शाम के सात बज चुके थे। तमिलनाडु के इस छोटे से शहर की सड़कें अब भी दिन भर की धूप से उबल रही थीं
अभी फिलहाल 2026 चल रहा है मई का महीना है गर्मी का मौसम अभी मैं तमिलनाडू मै हु यहा एक बैक मे 'काम कर रहा हु मुझे यहां आए हुए पाच महिने हो गऐ यहा मेरे 3 दोस्त भी बन गऐ है.जिसमे से एक का नाम श्रीधर है बो हमारी ATM गाडी का DRIVER और बहुत अच्छा लडका है दुसरे का नाम अरविन्द और बालामुरागन है ये दोनो कस्टोडियन है हम चारो आपस मै हसी मजाक करते रहते है ये तीनों तमिल मै बात करते थे मुझे थोडा बहुत समझ आ जाता था कुछ कुछ बाते नही आती थी इनके साथ रहते रहते मुझे भी थोडी थोडी तमिल बोलनी आ गई थी श्रीधर ज्यादा तर तमिल मे ही बात करता था
उस पर से मे भी सीख गया श्रीधर बहुत ही खुश मिजाज का था मैं जब कभी उदास होता तो वो मुझे खुश करने कि कोशिस करता रहता था
पर बो लडकीयो कि तरफ बहुत देखता था जो कोई लडक़ी पास से गुजरे बोलता देखो विनय भाई कितनी मस्त लडकी जा रही हे मैने तो उसे कभी उदास ही नही देखा था खुद भी खुश रहता और दुसरो को भी खुश कर देता ऐसे हसी मजाक करते दिन गुजर रहे थे मुझे तमिलनाडु अच्छा लगने लगा और यहा के लोग भी अच्छे थे एक दिन कि बात है हम चारो बैन्क का काम खत्म करके बापस आ रहे थे,,श्रीधर गाडी चला रहा था बालामुरगन उसके पास बाली सीट पर बैठा था मैं और एक लडका पिछे बाली सीट पर बैठे हुए थे हमसे थोडी आगे दो तमिल लडकिया स्कुटी पर जा रही थी
श्रीधर बालामुरगन से तमिल मे कहता है
देख तेरे लिये कितनी मस्त लडकी है बालामुरगन उर्म मे हम सबसे बड़ा था, तो फिर बालामुरगन मुस्कुराते हुये बोलता है ये मैरे लिये सही नही है ये तो एक तेरे लिए और एक विनय के लिए सही है श्रीधर बोला क्यों नहीं सही तुम्हारे लिए बालमुरगन कहता है यार उनकी उम्र देख और मेरी उम्र देख कहा वो जवान लड़की और कहा में 35 साल का आदमी मेरे लिए नहीं है ये तो तुम दोनों के लिए बढ़िया रहेंगी श्रीधर बोला अच्छा और गाड़ी को स्पीड से आगे ले गया वो लड़कियां डर गई उनको लगा कही हमे थोक न दे थोड़ी देर बाद आगे दो atm आने वाले थे तो बालामुर्गन बोला गाड़ी धीरे चला आगे atm आने वाले हैं श्रीधर गाड़ी स्लो कर देता है और atm पर रोक लेता है हम लोग गाड़ी से उतर कर atm में कैश लोड करके वापस आ जाते हैं गाड़ी में बैठ कर वापस अपने रूम की ओर जाने लगते हैं श्रीधर गाड़ी चला रहा था चुपचाप तभी थोड़ी देर बाद बालामुर्गन बोला यार विनय इस ड्राइवर श्रीथर का कोई अच्छा सा नाम बता ये श्रीधर नाम पुराना हो गया है कोई अच्छा सा नाम सोच कर बता विनय थोड़ी देर सोचने के बाद बोला इसका नाम श्रीलंड कैसा रहे गा बालामुरुगन हिंदी समझता था तो हंसते हुए बोला अरे विनय ये नाम अच्छा है इसका आज से इसे यही नाम से बुलाएंगे अब बालामुर्गन ड्राइवर की तरफ देखते हुए बोला और ड्राइवर श्रीलंड बोल कैसा नाम है ये तेरे लिए अब विचारे ड्राइवर को क्या पता लंड किस बाला से कहते हैं उसे हिंदी आती नहीं थी तो बोला अच्छा है गुड नेम उसकी बात सुनकर विनय और बालामुरुगन बहुत जोर जोर से हँसने लगे विनय को तो हंसते हंसते पेट में दर्द होने लगा था विनय का रूम आने वाला था तो बालामुरगन कहता है विनय कल सुबह 10 बजे विल्लुपुरम सिंगल पर वेट करना ये ड्राइवर श्रीलंड तुम्हें पिकअप कर लेगा ठीक है विनय हंसते हुए बोला ठीक है गुरु अब चुप हो जाओ और हंसते हुए अपने रूम की ओर चला गया रूम पर जाके विनय ने अपने जूतों को उतारा और अपने कंधों पर से बैग को निकला और टेवल पर रख दिया और फैन को ऑन कर दिया फिर एक गिलास पानी पी कर पंखे के नीचे लेट कर आराम करने लगा लेटे हुए वो अपने शांत रूम की दीवारों को देखते हुए सोचने लगा उसे अपने बही पुराने गुजरे दिन फिर से याद आने लगे जो इगलास में उसके घर के जैसे थे उसका बही शांत कमरा चारों ओर अधेरा और मोनिका के साथ बिताए हुए कुछ दिन उसे परेशान करने लगें वैसे तो विनय को मोनिका से बिछड़े हुए 8 साल हो गए पर वो मोनिका को आज तक भुला नहीं पाया आज भी मोनिका का प्यार विनय की रूह में कहीं न कहीं ज़िन्दा है
कहते हैं ना कि जान से ज्यादा प्यार करने वाला शख्स अगर हमसे दूर हो जाए तो इंसान इंसान नहीं रहता वो एक जिन्दा लाश बन जाता है ऐसे ही विनय को मोनिका के बारे में और अपनी बीती जिंदगी को याद करते करते नींद आ गई वो खाना पीना भी भूल गया सुबह उसकी आंख खुली तो उसने देखा कि घड़ी की सुई साढ़े आठ बजा रही थी उसने जल्दी से अपने हाथ मुंह धोए और नाश्ता बनाने लगा कुछ देर में नाश्ता रेडी हो गया था फिर बैंक जाने के लिए नहा धो कर तैयार हो गया और जल्दी से सिंगल पर बैक की गाड़ी और श्रीथर का इंतजार करने लगा...
तमिलनाडु में सभी पुरुष और महिलाएं यहां तक कि लड़कियां भी कुछ न कुछ काम करती थी कुछ देर बाद विनय की नज़र बही सिंगल के पास खड़ी एक लड़की पर पड़ी वो बिल्कुल देखने में मोनिका जैसी लग रही थी विनय अपने मन में सोचने लगा काश ये मोनिका होती या ही मोनिका है ये सोचने लगा पर खुद ही बोला ये मोनिका नहीं है वो यहां कैसे आ सकती हैं उसकी तो शादी हो गई है वो तो अपने गांव में होगी पर उसका मन नहीं मान रहा था सोच रहा था इससे एक बार बात करके देखूं पर वो लड़की तमिल बाली थी उसको कहा हिंदी आती फिर ये सोच कर विनय बही अपनी जगह खड़ा रहा कुछ देर में श्रीथर गाड़ी लेकर आ गया और विनय से हाय हैलो कहा और बोला तमिल में आओ विनय भाई बैठो जल्दी लेट हो रहे हैं विनय जल्दी से गाड़ी में बैठे गया और बोला चलो अब श्रीधर गाड़ी स्टार्ट करके बैंक की ओर चल पड़ा कुछ देर बाद बैक पहुंच गए बहा पहले ही बालामुर्गन और अरविन्द कैश का बक्सा लेकर खड़े थे मैने अरविन्द को आवाज लगाई आ जाओ जल्दी अरविन्द बालामुर्गन दोनों बक्से को लेकर गाड़ी में बैठ गए उसके बाद बालामुरुगन बोला ड्राइवर श्रीलंड चल जल्दी गाड़ी स्टार्ट कर लेट हो गए आज 11 बज गए कब कैश पहुंचाएंगे बैंकों में श्रीथर जल्दी से गाड़ी स्टार्ट करके स्पीड से आगे बढ़ता है कुछ देर में हसी मजाक करते हुए जब हम बैंकों में कैश पहुंचा कर लौटते हैं तो तमिलनाडु की सड़कों पर रास्ते में कुछ पहाड़ पड़ते हुए दिखाई देते हैं,, मैं यानि विनय अपने मन में सोचने लगा कि क्या मैं उस यात्रा में हूँ जिसके बारे में मोनिका कहा करती थी?
वो कभी-कभी मेरे साथ पहाड़ों पर घूमने की बात करती थी तो हर एक दिन, हर एक घंटे की सारी प्लानिंग पकड़कर चलता था। मुझे पहाड़ों पर बोर हो जाने का एक बड़ा डर बना रहता था। अपनी सारी प्लानिंग के बाद भी मैं हमेशा बोर होता हुआ पकड़ा जाता था। मोनिका को मेरी प्लानिंग और मेरा बोर होना हमेशा खलता था। वह मुक्त घूमना चाहती थी, बिना किसी प्लानिंग के। वह कहती थी यात्रा में अगर आश्चर्य ही न हो तो उस यात्रा का मतलब ही क्या है? क्या मैं कर रहा हूँ इस वक़्त वैसी यात्रा? मुझे शक था।
विनय खिड़की से बाहर पहाड़ों को देखता है। अचानक उसे अहसास होता है कि इन पहाड़ों की खूबसूरती को निहारते हुए उसे आज कोई बोरियत नहीं हो रही, बल्कि एक अजीब सी शांति महसूस हो रही है। शायद मोनिका सही थी—बिना प्लानिंग के इस सफर में ही असली मजा है। उसने अपने मन से कहा, "मोनिका, शायद तुम आज मेरे साथ नहीं हो, लेकिन आज मैं वो यात्रा कर रहा हूं जो तुम चाहती थी।" गाड़ी में पीछे से बालामुरुगन और श्रीधर की हंसी की आवाज आती है। विनय भी मुस्कुरा देता है। वह पहली बार खुद को उस 'जिंदा लाश' की स्थिति से बाहर आता हुआ महसूस करता है। उसने मोनिका को भुलाया नहीं है, लेकिन अब उसने उसे अपनी यादों के एक सुंदर बक्से में बंद करके रख दिया है। अब वह वर्तमान को जीने के लिए तैयार है। रास्ते का सफर जारी है, तभी बालामुरुगन मजे लेते हुए श्रीधर को फिर से 'श्रीलंड' कहकर बुलाता है। श्रीधर अपनी मासूमियत में मुस्कुराता है और कहता है, "विनय भाई, बाला सर, आप लोग जब से यह नाम रखे हो, लोग मुझे रास्ते में अजीब तरह से देख कर हंसते हैं। क्या ये नाम बहुत मशहूर है?" विनय का हंसते-हंसते बुरा हाल हो जाता है। तभी रास्ते में गाड़ी का टायर पंचर हो जाता है। चारों बाहर निकलते हैं। उसी वक्त वह लड़की जो विनय को सिंगल पर दिखाई दी थी फिर वहां से गुजरती है और गाड़ी के पास आकर रुकती है। वह टूटी-फूटी हिंदी में पूछती है, "क्या आप लोगों को मदद चाहिए?" विनय की बोलती बंद हो जाती है। वह लड़की की आवाज में वही मोनिका वाली मिठास थी।
विनय के लिए वह पल जैसे थम सा गया था। वह लड़की, उसकी आवाज़, उसका लहजा—सब कुछ बिल्कुल मोनिका जैसा ही था। टायर बदलने की आवाज़ें, श्रीधर और बालामुरुगन की आपसी बातचीत, और सड़क पर गाड़ियों का शोर, सब कुछ उसके कानों से ओझल होकर एक सन्नाटे में बदल गया।
विनय ने धीरे से अपना सिर उठाया और उस लड़की की आँखों में देखा। उसकी आँखें बिल्कुल वैसी ही थीं—गहरी और जिनमें कोई अनकही सी चमक थी। विनय के गले में जैसे कुछ फंस गया हो, उसने बड़ी मुश्किल से अपनी ज़ुबान खोली, "नहीं... जी, शुक्रिया। हम कर लेंगे, बस थोड़ा ही काम बाकी है।"
लड़की ने थोड़ी देर उसे गौर से देखा, उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आई, जो किसी पहचान की आहट जैसी लगी। उसने अपना सिर हिलाया और बिना कुछ कहे अपनी स्कूटी की ओर बढ़ गई।
तभी बालामुरुगन, जो टायर के पास झुककर नट कस रहा था, अचानक सीधा हुआ और बोला, "विनय, क्या हुआ? चेहरा क्यों उतर गया? यह लड़की तो तमिल बोल रही थी, फिर भी तुमने हिंदी में जवाब दिया?"
श्रीधर, जो पसीने से तर-बतर था, खिलखिलाकर हँसा और बोला, "अरे बाला सर, छोड़ो न! अब विनय भाई को काम करने' के साथ-साथ 'प्यार' का बुखार भी चढ़ गया है क्या? देखो, बेचारे की तो बोलती ही बंद हो गई!"
श्रीधर और बालामुरुगन की हँसी ने उस भारी सन्नाटे को तोड़ दिया। विनय जैसे अपनी तंद्रा से बाहर आया। उसने खुद को संभाला, एक गहरी साँस ली और मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोला, "कुछ नहीं यार, बस... उसकी आवाज़ में एक अजीब सी मिठास थी, बिल्कुल पुरानी यादों जैसी। चलो, टायर लग गया है, देर हो रही है।"
गाड़ी फिर से चल पड़ी। लेकिन इस बार विनय का मन पहले जैसा नहीं था। खिड़की से बाहर देखते हुए, पहाड़ अब उसे किसी पुरानी उदास फिल्म के सीन नहीं लग रहे थे, बल्कि एक नई शुरुआत के गवाह लग रहे थे। उसके मन में हलचल थी, लेकिन इस बार वह डर नहीं, बल्कि एक अजीब सी उत्सुकता थी
क्या सच में मोनिका की रूह किसी और के रूप में यहाँ है? या यह सिर्फ उसके मन का भ्रम है?
बालामुरुगन ने पीछे मुड़कर देखा और विनोदपूर्ण अंदाज़ में कहा, "विनय, इस शहर में आज़ाद घूमना है तो दिल को हल्का रखो। आज तो तुमने पक्का पंगा ले लिया, वो लड़की तुम्हें देख कर मुस्कुरा रही थी। अगर वो दोबारा दिखी, तो पक्का बात करना!"
विनय ने खिड़की से बाहर धूल भरी सड़कों और दूर दिखते पहाड़ों को देखा। उसने पहली बार सोचा कि अगर मोनिका का नाम लेना अब उसे दर्द नहीं देता, तो क्या किसी और से बात करना उसे बेवफाई लगेगा? उसने अपने मन को समझाया—शायद यह मोनिका ही है जो उसे 'वर्तमान' में वापस लाने के लिए किसी बहाने से उसे ज़िंदगी के रास्तों पर बार-बार टकरा रही है।
गाड़ी बैंक की ओर बढ़ रही थी, और विनय के होंठों पर अब एक ऐसी मुस्कान थी जो काफी समय से खोई हुई थी। उसने अपनी यादों के बक्से को एक तरफ रखा और अपने सहकर्मियों के साथ उस सफर का आनंद लेना शुरू किया। आज का दिन उसके लिए सिर्फ बैंक का काम खत्म करने का दिन नहीं, बल्कि खुद को तलाशने का पहला दिन था।
उसने सोचा, "कल फिर उसी सिंगल पर जाऊँगा। अगर वो लड़की फिर दिखी, तो पक्का पूछूँगा कि तुम्हारा नाम क्या है।"
सफर जारी था, और अब इस सफर में आश्चर्य की कमी नहीं थी।
विनय रोज की तरह अगले दिन सुबह के दस बजने से पहले ही। उस 'विल्लुपुरम सिंगल' पर पहुँच गया था। उसका दिल ज़ोरों से धड़क रहा था, बिल्कुल वैसा ही जैसे बरसों पहले पहली डेट पर जाने से पहले धड़कता था। उसने खुद को बार-बार आईने में देखा—उसने वही शर्ट पहनी थी जो मोनिका को पसंद थी, हालांकि वह अब काफी पुरानी हो चुकी थी।
तभी दूर से वही काली स्कुटी आती दिखाई दी। विनय की आँखें फटी की फटी रह गईं—वह वही लड़की थी! वह बिना हेलमेट के थी और उसके बाल हवा में लहरा रहे थे। वह ठीक उसके सामने आकर रुकी और स्कूटी से उतरी।
विनय की हिम्मत जवाब देने लगी थी, लेकिन वह इस मौके को गंवाना नहीं चाहता था। वह आगे बढ़ा और थोड़ी हिचकिचाहट के साथ बोला, "नमस्ते। कल मदद के लिए शुक्रिया।"
लड़की रुकी। उसने अपना बैग कंधे पर ठीक किया, विनय की ओर देखा और एक प्यारी सी मुस्कान के साथ शुद्ध हिंदी में बोली, "अरे, आप वही हैं ना? जो कल टायर ठीक कर रहे थे और जिनके दोस्त आपको... क्या नाम था उनका... 'श्रीलंड' बुला रहे थे?"
विनय आश्चर्यचकित से उसे देख रहा था। उसे उम्मीद थी कि उसे टूटी-फूटी हिंदी या तमिल में जवाब मिलेगा, लेकिन लड़की की हिंदी सुनकर उसे लगा जैसे कोई चमत्कार हो गया हो। वह कुछ देर बस उसे देखता रह गया।
"आप... आप हिंदी बोलती हैं?" विनय ने हकलाते हुए पूछा।
लड़की खिलखिलाकर हँस पड़ी। "हाँ, मैं मूल रूप से प्रयागराज की हूँ। यहाँ अपने मामाजी के पास एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में आई हूँ। मेरा नाम 'सुरभि' है।"
विनय ने राहत की साँस ली। वह नाम मोनिका नहीं था, लेकिन उस चेहरे में आज भी मोनिका की झलक उसे साफ़ दिख रही थी। "मेरा नाम विनय है," उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया।
सुरभि ने उसका हाथ मिलाया। विनय को लगा जैसे सालों से जमी हुई बर्फ पिघल रही हो। ठीक उसी वक्त पीछे से गाड़ी के हॉर्न की आवाज़ आई। श्रीधर गाड़ी लेकर आ गया था। गाड़ी में बैठे बालामुरुगन ने खिड़की से सिर बाहर निकाला और ज़ोर से चिल्लाया, "ओह हो! श्रीलंड, देख अपना विनय भाई तो सेट हो गया! विनय भाई, गाड़ी में बैठो, वरना मैनेजर साहब आज हमें कच्चा चबा जाएंगे!"
