दूसरी तरफ यह रहस्यमयी चेतावनी.
अब सवाल सिर्फ इतना था—क्या सचमुच उसकी माँ के साथ कुछ हुआ था. या फिर कोई उसे जाने से रोकने की कोशिश कर रहा था? कार के भीतर एक अजीब- सा सन्नाटा छा गया.
अक्षय की आँखें अब भी उस धुंध भरे शीशे पर टिकी थीं. लेकिन कुछ ही क्षणों बाद वह लिखावट धीरे- धीरे गायब होने लगी.
मानो वहाँ कभी कुछ लिखा ही न गया हो. अक्षय! समीर ने उसका कंधा पकडकर झकझोरा.
क्या हुआ? किसका फोन था? अक्षय ने काँपते हुए होंठों से कहा—
सोनाली का. उसने कहा. उसकी आवाज भर्रा गई. उसने कहा माँ नहीं रहीं.
समीर और विवेक दोनों सन्न रह गए. क्या. विवेक के मुँह से बस इतना ही निकल पाया. अक्षय ने तुरंत दोबारा सोनाली का नंबर मिलाया. फोन लगातार बजता रहा. लेकिन किसी ने उठाया नहीं. उसने फिर Call किया.
फिर. और फिर. लेकिन हर बार वही नतीजा. कोई जवाब नहीं. अब उसकी घबराहट और बढ चुकी थी.
गाडी घर की तरफ मोडो! वह लगभग चिल्लाया.
अभी! विवेक ने बिना कोई सवाल किए स्टीयरिंग घुमा दिया. गाडी तेजी से सडक पर दौडने लगी.
करीब बीस मिनट तक कोई कुछ नहीं बोला. अक्षय बार- बार सोनाली और अपनी माँ का नंबर मिलाता रहा.
लेकिन दोनों फोन बंद आ रहे थे. उसका दिल हर गुजरते मिनट के साथ और ज्यादा डूबता जा रहा था.
तभी. फोन की स्क्रीन अचानक चमकी. एक नया मैसेज आया था. भेजने वाले का नाम देखकर अक्षय का दिल धडक उठा.
माँ" उसकी उँगलियाँ काँप गईं. समीर और विवेक भी स्क्रीन की तरफ देखने लगे.
अक्षय ने मैसेज खोला. उसमें सिर्फ एक लाइन लिखी थी—
घर मत आना।
तीनों कुछ क्षणों तक स्क्रीन को घूरते रह गए.
ये. समीर की आवाज काँप गई. ये कैसे हो सकता है? अक्षय का दिमाग सुन्न पड चुका था.
अगर माँ नहीं रहीं. तो उनके फोन से मैसेज किसने भेजा? और अगर माँ जिंदा थीं.
तो सोनाली ने ऐसा क्यों कहा? अचानक. कार के अंदर का तापमान तेजी से गिरने लगा.
एसी बंद था. फिर भी बर्फ जैसी ठंड फैल रही थी
तीनों की हालत ऐसी हो चुकी थी कि उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या सच है और क्या झूठ.
हर नई घटना पिछले रहस्य से भी ज्यादा उलझी हुई थी.
मानो कोई अदृश्य शक्ति उनके चारों तरफ एक ऐसा जाल बुन रही थी, जिससे निकलना नामुमकिन होता जा रहा था.
कार के भीतर भारी सन्नाटा पसरा हुआ था.
तीनों बेबसी से कभी सामने सडक को देखते, तो कभी एक- दूसरे की तरफ.
लेकिन किसी के पास कोई जवाब नहीं था.
आखिरकार काफी देर बाद समीर ने ही चुप्पी तोडी.
मुझे लगता है ये सब हमें गुमराह करने के लिए किया जा रहा है।
उसने गंभीर स्वर में कहा.
सोचो अक्षय.
पहले फोन आता है कि माँ नहीं रहीं.
फिर तुम्हारी माँ के नंबर से मैसेज आता है कि घर मत आना.
और उसके बाद ये सारी अजीब बातें.
मुझे लगता है कोई चाहता है कि हम घबरा जाएँ और गलत फैसला लें।
अक्षय खिडकी के बाहर देखते हुए उसकी बात सुनता रहा.
कुछ क्षण बाद वह बोला—
लेकिन अगर हमें गुमराह ही किया जा रहा है.
तो फिर घर क्यों जाना चाहिए?
उसकी आवाज में उलझन साफ थी.
मुझे लगता है हमें सीधे विवेक के गाँव जाना चाहिए।
पहले उस तांत्रिक बाबा से मिलते हैं।
शायद वही हमें बता सकें कि ये सब हो क्या रहा है।
विवेक ने तुरंत सिर हिलाया। नहीं अक्षय। इस बार मैं समीर से सहमत हूँ। सबसे पहले घर जाना जरूरी है।
हमें अपनी आँखों से देखना होगा कि आंटी ठीक हैं या नहीं। अगर सब ठीक निकला तो हम तुरंत गाँव निकल जाएँगे। लेकिन अगर सचमुच कोई परेशानी हुई और हम घर नहीं गए.
