आत्मविश्वास था।


वह हँसते हुए बोला,


"मैंने कहा था..."


"अब युद्ध विश्वास का होगा।"


उसने अपनी काली कलम सातों ग्रंथों की ओर उठाई।


क्षणभर में अंधकार ग्रंथ से काली लपटें निकलने लगीं।


बाकी छह ग्रंथ भी काँपने लगे।


सरस्विनी ने घबराकर कहा,


"उसे रोकना होगा!"


"अगर सातों ग्रंथ दूषित हो गए..."


"तो हर नई कहानी अंधकार से जन्म लेगी।"


समर और विराज तलवार लेकर आगे बढ़े।


लेकिन छाया लेखक ने केवल एक शब्द लिखा—


"स्थिर।"


और दोनों वहीं पत्थर की मूर्तियों की तरह जड़ हो गए।


अदिति ने अपनी शक्ति से प्रकाश फैलाने की कोशिश की।


लेकिन उसने दूसरा शब्द लिखा—


"मौन।"


अदिति की आवाज़ चली गई।


वह बोल ही नहीं पाई।


अनन्या ने यह देखकर महसूस किया—


उसकी कलम केवल वस्तुएँ नहीं...


वास्तविकता बदल रही थी।


छाया लेखक ने मुस्कुराकर कहा,


"यही अंतर है..."


"तुम कहानी लिखती हो..."


"मैं नियम लिखता हूँ।"


यह सुनकर अनन्या कुछ क्षण सोचती रही।


फिर उसने अधूरी किताब खोली।


उसे आदि कथाधीश की बात याद आई—


"हर नियम से पहले एक कथा होती है।"


उसने जीवन-लेखनी उठाई।


और खाली पन्ने पर केवल एक पंक्ति लिखी—


"जहाँ आशा जीवित हो, वहाँ कोई शब्द अंतिम नहीं होता।"


जैसे ही उसने यह लिखा...


समर के शरीर से पत्थर टूटने लगा।


अदिति की आवाज़ लौट आई।


विराज फिर से चलने लगा।


छाया लेखक की मुस्कान पहली बार फीकी पड़ी।


सरस्विनी ने संतोष से कहा,


"तुमने नियम नहीं बदला..."


"तुमने उसका अर्थ बदल दिया।"


तभी...


पुस्तकालय की सबसे ऊँची अलमारी अपने आप खुल गई।


उसमें केवल एक पुस्तक रखी थी।


वह बाकी सभी पुस्तकों से अलग थी।


उसका आवरण पूरी तरह सफेद था।


उस पर कोई शीर्षक नहीं लिखा था।


अनन्या अनायास उसकी ओर बढ़ी।


जैसे ही उसने उसे हाथ में लिया...


उसके पहले पन्ने पर सुनहरे अक्षर उभर आए—


"लेखक की अपनी कहानी"


अनन्या के हाथ काँप उठे।


उसने पहला पन्ना खोला।


उसमें लिखा था—


"जिस दिन लेखक अपनी कहानी पूरी पढ़ लेता है..."


"उसी दिन उसकी लेखनी उससे विदा हो जाती है।"


वह तुरंत पुस्तक बंद करने लगी।


लेकिन देर हो चुकी थी।


पुस्तक अपने आप खुलती चली गई।


उसके अगले पन्ने चमकने लगे।


सरस्विनी घबराकर चिल्लाईं,


"अनन्या!"


"उसे पूरा मत पढ़ना!"


लेकिन एक अदृश्य शक्ति पुस्तक के पन्ने पलट रही थी।


हर पन्ने के साथ अनन्या की आँखों में नई यादें उभरने लगीं।


उसे अपना बचपन...


अपना भविष्य...


और फिर...


एक ऐसा दृश्य दिखाई दिया जिसे देखकर उसकी साँस रुक गई।


उसने स्वयं को देखा...


लेकिन वह अकेली नहीं थी।


उसके सामने बैठा था—


छाया लेखक।


दोनों एक ही मेज़ पर बैठकर...


एक ही किताब लिख रहे थे।


अनन्या ने घबराकर पुस्तक बंद कर दी।


उसके माथे पर पसीना था।


छाया लेखक दूर खड़ा मुस्कुरा रहा था।


उसने धीमे स्वर में कहा—


"अब तुमने भी देख लिया..."


"हमारी कहानी..."


और उसी क्षण...


सफेद पुस्तक के आवरण पर पहली बार एक शीर्षक उभर आया—


"दो लेखकों की अंतिम कथा"


पुस्तकालय की सभी मशालें एक साथ बुझ गईं।


और गहरे अंधकार में...


केवल दो कलमें चमक रही थीं—


एक सुनहरी...


और एक काली।


क्रमशः...