विनय शर्म से लाल हो गया। सुरभि ने शरारती नज़रों से उसे देखा और बोली, "तो ये आपके दोस्त हैं? बड़ा अजीब नाम रखा है आपने ड्राइवर का।"
विनय ने हँसते हुए कहा, "वो लंबी कहानी है, कभी मौका मिला तो ज़रूर बताऊंगा।"
सुरभि ने अपनी स्कूटी स्टार्ट की और जाते-जाते कहा, "वैसे, इस शहर के पहाड़ों के पीछे एक छोटी सी जगह है जहाँ का सूर्यास्त बहुत खूबसूरत है। अगर कभी 'बिना प्लानिंग' के घूमने का मन हो, तो बताना।"
विनय वहीं खड़ा रह गया। यह वही बात थी जो मोनिका हमेशा कहती थी! उसे लगा जैसे वक्त का चक्र फिर से घूम गया है। वह गाड़ी में बैठा, लेकिन इस बार उसका चेहरा शांत था। बालामुरुगन ने उसे कुहनी मारी, "क्या हुआ भाई? क्या बात हुई? कोई सेटिंग हुई या नहीं?"
विनय ने गाड़ी की खिड़की से बाहर देखते हुए मुस्कुराकर कहा, "पता नहीं बाला, शायद ज़िंदगी मुझे एक और मौका दे रही है।"
उस दिन बैंक का काम करते हुए विनय का मन काम में कम और सुरभि के शब्दों में ज्यादा था। उसने महसूस किया कि मोनिका उसकी यादों का हिस्सा थी, लेकिन सुरभि उसके वर्तमान की उम्मीद। क्या यह महज़ एक इत्तेफाक था, या किस्मत वाकई अपनी रफ़्तार से उसे उस मोड़ पर ले आई थी जहाँ से वह अपनी 'जिंदा लाश' वाली ज़िंदगी को पीछे छोड़ सकता था?
गाड़ी जब पहाड़ों के बीच से गुज़रने लगी, तो विनय ने खिड़की से बाहर हाथ निकाला। ताज़ी हवा उसके चेहरे से टकराई। उसने मन ही मन सोचा, "मोनिका, आज मैं तुम्हारी पसंद की वैसी ही यात्रा पर निकल पड़ा हूँ, जैसी तुम चाहती थी।"
और इस बार, वह बिल्कुल भी बोर नहीं हो रहा था।
शाम के करीब छह बज रहे थे। बैंक का काम निपटाकर जब चारों वापस लौट रहे थे, तो विनय का मन बार-बार उसी सिंगल की ओर भाग रहा था जहाँ सुबह सुरभि से मुलाकात हुई थी। गाड़ी के अंदर का माहौल हमेशा की तरह शोर-शराबे वाला था। श्रीधर आज भी अपने पुराने अंदाज़ में सड़क से गुजरने वाली हर लड़की पर कमेंट कर रहा था, और बालामुर्गन उसे 'श्रीलंड' कहकर चिढ़ा रहा था। लेकिन आज विनय को वह मज़ाक बुरा नहीं लग रहा था, उसे लग रहा था कि शायद यही वो सादगी और शोर है, जिसकी उसे इतने सालों से ज़रूरत थी।
अचानक, बालामुर्गन ने पीछे मुड़कर विनय की ओर देखा और गंभीर होते हुए बोला, "विनय, आज तुम कुछ अलग लग रहे हो। सुबह से खामोश हो, लेकिन चेहरे पर वो उदासी नहीं है जो पिछले पांच महीनों से थी। क्या बात है?"
विनय ने खिड़की से बाहर पहाड़ों की ओर देखते हुए एक लंबी साँस ली और मुस्कुराकर बोला, "पता नहीं बाला, शायद आज पहली बार मुझे लगा है कि मैं यहाँ का हिस्सा हूँ, मेहमान नहीं।"
तभी श्रीधर ने गाड़ी धीरे की और एक चाय की टपरी के पास गाड़ी रोक दी। "चलो भाई लोग, बहुत काम हो गया, थोड़ी चाय पी लेते हैं," श्रीधर ने कहा।
वे सब गाड़ी से नीचे उतरे। विनय टपरी के पास खड़ा होकर चाय का इंतज़ार कर रहा था कि अचानक उसकी नज़र सड़क के दूसरी तरफ गई। वहाँ सुरभि एक दुकान के बाहर खड़ी किसी से फोन पर बात कर रही थी। उसने अचानक सिर घुमाया और उसकी नज़र विनय पर पड़ी। उसने फोन कान से हटाया, उसे हाथ हिलाकर 'नमस्ते' कहा और अपनी स्कूटी की ओर चल पड़ी।
विनय ने चाय का गिलास टेबल पर रखा और बिना कुछ सोचे-समझे अपने दोस्तों से कहा, "तुम लोग चाय पियो, मैं बस दो मिनट में आया।"
वह तेज़ी से सड़क पार करके सुरभि के पास पहुँचा। सुरभि ने उसे आते देख स्कूटी रोक दी। "अरे, आप फिर मिल गए! लग रहा है विल्लुपुरम की सड़कें आज आप पर मेहरबान हैं," सुरभि ने शरारती अंदाज़ में कहा।
विनय थोड़ा असहज हुआ, लेकिन फिर हिम्मत जुटाकर बोला, "वो... आपने सुबह जो सूर्यास्त की बात कही थी, पहाड़ों के पीछे वाली जगह... अगर आप व्यस्त न हों, तो क्या कल हम वहाँ जा सकते हैं? बिना किसी प्लानिंग के?"
सुरभि की आँखों में एक चमक आ गई। उसने मुस्कुराते हुए कहा, "बिल्कुल! कल शाम चार बजे उसी सिंगल पर मिलते हैं। लेकिन याद रहे, 'बिना प्लानिंग' का मतलब है कि हम जहाँ भी पहुँचेंगे, वहीं मंज़िल होगी।"
विनय ने सिर हिलाया। उसे लगा जैसे उसने एक पुरानी बंद किताब को फिर से खोलने की हिम्मत जुटाई हो। सुरभि अपनी स्कूटी स्टार्ट करके निकल गई, और विनय वापस अपने दोस्तों के पास आया।
बालामुर्गन ने तिरछी नज़रों से देखते हुए कहा, "क्या हुआ? इतना खुश क्यों है? और ये कौन सी लड़की थी, जिसे देख कर आज हमारे विनय भाई के चेहरे पर इतनी चमक है?"
विनय ने चाय का घूँट भरा और हँसते हुए बोला, "ये ज़िंदगी की एक नई शुरुआत है, बाला। और सच कहूँ तो, मुझे डर नहीं लग रहा।"
उस रात जब विनय अपने कमरे में पहुँचा, तो उसने देखा कि मोनिका की पुरानी तस्वीर का फ्रेम जो मेज़ पर था, उस पर थोड़ी धूल जम गई थी। उसने धीरे से उस धूल को साफ किया, तस्वीर को एक आखिरी बार प्यार से देखा और उसे दराज के अंदर रख दिया। उसने मोनिका को भुलाया नहीं था, बस अब वह उसके लिए एक 'याद' थी, न कि उसकी 'साँस'।
वह पंखे के नीचे लेटा, लेकिन इस बार वह पुरानी यादों की गहराई में डूबने के बजाय आने वाले कल के बारे में सोचने लगा। सुरभि के साथ उस 'बिना प्लानिंग' वाले सफर का ख्याल उसे सुकून दे रहा था। उसे पहली बार एहसास हुआ कि तमिलनाडू की ये सड़कें, ये पहाड़ और ये नए दोस्त अब वाकई उसके अपने हो गए थे। नींद कब उसकी आँखों में उतरी, उसे पता ही नहीं चला, लेकिन इस बार उसके चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान थी।
अगले दिन के सूरज का इंतज़ार, पहली बार उसे एक नई उम्मीद के साथ जगाने वाला था।
अगले दिन, विनय ने अपनी नौकरी के कामों को इस फुर्ती के साथ निपटाया कि बालामुरुगन और श्रीधर भी हैरान रह गए। घड़ी की सुइयां जैसे जानबूझकर धीमी चल रही थीं, लेकिन आखिरकार शाम के चार बज ही गए। विनय ने जल्दी से अपना काम समेटा और 'विल्लुपुरम सिंगल' की ओर बढ़ गया।
उसने आज वही कपड़े पहने थे जो उसे सबसे ज्यादा आरामदायक लगते थे—एक सादी टी-शर्ट और जींस। उसे लगा कि बिना प्लानिंग वाली यात्रा के लिए दिखावे की जरूरत नहीं है, बस ईमानदारी काफी है।
तभी दूर से सुरभि की स्कूटी का हॉर्न सुनाई दिया। वह समय की पाबंद थी। जब वह विनय के पास आकर रुकी, तो उसने हेलमेट हटाया और अपने बालों को पीछे करते हुए कहा, "तैयार हो आज की अनजान मंज़िल के लिए? आज मैंने भी कोई रास्ता तय नहीं किया है, बस जिधर मन करेगा, उधर मुड़ जाएंगे।"
विनय ने मुस्कुराते हुए अपनी एक छोटी सी बैगपैक कंधे पर टांगी और सुरभि की स्कूटी के पीछे बैठ गया। "चलो, आज इस शहर को एक नए नज़रिए से देखते हैं," उसने कहा।
वे दोनों शहर की भीड़भाड़ से दूर, उन घुमावदार रास्तों पर निकल पड़े जो पहाड़ों की गोद में जा रहे थे। रास्ते में उन्होंने न जाने कितनी छोटी-छोटी बातें कीं। सुरभि ने बताया कि उसे पुरानी किताबों का कितना शौक है और कैसे उसे भी मोनिका की तरह ही छोटी-छोटी चीज़ों में खुशी ढूँढना पसंद है। विनय को आश्चर्य हुआ कि कैसे सुरभि की बातें उसे कभी-कभी बिल्कुल मोनिका जैसी लग रही थीं, पर साथ ही वह यह भी महसूस कर रहा था कि सुरभि अपनी एक अलग पहचान, अपना एक अलग मिजाज रखती है।
चलते-चलते वे एक ऐसी जगह पहुँचे जहाँ सड़क खत्म हो रही थी और आगे सिर्फ कच्चे रास्ते थे। वहाँ से नीचे एक शांत झील दिखाई दे रही थी, जिसके चारों ओर ऊंचे पहाड़ थे। सूरज अब धीरे-धीरे ढल रहा था, और आकाश में नारंगी, गुलाबी और सुनहरे रंगों का एक अद्भुत ताना-बाना बुन गया था।
वे स्कूटी से उतरे और झील के किनारे जाकर बैठ गए। चारों तरफ एक गजब की शांति थी, बस दूर कहीं किसी पक्षी की चहचहाहट सुनाई दे रही थी।
सुरभि ने झील की ओर देखते हुए कहा, "पता है विनय, लोग अक्सर अपनी पूरी जिंदगी किसी खास मंज़िल तक पहुँचने की प्लानिंग में गुज़ार देते हैं। लेकिन असली खूबसूरती तो इस सफर में है, जहाँ हम अभी बैठे हैं, बिना ये जाने कि आगे क्या होगा।"
विनय ने सुरभि की ओर देखा। उस सुनहरी धूप में सुरभि का चेहरा किसी पेंटिंग जैसा लग रहा था। उसने धीरे से कहा, "तुम सही कहती हो सुरभि। मैंने पिछले आठ साल एक ऐसी याद में बिता दिए, जो मुझे आगे नहीं बढ़ने दे रही थी। लेकिन आज, इस पल में, मुझे लग रहा है जैसे मैं पहली बार खुलकर साँस ले रहा हूँ।"
सुरभि ने मुस्कुराते हुए विनय का हाथ थामा। वह स्पर्श किसी मरहम जैसा था। "बीता हुआ कल सिर्फ एक सबक है, विनय। उसे यादों की डायरी में बंद करके रखना ही बेहतर है। वर्तमान ही वह सच है जो हमारे पास है।"
उस शाम, उस शांत झील के किनारे, विनय को एहसास हुआ कि जिंदगी खत्म नहीं हुई थी, वह तो बस एक नए अध्याय के शुरू होने का इंतज़ार कर रही थी। उसने सुरभि को मोनिका के बारे में सब कुछ बता दिया—उसके प्यार से लेकर उसके बिछड़ने के दर्द तक। और सुरभि ने उसे पूरी धैर्य के साथ सुना।
जब वे वापस लौटने के लिए निकले, तो आसमान में चाँद निकल आया था। शहर की तरफ लौटते हुए, विनय के मन में अब कोई भारीपन नहीं था। उसने अपनी पुरानी उदासी को उसी झील के किनारे छोड़ दिया था।
अगले दिन बैंक में, जब बालामुरुगन और श्रीधर ने उसे देखा, तो उन्हें उसके चेहरे पर एक अनोखी चमक दिखी। श्रीधर ने अपना मजाक वाला लहजा छोड़, उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा, "विनय भाई, आज आप कुछ ज्यादा ही खुश लग रहे हो, क्या हुआ?"
विनय ने मुस्कुराकर बालामुरुगन और श्रीधर की ओर देखा और कहा, "कुछ नहीं दोस्तों, बस आज पहली बार मुझे लगा कि मैं अपनी ज़िंदगी का ड्राइवर खुद हूँ, और रस्ता अभी बहुत लंबा है।"
श्रीधर हँसा और बोला, "भाई, तो क्या अब हम 'श्रीलंड' के साथ-साथ आपके 'लव-गुरु' भी बन जाएं?"
पूरे बैंक में ठहाके गूँज उठे, और विनय भी उन हँसी के शोर में शामिल हो गया। आज वह वाकई बहुत खुश था। उसके पास अब यादें थीं, दोस्त थे, और सबसे बढ़कर—जीने की एक नई वजह।
सूरज की ढलती किरणों के साथ विनय की ज़िंदगी ने एक नया मोड़ ले लिया था। सुरभि के साथ बिताया वह शाम का वक्त मानो उसके सूखे मन में फिर से हरियाली ले आया था। अब उसके दिन बैंक की भागदौड़, दोस्तों की हँसी-मज़ाक और शाम को सुरभि के साथ होने वाली अनकही मुलाकातों के इर्द-गिर्द घूमने लगे थे।
अगले कुछ हफ़्तों तक, उनकी मुलाकातों का कोई ठिकाना नहीं होता था। कभी वे किसी पुरानी तमिल बस्ती की गलियों में खो जाते, तो कभी किसी ऊंचे टीले पर बैठकर शहर की रोशनी को देखते। विनय को अब तमिल भाषा भी पहले से काफी बेहतर समझ आने लगी थी। सुरभि अक्सर उसे शहर के लोक-गीतों का अर्थ समझाती, और विनय उसे अपनी जबलपुर की कहानियाँ सुनाता।
एक शनिवार की दोपहर, जब काम जल्दी खत्म हो गया, तो सुरभि ने उसे एक पुरानी लाइब्रेरी में चलने को कहा। लाइब्रेरी की उन धूल भरी अलमारियों और पुरानी किताबों की खुशबू ने विनय को फिर से अपनी पढ़ाई के दिनों की याद दिला दी।
तभी सुरभि ने एक अलमारी से एक किताब निकाली और उसे विनय की तरफ बढ़ाते हुए कहा, "विनय, मैंने सुना है कि जब हम किसी से प्यार करते हैं, तो वह इंसान हमारे अंदर के किसी खास हिस्से को जगा देता है। मुझे लगता है कि मोनिका ने तुम्हारे अंदर के उस संवेदनशील 'विनय' को ज़िंदा किया था, जो शायद कहीं खो गया था। और अब, मैं बस उस इंसान को थोड़ा और खुश देखना चाहती हूँ।"
विनय ने सुरभि की आँखों में देखा। उसे समझ आया कि सुरभि को मोनिका के बारे में सब पता होने के बावजूद, वह उससे असुरक्षित महसूस नहीं करती। वह बहुत परिपक्व थी। विनय ने किताब हाथ में लेते हुए धीरे से कहा, "तुम बिल्कुल सही हो, सुरभि। तुम मेरे अतीत को मिटाने नहीं आई हो, बल्कि मुझे उस अतीत से सीखकर आगे बढ़ने का हौसला दे रही हो।"
उसी शाम, जब वे वापस लौट रहे थे, अचानक तेज़ बारिश शुरू हो गई। तमिलनाडु की वह मूसलाधार बारिश! वे पास की ही एक बस स्टॉप की शेड के नीचे जा खड़े हुए। चारों तरफ पानी की बौछार थी, ठंडी हवा चल रही थी। विनय और सुरभि एक-दूसरे के करीब खड़े थे।
विनय ने देखा कि बारिश की बूँदें सुरभि के चेहरे पर गिर रही थीं और वह खिलखिलाकर हँस रही थी। उस पल में, विनय को लगा जैसे वो आठ साल का सूखा और वो 'ज़िंदा लाश' वाली ज़िंदगी हमेशा के लिए खत्म हो गई है।
उसने अचानक सुरभि का हाथ पकड़ा और रुकने को कहा। सुरभि ने उसकी तरफ देखा। विनय के चेहरे पर एक गजब का आत्मविश्वास था। उसने कहा, "सुरभि, मैं नहीं जानता कि भविष्य कहाँ ले जाएगा, और न ही मैं अब कोई प्लानिंग करना चाहता हूँ। लेकिन मैं बस ये जानता हूँ कि इस वक़्त, इस बारिश में, मुझे तुम बहुत अच्छी लग रही हो।"
सुरभि की हँसी थम गई। उसने अपनी नम आँखों से विनय को देखा और धीरे से उसका सिर अपने कंधे पर रख लिया।
दूसरी तरफ, बैंक के बाकी लोग—बालामुरुगन और श्रीधर—भी उसी बारिश में अपनी गाड़ी के अंदर बैठे थे। उन्होंने दूर से विनय और सुरभि को साथ देखा। श्रीधर ने अपने अंदाज़ में कहा, "देखो बाला सर, मुझे तो आज ड्यूटी छोड़नी पड़ेगी, विनय भाई तो अपनी दूसरी पारी शुरू कर चुके हैं!"
