रामनगर की एक पुरानी गली में, जहाँ सुबह की पहली किरण आते ही मोहल्ले की गलियों में बच्चों की किलकारियाँ गूँजने लगती थीं, वहाँ एक दो मंजिला घर था। उस घर में रहता था शर्मा परिवार। घर के बुजुर्ग, बाबूजी रामप्रसाद शर्मा, जिनकी उम्र सत्तर साल के आसपास थी, हर सुबह चार बजे उठकर तुलसी के पौधे के सामने हाथ जोड़े खड़े हो जाते। उनकी पत्नी, बुआजी सरस्वती देवी, जो अब साठ के पार हो चुकी थीं, रसोई में चाय की केतली चढ़ाने में लगी रहतीं। उनका बड़ा बेटा, अमित, जो अब तीस साल का हो चुका था, अपनी पत्नी प्रिया और छह साल की बेटी रिया के साथ ऊपरी मंजिल पर रहता था। नीचे वाली मंजिल पर बाबूजी और बुआजी रहते थे, और बीच में एक छोटा सा दफ्तर था जहाँ अमित अपना लेखा परीक्षा का काम करता था।
अमित एक साधारण लेखाकार था। हर सुबह सात बजे उठता, बाथरूम में मुँह धोता, आईने में अपनी झुर्रियों वाली आँखों को देखता, और फिर नीचे आकर बाबूजी के पैर छूता। प्रिया, जो एक स्कूल में अध्यापिका थी, हमेशा अपने बालों में तेल लगाकर, साड़ी पहनकर, चाय का कप हाथ में लिए नीचे आती। रिया तो बस अपनी दादी की गोद में बैठकर कहानियाँ सुनने में मशगूल रहती।
लेकिन पिछले कुछ महीनों से इस घर में कुछ बदल गया था। कुछ ऐसा जो सबने महसूस किया, लेकिन किसी ने मुँह से कहा नहीं।
प्रिया की आँखों में एक अजीब सी उदासी रहने लगी थी। वो जब भी अमित से बात करती, उसकी आवाज़ में एक हल्की सी कड़वाहट होती। अमित भी जानता था कि क्यों, लेकिन वो चुप रहता। उसकी आँखें ज़मीन पर टिकी रहतीं, और हाथ बेजान सा कप पकड़े रहते।
एक रात की बात है। बारिश की बूँदें छत पर टप टप की आवाज़ कर रही थीं। प्रिया बिस्तर पर लेटी हुई थी, आँखें छत की तरफ गड़ाए। अमित कमरे में आया, अपनी शर्ट उतारी, और बिस्तर के किनारे बैठ गया।
"अमित," प्रिया की आवाज़ धीमी थी, लेकिन उसमें एक गहराई थी।
"हाँ," अमित ने मुड़कर देखा। उसके चेहरे पर थकान के गहरे निशान थे।
"कब तक?" प्रिया ने पूछा, और इस बार उसकी आवाज़ काँप रही थी।
अमित चुप रहा। उसने अपने हाथों को आपस में मलना शुरू किया। ये उसकी आदत थी जब वो घबराता था।
"मैंने पूछा, कब तक?" प्रिया उठकर बैठ गई। उसकी आँखें लाल हो रही थीं। "हर महीने, हर महीने हमारे खाते से पैसे निकलते हैं। और तुम मुझे एक शब्द नहीं बताते।"
अमित ने गहरी साँस ली। "प्रिया, मैंने तुमसे कहा था ना, ये मेरी बहन के लिए है। राधिका की हालत ठीक नहीं है। उसके पति की नौकरी चली गई है। दो छोटे बच्चे हैं।"
"तो?" प्रिया की आवाज़ तेज़ हो गई। "तो क्या हम अमीर हैं? क्या हमारे पास इतने पैसे हैं कि हम दूसरों को देते रहें? तुम्हें पता है ना, रिया के स्कूल की फीस बढ़ने वाली है। घर का किराया, बिजली का बिल, सब कुछ। और तुम, तुम हर महीने पंद्रह हज़ार रुपये अपनी बहन को भेज देते हो।"
अमित का सिर झुक गया। उसकी आँखों में आँसू भर आए। "प्रिया, वो मेरी बहन है। मेरी रक्त की एक बूँद है। मैं कैसे देखूँ कि वो भूखी सोए?"
