हवेली का आख़िरी चिराग़
गढ़कुंडार की पहाड़ियों पर स्थित वह पुरानी हवेली सदियों से वीरान पड़ी थी। गाँव के लोग कहते थे कि वहाँ वक़्त ठहर चुका है। लेकिन रात के ठीक बारह बजे, उस हवेली की सबसे ऊपरी मंज़िल की खिड़की पर एक धुंधली सी रोशनी दिखाई देती थी।
अमित एक साहसी लेखक था, जो अपनी नई किताब के लिए सच्ची डरावनी कहानियों की तलाश में था। हाथ में अपनी भरोसेमंद फ्लैशलाइट (टॉर्च) और कंधे पर कैमरा टांगे, उसने हवेली के भारी, सड़ चुके लकड़ी के दरवाज़े को धक्का दिया। दरवाज़ा एक चीख के साथ खुला, मानो बरसों की ख़ामोशियाँ टूट गई हों। अंदर हवा इतनी ठंडी और भारी थी कि अमित की हर सांस से धुएं के बादल बन रहे थे। दीवारों पर लटके पुराने तेल-चित्रों की आँखें उसे ही घूरती हुई महसूस हो रही थीं।
जैसे ही उसने हवेली की सीढ़ियाँ चढ़ना शुरू किया, उसे किसी के चलने की आवाज़ आई—छम... छम... मानो कोई पायल पहने उसके आगे-आगे चल रहा हो। अमित का दिल ज़ोर से धड़कने लगा, लेकिन उसका कौतूहल उसके डर पर भारी था। वह सीधे उस कमरे की तरफ बढ़ा जहाँ से हर रात रोशनी आती थी।
कमरे का दरवाज़ा आधा खुला था। अमित ने धीरे से अंदर झाँका। वहाँ का नज़ारा देखकर उसके रोंगटे खड़े हो गए। कमरे के बीचों-बीच एक पुरानी नक्काशीदार मेज़ थी, जिस पर पीतल का एक दीया जल रहा था। उस दीये की लौ पूरी तरह से नीली थी। सबसे डरावनी बात यह थी कि उस कमरे में कोई इंसान नहीं था, लेकिन मेज़ के सामने रखी कुर्सी अपने आप धीरे-धीरे हिल रही थी।
तभी, कमरे का दरवाज़ा एक झटके से बंद हो गया। अमित घबरा गया। उसने भागने के लिए दरवाज़े के हैंडल को पकड़ा, लेकिन वह लॉक हो चुका था। अचानक, कमरे की पूरी रोशनी बुझ गई। चारों तरफ घाना, दम घोटने वाला अंधेरा छा गया। अमित ने कांपते हाथों से अपनी फ्लैशलाइट ऑन की।
सफ़ेद एलईडी (LED) रोशनी जैसे ही कमरे के कोने में पड़ी, अमित की चीख निकल गई। वहाँ एक साया खड़ा था—एक औरत, जिसके चेहरे पर कोई आँख या नाक नहीं थी, सिर्फ एक भयानक, चौड़ी मुस्कान थी। वह साया हवा में तैरते हुए अमित की तरफ बढ़ने लगा। अमित ने डर के मारे अपनी आँखें बंद कर लीं और ज़ोर-ज़ोर से हनुमान चालीसा का पाठ करने लगा।
कुछ मिनटों बाद, जब सन्नाटा छा गया, अमित ने धीरे से अपनी आँखें खोलीं। कमरा पूरी तरह खाली था। भूत गायब हो चुका था। अमित की जान में जान आई। उसने राहत की सांस ली और तुरंत अपनी फ्लैशलाइट की रोशनी ज़मीन पर डाली ताकि वह फर्श पर गिरे अपने कमरे की चाबी को ढूंढ सके। पर जैसे ही उसकी नज़र ज़मीन पर पड़ी, उसका खून जम गया।
सफ़ेद रोशनी में, ज़मीन पर अमित की खुद की कोई परछाईं नहीं बन रही थी... बल्कि उसकी जगह उसी बिना चेहरे वाली औरत की डरावनी परछाईं फर्श पर रेंग रही थी। अमित समझ गया कि वह अब अकेला नहीं था।
--- Aarav
(Winner of the)
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