बालामुरुगन ने मुस्कुराते हुए कहा, "रहने दे श्रीधर, आज उसे उसकी खुशी मिल गई है। यही सबसे बड़ी जीत है।"
विनय के लिए, वह बारिश सिर्फ पानी की बूँदें नहीं थी, बल्कि उसके मन के सारे पुराने ज़ख्मों को धो देने वाला एक वरदान था। अब उसके पास न केवल यादों का एक सुंदर बक्सा था, बल्कि उस बक्से से बाहर निकलकर एक नई दुनिया बसाने का हौसला भी था।
उस दिन से विनय ने मान लिया था कि ज़िंदगी का असली मज़ा न तो पुरानी यादों को ढोने में है और न ही आने वाले कल की चिंता में—असली मज़ा तो उस 'आज' में है जिसे हम दिल से जीते हैं।
उसकी तमिल की क्लास, उसके दोस्तों का साथ, और सुरभि का हाथ—अब यही उसकी नई दुनिया थी, और इस दुनिया में वह बिल्कुल भी बोर नहीं था।
बारिश के रुकने के बाद, तमिलनाडु की हवा में एक सोंधी सी महक घुल गई थी। विनय और सुरभि उस बस स्टॉप से निकले, तो आसमान अब बिल्कुल साफ हो चुका था। भीगे हुए रास्ते पर चलते हुए सुरभि ने अचानक अपना हाथ विनय के हाथ से छुड़ाया और एक कदम आगे जाकर मुड़ते हुए बोली, "विनय, ये बताओ... क्या तुमने कभी सोचा है कि अगर ये बारिश न होती, तो शायद हम आज यहाँ इस तरह खड़े नहीं होते? बिना प्लानिंग के!"
विनय मुस्कुराया। उसने महसूस किया कि अब वह उन सवालों का जवाब ढूँढने में नहीं, बल्कि उन पलों को महसूस करने में यकीन रखता है। उसने जवाब दिया, "शायद तुम सही कह रही हो सुरभि। प्लानिंग में अक्सर हम वो चीज़ें खो देते हैं जो ज़िंदगी हमें अचानक देती है—जैसे ये मुलाकात, या ये बारिश।"
उसी समय श्रीधर की गाड़ी धीरे से उनके पास आकर रुकी। गाड़ी के अंदर से बालामुरुगन का सिर बाहर निकला और उसने एक शरारती मुस्कान के साथ कहा, "अरे 'श्रीलंड', देखो तो सही, बारिश में तो बड़े-बड़े आशिक भी भीग जाते हैं, लेकिन हमारे विनय भाई तो यहाँ पूरी तैयारी के साथ खड़े हैं! विनय भाई, चलो, काफी देर हो गई है, घर नहीं जाना क्या?"
सुरभि खिलखिलाकर हँस पड़ी। विनय ने भी हँसते हुए सिर हिलाया। उसने सुरभि से विदा ली, "कल फिर मिलेंगे?"
सुरभि ने हाथ हिलाते हुए कहा, "बिल्कुल, बिना किसी वादे के, बस एक मुलाकात के लिए।"
विनय जब गाड़ी में बैठा, तो श्रीधर ने उसे आईने में देखते हुए मज़ाक में कहा, "विनय भाई, आज तो आप बिल्कुल हीरो लग रहे हो! क्या ख्याल है, क्या हम आपको 'विनय सर' बुलाना शुरू करें?"
विनय ने पीछे बैठे बालामुरुगन की तरफ देखा, जो आज बहुत खुश लग रहा था। उसने कहा, "नहीं श्रीधर, 'विनय भाई' ही ठीक है। मुझे दोस्तों के बीच रहना ही पसंद है।"
गाड़ी आगे बढ़ गई। उस रात, जब विनय अपने कमरे में पहुँचा, तो उसने देखा कि मेज़ पर रखी वह डायरी, जिसमें वह कभी अपनी उदासी लिखा करता था, अब खाली पड़ी थी। उसने उस डायरी के आखिरी पन्नों को पलटा। जहाँ उसने मोनिका के बिछड़ने के गम में पन्ने भरे थे, वहीं आज उसने आखिरी पन्ने पर सुरभि का नाम और उस झील वाली शाम का ज़िक्र लिख दिया।
उसने डायरी बंद की और अलमारी में रख दी। उसने खुद से कहा, "मोनिका मेरी रूह का वो हिस्सा है जो हमेशा रहेगा, लेकिन सुरभि मेरी आँखों का वो सपना है जिसे मैं अब जीना चाहता हूँ।"
अगले कुछ हफ्तों में, विनय की ज़िंदगी में एक अनोखा बदलाव आया। उसने तमिल भाषा पर इतनी अच्छी पकड़ बना ली थी कि अब श्रीधर और बालामुरुगन के बीच होने वाली बातों को वह मज़े लेकर सुनता था। यहाँ तक कि कभी-कभी वह खुद भी तमिल में मज़ाक करने लगा था, जिसे सुनकर श्रीधर हैरान होकर कहता, "अरे! ये तो पक्का 'लोकल' बन गया है!"
विनय ने महसूस किया कि तमिलनाडु अब सिर्फ एक 'काम करने वाली जगह' नहीं, बल्कि उसका घर बन चुका था। उसने अपनी पुरानी उदासी को पीछे छोड़ दिया था।
एक दिन बैंक से निकलते समय, बालामुरुगन ने विनय के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, "विनय, तुझे यहाँ आए पाँच महीने हो गए थे, अब तो छह महीने बीतने को आए हैं। तूने हमें सिर्फ एक दोस्त नहीं, एक भाई दिया है।"
विनय की आँखों में हल्की सी नमी आ गई। उसने उन चारों—खुद, श्रीधर, बाला और सुरभि—की एक काल्पनिक तस्वीर अपने मन में सोची। उसने जान लिया था कि ज़िंदगी का मतलब सिर्फ मंजिल तक पहुँचना नहीं, बल्कि सफर के दौरान मिलने वाले उन लोगों को संजोना है जो हमें फिर से जीना सिखाते हैं।
उसने खिड़की से बाहर देखा—पहाड़, सड़कें, और वो चमकता हुआ तमिलनाडु का आसमान। उसने लंबी साँस ली और मुस्कुराते हुए कहा, "हाँ बाला, सफर अभी जारी है... और सच कहूँ तो, अब मुझे बिल्कुल भी बोरियत नहीं हो रही।"समय के साथ, विनय के लिए तमिलनाडु अब केवल एक कार्यस्थल नहीं, बल्कि उसका दूसरा घर बन गया था। बैंक की व्यस्तता, दोस्तों की आपसी नोक-झोंक और सुरभि के साथ बिताए वे अनमोल पल—इन सबने विनय के व्यक्तित्व में एक सकारात्मक बदलाव ला दिया था।
एक रविवार की सुबह, सुरभि ने विनय को एक प्राचीन शिव मंदिर के पास बुलाया। यह जगह शहर के शोर-शराबे से दूर, ऊंचे पहाड़ों की तलहटी में स्थित थी। मंदिर के पीछे एक छोटा सा झरना बह रहा था, जिसकी कल-कल की आवाज़ पूरे माहौल को शांत और पवित्र बना रही थी।
विनय जब वहाँ पहुँचा, तो सुरभि सीढ़ियों पर बैठी अपनी डायरी में कुछ लिख रही थी। विनय को देखते ही उसने अपनी डायरी बंद की और मुस्कुरा दी।
"आज हम यहाँ क्यों आए हैं?" विनय ने पूछा।
सुरभि ने शांति से कहा, "बस ऐसे ही। कभी-कभी खुद से मिलने के लिए किसी शांत जगह की ज़रूरत होती है। विनय, तुम यहाँ आए, तमिल सीखी, काम संभाला और अपने दोस्तों के साथ एक नया परिवार बनाया। क्या तुम्हें कभी लगता है कि तुम उस 'पुराने विनय' से बहुत आगे निकल आए हो?"
विनय ने झील के शांत पानी को निहारा और गहरी सांस ली। "शायद हाँ। पहले मैं सिर्फ उन चीज़ों को ढो रहा था जो मेरे पास नहीं थीं। लेकिन अब, मैं उन चीज़ों की कद्र करना सीख गया हूँ जो मेरे पास हैं—तुम, बाला, श्रीधर और यह ज़िंदगी।"
तभी, पास के रास्ते से श्रीधर और बाला भी अपनी छुट्टी का आनंद लेते हुए उसी ओर आ निकले। उन्हें देखकर विनय और सुरभि दोनों ही चकित रह गए। श्रीधर ने दूर से ही चिल्लाकर कहा, "अरे, देखो-देखो! आज तो हमारा विनय भाई और सुरभि यहाँ शांति का उपदेश देने आए हैं!"ऐसा कहते हुए दोनों चले गए समय अपनी गति से चल रहा था कुछ देर बाद सुरभि विनय से कहती है हमें मिले हुए 4 से 5 दिन हो गए हैं विनय तुमने मेरे दिल में वो जगह बनाली है जो किसी ने नहीं बनाई अभी तक में तुम्हें बहुत पसन्द करने लगी हु क्या तुम भी मुझे प्यार करते हो तुम्हारे दिल में भी मेरे लिए वो जगह है जो मेरे दिल में है बताओ न विनय जी प्लीज सुरभि के इस सीधे और मासूम सवाल ने विनय के दिल की धड़कनों को जैसे एक पल के लिए थाम सा दिया था। मंदिर की सीढ़ियों पर उस झरने के शोर के बीच, सन्नाटा अब और गहरा हो गया था। विनय ने सुरभि की ओर देखा—उसकी आँखों में एक गहरी सच्चाई और निश्छलता थी, जो बिना किसी दिखावे के अपना दिल खोलकर रख दी थी।
विनय ने सुरभि का हाथ धीरे से अपने हाथों में लिया। उसका हाथ थोड़ा कांप रहा था, लेकिन उसके मन में अब कोई दुविधा नहीं थी। उसने धीरे से मुस्कुराते हुए कहा, "सुरभि, मैं आज तक सिर्फ यादों के बक्से को ढो रहा था, ये सोचकर कि शायद प्यार एक बार ही होता है और वो भी खत्म हो जाता है। लेकिन इन चंद दिनों में, तुमने मुझे सिखाया है कि प्यार खत्म नहीं होता, बस अपना रूप बदल लेता है।"
उसने थोड़ा रुककर गहरी सांस ली और आगे कहा, "तुमने मेरे अंदर की उस उदासी को मिटाकर एक नई रौशनी भर दी है। मैं झूठ नहीं कहूँगा, शुरुआत में मुझे लगा कि शायद ये सिर्फ एक एहसास है, लेकिन आज मुझे यकीन है कि तुम मेरी ज़िंदगी का वो हिस्सा हो जिसकी मुझे तलाश थी। हाँ सुरभि, मैं भी तुमसे बहुत प्यार करता हूँ। तुम मेरे लिए सिर्फ एक दोस्त नहीं, बल्कि वो सुकून हो जो मुझे बरसों से नहीं मिला था।"
सुरभि के चेहरे पर एक ऐसी खुशी तैर गई, मानो उसने दुनिया की सबसे कीमती चीज़ पा ली हो। वह मुस्कुराते हुए विनय के और करीब आ गई। उस शांत मंदिर के प्रांगण में, उनके बीच अब कोई दूरी नहीं थी।
तभी विनय ने मज़ाक करते हुए कहा, "लेकिन सुरभि, मुझे अभी भी डर लगता है! कहीं तुम्हारी ये 'बिना प्लानिंग वाली' यात्रा मुझे किसी बहुत बड़ी मुसीबत में न डाल दे?"
सुरभि ने हँसते हुए जवाब दिया, "डरने की कोई बात नहीं है विनय! अब तो हम दोनों 'को-ड्राइवर' हैं, और हमारी गाड़ी का ड्राइवर हमारा साथ देने के लिए हमेशा तैयार है।"
वे दोनों अभी इन बातों में खोए ही थे कि तभी दूर से श्रीधर और बालामुरुगन की ज़ोरदार आवाज़ें फिर से गूँज उठीं। वे दोनों वापस लौट रहे थे और उन्हें मंदिर की तरफ आते देख विनय और सुरभि झटपट एक-दूसरे से थोड़े दूर हो गए।
श्रीधर ने पास आते ही अपनी शरारती मुस्कान के साथ कहा, "क्या बात है भाई? चेहरे की चमक बता रही है कि 'उपदेश' काफी असरदार रहा!"बालामुरुगन ने अपनी नज़रें झुकाकर हल्की मुस्कान के साथ कहा, "विनय भाई, चेहरे की चमक सब बयां कर रही है। अब तो 'उपदेश' का असर साफ दिख रहा है"। श्रीधर ने अपनी शरारत बरकरार रखते हुए सुरभि की ओर देखा और चुटकी ली, "लगता है आज चाय के साथ कुछ और भी पक रहा है!"।
मंदिर की सीढ़ियों से नीचे उतरते हुए विनय का मन एक अजीब सी हलचल से भरा था। उसे लगा कि ये तमिलनाडु के पहाड़, यहाँ की भाषा और ये लोग, जो कभी उसे सिर्फ एक अजनबी का ठिकाना लगते थे, अब उसके अस्तित्व का हिस्सा बन गए हैं।
शाम को घर लौटते वक्त, विनय ने डायरी निकाली। उसने मोनिका की यादों वाले पन्नों को पीछे छोड़ते हुए, एक नया पन्ना खोला। आज उसने अपनी डायरी में सुरभि का नाम लिखा और मुस्कुराते हुए खुद से कहा, "मोनिका मेरी रूह की वह पुरानी गूंज है जिसे मैं प्यार करता था, लेकिन सुरभि मेरी आँखों का वो नया सवेरा है जिसके साथ मुझे अपनी नई यात्रा तय करनी है"।
अगले दिन बैंक में, बालामुरुगन ने गंभीरता से विनय के कंधे पर हाथ रखा। उसने तमिल में कुछ कहा, जिसका अर्थ था कि जीवन एक नदी की तरह है, जो हमेशा बहती रहती है, और विनय ने आखिरकार उस बहाव को अपना लिया है। विनय ने उसे गले लगा लिया। वह समझ चुका था कि 'बिना प्लानिंग' की इस ज़िंदगी में जो सुख है, वो किसी भी कागज़ी योजना में नहीं था। कुछ देर बाद सभी गाड़ी में बैठ कर बैंको में कैश पहुंचने के लिए निकल गए रस्ते में विनय ने देखा कि पहाड़ अब किसी पुरानी फिल्म के सीन नहीं, बल्कि एक ताज़ा शुरुआत के गवाह लग रहे थे। अब वह 'जिंदा लाश' नहीं था, बल्कि एक ऐसा इंसान था जिसके पास सपने थे। उसने अपनी डायरी बंद की और मुस्कुराते हुए काम में लग गया—क्योंकि सफर अभी जारी था, और आगे का रास्ता बहुत खूबसूरत था।
ऐसे ही दिन गुजरने लगे कुछ दिन बाद जुलाई का महीना लग गया था एक दिन सुरभि ने विनय के फोन पर मैसेज किया हेलो विनय मुझे माफ करना मैं तुमको बताना भूल गई हमारा प्रोजेक्ट खत्म हो गया है तो आज रात को हम अपने शहर प्रयागराज के लिए निकलने वाले हैं sorry मुझे माफ करना और अपना ध्यान रखना टाइम से खाना और अच्छे से रहना Okk और हां ये मेरी इंस्टाग्राम id है में इसी पर तुमसे बात करती रहूंगी.......
विनय जब अपना बैंक का काम खत्म करके रूम पर आके लेटा और उसने अपना फोन ऑन किया और उसने देखा फोन पर कई मैसेज आए हुए थे पर उसकी नज़र सुरभि के मैसेज पर पड़ी उसने मैसेज ओपन किया और पढ़ने लगा
मैसेज पढ़ने के बाद विनय की दुनिया जैसे एक पल के लिए थम गई। उसके हाथ से फोन छूटते-छूटते बचा। कमरे का सन्नाटा उसे और भी भारी लगने लगा। वही कमरा, जो कल तक सुरभि के ख्यालों से महकता था, आज अचानक खाली-खाली सा महसूस होने लगा। विनय की आँखें मैसेज के शब्दों पर टिकी थीं, लेकिन मन उन पलों को याद कर रहा था जो उसने झील के किनारे और मंदिर की सीढ़ियों पर सुरभि के साथ बिताए थे।
उसने जल्दी से टाइप किया, "सुरभि, तुम यह क्या कह रही हो? मुझे लगा था हमारे पास और भी समय है। क्या हम आज शाम मिल सकते हैं? मुझे तुमसे बहुत कुछ कहना है।"
कुछ ही देर बाद फोन की घंटी बजी। सुरभि का कॉल था। विनय ने हड़बड़ाते हुए फोन उठाया।
"हेलो विनय," सुरभि की आवाज़ में भी एक भारीपन था। "मुझे पता है यह अचानक हुआ है। मैं भी नहीं चाहती थी कि सब इतना जल्दी खत्म हो, लेकिन ऑफिस के ऑर्डर हैं। मुझे निकलना ही होगा।"
विनय ने थोड़ा रुककर कहा, "मैं अभी आ रहा हूँ। जहाँ तुम कहोगी, वहाँ मिलूँगा। बस एक आखिरी बार..."
सुरभि ने एक पते की जगह बताई। वह शहर के बाहर का एक छोटा सा रेलवे स्टेशन था, जहाँ से उसकी ट्रेन थी। विनय ने बिना कुछ सोचे, अपने दोस्तों को एक मैसेज किया कि वह आज रात बैंक के काम से थोड़ा लेट होगा। वह दौड़ता हुआ अपनी बाइक (या जो भी साधन उपलब्ध था) लेकर उस स्टेशन की ओर निकल पड़ा।
रास्ते में बारिश फिर शुरू हो गई थी, लेकिन आज यह बारिश उसे धो नहीं रही थी, बल्कि उसके दिल की बेचैनी को और बढ़ा रही थी। उसे लग रहा था कि क्या एक बार फिर उसकी खुशियों को किसी की नज़र लग गई है? क्या मोनिका के बाद अब सुरभि भी उसकी ज़िंदगी से एक याद बनकर ओझल हो जाएगी?
जब वह स्टेशन पहुँचा, तो सुरभि प्लेटफॉर्म के एक कोने में अपने बैग के साथ खड़ी थी। उसे देखते ही विनय के कदम ठिठक गए। सुरभि ने उसे देखा और उसकी आँखों में भी नमी थी।
विनय उसके पास पहुँचा। "सुरभि, क्या यह सच में आखिरी मुलाकात है?"
