The last guard of the fort in Hindi Short Stories by Zero books and stories PDF | किले का आखिरी पहरेदार

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किले का आखिरी पहरेदार

⚔️ किले का आखिरी पहरेदार

साल 1672...

अरावली की पहाड़ियों के बीच बना देवगढ़ का किला उस रात बिल्कुल शांत था। आसमान में काले बादल छाए हुए थे और तेज हवा के कारण किले की दीवारों पर जल रही मशालें बार-बार बुझने को हो रही थीं।

लेकिन यह शांति किसी तूफान से पहले की खामोशी थी।

किले की सबसे ऊंची दीवार पर खड़ा वीरेंद्र सिंह दूर अंधेरे में देख रहा था। उसकी उम्र केवल चौबीस वर्ष थी। कुछ महीने पहले ही उसे किले की सेना में एक छोटी टुकड़ी का नेतृत्व सौंपा गया था।

तभी उसे पहाड़ियों के बीच कई छोटी-छोटी रोशनियां दिखाई दीं।

मशालें!

वीरेंद्र तुरंत समझ गया।

“दुश्मन...”

कुछ ही देर में पूरे किले में खतरे की घंटियां बजने लगीं।

सेनापति रुद्र प्रताप अपने सैनिकों के साथ मुख्य द्वार पर पहुंचे। एक जासूस दौड़ता हुआ आया और हांफते हुए बोला,

“सेनापति जी! करीब दो हजार सैनिक हमारी तरफ बढ़ रहे हैं।”

रुद्र प्रताप के चेहरे का रंग बदल गया।

किले में मुश्किल से चार सौ सैनिक थे।

“राजधानी तक संदेश पहुंचने में कितना समय लगेगा?”

“अगर घोड़ा लगातार दौड़े तो सुबह तक सहायता आ सकती है।”

कुछ पल के लिए वहां सन्नाटा छा गया।

तभी वीरेंद्र आगे आया।

“मैं संदेश लेकर जाऊंगा।”

सेनापति ने उसकी तरफ देखा।

“किले के बाहर दुश्मन फैल चुका है। पकड़े गए तो जिंदा वापस नहीं आओगे।”

वीरेंद्र मुस्कुराया।

“और अगर संदेश नहीं पहुंचा तो यहां मौजूद चार सौ सैनिक भी सुबह नहीं देख पाएंगे।”

सेनापति के पास कोई जवाब नहीं था।

किले के पीछे बने एक पुराने गुप्त रास्ते से वीरेंद्र अपने घोड़े के साथ बाहर निकला।

बारिश शुरू हो चुकी थी।

वह जंगल के रास्ते तेजी से आगे बढ़ा, लेकिन कुछ दूर जाते ही पीछे से घोड़ों की आवाज सुनाई दी।

दुश्मन के सैनिकों ने उसे देख लिया था।

“उसे पकड़ो!”

वीरेंद्र ने घोड़े की रफ्तार बढ़ा दी।

एक तीर उसके कंधे में आकर लगा।

दर्द से उसकी आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा, मगर उसने लगाम नहीं छोड़ी।

रास्ते में एक नदी थी। बारिश के कारण पानी का बहाव बहुत तेज था। सामान्य स्थिति में भी उसे पार करना खतरनाक था।

पीछे दुश्मन था।

सामने उफनती नदी।

वीरेंद्र ने एक पल भी नहीं सोचा।

“चल चेतक!”

उसका घोड़ा नदी में उतर गया।

तेज पानी दोनों को बहाने लगा, लेकिन कुछ संघर्ष के बाद वे दूसरी तरफ पहुंच गए। दुश्मन के सैनिक वहीं रुक गए।

सुबह होने से कुछ समय पहले वीरेंद्र राजधानी पहुंचा।

महल के सैनिकों ने जब उसे खून से लथपथ देखा तो तुरंत अंदर ले गए।

वीरेंद्र ने कांपते हाथों से सेनापति का पत्र राजा को दिया।

“महाराज... देवगढ़ को सहायता चाहिए।”

इतना कहते ही वह जमीन पर गिर पड़ा।

कुछ घंटों बाद देवगढ़ के किले का मुख्य द्वार टूटने वाला था।

चार सौ में से आधे से ज्यादा सैनिक घायल हो चुके थे।

सेनापति रुद्र प्रताप ने तलवार उठाई।

“आज शायद हमारा आखिरी युद्ध है!”

तभी दूर से युद्ध के नगाड़ों की आवाज सुनाई दी।

पहाड़ियों के पीछे हजारों घुड़सवार दिखाई दिए।

राजधानी की सेना पहुंच चुकी थी।

किले के सैनिक खुशी से चिल्ला उठे।

दोनों तरफ से घिरते ही दुश्मन सेना पीछे हटने लगी।

देवगढ़ बच गया था।

युद्ध समाप्त होने के बाद सेनापति रुद्र प्रताप ने सबसे पहले वीरेंद्र के बारे में पूछा।

एक सैनिक ने धीरे से कहा,

“वह जीवित है, सेनापति जी। वैद्य उसका इलाज कर रहे हैं।”

रुद्र प्रताप ने आसमान की तरफ देखा और मुस्कुरा दिया।

कुछ सप्ताह बाद वीरेंद्र वापस देवगढ़ आया।

किले के मुख्य द्वार पर सैकड़ों सैनिक उसका इंतजार कर रहे थे।

सेनापति ने अपनी तलवार उसके सामने झुकाते हुए कहा,

“उस रात इस किले को चार सौ सैनिकों ने नहीं बचाया था, वीरेंद्र।”

वीरेंद्र हैरानी से उसे देखने लगा।

सेनापति मुस्कुराया।

“इसे उस एक आदमी ने बचाया था... जिसने मौत को पीछे छोड़कर मदद पहुंचाई।”

उस दिन से देवगढ़ के इतिहास में वीरेंद्र का नाम किसी राजा या सेनापति के रूप में नहीं, बल्कि—

‘किले का आखिरी पहरेदार’

के नाम से याद किया जाने लगा।