वह अपनी बात अधूरी छोड गया. उस अधूरे वाक्य ने ही अक्षय के दिल में डर की एक नई लहर पैदा कर दी.
समीर ने भी धीरे से कहा— मुझे नहीं लगता तुम ये जोखिम उठा सकते हो। पहले घर। फिर बाकी सब।
कुछ क्षण तक अक्षय चुप बैठा रहा. उसके मन में भयंकर संघर्ष चल रहा था. एक तरफ मितालिका की चेतावनी थी— घर मत जाओ. दूसरी तरफ उसकी माँ और sonali. आखिरकार उसने गहरी साँस ली.
और धीरे से सिर हिला दिया. ठीक है. पहले घर चलते हैं. अगले ही पल उसने एक्सीलेटर पर पैर और जोर से दबा दिया.
गाडी तेजी से सडक पर दौडने लगी. सडक के दोनों तरफ के दृश्य धुंधले पडते जा रहे थे.
लेकिन तभी. अक्षय की नजर सामने सडक के किनारे लगे एक पुराने माइलस्टोन पर पडी.
और उसका दिल धडकना भूल गया. पत्थर पर मोटे अक्षरों में लिखा था—
प्रतापगढ – सत्ताईस Kilo Meter" अक्षय की भौंहें सिकुड गईं. ये कैसे हो सकता है.
क्यों हो रहा था अक्षय के साथ यह सब?
क्या अक्षय की माँ सचमुच सुरक्षित थीं?
या फिर उनका ठीक दिखाई देना भी किसी गहरी साजिश का हिस्सा था?
रणविजय कौन था? मितालिका और उसके बीच ऐसा क्या हुआ था, जिसकी गूँज सदियों बाद भी सुनाई दे रही थी?
इन सभी रहस्यों, अधूरे सवालों और एक अनोखी प्रेम कहानी के पीछे छिपे सच को जानने के लिए सुनते रहिए—
मितालिका – एक अधूरी कहानी"
एक ऐसी प्रेम गाथा.
जो प्रेम से शुरू हुई,
विश्वासघात में टूटी,
और श्राप बनकर सदियों तक भटकती रही.
यह कहानी अब अपने सबसे रहस्यमयी मोड पर पहुँच चुकी है.
अक्षय के साथ ये अजीब और रहस्यमयी घटनाएँ आखिर क्यों घट रही थीं? इस सवाल का जवाब ढूँढने के लिए तीनों दोस्तों ने फैसला किया कि वे विवेक के गाँव जाकर तांत्रिक बाबा से मिलेंगे. शायद उनके पास इस अनजाने साये से छुटकारा पाने का कोई उपाय हो. लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था.
वे गाँव के लिए निकल पाते, उससे पहले ही एक नई मुसीबत ने उनके दरवाजे पर दस्तक दे दी. अक्षय के घर से आई एक फोन Call ने फिर से उनके दिलों में बेचैनी और डर की लहर दौडा दी. माहौल पहले ही रहस्यमय घटनाओं से भारी था, और अब यह खबर किसी नए तूफान का संकेत लग रही थी.
विवेक और समीर के कहने पर अक्षय ने गाडी अपने घर की ओर जाने वाले रास्ते पर मोड तो दी, लेकिन कुछ ही देर बाद उन्हें एहसास हुआ कि गाडी मानो उनकी मर्जी से नहीं, किसी और अदृश्य शक्ति के इशारों पर चल रही थी. सडक उन्हें सीधे प्रतापगढ की ओर लिए जा रही थी.
तीनों के चेहरों का रंग उड गया, जब सडक किनारे लगे एक पुराने माइलस्टोन पर उनकी नजर पडी. उस पर बडे- बडे अक्षरों में लिखा था—
प्रतापगढ –एक सौ पचहत्तर किलोमीटर"
एक पल के लिए मानो समय थम गया.
अक्षय की आँखें हैरानी और भय से फैल गईं. उसके माथे पर ठंडे पसीने की बूंदें उभर आईं. दिल इतनी तेजी से धडक रहा था जैसे सीने की कैद तोडकर बाहर निकल आएगा. तभी अचानक उसे महसूस हुआ कि उसके पैर उसके अपने नहीं रहे. किसी अदृश्य ताकत ने मानो उन पर कब्जा कर लिया हो. अगले ही क्षण उसके पैर अपने- आप ब्रेक पर जा पडे.
टायरों की कान फाड देने वाली चीख सुनसान सडक पर गूँज उठी. गाडी बुरी तरह बेकाबू होकर लहराई और साथ घिसटती हुई सडक के किनारे जा उतरी और एक जोरदार झटके के रुक गई. समीर और विवेक आगे की तरफ झटका खाकर संभले. कुछ क्षणों तक कार के भीतर सन्नाटा छाया रहा.