सुरभि ने अपनी नम आँखें ऊपर कीं। "विनय, दूरी सिर्फ रास्तों की होती है, दिलों की नहीं। तुमने मुझे सिखाया था कि ज़िंदगी का असली मज़ा 'बिना प्लानिंग' के जीने में है। तो चलो, इस दूरी को भी एक ऐसी ही अनजानी मंज़िल मान लेते हैं। हम इंस्टाग्राम पर बात करेंगे, वीडियो कॉल करेंगे... और कौन जानता है, शायद भविष्य में रास्ते फिर कहीं मिलें।"
विनय ने उसे एक छोटी सी डायरी दी, जो उसने बैंक में काम करते हुए कुछ दिनों में लिखी थी—उसमें उन दोनों की मुलाकातों के खूबसूरत लम्हे थे। "ये रखो। इसमें हमारी वो 'बिना प्लानिंग' वाली यादें हैं। ताकि तुम कभी भूल न सको कि तमिलनाडु के इन पहाड़ों ने हमें मिलाया था।"
ट्रेन की सीटी सुनाई दी। सुरभि ने अपना बैग उठाया और चलती हुई ट्रेन के दरवाज़े पर खड़ी हो गई। विनय उसे तब तक देखता रहा जब तक ट्रेन की लाल बत्तियाँ अंधेरे में गायब नहीं हो गईं।
उस रात जब विनय वापस अपने रूम पहुँचा, तो वह पूरी तरह टूट चुका था। लेकिन तभी उसे श्रीधर और बालामुरुगन का फोन आया।
"विनय भाई, हम जानते हैं कि आज आपका मन उदास होगा। हम सब बाहर चाय की टपरी पर बैठे हैं। आप जल्दी से नीचे आ जाओ।"
विनय को समझ आया कि सुरभि भले ही चली गई हो, लेकिन उसकी ज़िंदगी में जो लोग उसे यहाँ मिले हैं—ये दोस्त, ये पहाड़, ये शहर—वे उसे कभी अकेला नहीं छोड़ेंगे। उसने अपने चेहरे से उदासी पोंछी और नीचे अपने दोस्तों के पास चला गया।
उसने सोचा, "मोनिका एक याद थी, सुरभि एक एहसास है, और ये दोस्त मेरी हकीकत हैं।" अब उसे पता था कि सफर अभी खत्म नहीं हुआ है, यह तो बस एक नया मोड़ था।
अगले दिन, बैंक की उसी गाड़ी में जब श्रीधर ने पूछा, "विनय भाई, आज इतने शांत क्यों हो?" तो विनय ने मुस्कुराते हुए बाहर पहाड़ों की ओर देखा और कहा, "कुछ नहीं श्रीधर, बस ज़िंदगी की अगली मंज़िल का इंतज़ार है।" और इस बार, उसके दिल में डर नहीं, बल्कि एक अजीब सा सुकून था।
सफर वाकई जारी था।
सुरभि के जाने के बाद कुछ दिन विनय के लिए वाकई कठिन थे। उसके कमरे की चारदीवारी फिर से उसे पुरानी यादों की तरह खामोश लगने लगी थी, लेकिन इस बार अंतर यह था कि उसके पास सुरभि का वादा और उन दोस्तों का साथ था जो उसे हर पल मुस्कुराने की वजह देते थे विनय को अब समझ आ गया था कि जिसे वह 'अधूरी दास्तां' समझता था, वह असल में उसकी ज़िंदगी की एक नई और मुकम्मल कहानी का पहला अध्याय था। तमिलनाडु की उन सड़कों से शुरू हुआ उसका सफर, अब पहाड़ों की ऊंचाइयों को छूने के लिए तैयार था
ऐसे ही दिन गुजरने लगे
सुरभि के जाने के बाद कुछ दिन बहुत भारी गुजरे। विनय के लिए अब काम पर जाना, वही सड़कें, वही एटीएम और वही 'विल्लुपुरम सिंगल' उसे बार-बार सुरभि की याद दिलाते थे। लेकिन अब वह 'जिंदा लाश' वाला पुराना विनय नहीं था। वह जानता था कि सुरभि ने उसे जो उम्मीद दी थी, उसे खोने नहीं देना है।
समय बीतता गया और अगस्त का महीना आ गया। बैंक के काम में व्यस्तता बढ़ गई थी, क्योंकि उस महीने कुछ नए प्रोजेक्ट्स पर काम करना था। बालामुरुगन और श्रीधर उसे उदास नहीं रहने देते थे।
एक दिन, जब वे लोग बैंक का काम खत्म करके वापस आ रहे थे, श्रीधर ने गाड़ी एक ऊंचे पहाड़ी रास्ते की ओर मोड़ दी। विनय ने पूछा, "अरे, आज ये रास्ता क्यों? घर तो दूसरी तरफ है।"
बालामुरुगन पीछे से हँसते हुए बोला, "विनय, आज एक सरप्राइज है। तुझसे कहा था न कि ज़िंदगी में 'बिना प्लानिंग' के ही असली मजा है? आज वही दिन है।"
गाड़ी एक बेहद खूबसूरत पॉइंट पर रुकी, जहाँ से पूरा शहर और दूर तक फैले पहाड़ दिखाई दे रहे थे। वह वही जगह थी जहाँ विनय और सुरभि पहली बार 'बिना प्लानिंग' के घूमने आए थे। विनय की आँखें नम हो गईं। उसे लगा जैसे सुरभि अभी भी वहीं कहीं आस-पास है।
तभी उसका फोन बजा। इंस्टाग्राम पर सुरभि का मैसेज था: "विनय, क्या तुम्हें वो जगह याद है? आज बहुत दिनों बाद मन किया कि तुम्हें कुछ कहूँ। मुझे यहाँ प्रयागराज में भी वो सुकून नहीं मिला जो तमिलनाडु की उन पहाड़ियों में था। क्या हम अपनी 'बिना प्लानिंग' वाली दोस्ती को ऐसे ही हमेशा जिंदा रख सकते हैं?"
विनय ने तुरंत जवाब लिखा, "दूरी का क्या है सुरभि, तुम मेरे पास ही हो—इन पहाड़ों में, इन दोस्तों में और मेरी उस डायरी में, जो मैंने तुम्हें दी थी।"
विनय ने अब समझ लिया था कि प्यार का मतलब सिर्फ साथ रहना ही नहीं, बल्कि एक-दूसरे की यादों में जिंदा रहना भी है। उसने अपना फोन जेब में रखा और अपने दोस्तों की ओर देखा जो उसे देखकर मुस्कुरा रहे थे।
विनय ने लंबी साँस ली। उसने महसूस किया कि तमिलनाडु अब सिर्फ एक जगह नहीं थी, बल्कि उसके 'होने' का सबूत बन गई थी। उसने बालामुरुगन और श्रीधर की ओर हाथ बढ़ाया और कहा, "चलो दोस्तों, आज सूर्यास्त साथ में देखते हैं। आज मुझे बिल्कुल भी बोरियत नहीं हो रही।"
उस शाम, पहाड़ों के पीछे डूबते हुए सूरज को देखकर विनय को एहसास हुआ कि उसकी ज़िंदगी की किताब का यह पन्ना अभी और लिखा जाना बाकी है। वह अब इंतज़ार नहीं कर रहा था, वह जी रहा था।
विनय का सफर: विनय ने अब स्वीकार कर लिया था कि सुरभि उसकी ज़िंदगी का एक खूबसूरत मोड़ थी।
दोस्तों का साथ: बालामुरुगन और श्रीधर उसके लिए सिर्फ सहकर्मी नहीं, बल्कि उसके नए परिवार का हिस्सा बन चुके थे।
नया दृष्टिकोण: विनय अब 'बिना प्लानिंग' के जीने के मंत्र को पूरी तरह अपना चुका था और वर्तमान को ही अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानता था।
विनय की गाड़ी फिर से स्टार्ट हुई और वे शहर की ओर बढ़ गए। रास्ते की धुंध में उसे आज भी मोनिका की पुरानी यादें और सुरभि की नई उम्मीदें एक साथ मुस्कुराती हुई महसूस हो रही थीं। सफर जारी था, और इस बार मंज़िल का पता होने की ज़रूरत किसी को नहीं थी।
दिन ऐसे ही गुजरने लगे विनय ने मोनिका और सुरभि की यादों से बचने के लिए zym करना चालू कर दिया सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक बैंक में काम करना और शाम 7 बजे से 9 बजे तक zym करना बस यही उसका डेली का नियम हो गया वो अपने शरीर को आराम नहीं देना चाहता था वो अपने शरीर को इतना कठोर बना रहा था कि उसे किसी दर्द का अहसास नही हो पर उसने शरीर को ही कठोर बना सकता था दिल को कैसे बनाता उसके दिल में तो सिर्फ मोनिका की यादों के अलावा और कुछ नहीं था जो वो उन्हें कभी नहीं मिटा सकता था
विनय की ज़िंदगी अब एक सख्त अनुशासन और पुरानी यादों के बीच एक नाजुक संतुलन पर टिकी थी। जिम की भारी कसरतें उसके शरीर को तो पत्थर सा बना रही थीं, लेकिन उसका दिल आज भी उन्हीं पुरानी यादों की कैदी था।
जिम से लौटते समय, अक्सर जब वह तमिलनाडु की उन सुनसान सड़कों से गुजरता, तो उसे मोनिका की मुस्कान हर मोड़ पर दिखाई देती। सुरभि ने उसे वर्तमान में जीना सिखाया था, लेकिन सुरभि के जाने के बाद वह वर्तमान एक बार फिर से 'याद' में बदल गया था।
एक दिन जिम में कसरत करते हुए विनय को काफी देर हो गई। रात के नौ बज चुके थे। जब वह बाहर निकला, तो चारों तरफ सन्नाटा था। उसने अपनी बाइक स्टार्ट की और कमरे की ओर चल पड़ा। रास्ते में वही 'विल्लुपुरम सिंगल' पड़ा जहाँ उसने सुरभि से पहली बार मुलाकात की थी और जहाँ वह अक्सर मोनिका की यादों में खोया रहता था।
अचानक उसे लगा कि सामने से कोई और नहीं, बल्कि मोनिका ही आ रही है। वह अपनी आँखें मलता रहा, लेकिन वह साया ओझल हो गया। यह भ्रम था या उसकी रूह का कोई पुराना कोना उसे आज भी पुकार रहा था?
तभी उसका फोन बजा। स्क्रीन पर 'बाला' का नाम था। फोन उठाते ही बाला की आवाज आई, "विनय, कहाँ है भाई? आज रात को हम सब एक शादी में जा रहे हैं, तू भी चल। ये 'श्रीलंड' (श्रीधर) तुझे लेने आ रहा है, घर पर ही रुकना।"
विनय का मन तो नहीं था, लेकिन वह जानता था कि अगर वह अकेले कमरे में रहा, तो उसकी यादों का बक्सा उसे फिर से 'जिंदा लाश' बना देगा। थोड़ी देर में श्रीधर गाड़ी लेकर पहुँच गया। गाड़ी में बैठते ही श्रीधर ने पुराने अंदाज़ में कहा, "विनय भाई, आज शादी में बहुत मजे करेंगे, देखना कोई मस्त लड़की मिल जाए तो!"
शादी की रौनक, रोशनी और शोर-शराबे के बीच विनय को एक पल के लिए लगा कि शायद ज़िंदगी इतनी भी बुरी नहीं है। शादी के दौरान, जब संगीत बज रहा था, तो अचानक एक गाना वही बजा जो मोनिका को बहुत पसंद था। विनय के हाथ से पानी का गिलास छूटकर गिर गया। उसे लगा कि वह दम घुटने की स्थिति में है।
वह शोर-शराबे से दूर शादी के गार्डन के पीछे एक शांत कोने में जाकर बैठ गया। तभी वहाँ एक अधेड़ उम्र की महिला आई, जो शायद उस शादी की कोई रिश्तेदार थीं। उन्हें विनय के चेहरे पर छाई उदासी देख कुछ समझ आ गया। उन्होंने पास आकर कहा, "बेटा, यहाँ तो सब खुशियाँ मना रहे हैं, तुम क्यों अकेले बैठे हो?"
विनय ने बस इतना कहा, "कुछ यादें, माँ जी। जो कभी पीछा नहीं छोड़तीं।"
महिला ने मुस्कुराते हुए कहा, "यादें तो छांव की तरह होती हैं, बेटा। अगर तुम धूप में दौड़ते रहोगे, तो वे तुम्हारे पीछे ही रहेंगी। लेकिन अगर तुम ठहरे हुए पानी की तरह बन जाओ, तो वे खुद-ब-खुद नीचे बैठ जाएंगी।"
उस रात, विनय की आँखों में एक अजीब सी चमक थी। घर लौटकर उसने अपनी वह डायरी निकाली जिसमें उसने मोनिका और सुरभि दोनों का ज़िक्र किया था। उसने डायरी का वह पन्ना खोला जिस पर उसने आखिरी बार कुछ लिखा था।
उसने लिखा: "शरीर को कठोर बनाना आसान है, लेकिन दिल को लचीला बनाना ही असली वीरता है। मैं मोनिका को नहीं मिटाऊंगा, न ही सुरभि को भूलूँगा। मैं बस अब इन दोनों यादों के साथ 'तैरना' सीखूँगा, डूबना नहीं।"
अगली सुबह जब सूरज की किरणें खिड़की से अंदर आईं, तो विनय ने पहली बार जिम के भारी डंबल उठाने के बजाय, पुराने ज़माने के गानों को चला दिया उसे लगा कि उसकी रूह में जमा हुआ वो बर्फ का पहाड़ पिघलने लगा है।
विनय ने समझ लिया था कि ज़िंदगी न तो केवल बैंक का काम है, न ही सिर्फ कसरत। यह उन तमाम रंगों का मेल है जो समय उसे दे रहा है। सफर अभी जारी था, और अब वह किसी मंज़िल का मोहताज नहीं था। वह बस इस सफर को, इसके हर उतार-चढ़ाव के साथ, पूरी शिद्दत से जीने के लिए तैयार था।
एक दिन विनय अपने कमरे में लेता हुआ पंखे की तरफ देखते हुए अपनी और मोनिका की पुरानी यादें सोचने लगा उसे अपनी और मोनिका की पहली बार की मुलाकात याद आई कैसे वो मिले..__
" पहला प्यार "
पहली बार जब वो मिली थी ना... तो उसने ठीक से मेरी तरफ देखा भी नहीं था... बस दुपट्टा थोड़ा सा चेहरे के पास खींच लिया था... और हल्की-सी मुस्कान छुपाकर दूसरी तरफ देखने लगी थी...
उस दिन पहली बार समझ आया... शर्माना भी कितना खूबसूरत होता है... धीरे-धीरे हमारी बातें शुरू हुईं... पहले "हाँ" और "ठीक है" तक रहती थीं...
फिर वही लड़की रात-रात भर मुझसे बातें करने लगी...
वो हर छोटी बात बताती थी-
आज क्या खाया... किससे झगड़ा हुआ...
और सबसे ज़्यादा ये पूछती थी-
"तुमने खाना खा लिया ना...?"
मुझे तब समझ नहीं था...
कि कोई इंसान किसी की इतनी आदत भी बन सकता है...
एक दिन मैंने मज़ाक में पूछा-"अगर मैं कहीं चला गया तो...?"
वो तुरंत चुप हो गई... फिर धीरे से बोली-
"ऐसी बात मत किया करो... अच्छा नहीं लगता..."
उसकी वही घबराई हुई आवाज़...
आज भी कानों में गूंजती है...
लेकिन आज वह लड़की... लड़की कहां है कैसी क्या कर रही मुझे याद करती भी है या नहीं कुछ नहीं पता
पर मैं आज भी उसी जगह खड़ा हूँ... उसकी यादों के सहारे जहाँ वो पहली बार शर्माकर मुस्कुराई थी... सच बताऊँ...
पहली मोहब्बत कभी खत्म नहीं होती...
वो बस एक याद बनकर आँखों में हमेशा के लिए रह जाती है...!
मैं आज भी वही हूँ
उस रात जब तुम रोते-रोते मुझसे कह रही थीं-
"कभी मुझे छोड़कर मत जाना..."
मैंने मज़ाक में हँसकर कहा था-
"अगर चला भी गया ना... तो तुम्हारे आसपास ही रहूँगा..."
तुम नाराज़ हो गई थीं... बोली थीं-
"ऐसी बातें मत किया करो... डर लगता है..."
आज सच में मैं दूर हूँ... लेकिन अजीब बात है...
तुम्हें आज भी हर छोटी बात में मेरा ख्याल आ ही जाता होगा ना...
जब तुम देर रात तक जागती हो... और बिना वजह
दिल भारी हो जाता है... तो समझ लेना...
मैं वहीं कहीं पास बैठा हूँ... बस पहले की तरह
तुम्हें चुपचाप देख रहा हूँ...
जब कोई तुम्हारा हाल नहीं पूछता होगा... और तुम
आदत से मजबूर होकर मोबाइल उठाती हो... तो याद करना...
कभी कोई था जो बिना वजह भी पूछ लिया करता था-
"खाना खाया...?"
मैं चला गया हूँ... लेकिन मोहब्बत नहीं गई...
तुम्हारी हर खामोशी में... हर अधूरी हँसी में...
और हर उस आँसू में... जो तुम किसी को दिखाती नहीं हो...
मैं आज भी वहीं रहता हूँ...
जहाँ तुम आख़िरी बार मेरा नाम लेकर रोई थी...।
वक्त बदल गया है, चेहरे धुंधले हो गए हैं,
पर मेरी यादों के पन्ने आज भी वही हैं।
तुमने शायद मुझे अपनी जिंदगी से मिटा दिया हो,
पर मैंने खुद को तुम्हारी यादों में ही सजा लिया है।
आज भी जब बारिश की बूंदें खिड़की पर दस्तक देती हैं,
तो तुम्हारा चेहरा मेरी आँखों के सामने तैर जाता है।
वो चाय की पहली चुस्की, वो लंबी बातें,
सब कुछ मानो कल की ही तो बात लगती है।
लोग कहते हैं कि वक्त सब कुछ भुला देता है,
शायद उन्हें पता नहीं कि कुछ निशान रूह पर होते हैं।
मैं आज भी कहीं उसी मोड़ पर खड़ा हूँ,
जहाँ तुम मेरी दुनिया को अधूरा छोड़ गई थी।
पर अब बस एक ही दुआ है मेरी खुदा से,
कि जहाँ भी रहो तुम, खुश रहो और मुस्कुराती रहो।
मेरी मोहब्बत का अंजाम चाहे जो भी रहा हो,
तुम्हारी हँसी की गूँज मेरी खामोशी को सुकून देती रहे।
नए सवेरे की ओर
डायरी बंद करते हुए विनय ने एक गहरी साँस ली। वह समझ चुका था कि मोनिका और सुरभि, दोनों ही उसकी ज़िंदगी के वो अध्याय थे, जिन्हें बदला नहीं जा सकता था, लेकिन उनके साथ आगे बढ़ा जा सकता था।
अगले कुछ हफ्तों में, विनय ने खुद को पूरी तरह बदल लिया। उसने जिम की कसरत को अब 'सजा' नहीं, बल्कि 'शक्ति' का माध्यम बना लिया था। बैंक की नौकरी में भी उसकी एकाग्रता लौट आई थी। उसके सहकर्मी अब उसके चेहरे पर वो ठहराव देख पा रहे थे, जो पहले कभी नहीं था।
एक शाम, जब वह ऑफिस से लौट रहा था, अचानक बारिश शुरू हो गई। विनय ने पास की एक पुरानी कॉफी शॉप में शरण ली। वह अपनी कॉफी की चुस्की ले ही रहा था कि उसकी नज़र कोने में बैठी एक युवती पर पड़ी, जो एक किताब पढ़ते हुए मुस्कुरा रही थी। उसकी मुस्कान में एक सहजता थी, कोई बनावट नहीं। विनय को एक पल के लिए लगा कि जैसे समय थम गया है।
उसने खुद को झिंझोड़ा। 'नहीं, मैं किसी को ढूँढने नहीं आया हूँ,' उसने मन ही मन सोचा। लेकिन जैसे ही वह जाने के लिए उठा, उस युवती ने अपनी किताब बंद की और पास ही रखी डायरी पर कुछ लिखने लगी। वह दृश्य विनय को अपनी उस पुरानी डायरी की याद दिला गया।
विनय अनजाने में ही उसकी ओर बढ़ा और बस इतना कहा, "लिखना वाकई एक सुकून है, है न?"
युवती ने मुस्कुराते हुए सिर उठाया और कहा, "शायद इसलिए, क्योंकि पन्ने कभी शिकायत नहीं करते।"
उस छोटी सी बातचीत ने विनय के भीतर एक नई जिज्ञासा जगाई। उसने समझ लिया था कि ज़िंदगी का मतलब सिर्फ बीते हुए कल के पन्नों को पलटना नहीं है, बल्कि आज के खाली पन्नों पर नई इबारत लिखना भी है।
उस रात घर पहुँचकर, विनय ने अपनी डायरी का अगला पन्ना खोला। उसने आज मोनिका के बारे में कुछ नहीं लिखा, न ही सुरभि के बारे में। उसने बस एक पंक्ति लिखी:
"आज बारिश में पहली बार मैंने महक को महसूस किया, यादों को नहीं। शायद, ज़िंदगी फिर से शुरू हो रही है।"
उसने डायरी को दराज में रखा और खिड़की खोल दी। बाहर की ठंडी हवा और आसमान में छाए बादल अब उसे डरा नहीं रहे थे, बल्कि एक नए सफर का आमंत्रण दे रहे थे। विनय अब तैयार था—अतीत के बोझ को साथ लेकर, लेकिन वर्तमान की आँखों में आँखें डालकर जीने के लिए।
अगले कुछ दिनों तक विनय उस कॉफी शॉप के इत्तेफाक को भुलाने की कोशिश करता रहा, लेकिन उसका मन बार-बार उसी शाम की ओर खिंच जाता था। उसने महसूस किया कि वह अब अपनी यादों के साथ तैरना सीख चुका है, लेकिन उसका दिल अभी भी एक ऐसे चौराहे पर था जहाँ से आगे का रास्ता धुंधला था।
अगले हफ्ते जब वह दोबारा उसी कॉफी शॉप में गया, तो वह युवती फिर वहीं बैठी थी। इस बार उसने विनय को देखते ही हाथ हिलाकर अभिवादन किया। विनय हिचकिचाते हुए उसकी मेज के पास गया।
"क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ?" उसने पूछा।
युवती ने अपनी डायरी एक तरफ रखते हुए मुस्कुराकर जगह दी। उसने अपना नाम 'अदिति' बताया। बातचीत शुरू हुई तो विनय को एहसास हुआ कि अदिति का व्यक्तित्व भी उसी की तरह कुछ अनकही कहानियों से बना था। उसने बताया कि वह अक्सर यहाँ उन पन्नों को भरने आती है जो उसके अपने अतीत के अधूरे वाक्यों को पूरा करते हैं।
विनय ने पहली बार किसी को अपनी उन पुरानी उलझनों के बारे में बताया—मोनिका की वो मासूम मुस्कान और सुरभि के साथ बिताया वह छोटा सा लेकिन गहरा वक्त। उसने बताया कि कैसे एक समय उसने खुद को 'जिंदा लाश' सा महसूस किया था, जब वह अकेले कमरे में अपनी यादों के बक्से में कैद था।
अदिति ने बहुत ध्यान से उसकी बातें सुनीं और अंत में बस इतना कहा, "विनय, यादें बोझ नहीं, बल्कि वो नक्शे हैं जो हमें बताते हैं कि हम कहाँ से आए हैं। लेकिन अगर हम नक्शे को ही मंजिल समझ लें, तो आगे का सफर शुरू ही नहीं हो पाएगा।"
उस रात, जब विनय वापस लौटा, तो उसके कमरे में सन्नाटा तो था, लेकिन वह उसे भारी नहीं लग रहा था। उसने डायरी का वह पुराना पन्ना फिर से पढ़ा जहाँ उसने लिखा था कि वह अब डूबना नहीं चाहता।
उसने डायरी में आज की तारीख डाली और लिखा:
"आज पहली बार मैंने अपनी कहानी किसी और के साथ साझा की। ऐसा लगा जैसे रूह का वो बर्फ का पहाड़, जो जिम की कसरतों से भी नहीं पिघला था, आज किसी के सुन लेने भर से पिघल गया है।"
विनय को समझ आ गया था कि जिंदगी का सफर अब किसी मंजिल की तलाश में नहीं, बल्कि उन लोगों के साथ है जो आपके दर्द को अपनी खामोशी में जगह दे सकें। अब वह एक बेहतर, हल्का और भविष्य की ओर देखता हुआ विनय था।
अदिति के साथ हुई वह मुलाकात विनय के जीवन के लिए एक 'कैटलिस्ट' (उत्प्रेरक) साबित हुई। धीरे-धीरे, विनय और अदिति के बीच कॉफी शॉप की मुलाकातें एक नियमित सिलसिला बन गईं। अब विनय के लिए वह 'विल्लुपुरम सिंगल' का रास्ता सिर्फ मोनिका की यादों का ठिकाना नहीं रहा था, बल्कि वह उस रास्ते को एक नई उम्मीद के साथ देखता था।
एक शाम, जब वे दोनों शहर के एक शांत पार्क में टहल रहे थे, विनय ने रुककर अदिति से कहा, "अदिति, मैंने कभी नहीं सोचा था कि किसी अजनबी के साथ अपनी खामोशी को साझा करना इतना आसान होगा। मोनिका और सुरभि ने मुझे जीना सिखाया, लेकिन तुमने मुझे यह सिखाया कि ज़िंदगी में आगे बढ़ना भूलना नहीं, बल्कि नए अनुभवों का स्वागत करना है।"
अदिति ने अपनी डायरी से एक पन्ना निकाला और विनय को देते हुए कहा, "हम अपनी यादों को रूह के एक कोने में तह लगाकर रख सकते हैं, लेकिन हमें उस तह को खोलकर हर रोज़ नहीं देखना चाहिए। विनय, तुम आज भी वहीं खड़े हो जहाँ तुम उस दिन थे, जब तुमने आखिरी बार मोनिका का नाम लेकर रोया था।"
विनय को अदिति की बात में एक गहरा सच दिखाई दिया। उसने महसूस किया कि वह अब अपनी यादों के उस 'बर्फ के पहाड़' से बाहर निकल चुका था, जो उसे अंदर ही अंदर जमाए हुए था। उसने पहली बार अदिति का हाथ थाम लिया। यह हाथ का साथ सिर्फ एक सहारा नहीं था, बल्कि भविष्य के प्रति उसकी स्वीकृति थी।
उस रात घर लौटकर, विनय ने अपनी डायरी के आखिरी पन्नों पर कुछ नया लिखा:
"आज मैंने पहली बार अपनी रूह से वह पुराना बोझ उतार दिया है।
मैं अभी भी वही विनय हूँ जिसने प्यार करना सीखा, लेकिन अब मैं वो विनय हूँ जो खुद से भी प्यार करना जानता है।
कल की यादें अब मेरी 'मंज़िल' नहीं, बल्कि मेरे 'सफर' का हिस्सा भर हैं।"
विनय ने डायरी बंद की और मुस्कुराते हुए सो गया। अब उसे कोई डर नहीं था, क्योंकि उसने समझ लिया था कि ज़िंदगी का असली सुकून किसी को खोने या पाने में नहीं, बल्कि खुद को हर रोज़ नए सिरे से जीने में है।
विनय की ज़िंदगी अब एक नए आयाम की ओर मुड़ चुकी थी। अदिति के साथ का समय उसे यह अहसास दिलाने लगा था कि बीता हुआ कल उसके व्यक्तित्व का एक हिस्सा तो है, पर वही उसका पूरा वजूद नहीं है।
उसने धीरे-धीरे अपने कमरे की उन चीज़ों को व्यवस्थित करना शुरू किया जो उसे पुरानी यादों के भंवर में खींच ले जाती थीं। जिम की कसरतें अब केवल शरीर बनाने के लिए नहीं, बल्कि मानसिक शांति के लिए थीं।
एक दोपहर, जब वह और अदिति शहर की पुरानी लाइब्रेरी में साथ बैठे थे, अदिति ने विनय से पूछा, "क्या तुम्हें कभी लगता है कि हम अपनी यादों से भाग रहे हैं?"
विनय ने खिड़की के बाहर देखते हुए शांत स्वर में कहा, "पहले लगता था, लेकिन अब नहीं। अब मुझे समझ आया है कि यादें तो छांव की तरह होती हैं, जो सूरज की रोशनी के साथ ही बदलती हैं। अगर मैं धूप में दौड़ता रहूँगा, तो वे मेरे पीछे ही रहेंगी, लेकिन अगर मैं ठहर जाऊँ, तो वे खुद-ब-खुद नीचे बैठ जाएंगी।"
उस दिन विनय ने अपनी डायरी में पहली बार 'वर्तमान' की सुंदरता के बारे में विस्तार से लिखा:
उसने लिखा कि कैसे अब वह विल्लुपुरम की उन सड़कों को बिना किसी दुख के देख पाता है, जहाँ कभी उसे मोनिका का भ्रम होता था।
उसने अपनी डायरी में यह भी स्वीकार किया कि सुरभि ने उसे वर्तमान जीना सिखाया था, और अब अदिति उसे उस वर्तमान को प्रेम के साथ जीना सिखा रही है।
उसने अंत में लिखा कि उसकी मोहब्बत अब किसी के जाने या आने की मोहताज नहीं, बल्कि उसके स्वयं के भीतर पनप रही एक शांति है।
विनय अब वह 'जिंदा लाश' नहीं था जो अपनी यादों के बक्से में कैद था। वह अब एक ऐसे सफर पर था, जहाँ मंज़िल से ज़्यादा रास्तों की खूबसूरती मायने रखती थी। उसने समझ लिया था कि रूह पर लगे कुछ निशान कभी नहीं मिटते, लेकिन वे अब दर्द नहीं, बल्कि उसे और अधिक मानवीय और संवेदनशील बनाते हैं।
उस शाम जब वह घर लौटा, तो उसने अपनी खिड़की पूरी तरह खोल दी। बाहर बारिश की फुहारें आ रही थीं, लेकिन इस बार उसे मोनिका का चेहरा नहीं, बल्कि जीवन की ताज़गी का अहसास हुआ। विनय मुस्कुराया, डायरी बंद की और अपने नए कल के सपनों को बुनने के लिए तैयार हो गया।
इस तरह, एक लंबे संघर्ष के बाद, विनय ने अपनी रूह के उस 'बर्फ के पहाड़' को पूरी तरह पिघला दिया था।
विनय की यह नई शुरुआत केवल शब्दों तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसके कार्यों में भी झलकने लगी थी। उसने बैंक की अपनी जिम्मेदारियों को नई ऊर्जा के साथ पूरा करना शुरू किया और अपने पुराने मित्रों, जैसे बाला और श्रीधर, के साथ भी फिर से खुलकर जुड़ने लगा। वह समझ गया था कि खुशियाँ बाहर ढूँढने से नहीं, बल्कि भीतर के द्वंद्वों को शांत करने से मिलती हैं।
एक सुबह, विनय ने अपनी उस पुरानी डायरी को अलमारी के सबसे निचले खाने में रख दिया, जहाँ वह बरसों तक कैद थी। उसने डायरी के अंतिम पृष्ठ पर केवल तीन शब्द लिखे थे: "स्वीकार, शांति, शुरुआत"।
उसकी ज़िंदगी अब उन यादों की कैदी नहीं थी, बल्कि उन यादों को अपनी ताकत बनाकर आगे बढ़ रही थी। उसने महसूस किया कि:
मोनिका का प्यार उसकी पहली सीख थी।
सुरभि का साथ उसकी वर्तमान को जीने की प्रेरणा थी।
अदिति का होना उसके उस सफर की नई उम्मीद था, जहाँ अब कोई धुंधलापन नहीं था।
विनय अब विल्लुपुरम की उन सड़कों पर जब अपनी बाइक से निकलता, तो वह शोर-शराबे और सन्नाटे के बीच एक अजीब सा सुकून महसूस करता। उसने जिम जाना नहीं छोड़ा था, लेकिन अब डंबल उठाना उसके लिए अपनी ताकत को साबित करने का साधन नहीं, बल्कि अपनी सेहत के प्रति एक सकारात्मक समर्पण था।
कहानी का यह पड़ाव एक अंत नहीं, बल्कि विनय के रूपांतरण की पूर्णता थी। वह अब एक ऐसा इंसान बन चुका था जिसने यह जान लिया था कि ज़िंदगी के हर उतार-चढ़ाव, चाहे वे कितने ही दर्दनाक क्यों न हों, अंततः एक बेहतर इंसान बनाने के लिए ही होते हैं।
विनय ने खिड़की की ओर देखा, जहाँ धूप अब और भी सुनहरी लग रही थी। उसने गहरी साँस ली और मुस्कुराते हुए अपने दिन की नई शुरुआत की, क्योंकि अब उसके पास पीछे देखने का पछतावा नहीं, बल्कि आगे देखने का एक साफ नज़रिया था।
फिर एक दिन विनय को अनुष्का से माफ़ी मांगने का ख्याल आया उसने अपनी बहन से बोला कि मैं अनुष्का से बात करना चाहता हूं उससे बोल मेरे पास मैसेज कर ले पर उसका मैसेज नहीं आया विनय ने हिम्मत करके एक मैसेज किया हेलो क्या कर रही हो अनुष्का शर्मा जी कुछ देर बाद अनुष्का का रिप्लाई आया कुछ नहीं तुम बताओ आज कैसे याद आ गई हमारी विनय ने मैसेज किया ऐसे ही कुछ बोलना था तुमसे पहले ये बताओ मेरी कहानी कैसी लगी अनुष्काने जवाब दिया बहुत अच्छी है आगे नहीं लिख रहे हो विनय बोला हां लिख रहा हूं कुछ दिनों में पूरी हो जाएगी पर मुझे तुमसे माफी मांगनी है इस लिए कि मैने तुमसे बिना पूछे तुम्हारा नाम अपनी पहली किताब में लिख दिया उसके लिए मुझे माफ करना और उस बात के लिए भी जो मैने तुमसे बहुत दिन पहले कही थी प्लीज मुझे माफ करना मुझे कहानी लिखते समय बहुत बुरा लगा जब मुझे याद आया कि मैने तुमसे ये शब्द क्यों बोल दिए प्लीज मुझे माफ करना sorry पर अनुष्का की तरफ से कोई रिप्लाई नहीं आया विनय ने सोचा शायद अनुष्का अभी तक उससे नाराज है पर विनय का दिल हल्का हो गया उसने माफी जो मांग ली अब ये बात अनुष्का के ऊपर है कि वो उसे माफ कर रही है या नहीं कुछ देर बाद अनुष्का का रिप्लाई आया हां कोई बात नहीं मैंने तुम्हें माफ़ कर दिया ऐसी छोटी मोटी गलती तो हो जाती हैं कोई बात नहीं पर जब तुम्हारी कहानी का दूसरा भाग पूरा हो जाए तो मेरे पास जरूर भेज देना विनय ने कहा ठीक है......
अब विनय ने अपनी डायरी का पन्ना पलटा और उसे बंद करके मेज़ पर रख दिया। अदिति के साथ हुई मुलाकातों, दोस्तों के साथ बिताए पलों और अनुष्का से मांगी गई माफी के बाद उसके मन में एक हल्कापन था। अब उसके जीवन में पश्चाताप का कोई भारीपन नहीं बचा था, सिवाय एक अनसुलझे सवाल के—मोनिका। आठ साल बीत चुके थे, लेकिन मोनिका का हाल-चाल न जानने का यह खालीपन आज भी उसके भीतर कहीं न कहीं टीस बन कर रह जाता था।
अगली सुबह, जब विनय हमेशा की तरह विल्लुपुरम सिंगल पर बैंक की गाड़ी का इंतज़ार कर रहा था, तभी श्रीधर ने अपनी जीप उसके पास लाकर रोकी। जीप में आगे बैठे बालामुरुगन ने मुस्कुराते हुए कहा, "क्या बात है विनय भाई, आज बहुत दिनों बाद चेहरे पर एक अलग सी गहराई दिख रही है। किस सोच में डूबे हो?"