कुछ सेकंड तक चारों तरफ सन्नाटा पसरा रहा.
और फिर, उस सन्नाटे के बीच, कहीं दूर किसी की धीमी और खौफनाक हँसी गूँज उठी. ऐसी हँसी, जिसने तीनों के शरीर में सिर से लेकर पाँव तक सिहरन दौडा दी. उन्हें एहसास हो चुका था कि यह सिर्फ एक रास्ता भटकने की घटना नहीं थी.
कोई था. जो उन्हें प्रतापगढ बुला रहा था.
समीर और विवेक ने phir se बोर्ड की तरफ देखा. दोनों के चेहरों का रंग उड गया. क्योंकि वे घर की दिशा में जा रहे थे. प्रतापगढ की तरफ नहीं. फिर यह बोर्ड यहाँ कैसे था
तीनों बस एक- दूसरे का चेहरा देख रहे थे, जैसे किसी के पास कुछ कहने के लिए शब्द ही न बचे हों. माहौल में ऐसा खामोश डर पसरा हुआ था, जिसने उनकी आवाज तक छीन ली थी.
अक्षय ने गहरी साँस लेते हुए दोबारा गाडी स्टार्ट करने के लिए चाबी घुमाई ही थी कि अचानक मौसम ने करवट ले ली.
एकाएक तेज हवाएँ चलने लगीं. कुछ ही पलों में धूल से भरी एक भयावह आँधी सडक पर दौडती हुई उनकी ओर बढने लगी. हवा की सनसनाहट किसी अनजाने खतरे की चेतावनी जैसी लग रही थी. सडक के दोनों ओर खडे पेड बुरी तरह झूम रहे थे, मानो किसी अदृश्य शक्ति के सामने झुकने को मजबूर हों.
अक्षय ने बिना समय गंवाए कार स्टार्ट की और उसे वापस जाने वाले रास्ते पर मोड दिया.
यार. ये मौसम अचानक इतना खराब कैसे हो गया? समीर ने हैरानी से कहा. उसकी आवाज में छिपा डर अब साफ महसूस किया जा सकता था. अक्षय की निगाहें सामने विंडशील्ड पर टिकी थीं. उसके चेहरे पर एक अजीब गंभीरता छाई हुई थी, जैसे वह किसी गहरी सोच में डूबा हो. समीर. हम एक ऐसे जाल में फँसते जा रहे हैं, जहाँ कभी भी कुछ भी हो सकता है. जो कुछ हमारे साथ हो रहा है, ये सब कोई संयोग नहीं है. ये एक चाल है. एक छलावा. उसने धीमी लेकिन दृढ आवाज में कहा.
हमें बस एक चीज की जरूरत है. अपना होश और हिम्मत बनाए रखने की. क्योंकि जिस पल हमने डर के आगे घुटने टेक दिए. उसी पल हम हार जाएँगे। उसकी बात सुनकर विवेक और समीर ने एक- दूसरे की तरफ देखा. दोनों अब पहले से कहीं ज्यादा सतर्क हो चुके थे. अक्षय ने एक्सीलेटर पर दबाव बढाया. कार की रफ्तार तेज हो गई.
लेकिन तभी. आँधी के बीच, सडक के बहुत दूर एक धुँधली- सी आकृति दिखाई दी. सफेद कपडों में लिपटी वह परछाईं सडक के ठीक बीचों- बीच खडी थी. अक्षय की पकड स्टीयरिंग पर और कस गई.
जैसे- जैसे कार उसकी ओर बढ रही थी, तीनों की धडकनें भी तेज होती जा रही थीं. क्योंकि वह आकृति न तो हिल रही थी.
और न ही इंसानों की तरह दिखाई दे रही थी. अक्षय ने अपनी आँखें मसलकर दोबारा सामने देखा.
वह आकृति अब भी वहीं खडी थी.
बिल्कुल स्थिर.
आँधी की तेज हवाएँ उसके चारों ओर धूल के भँवर बना रही थीं, लेकिन अजीब बात यह थी कि उसके कपडों का एक कोना तक नहीं हिल रहा था. मानो वह इस दुनिया की नहीं, किसी और ही लोक की चीज हो.
अ. अक्षय. गाडी रोक. विवेक की काँपती आवाज कार के भीतर गूँज उठी.
लेकिन अक्षय ने कोई जवाब नहीं दिया. उसकी नजरें उस रहस्यमयी साये पर जमी थीं.
जैसे- जैसे कार करीब पहुँच रही थी, आकृति का चेहरा साफ होने लगा.
और अगले ही पल. तीनों के मुँह से एक साथ चीख निकल गई. वह कोई और नहीं.
अक्षय था! बिल्कुल उसी के चेहरे वाला आदमी सडक के बीचों- बीच खडा था.