विनय ने गाड़ी का दरवाज़ा खोलते हुए पीछे वाली सीट पर अपनी जगह ली और हल्के से मुस्कुराकर बोला, "कुछ नहीं बाला, बस कल रात पुराने कुछ पन्नों को पलट रहा था।"
तभी बाला कहता है यार विनय बीते हुए कल को भूल कर आगे बढ़ो लोगों का क्या है आते जाते रहते हैं अपनी जिंदगी की नई शुरूबात करो
उस दिन विनय बैंक का काम जल्दी से खत्म करके रूम पर आके लेट रहा होता है कुछ देर बाद अपना मोबाइल निकाल कर अपने दोस्त मोनू पर कॉल करता है पहली रिंग पर मोनू फोन उठा लेता है और कहता है हेलो बोल भाई विनय आज कैसे इतने दिनों बाद याद आ गई, विनय सुस्ताते हुए बोला कुछ नहीं यार सोचा हाल चाल पूछ लु तेरे और कैसा है तू ठीक है ना तबियत सही है तेरी मोनू ने जवाब दिया हा यार में बढ़िया हु मस्त तू बता तू सही है न विनय बोला हां यार सही हु मैं पर एक बात पूछनी थी तुझे, बता सकता है, मोनू ने कहा बता क्या बात है बोल, विनय ने कहा यार मैने तुझे मोनिका का पता लगाने के लिए बोला था तूने पता लगाया उसका कहा पर है कैसी है वो,, मोनू ने जवाब दिया मैंने बहुत कोशिश की पर उसका कोई अता पता नहीं चला यार मेरी बातचित बन्द है उसके माता पिता से नहीं उनसे ही पूछ लेता में पर तू टेंशन मत कर पता चलेगा तो सबसे पहले तुझे ही बताऊंगा ठीक है
विनय ने कहा ठीक है यार पर मुझे बहुत बैचेनी हो रही है उसकी उसे कुछ हो न गया हो इतने साल हो गए आज तक उसका कोई पता नही चल सका तू जल्दी से पता लगा कर मुझे बताना ओके मोनू ने कहा ठीक है दोस्त और फोन काट दिया,,,
अध्याय: अनसुलझे धागे और नया सवेरा
मोनू से फोन पर बात करने के बाद भी विनय की बेचैनी कम नहीं हुई। रात के सन्नाटे में उसका मन बार-बार उसी सवाल पर आकर अटक जाता था कि आखिर आठ साल में मोनिका कहाँ खो गई? क्या वाकई वक्त हर रिश्ते को धुंधला कर देता है, या कुछ निशान कभी नहीं मिटते? इन तमाम उलझनों के बीच अगली सुबह फिर से बैंक के काम का सूरज लेकर आ गई।
विल्लुपुरम सिंगल पर एक नया दिन
अगले दिन सुबह विनय हमेशा की तरह समय से पहले 'विल्लुपुरम सिंगल' पर पहुँच गया। हवा में हल्की सी ठंडक थी और तमिलनाडु की सड़कें धीरे-धीरे अपनी रफ्तार पकड़ रही थीं। कुछ ही पलों में श्रीधर अपनी एटीएम गाड़ी लेकर वहाँ आ पहुँचा और हमेशा की तरह मुस्कुराते हुए गाड़ी रोकी। आगे की सीट पर बैठे बालामुरुगन ने खिड़की से सिर निकालकर चुटकी ली, "क्या बात है विनय भाई, आज फिर किसी पुरानी याद के सहारे हो या आज कोई नया सरप्राइज मिलने वाला है?"
विनय ने गाड़ी का दरवाज़ा खोला और पीछे बैठकर मुस्कुराते हुए कहा, "ऐसी कोई बात नहीं है बाला, बस यूं ही थोड़ा मन शांत था। चलो, आज का काम समय पर पूरा करना है। गाड़ी में उनके साथ पीछे अरविन्द भी बैठा था, जो बक्से को ठीक से व्यवस्थित कर रहा था। श्रीधर ने गाड़ी स्टार्ट की और बैंक की ओर बढ़ा दी। रास्ते भर श्रीधर और बालामुरगन की वही पुरानी हँसी-मज़ाक और नोक-झोंक चलती रही, जिससे विनय का मन भी हल्का होने लगा।
बैंकों का सफर और अदिति का संदेश
उस दिन बैंक के कई अलग-अलग एटीएम में कैश लोड करना था। काम काफी व्यस्तता भरा था, इसलिए विनय पूरा दिन अपने काम में ही केंद्रित रहा। पिछले कुछ हफ़्तों में अदिति के साथ हुई मुलाकातों और उससे दिल की बातें साझा करने के बाद विनय के भीतर एक मानसिक ठहराव आ चुका था। वह अब अतीत के गम में घुटने के बजाय वर्तमान की हकीकत को स्वीकार करना सीख गया था।
शाम को जब काम खत्म करके वे लोग वापस लौट रहे थे, तभी विनय के फोन पर एक नोटिफिकेशन चमका। स्क्रीन पर अदिति का मैसेज था:
"विनय, क्या आज शाम को उस पुरानी कॉफी शॉप पर मिल सकते हैं? तुमसे कुछ जरूरी और अच्छी बातें साझा करनी हैं।"
मैसेज पढ़कर विनय के चेहरे पर एक स्वाभाविक मुस्कान तैर गई। उसने तुरंत रिप्लाई किया, "हाँ बिल्कुल, बैंक का काम निपटाकर मैं वहीं पहुँचता हूँ। गाड़ी जब विनय के कमरे के पास पहुँची, तो उसने अपने दोस्तों से कहा कि उसे थोड़ा काम है, इसलिए वह थोड़ी देर से लौटेगा। बालामुरुगन ने आँख दबाते हुए मज़ाकिया अंदाज़ में कहा, "ठीक है भाई, जाओ... आजकल तुम्हारे रास्ते वैसे भी किसी और ही मंजिल की तरफ मुड़ जाते हैं!"
कॉफी शॉप की वह शाम
तय समय के अनुसार विनय जब उस परिचित कॉफी शॉप में दाखिल हुआ, तो अदिति कोने वाली मेज़ पर बैठी उसका इंतज़ार कर रही थी। उसके सामने कॉफी का कप रखा था और हाथ में वही पुरानी डायरी थी। विनय को देखते ही अदिति ने हाथ उठाया।
विनय जाकर उसके सामने बैठ गया और थोड़ा सांस लेते हुए बोला, "क्षमा करना, थोड़ा विलंब हो गया... बैंक का काम आज कुछ ज्यादा ही फैल गया था। कहो, सब ठीक तो है?"
अदिति ने अपनी डायरी बंद की, कप को थोड़ा सरकाया और कहा, "सब कुछ बहुत अच्छा है, विनय। दरअसल, मैं तुमसे यह कहने आई थी कि मेरा वह प्रोजेक्ट यहाँ पूरा हो चुका है, और अब मुझे अगले सप्ताह अपने शहर वापस लौटना होगा। लेकिन जाने से पहले मैं चाहती थी कि हम इस सफर के आखिरी पड़ाव को किसी खूबसूरत याद में बदल दें।"
विनय एक पल के लिए खामोश हो गया। सुरभि के जाने का वह दर्द जो कुछ समय पहले उसने झेला था, एक बार फिर से उसकी यादों में कौंध गया। लेकिन इस बार उसके मन में डर या घबराहट नहीं थी। उसने अदिति की आँखों में देखा और बहुत ही सहजता से उत्तर दिया, "अदिति, मैंने अपनी ज़िंदगी में बहुत से लोगों को आते और जाते देखा है। मोनिका एक अधूरी याद थी, सुरभि वर्तमान का एक खूबसूरत एहसास थी, और तुम... तुम वह रोशनी हो जिसने मुझे यह सिखाया कि राือนियों का अंत सफर का अंत नहीं होता। तुम अपने शहर जरूर जाओ, लेकिन मेरे दिल में और इस डायरी के पन्नों में तुम्हारी जगह हमेशा रहेगी।
अदिति की आँखें नम हो गईं। उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया और विनय के हाथ पर अपना हाथ रख दिया। वह स्पर्श बहुत ही पवित्र और सुकून देने वाला था।
वर्तमान की हकीकत और आगे का रास्ता
कॉफी शॉप से निकलने के बाद जब विनय अपने कमरे की तरफ पैदल लौट रहा था, तो तमिलनाडु की रात का मौसम बहुत सुहाना हो चुका था। हवा में हल्की सी नमी थी और आसमान में तारे टिमटिमा रहे थे। उसने जेब में हाथ डाला तो उसका फोन वाइब्रेट हुआ। स्क्रीन पर मोनू का नाम जगमगा रहा था।
विनय ने बिना एक सेकंड गंवाए तुरंत कॉल रिसीव की और उत्सुकता से पूछा, "हेलो मोनू! बोल भाई, क्या कोई खबर मिली मोनिका की? तूने पता किया कुछ?"
फोन के दूसरे छोर पर मोनू ने थोड़ा गंभीर होते हुए कहा, "देख विनय, मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर ली है। उसके पुराने आस-पड़ोस में भी पता किया, पर किसी के पास कोई पुख्ता जानकारी नहीं है। सब यही कहते हैं कि परिवार वाले बहुत पहले ही शहर छोड़कर कहीं और शिफ्ट हो गए थे। भाई, अब तुझे भी खुद को थोड़ा संभालना चाहिए। आठ साल बहुत लंबा समय होता है। जो इंसान अपनी मर्जी से या हालात के कारण दूर हो गया, उसके पीछे अपनी वर्तमान जिंदगी को दांव पर मत लगा। अगर कभी कुछ पता चला भी, तो सबसे पहले तुझे ही बताऊंगा, यह मेरा वादा है। भरोसा रख मुझ पर।"
मोनू की बातें सुनकर विनय को एक अजीब सा झटका भी लगा और एक आंतरिक शांति भी। उसने गहरी सांस ली, आसमान की तरफ देखा और कहा, "ठीक है यार मोनू, जैसा तुझे ठीक लगे... शुक्रिया। जब जानकारी मिले तो बता देना। अब मैं समझ गया हूँ कि कुछ सवालों के जवाब वक्त पर ही छोड़ देने चाहिए."
फोन काटकर जब विनय अपने कमरे के अंदर आया, तो उसने पंखा ऑन किया, पानी का एक गिलास पिया और अपनी उस पुरानी डायरी को मेज़ पर रख दिया। उसने डायरी का वह आखिरी पन्ना खोला जिस पर उसने कुछ दिन पहले लिखा था—"स्वीकार, शांति, शुरुआत"।
उसने पेन उठाया और उसके नीचे एक अंतिम पंक्ति और जोड़ दी:
"अतीत कितना भी गहरा क्यों न हो, वह आपके आज को कैद नहीं कर सकता। मोनिका मेरी रूह का एक कोना है, सुरभि और अदिति मेरा वर्तमान हैं, और यह खुला हुआ आसमान मेरा भविष्य।"
डायरी बंद करके उसने उसे दराज के भीतर सुरक्षित रख दिया। अब उसके दिल में कोई बोझ नहीं था, कोई अधूरापन नहीं था। वह समझ चुका था कि जिंदगी का सफर किसी एक मंजिल या किसी एक इंसान के रुक जाने से नहीं थमता। सुबह फिर नया सूरज उगने वाला था,
और कुछ ऐसा होने वाला था जो विनय ने कभी सोचा भी नहीं था अगले दिन मोनू का फिर से फोन आया और इस बार उसकी आवाज में बहुत ही गम्भीर स्वर था मोनू ने कहा विनय मुझे आज मोनिका के बारे में एक बात पता चली है जिसे सुनकर तेरे दिल को बहुत बड़ा झटका लग सकता है यार पर तू हिम्मत करके मेरी बात सुन
जब मोनू ने फोन पर यह कहा कि दिल को बहुत बड़ा झटका लग सकता है, तो विनय की सांसें एक पल के लिए थम गईं। उसके हाथ से पानी का गिलास छूटते-छूटते बचा। कमरे का सन्नाटा अचानक चीखता हुआ सा महसूस होने लगा। विनय ने कांपती आवाज़ में फोन के स्पीकर पर हाथ कसते हुए कहा, "मोनू, पहेलियाँ मत बुझाओ यार! जो भी है, साफ-साफ बताओ। क्या हुआ है मोनिका को?"
फोन के दूसरे छोर पर मोनू ने एक लंबी और भारी साँस ली और कहा, "विनय, भाई... बहुत हिम्मत जुटाकर यह बात बता रहा हूँ। आज मुझे उसकी एक पुरानी दोस्त के जरिए पता चला कि... कि आज से कुछ साल पहले, जब उसके घर वाले शहर छोड़कर गए थे, तो असल में कोई सामान्य शिफ्टिंग नहीं थी। मोनिका अंदर ही अंदर किसी बहुत गंभीर बीमारी से जूझ रही थी। उसके घरवालों ने यह बात सबसे छिपाई थी, यहाँ तक कि तुमसे भी इसलिए दूरी बनाई थी ताकि तुम उसकी इस तकलीफ को देखकर अंदर से टूट न जाओ।"
विनय का पूरा शरीर जैसे सुन्न पड़ गया। उसके कान सुंन हो गए और आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा। उसने चीखते हुए कहा, "नहीं... यह झूठ है! वो तो बस मुझसे खफा थी, इसीलिए चली गई थी! ऐसा कैसे हो सकता है?"
मोनू ने भारी मन से आगे कहा, "विनय, सच कड़वा होता है। उस बीमारी की वजह से... और वक्त पर इलाज न मिल पाने या जो भी ऊपर वाले की मर्जी रही हो, आज से ठीक उसकी शादी के 2 साल बाद ही मोनिका इस दुनिया को हमेशा के लिए छोड़कर जा चुकी है।"
फोन का स्पीकर जैसे बहरा हो गया हो। विनय के हाथ से फोन फिसलकर जमीन पर गिर गया। उसकी दुनिया एक सेकंड में बिखर चुकी थी। वह ज़मीन पर घुटनों के बल बैठ गया। आठ साल से जिस उम्मीद के सहारे वह जी रहा था, जिस तस्वीर को उसने दिल के सबसे महफूज कोने में सजा रखा था, वह आज एक झटके में हमेशा के लिए छिन चुकी थी। उसके मुँह से कोई आवाज़ नहीं निकल रही थी, बस आँखों से आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा था।
कमरे की दीवारें उसे अपने आगोश में भींचती हुई महसूस हुईं। उसे वो सारे पल याद आने लगे जब मोनिका ने कहा था—“कभी मुझे छोड़कर मत जाना...” और उसने हंसकर टाल दिया था। आज सचमुच वह हमेशा के लिए दूर हो चुकी थी, इतनी दूर कि चाहकर भी कभी वापस नहीं आ सकती थी।
उसी वक्त उसके कमरे का दरवाजा ज़ोर-ज़ोर से खड़का। बाहर श्रीधर और बालामुरगन खड़े थे। बैंक जाने का वक्त हो चुका था और वे विनय को लेने आए थे। श्रीधर ने दरवाजा खोलते हुए चिल्लाकर कहा, "विनय भाई! अरे सो रहे हो क्या आज? गाड़ी नीचे तैयार है, चलो लेट हो रहे हैं..."
लेकिन कमरे के अंदर का नज़ारा देखकर श्रीधर और बालामुरगन की बोलती बंद हो गई। विनय ज़मीन पर सिर झुकाए फूट-फूट कर रो रहा था, और सामने बिखरा हुआ मोबाइल पड़ा था। बाला दौड़कर उसके पास आया और उसके कंधे पर हाथ रखकर घबराते हुए पूछा, "क्या हुआ विनय? भाई, क्या बात हो गई? अचानक ऐसा क्या हो गया?"
विनय ने सिसकते हुए, टूटती आवाज़ में बाला की तरफ देखा और सिर्फ इतना कह पाया, "बाला... वो अब इस दुनिया में नहीं है... मेरी मोनिका हमेशा के लिए चली गई..."
श्रीधर भी सन्न रह गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या कहे। बालामुरगन ने एक बड़े भाई की तरह विनय को अपने सीने से लगा लिया। उस वक्त विल्लुपुरम की उन दीवारों के बीच, उस तमिल धरती पर, विनय का रोना सिर्फ एक प्रेमी का रोना नहीं था, बल्कि उसके आठ साल के उस इंतजार और उम्मीद का अंत था, जिसे उसने अपनी सांसों में जीया था।
कुछ देर तक कोई कुछ नहीं बोला। कमरे में सिर्फ विनय की सिसकियों की आवाज़ गूँजती रही। फिर बाला ने धीमे से उसके कंधे को सहलाते हुए कहा, "विनय... भाई, खुद को संभाल। अगर आज वह इस दुनिया में नहीं है, तो क्या हुआ? उसकी यादें, उसका प्यार तो तेरे अंदर जिंदा है ना? तू ऐसे टूट जाएगा तो उसकी आत्मा को कहाँ सुकून मिलेगा?"
श्रीधर ने भी पानी का गिलास आगे बढ़ाते हुए कहा, "हाँ विनय भाई, बाला सर ठीक कह रहे हैं। सुरभि, अदिति, हम सब... तेरे ये दोस्त तेरे साथ हैं। भाई को इस तरह टूटा हुआ नहीं देख सकते हम।"
विनय ने अपनी नम आँखें उठाईं और खिड़की के बाहर देखा। बाहर तमिलनाडु का वही चमकीला आसमान था, वही पहाड़ थे और हवा का वही झोंका था। उसे अचानक महसूस हुआ कि मोनिका अब किसी बीमारी या दर्द में नहीं है, वह अब पूरी तरह आजाद है—शायद उन बादलों में, शायद उन पहाड़ों की शांति में।
उसने धीरे से खुद को संभाला, बाला के हाथ से पानी का गिलास लिया और एक घूंट पिया। उसने अपनी डायरी उठाई, जिसका पन्ना खुला हुआ था। उसने पेन उठाया और मोनिका के नाम के आगे आज की तारीख लिखकर सिर्फ इतना लिखा:
"अलविदा, मोनिका। तुम मेरी रूह का वो हिस्सा हो जो कभी नहीं मिटेगा, और अब तुम हर दर्द से आजाद हो।"
विनय ने डायरी बंद की, एक गहरी और भारी सांस ली और अपने दोस्तों की तरफ देखकर एक बेहद कमजोर, लेकिन संकल्प से भरी मुस्कान दी। उसने समझ लिया था कि ज़िंदगी रुकती नहीं है। गम का पहाड़ बहुत बड़ा था, लेकिन उसके कंधे अब उस गम को एक खूबसूरत याद बनाकर उठाने के लिए तैयार हो चुके थे।
वह उठा, अपने जूते पहने और अपने दोस्तों के साथ कमरे से बाहर निकल आया। विल्लुपुरम सिंगल पर गाड़ी इंतजार कर रही थी।
कमरे से बाहर निकलकर विनय जब श्रीधर और बालामुरगन के साथ एटीएम गाड़ी की तरफ बढ़ा, तो सुबह की धूप थोड़ी भारी और तीखी लग रही थी। विल्लुपुरम सिंगल पर गाड़ी रुकी, तो हवा का एक ठंडा झोंका उसके चेहरे से टकराया। हमेशा की तरह आज श्रीधर ने कोई मज़ाक नहीं किया और बालामुरगन भी खामोश था। वे दोनों समझ रहे थे कि विनय के भीतर इस समय क्या उथल-पुथल मची हुई है।
गाड़ी बैंक की तरफ बढ़ रही थी। खिड़की से बाहर देखते हुए विनय की आँखें नम थीं, लेकिन अब उन आँखों में आंसुओं के साथ एक अजीब सी स्थिरता भी आ चुकी थी। आठ साल का वह लंबा इंतजार, वह अधूरा सवाल और वह अनसुलझी बेचैनी—आज एक बड़े झटके के साथ शांत हो चुकी थी। मोनिका अब इस दुनिया में नहीं थी, यह सच उसके दिल पर किसी पत्थर की तरह भारी था, लेकिन साथ ही यह अहसास भी था कि अब वह हर तरह के दर्द और बीमारी से आजाद हो चुकी थी।
बैंक पहुँचकर विनय ने अपने काम में पूरी तरह खुद को झोंक दिया। कैश लोड करना, एंट्री करना, ग्राहकों से बात करना—सब कुछ उसने यंत्रवत् किया, लेकिन उसका मन पूरी तरह शांत था। काम के दौरान जब दोपहर हुई, तो अदिति का एक मैसेज उसके फोन पर आया:
"विनय, मुझे पता चला है कि तुम आज कुछ परेशान हो। भले ही मैं यहाँ से जा रही हूँ, लेकिन एक दोस्त के नाते मैं चाहती हूँ कि तुम खुद को टूटने मत देना। मोनिका तुम्हारी यादों की वह खूबसूरत किताब है, जिसे बंद किया जा सकता है, पर जलाया नहीं जा सकता। अपना ख्याल रखना।"
मैसेज पढ़कर विनय के चेहरे पर एक बहुत हल्की सी, लेकिन सच्ची मुस्कान आ गई। उसे लगा कि जिंदगी ने भले ही उससे उसका सबसे पुराना सपना छीन लिया हो, लेकिन उसने उसे ऐसे लोग जरूर दिए हैं जो इस मुश्किल वक्त में उसका हाथ थामे हुए हैं।
शाम ढलने लगी थी। बैंक का काम खत्म करके जब वे चारों वापस लौट रहे थे, तो रास्ते में वही पहाड़ और लंबी सड़कें दिखाई दे रही थीं, जहाँ से इस पूरी यात्रा की शुरुआत हुई थी। श्रीधर ने गाड़ी को थोड़ा धीमा किया और पीछे मुड़कर विनय से बोला, "विनय भाई, आज मूड कैसा है? अगर मन न हो तो सीधा रूम छोड़ दें?"
विनय ने खिड़की से बाहर आसमान की तरफ देखा, जहाँ सूरज बादलों के पीछे अपनी आखिरी किरणें छोड़ रहा था। उसने एक लंबी सांस ली और दृढ़ स्वर में कहा, "नहीं श्रीधर, रूम पर नहीं... आज उस झील के पास चलते हैं, जहाँ सुरभि के साथ गया था।"
बालामुरगन ने आगे से मुड़कर मुस्कुराते हुए कहा, "चल भाई, जैसा तू कहे!"
गाड़ी उन कच्चे रास्तों और घुमावदार पहाड़ियों की तरफ मुड़ गई। कुछ ही देर में वे सब उस शांत झील के किनारे पहुँच गए। चारों तरफ सन्नाटा था और पानी में ढलते हुए सूरज की लालिमा तैर रही थी। विनय गाड़ी से उतरा और झील के किनारे जाकर चुपचाप खड़ा हो गया।
उसने अपनी जेब से वह पुरानी डायरी निकाली। डायरी का वह पन्ना खोला जिस पर उसने मोनिका की मौत की खबर के बाद "अलविदा" लिखा था। उसने पेन निकाला और उसके नीचे कुछ पंक्तियाँ और जोड़ीं:
"आज मैंने अपनी जिंदगी के सबसे बड़े सच को स्वीकार कर लिया है। मोनिका, तुम मेरी पहली मोहब्बत थीं, मेरी रूह का वो हिस्सा जो कभी धुंधला नहीं होगा। लेकिन अब मैं समझ गया हूँ कि किसी की यादों में घुटकर जीना प्यार नहीं, बल्कि खुद को सजा देना है। सुरभि ने मुझे वर्तमान जीना सिखाया, अदिति ने मुझे अतीत के बोझ से आजाद होना सिखाया, और मेरे इन यारों ने मुझे अकेलेपन में बिखरने नहीं दिया। मैं अब एक 'जिंदा लाश' नहीं हूँ। मैं विनय हूँ—जो दर्द को सहना भी जानता है और मुस्कुराना भी।"
डायरी बंद करके उसने उसे अपने सीने से लगाया और एक लंबी राहत की सांस ली। उसके भीतर का वह बर्फ का पहाड़, जो सालों से जमा हुआ था, आज पूरी तरह पिघल चुका था। उसकी आँखें नम जरूर थीं, लेकिन दिल हल्का हो चुका था।
पीछे से बालामुरगन और श्रीधर भी चाय के दो डिस्पोजेबल कप लेकर आ गए। श्रीधर ने एक कप विनय की तरफ बढ़ाते हुए कहा, "लो भाई, चाय पियो। ठंडी हो रही है।"
विनय ने मुस्कुराकर कप थाम लिया। उसने अपने दोनों दोस्तों को देखा और फिर दूर क्षितिज पर फैलते हुए अंधेरे और आसमान के तारों को निहारा। उसे अब किसी बात का डर नहीं था। न भविष्य की कोई चिंता थी और न ही अतीत का कोई पछतावा।
जिंदगी अभी रुकी नहीं थी। रास्ते अभी और लंबे थे, मोड़ अभी और बाकी थे, और सफर... सफर तो अभी भी जारी था।
कुछ दिनों बाद अदिति अपने शहर प्रयागराज के लिए रवाना हो गई, जाने से पहले उसने विनय को एक छोटा सा खत भेजा जिसमें लिखा था—"विनय, अपने सफर को कभी मत रोकना। तुम्हारी कहानी अभी बहुत बाकी है।" विनय ने उस खत को संभाल कर अपनी उसी डायरी में रख दिया।
समय अपनी रफ्तार से चलता रहा। जुलाई और अगस्त के महीने बीतते गए। विनय ने बैंक के अपने काम में और अधिक मन लगाना शुरू कर दिया। अब वह सिर्फ एक कर्मचारी नहीं, बल्कि अपने सहकर्मियों का सच्चा साथी बन चुका था। जिम की कसरत अब उसके शरीर को नहीं, बल्कि उसके आत्मविश्वास को मजबूत करती थी
समय अपनी सामान्य रफ्तार से बह रहा था। तमिलनाडु की धूप अब विनय को जलाती नहीं थी, बल्कि उसे ऊर्जा देती थी। विल्लुपुरम की उन सड़कों पर जब वह श्रीधर और बालामुरुगन के साथ निकलता, तो उसके भीतर एक अलग ही ठहराव और आत्मविश्वास होता था। मोनिका की मौत का गम अपनी जगह था, लेकिन अब वह गम उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी ताकत बन चुका था। उसके दिल में यह अहसास पक्का हो चुका था कि जिंदगी रुकती नहीं है; वह बस रूप बदलती है।
एक शाम, जब बैंक का काम खत्म करके विनय अपने कमरे में लौटा, तो उसने अपनी अलमारी के सबसे निचले खाने से वह पुरानी डायरी निकाली, जिसमें उसने अपने जीवन के हर उतार-चढ़ाव, मोनिका की यादें, सुरभि के साथ बिताए वो अनजाने पल, और अदिति से सीखी हुई समझदारी को सहेजा था। पन्ने पलटते-पलटते उसकी नजर उन तमाम एहसासों पर पड़ी, जिन्हें उसने खून-पसीने और आंसुओं से सींचा था।
तभी उसके मन में एक ख्याल आया—क्यों न इस डायरी के पन्नों को एक किताब का रूप दिया जाए? यह सिर्फ उसकी कहानी नहीं थी, बल्कि हर उस इंसान की कहानी थी जो कभी न कभी टूटकर फिर से खड़ा होता है।
उसने पेन उठाया और लिखना शुरू किया। रातें बीतती गईं, महीनों का सफर तय हुआ। विनय ने अपनी नौकरी के साथ-साथ इस किताब को अपना नया मकसद बना लिया। वह रोज बैंक से आने के बाद घंटों लिखता। उसकी इस खामोश मेहनत में उसके दोस्त—बाला और श्रीधर—भी उसका पूरा साथ देते थे। जब भी वे देखते कि विनय लिखने में व्यस्त है, श्रीधर बिना शोर मचाए चाय का कप उसके टेबल पर चुपचाप रख जाता और बाला प्यार से कहता, "लिखो भाई, तुम्हारी यह कहानी दुनिया तक पहुँचनी चाहिए।"
लगभग छह महीने की कड़ी मेहनत के बाद, विनय की वह किताब पूरी हो गई। उसने किताब का नाम रखा— "एक प्यार की अधूरी दास्तां: एक किराएदार ऐसा भी,,
किताब पूरी होने के बाद, विनय ने सबसे पहले अपनी बहन पिंकी और पुरानी दोस्त अनुष्का को उसकी डिजिटल कॉपी भेजी, जिससे उसने पहले माफी मांगी थी। कुछ ही दिनों में अनुष्का का रिप्लाई आया। उसने लिखा था, "विनय, मैंने इसे एक ही सांस में पढ़ डाला। यह सिर्फ एक किताब नहीं, किसी की रूह का दस्तावेज है। मुझे गर्व है कि मैं इस सफर का एक छोटा सा हिस्सा रही। इसे तुरंत पब्लिश करवाओ!"
अनुष्का के उन शब्दों ने विनय को और अधिक हौसला दिया। और विनय की बहन पिंकी ने तो तब उसका हौसला बढ़ाया था जब उसने एक पेज लिखकर उसके पास भेजा था पिंकी ने कहा तेरी ये कहानी बहुत अच्छी है इसे तू आगे लिख मैं तेरे साथ हूं उन शब्दों ने विनय को और अधिक हौसला दिया। और फिर विनय ने एक अच्छे पब्लिकेशन हाउस से संपर्क किया। उसकी कहानी में जो सच्चाई, दर्द और जीवन का जो दर्शन था, उसने पब्लिशर का दिल जीत लिया। कुछ ही हफ्तों में किताब छपकर बाजार में आ गई।
जब उस किताब की पहली प्रति विनय के हाथों में आई, तो उसकी आँखें भर आईं। उसने किताब के पहले पन्ने पर मोनिका, सुरभि, अदिति और अपने उन दोनों यारों—बाला और श्रीधर—का जिक्र करते हुए लिखा था: "यह किताब उन सबको समर्पित है, जिन्होंने मुझे सिखाया कि गिरना अंत नहीं है, बल्कि संभलकर उड़ना सीखना ही असली जिंदगी है।"
विल्लुपुरम में इस बात का जश्न मनाना तो बनता था! उस रविवार बैंक की छुट्टी थी। श्रीधर ने अपनी जीप को फूलों और गुब्बारों से सजा दिया। बालामुरुगन ने शहर के एक अच्छे रेस्टोरेंट में छोटी सी पार्टी का आयोजन किया।
पार्टी में जब श्रीधर ने हाथ में किताब उठाई और मज़ाकिया अंदाज में कहा, "अरे हमारे आशिक'विनय' भाई ने तो सच में किताब छाप दी! अब तो हमें ऑटोग्राफ लेना पड़ेगा," तो पूरा रेस्टोरेंट ठहाकों से गूँज उठा। विनय भी हँसे बिना नहीं रह सका। उसने अपने दोनों दोस्तों को गले से लगा लिया और कहा, "अगर तुम दोनों उस गाड़ी में मुझे हँसाते नहीं, तो शायद मैं कभी यह लिख ही नहीं पाता।"
किताब को पाठकों का बहुत प्यार मिलने लगा। सोशल मीडिया और साहित्यिक मंचों पर उसकी चर्चा होने लगी। कई जगहों से विनय के पास इंटरव्यू के लिए मेल आने लगे। एक साधारण बैंक कर्मचारी से लेकर एक लेखक बनने तक का यह सफर विनय के लिए किसी सपने जैसा था।
एक दिन, जब विनय विल्लुपुरम सिंगल पर हमेशा की तरह गाड़ी का इंतजार कर रहा था, तो उसने आसमान की तरफ देखा। सूरज की सुनहरी किरणें बादलों को चीरती हुई बाहर आ रही थीं। उसके हाथ में उसकी अपनी छपी हुई किताब थी।
उसने मन ही मन सोचा, "मोनिका, तुम आज यहाँ नहीं हो, लेकिन तुम्हारी याद ने मुझे वह बना दिया जो मैं आज हूँ।"
गाड़ी आकर रुकी। बालामुरुगन ने खिड़की से सिर निकालकर आवाज लगाई, "क्या साहब, लेखक महोदय! आज बैंक चलना है या विल्लुपुरम के पहाड़ों पर साइनिंग कैंप लगाना है?"
विनय खुलकर हँसा, दरवाजा खोलकर पीछे की सीट पर बैठा और बोला, "चलो गाड़ी आगे चल दी
किताब के प्रकाशन और उसकी अपार सफलता के बाद विनय की ज़िंदगी का दायरा और अधिक विस्तृत हो चुका था। अब वह सिर्फ तमिलनाडु के एक बैंक में कैश लोड करने वाला साधारण कर्मचारी नहीं था, बल्कि देश के कई हिस्सों के युवा लेखकों और पाठकों के लिए एक प्रेरणा बन चुका था। उसके पास अक्सर देश भर से पाठकों के पत्र और ईमेल आते थे, जिनमें लोग अपनी अधूरी प्रेम कहानियों और उससे उबरने के अनुभवों को साझा करते थे। विनय हर एक पत्र को बड़े ध्यान से पढ़ता और उन्हें तसल्ली से जवाब भी देता था, क्योंकि वह अच्छी तरह जानता था कि दर्द को समझ पाना और उसे स्वीकार करना कितना मुश्किल होता है।
एक दिन, जब विनय बैंक के काम से फ्री होकर अपने कमरे में लौटा, तो उसके फोन पर एक प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका के संपादक का मेल आया। मेल में उसे चेन्नई में आयोजित होने वाले एक बड़े लिटरेचर फेस्टिवल (साहित्यिक उत्सव) में मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया था। विषय था— "अतीत के साये से वर्तमान की रोशनी तक: एक लेखक का सफर।"
जब विनय ने यह मेल अपने दोस्तों को दिखाया, तो श्रीधर की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। श्रीधर ने ताली बजाते हुए कहा, "अरे वाह विनय भाई! अब तो हमारे बैंक वाले दोस्त सेलिब्रिटी बन गए हैं! हमें भी अपने साथ चेन्नई लेकर चलना, वहाँ बड़े-बड़े लोग आएंगे।" बालामुरुगन ने भी गर्व से विनय के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, "तू इस सम्मान का हकदार है भाई। तूने अपनी मेहनत और अपनी सच्चाई से यह मुकाम हासिल किया है।"
चेन्नई के उस लिटरेचर फेस्टिवल का दिन आ गया। हॉल खचाखच भरा हुआ था। जब मंच पर विनय का नाम पुकारा गया, तो तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा कमरा गूँज उठा। विनय ने मंच पर कदम रखा, माइक के सामने खड़ा हुआ और सामने बैठे सैकड़ों चेहरों को देखा। उसने बिना किसी बनावटी भाषण के अपनी कहानी बयां करनी शुरू की—एक छोटे से शहर से तमिलनाडु की अनजान सड़कों तक का सफर, एटीएम गाड़ी में काम करते हुए दोस्तों का साथ पाना, सुरभि और अदिति के जरिए ज़िंदगी के नए रंगों को देखना, और अंत में मोनिका की यादों को एक खूबसूरत मुकाम देकर खुद को आजाद करना।
उसकी सादगी और उसकी बातों में छिपी सच्चाई ने वहां बैठे हर शख्स को भावुक कर दिया। जब उसका सत्र समाप्त हुआ, तो कई लोग हस्ताक्षर के लिए उसकी किताब लेकर लाइन में खड़े हो गए। उसी भीड़ में से एक जाना-पहचाना चेहरा आगे आया। वह कोई और नहीं, बल्कि प्रयागराज से अपनी किसी कार्यशाला के सिलसिले में चेन्नई आई हुई अदिति थी।
अदिति को सामने देखकर विनय की आँखें खुशी से चमक उठीं। उसने अपनी सीट से उठकर अदिति को गले लगा लिया। अदिति ने मुस्कुराते हुए कहा,
"मैंने कहा था न विनय, कि तुम्हारी कहानी अभी बहुत बाकी है। आज तुम्हें इस मंच पर देखकर मुझे बेहद गर्व महसूस हो रहा है।"
फेस्टिवल के बाद, विनय, अदिति, श्रीधर और बालामुरुगन—जो विशेष रूप से विनय का यह पल देखने चेन्नई आए थे—सबने मिलकर एक छोटी सी पार्टी की। पुरानी यादें ताज़ा हुईं, हँसी-मज़ाक हुआ और सबने एक-दूसरे के भविष्य के लिए शुभकामनाएं दीं।
विल्लुपुरम लौटने के बाद विनय की जिंदगी फिर से अपनी सामान्य रफ्तार में आ गई, लेकिन अब उस रफ्तार में एक अलग ही ठहराव और सुकून था। सुबह बैंक की नौकरी, शाम को जिम का अनुशासन, दोस्तों का साथ, और रात को नए पन्नों पर अपनी कला को उकेरना—यही उसकी दुनिया थी।
एक शाम, जब वह विल्लुपुरम सिंगल पर गाड़ी का इंतज़ार कर रहा था, तो उसने आसमान में ढलते सूरज को देखा। हवा का एक हल्का झोंका आया। उसने अपनी डायरी खोली, जिसका आखिरी पन्ना अब भी साफ था। उसने पेन उठाया और लिखा:
"जिंदगी न तो कोई शिकायत है और न ही कोई पहेली; यह तो बस एक ऐसा खूबसूरत सफर है, जिसे बिना किसी प्लानिंग के पूरी शिष्टता और प्रेम के साथ जिया जाना चाहिए।
समय अपनी अनवरत गति से आगे बढ़ता रहा। चेन्नई के उस सफल लिटरेचर फेस्टिवल के बाद, विनय का जीवन एक नई और संतुलित दिशा में स्थापित हो चुका था। अब विल्लुपुरम की वे सड़कें, जिन पर कभी वह खोया-खोया सा रहता था, उसे अपने ही घर जैसी लगने लगी थीं।
बैंक में उसके काम की निष्ठा और उसकी सादगी को देखते हुए प्रबंधन ने उसे एक बड़ी जिम्मेदारी सौंपते हुए मुख्य शाखा में पदोन्नति (प्रमोशन) दे दी। अब वह केवल कैश लोड करने का काम नहीं देखता था, बल्कि बैंक के प्रशासनिक कार्यों में भी अपनी अहम भूमिका निभा रहा था। उसके सहकर्मी—श्रीधर (जिसे वे प्यार से 'श्रीलंड' कहते थे) और बालामुरुगन—उसकी इस तरक्की से सबसे ज्यादा खुश थे।
एक दिन, जब बैंक का काम समाप्त होने के बाद वे तीनों हमेशा की तरह गाड़ी से लौट रहे थे, तो श्रीधर ने चुटकी लेते हुए कहा, "भाई विनय, अब तो तुम बड़े लेखक बन गए हो, बैंक के मैनेजर भी बनने वाले हो, कहीं ऐसा न हो कि तुम हम गरीबों को भूल जाओ!"
बालामुरुगन ने पीछे से श्रीधर के सिर पर हल्का सा थप्पड़ मारते हुए हँसकर कहा, "अरे मूर्ख, विनय भाई कभी किसी को नहीं भूलते। उनकी सफलता में हमारी भी तो थोड़ी बहुत मस्ती और चाय का योगदान है!"
विनय दोनों की इस प्यारी सी नोक-झोंक को देखकर मुस्कुरा उठा। उसने अपने दोनों दोस्तों के कंधों पर हाथ रखते हुए कहा, "तुम्हें भूलने का मतलब है अपनी उस जड़ को भूल जाना, जिसने मुझे दोबारा जीना सिखाया है। तुम दोनों सिर्फ मेरे सहकर्मी नहीं, मेरा परिवार हो।"
उस शाम, जब विनय अपने कमरे में लौटा, तो उसने महसूस किया कि उसका जीवन अब किसी अधूरेपन का शिकार नहीं है। उसने अपनी उस पुरानी डायरी को खोला, जिसके पन्नों में मोनिका का दर्द, सुरभि का वर्तमान और अदिति का मार्गदर्शन दर्ज था। उसने डायरी के बिल्कुल अंतिम पन्ने पर एक नया और आखिरी अध्याय जोड़ा—
“जिंदगी इम्तिहानों का दूसरा नाम है। जब तक हम अतीत की जंजीरों में बंधे रहते हैं, तब तक हर रास्ता मुश्किल लगता है। लेकिन जैसे ही हम 'स्वीकार' करना सीख जाते हैं, हर ठोकर एक सबक बन जाती है और हर नया दिन एक नया अवसर। आज मैं जहाँ भी हूँ, पूरी तरह से आज़ाद हूँ—अपने कल से भी, और अपनी अनिश्चितिक कल की चिंताओं से भी।”
उसने पेन बंद किया, डायरी को करीने से अपनी मेज़ के दराज में रखा और अपनी खिड़की पूरी तरह खोल दी। बाहर तमिलनाडु की ठंडी और सुहानी हवा उसके कमरे में भर गई। दूर पहाड़ों की ओट से आसमान में तारे टिमटिमा रहे थे। तभी सुरभि का मैसेज आता है उसने लिखा कि विनय क्या कर रहे हो तुम अभी विनय ने फोन उठाया और सुरभि के मैसेज का प्यार भरा जवाब दिया, "बस खिड़की से आसमान देख रहा था और अपनी इस डायरी के आखिरी पन्ने को पूरा कर रहा था." सुरभि ने तुरंत रिप्लाई किया, "तुम्हारी किताब चेन्नई फेस्टिवल वाली मैंने भी पढ़ी, विनय... सच में तुम्हारी इस रूहानी सफर की कहानी ने मेरा दिल जीत लिया." दोनों के बीच फोन पर पुरानी यादों और वर्तमान की खुशियों को लेकर लंबी और मीठी बातें हुईं. कुछ देर बाद सुरभि ने कहा विनय मैंने अपने पापा से बात की है कि मैं एक लड़के से प्यार करती हूं उसी से शादी करूंगी पापा ने पूछा कौन है लड़का क्या करता है तो मैंने तुम्हारे बारे में सब कुछ बता दिया है मेरे पापा भी मान गए हैं अब तुम बताओ क्या तुम मुझसे शादी करोगे
विनय कुछ देर के लिए शांत हो गया फिर विनय ने जवाब दिया देखो सुरभि अभी हमको मिले हुए कुछ ही महीने हुए हैं और हमारी बातें और हमारा रिश्ता भी बहुत आगे बढ़ गया है पर शादी का फैसला इतनी जल्दी नहीं लिया जाता क्योंकि कि विवाह एक ऐसा रिश्ता है जिसे हमे पूरी उम्र निभाना पड़ेगा इस लिए सोच लो सही से और तुम्हें तो मेरे बारे में सब पता है कि मैं पहले ही किसी लड़की से प्यार करता था, मेरे अंदर जितना प्यार था उसी पर लुटा दिया मैंने तो में नहीं चाहता कि मेरी वजह से किसी लड़की की जिन्दगी खराब हो और अगर हम शादी करेंगे भी तो ये समाज हमारे बारे में बहुत गलत सोचेगा क्योंकि मैं एक ब्राह्मण परिवार से हु और तुम ठाकुर खानदान से हो और अगर हमने शादी कर भी ली तो मेरे पास इतना प्यार नहीं है कि मैं तुम्हे दे सकूं तुम मेरे साथ कभी खुश नहीं रह पाओगी तुम्हें मुझसे भी अच्छे लड़के मिलेंगे सुरभि जिन्दगी बहुत बड़ी है ज्यादा बड़ा सवाल तुम्हारी अपनी खुशी का है, और मैं कभी नहीं चाहूंगा कि मेरे साथ जुड़कर तुम्हारा भविष्य किसी समझौते में बदल जाए। कृपया इस बारे में एक बार फिर से ठंडे दिमाग से सोचो।"
संदेश भेजने के बाद विनय का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। उसे लगा कि शायद यह सच बहुत कड़वा था, लेकिन सुरभि के साथई और ईमानदारी बनाए रखने के लिए यह कहना बहुत जरूरी था।
कुछ मिनट बीत गए, लेकिन उधर से कोई रिप्लाई नहीं आया। विनय की बेचैनी बढ़ने लगी। तभी उसके फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर सुरभि का नाम चमक रहा था।
विनय ने थोड़ा संकोच करते हुए कॉल रिसीव की। फोन उठाते ही दूसरी तरफ से सुरभि की शांत और ठहरी हुई आवाज़ आई, "विनय, तुमने इतनी लंबी बातें लिखीं, लेकिन तुमने एक बात पर गौर नहीं किया—प्यार कोई हिसाब-किताब या गणित नहीं है कि किसमें कितना प्यार बचा है और किसे कितना देना है। मैंने तुम्हें इसलिए नहीं चुना कि तुम अतीत से पूरी तरह अछूते हो, बल्कि इसलिए चुना कि तुमने अपने हर दर्द को बहुत खूबसूरती से संभाला है। समाज और जातियों की दीवारें अपनी जगह हैं, लेकिन अगर इंसान खुद अपने दिल की दीवारें खड़ी कर ले, तो फिर कोई क्या कर सकता है? मैं कोई बच्ची नहीं हूँ विनय, मैंने सोच-समझकर ही यह फैसला लिया है। अगर तुम सच में मुझसे दूर भागना चाहते हो, तो अलग बात है, लेकिन अगर वजह सिर्फ तुम्हारा पुराना अतीत या समाज का डर है, तो मैं इन सबका सामना करने के लिए तैयार हूँ। मैं तुम्हें सोचने के लिए वक्त देती हूँ, पर गलत फैसला मत लेना।"
इतना कहकर सुरभि ने फोन काट दिया।
फोन की लाइन कटने के बाद भी उसकी बातें विनय के कानों में गूँजती रहीं। कमरे का सन्नाटा और गहरा हो गया था। विनय अपनी मेज़ के पास गया, जहाँ उसकी वह डायरी रखी थी जिसमें उसने अपने जीवन के हर पड़ाव को दर्ज किया था। उसने डायरी उठाई और उसके पन्नों को पलटने लगा—मोनिका का बिछड़ना, सुरभि का यूं अचानक मिलना और फिर चले जाना, अदिति का मार्गदर्शन, और उसके अपने दोस्तों—बाला और श्रीधर—का बेमिसाल साथ।
विनय के लिखे हुए कुछ पेज.......
कुछ रिश्ते खुशबू जैसे होते हैं। बाँधते ही बासी हो जाते हैं। सुरभि के लिए विनय बासी न हो जाए, इसलिए उनको बार-बार मिलना और बिछड़ना पड़ा। मैं जान-बूझकर यह कहानी अधूरी छोड़ रहा हूँ ताकि आप अपने हिस्से की वो कहानी पूरी कर पाएँ जो कभी किसी कागज पर नहीं छपेगी।
कुछ कहानियाँ लेखक पूरी नहीं करना चाहता क्योंकि वैसी कहानियाँ पूरी होते ही दिल-दिमाग-उँगलियों से हट जाती हैं। जब तक कहानी अधूरी रहती है तब तक लेखक और पाठक की उँगलियाँ उन्हें बार-बार छूने के लिए बेचैन होती रहती हैं। और मेरी कहानी का नाम सुना होगा एक प्यार अधूरी दास्तां... इस लिए मेरी कहानी भी अधूरी है
एक पेज मेरे घर बालों के लिए.....
घर वालो सुनो ना
मेरे अपने परिवार वालों,
आज पहली बार दिल खुलकर कुछ कहना चाहता हूँ।
अगर पिछले कुछ समय से मैं चुप रहने लगा हूँ, अकेला रहने लगा हूँ, या पहले जैसा नहीं रह पा रहा हूँ, तो उसकी वजह ये नहीं कि मुझे किसी की परवाह नहीं है, बल्कि सच ये है कि मैं अंदर से बहुत थक गया हूँ।
कुछ बातें ऐसी हैं, जो किसी से कह नहीं पा रहा हूँ, और कुछ दर्द ऐसे भी हैं, जो धीरे-धीरे मुझे अंदर ही अंदर मार रहे हैं।
हर दिन खुद को संभालने की कोशिश करता हूँ, सबके सामने सामान्य दिखने की भी, लेकिन सच कहूँ तो अब ये लड़ाई अकेले लड़ना मुश्किल लगने लगा है।
अगर कभी मैंने किसी का दिल दुखाया हो, तो मुझे माफ़ कर देना। मेरा इरादा कभी किसी को तकलीफ़ देने का नहीं था।
मुझे बस थोड़ा अपनापन चाहिए था, थोड़ा अपनों का साथ चाहिए था, क्योंकि कभी-कभी इंसान को शब्द नहीं, सिर्फ़ यह अहसास बचा लेता है कि वो अकेला नहीं है।
लेकिन मैं...?
बहुत अकेला हो गया हूँ...
थक चुका हूँ
कभी-कभी ऐसा लगता है कि
मैं बस चल रहा हूँ, जी नहीं रहा।
सबकी उम्मीदों पर खरा उतरते-उतरते
अपनी खुशी कहाँ खो दी,
पता ही नहीं चला।
लोग कहते हैं "मजबूत बनो",
पर कोई ये नहीं पूछता
कि कितना दबाव है अंदर।
हर दिन सामान्य दिखने की कोशिश करता हूँ,
जबकि अंदर सब बिखरा हुआ है।
सबके पास बात करने के लिए लोग हैं,
पर मेरे पास सिर्फ सोचने के लिए
खामोशी है।
कुछ शब्द लड़कियों के लिए....
मैं हर लड़की से बस एक बात कहना चाहता हूँ...
हमसफर कभी सिर्फ अमीर मत चुनना, बल्कि ऐसा इंसान चुनना - जिसका दिल साफ हो, जो आपको समझ सके, आपका ख्याल रखे, आपकी इज्जत करे, और हर परिस्थिति में आपका साथ निभाए।
क्योंकि गरीबी तो मेहनत करके काटी जा सकती है, लेकिन किसी गलत इंसान के साथ पूरी जिंदगी नहीं बिताई जा सकती।
अगर हमसफर सही मिल जाए, तो इंसान जिंदगी की हर मुश्किल जीत लेता है। लेकिन अगर गलत मिल जाए, तो जीते जी इंसान अंदर से हार जाता हैं।
सच तो यही है कि रिश्ते पैसे से नहीं, समझ, सम्मान और सच्चे प्यार से चलते हैं।
बड़े भाई के लिए कुछ शब्द
बड़ा भाई
बड़ा भाई वो शख्स होता है, जो कभी अपने आँसू किसी को नहीं दिखाता।
वो हर दर्द को मुस्कुराकर छुपा लेता है, ताकि घर वालों की मुस्कान बनी रहे।
उसकी जेब भले खाली हो, लेकिन छोटे भाई की ज़रूरत कभी अधूरी नहीं रहने देता।
वो अपनी खुशियों का सौदा कर देता है, सिर्फ़ परिवार की खुशियों के लिए।
कभी डाँटता है, तो कभी गले लगाकर सारी परेशानियाँ भुला देता है।
पिता के बाद अगर कोई सबसे मज़बूत सहारा है, तो वो बड़ा भाई ही होता है।
जिसके सिर पर बड़े भाई का हाथ हो, उसे दुनिया की आधी परेशानियों से डर नहीं लगता।
रब हर किसी को ऐसा बड़ा भाई दे, जो रिश्ता नहीं... पूरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी दौलत हो।
कुछ शब्द मेरे पापा जी के लिए ....
मेरे पापा ने भले ही बड़ा महल नही बनाया, लेकिन उन्होंने मुझे, इतना प्यार, सम्मान और संस्कार दिए हैं कि दुनिया का हर महल भी उनके सामने छोटा लगता है।
मेरे लिए मेरे पापा ही मेरी सबसे बड़ी दौलत हैं।
“महल बनाने वाले बहुत मिल जाएंगे, लेकिन अपनी औलाद के सपनों को अपने पसीने से सींचने वाले पिता बहुत कम होते हैं।
मुझे अपने पापा पर हमेशा गर्व रहेगा।”
क्या हुआ आज वो मेरे साथ नहीं हैं तो उनके दिए हुए संस्कार तो है मेरे पास miss you पापा
कुछ शब्द अपने दोस्तों के लिए....
जब मैं नहीं रहूँगा...
देखतो... आज मैं ज़िंदा हूँ, तो मुझे कोई पूछता तक नहीं।
मैरी बातों की कोई कीमत नहीं, मेरे होने का कोई मतलब नहीं।
लेकिन याद रखना... जिस दिन मैं इस दुनिया से चला जाऊंगा ना, उसी दिन मेरी कमी तुम्हें महसूस होगी।
तब तुम कहोगे "यार, वो इंसान अच्छा था..."
"हमसे कितनी इज़्ज़त से बात करता था..."
"दिल का साफ था..."
कोई ये भी बोलेगा "जैसा भी था... लेकिन सच्चा इंसान था..."
पर सच क्या है जानते हो ? ये सब बातें तब होंगी... जब मैं सुनने के लिए यहाँ नहीं रहूँगा।
इसलिए आज कह रहा हूँ अगर मैं ज़िंदा हूँ, तो कम से कम इंसान समझकर बात कर लिया करो। क्योंकि बाद में याद करने से बेहतर है, आज थोड़ा सा साथ दे देना...
क्योंकि वक्त और इंसान...
दोनों वापस नहीं आते...
"मैं लोगों से नहीं, उनके शोर से दूर हूँ"
लोग समझते हैं कि मुझे लोगों से बात करना पसंद नहीं, कि मैं घमंडी हूँ, या दुनिया से कटा हुआ कोई अजीब-सा इंसान।
पर सच इतना-सा नहीं है।
मैंने बचपन से देखा है, लोग शब्दों से कम, मतलबों से ज़्यादा बातें करते हैं। हर मुस्कान में अपनापन नहीं होता, हर हाल-चाल में फ़िक्र नहीं होती।
मैंने कोशिश की थी भीड़ का हिस्सा बनने की, लोगों जैसा होने की, बेवजह हँसने की, हर बातचीत में शामिल होने की। मगर हर बार कुछ देर बाद ऐसा लगा जैसे मैं किसी और का किरदार निभा रहा हूँ।
मुझे थका देती हैं वे बातें जिनका कोई अर्थ नहीं होता, वे रिश्ते जिनमें सच्चाई नहीं होती, वे मुलाक़ातें जिनमें दिल नहीं, सिर्फ़ औपचारिकताएँ मिलती हैं।
इसलिए मैं लौट आता हूँ अपने भीतर...
जहाँ कोई मुखौटा नहीं पहनना पड़ता, जहाँ मैं जैसा हूँ, वैसा ही रह सकता हूँ।
अकेलापन मुझे इसलिए पसंद नहीं कि मैं लोगों से भागता हूँ, बल्कि इसलिए कि वहाँ मुझे खुद से मिलने का वक़्त मिलता है। मैं घंटों चुप रह सकता हूँ, क्योंकि मेरे भीतर एक पूरी दुनिया रहती है। कुछ यादें हैं जो अब भी मुझसे बातें करती हैं, कुछ सपने हैं जो अभी तक टूटे नहीं, कुछ ज़ख़्म हैं जिनकी आवाज़ सिर्फ़ मैं सुन सकता हूँ।
लोग कहते हैं, "ज़िंदगी जीने के लिए लोगों की ज़रूरत होती है।"
शायद होती होगी...
मगर मैंने देखा है, सबसे गहरे घाव भी लोगों ने दिए हैं, और सबसे बड़ा सहारा भी अक्सर ख़ुद ही बनना पड़ता है। अब मैं हर किसी को अपनी दुनिया में आने नहीं देता, क्योंकि हर आने वाला रुकने नहीं आता।
कुछ लोग जिज्ञासा लेकर आते हैं, कुछ समय बिताने, और कुछ केवल तब तक जब तक उन्हें कोई बेहतर साथ न मिल जाए।
फिर वे चले जाते हैं...
और पीछे छोड़ जाते हैं एक और वजह, ख़ामोश हो जाने की।
इसलिए अगर मैं चुप हूँ, तो इसे मेरी कमजोरी मत समझना।
मैंने शोर से ज़्यादा ख़ामोशी को सच्चा पाया है।
मैंने भीड़ से ज़्यादा तन्हाई को वफ़ादार पाया है।
और मैंने लोगों से ज़्यादा खुद को समझने की कोशिश की है।
क्योंकि इस दुनिया में सबसे मुश्किल काम अकेले रहना नहीं है...
सबसे मुश्किल काम है उन लोगों के बीच रहना जो तुम्हें सुनते तो हैं, पर कभी समझते नहीं।।
इस कहानी का अंत तो नहीं हुआ है पर हा शायद मेरे दिल का दर्द कम जरूर हो गया कुछ कहानियां अधूरी ही रहे तो अच्छा होता हैं मेरी कहानी भी कुछ ऐसी ही है एक अधूरी दास्तां
आपको कहानी पढ़ने में कैसी लगी ये जरूर बताना आपका प्यारा लेखक: मुकुल तिवारी इगलास (अलीगढ़), उत्तर प्रदेश
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