"और मैं?" प्रिया की आवाज़ फूट पड़ी। "मैं क्या तुम्हारी परायी हूँ? क्या रिया तुम्हारी बेटी नहीं है? हर महीने जब मैं बाज़ार जाती हूँ, हर चीज़ सोच समझकर खरीदती हूँ। सब्ज़ी वाले से दस रुपये कम करवाने की कोशिश करती हूँ। और तुम, तुम बिना बताए पंद्रह हज़ार भेज देते हो।"
अमित उठा। खिड़की के पास गया। बारिश अब और तेज़ हो गई थी। उसकी पीठ प्रिया की तरफ थी। उसके कंधे हल्के हल्के काँप रहे थे।
"मैंने कभी मना नहीं किया तुमसे," प्रिया रोते हुए बोली। "मैंने कहा था, एक बार बता दो। हम मिलकर सोचेंगे। लेकिन तुमने मुझे धोखा दिया। तुमने मुझे अपनी जीवन संगिनी नहीं, एक अजनबी समझा।"
अमित ने मुड़कर देखा। उसके गालों पर आँसू बह रहे थे। "प्रिया, मैंने तुम्हें धोखा नहीं दिया। मैं तो बस... मैं तो बस डर गया था। मुझे लगा, तुम मना कर दोगी। और मैं अपनी बहन को ना नहीं कह सकता था।"
"तो तुमने मुझसे झूठ बोलना बेहतर समझा?" प्रिया ने तकिया एक तरफ फेंका। "तीन महीने हो गए अमित। तीन महीने से मैं तुमसे बात नहीं कर रही हूँ। और तुम, तुम्हें कोई फर्क ही नहीं पड़ता।"
अमित वापस बिस्तर के पास आया। घुटनों के बल बैठ गया। "प्रिया, प्लीज़। मुझे माफ़ कर दो। मैं आगे से कुछ नहीं छिपाऊँगा।"
प्रिया ने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में एक मिश्रित भाव था। गुस्सा भी था, दर्द भी, और एक हल्की सी उम्मीद भी। लेकिन फिर उसने अपना चेहरा फेर लिया। "मुझे सोना है।"
अमित उठा। अँधेरे में अपनी तरफ लेट गया। दोनों की पीठें एक दूसरे की तरफ थीं, लेकिन दोनों की आँखें खुली थीं। बारिश की आवाज़ के बीच, दोनों के दिल धड़क रहे थे, लेकिन दोनों चुप थे।
अगली सुबह, जब सूरज की किरणें खिड़की से आईं, तो प्रिया उठ चुकी थी। उसने साड़ी पहनी, माथे पर बिंदी लगाई, और नीचे रसोई में चली गई। अमित भी उठा, लेकिन आज उसके कदम भारी थे। नीचे आकर उसने देखा, बुआजी आटा गूँथ रही थीं, और प्रिया चूल्हे पर चाय रखे खड़ी थी। दोनों के बीच कोई बातचीत नहीं थी, लेकिन एक अजीब सी शांति थी।
बाबूजी अपनी कुर्सी पर बैठे अख़बार पढ़ रहे थे। उन्होंने अमित को आते देखा, और उनकी आँखें कुछ पल के लिए रुकीं। बाबूजी कुछ जानते थे, लेकिन वो भी चुप थे। बुज़ुर्गों की चुप्पी में एक गहराई होती है, जो सब समझती है लेकिन कुछ कहती नहीं।
"बाबूजी, प्रणाम," अमित ने हाथ जोड़े।
"आओ बेटा," बाबूजी ने अख़बार नीचे रखा। "बैठो।"
अमित बैठ गया। बुआजी ने उसकी तरफ देखा, और फिर चुपचाप रोटी बेलने लगीं। घर में एक अजीब सी खामोशी थी, जो किसी भारी बादल की तरह सब पर मंडरा रही थी।
उसी समय, दरवाज़े की घंटी बजी। रिया दौड़कर गई। "दादी, मौसी आई हैं!"
दरवाज़े पर राधिका खड़ी थी। उसके हाथ में एक छोटा सा बैग था, और चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान। लेकिन जब वो अंदर आई, तो उसकी आँखें घर में एक एक चेहरे को टटोलने लगीं। उसने प्रिया को देखा, और प्रिया ने ज़मीन पर नज़रें गड़ा लीं।
"राधिका बेटी, आओ," बुआजी ने हाथ बढ़ाया। "बैठो। चाय पियोगी?"
"हाँ माँ," राधिका ने मुस्कुराते हुए कहा। लेकिन उसकी मुस्कान में एक अनकही चिंता थी। वो सोफे पर बैठी, और रिया को अपनी गोद में बिठा लिया। "कैसी है मेरी बिटिया?"
"मौसी, मैंने नया गाना सीखा है," रिया ने खिलखिलाते हुए कहा।
"सुनाओ ना," राधिका ने उसके गाल को चूमा।
रिया गाने लगी। उसकी मासूम आवाज़ घर में गूँजी। लेकिन बड़ों के चेहरे पर वही गंभीरता बनी हुई थी। प्रिया रसोई में काम करती रही, और अमित अपनी कुर्सी पर बैठा सिर झुकाए रहा।
राधिका ने अमित की तरफ देखा। "भैया, आप ठीक हैं?"
"हाँ, हाँ," अमित ने सिर उठाया। "बस थोड़ी थकान है।"
राधिका समझदार थी। उसने प्रिया की ओर देखा, और फिर अमित की ओर। उसके दिल में कुछ कचोटा। वो उठी, और रसोई में गई।
"भाभी," उसने धीरे से कहा।
प्रिया ने मुड़कर देखा। राधिका की आँखों में एक अजीब सी नमी थी। "हाँ बोलो," प्रिया की आवाज़ सख्त थी।
"भाभी, मैं जानती हूँ," राधिका ने अपने हाथ आगे बढ़ाए। "मैं जानती हूँ कि भैया ने आपसे बिना पूछे पैसे भेजे। और मैं यहाँ इसलिए आई हूँ।"
प्रिया ने हाथ धोना बंद किया। उसकी आँखें राधिका पर टिकीं।
"भाभी, मैंने भैया को मना किया था," राधिका की आवाज़ काँप रही थी। "मैंने कहा था, मैं कुछ और तरीका ढूँढ लूँगी। लेकिन भैया ने मना कर दिया। उन्होंने कहा, 'राधिका, तू मेरी छोटी बहन है। मैंने तुझे गोद में खिलाया है। मैं तुझे कैसे अनदेखा कर सकता हूँ?'"
प्रिया का चेहरा बदल रहा था। उसकी आँखों में एक नरमी आ रही थी, लेकिन वो अभी भी सतर्क थी।
"भाभी, मैं आज जो कुछ भी हूँ, सिर्फ भैया की वजह से हूँ," राधिका रोते हुए बोली। "जब मेरी शादी हुई थी, तो भैया ने अपनी पहली तनख़्वाह से मेरे लिए सोने की चूड़ी खरीदी थी। जब मेरा पहला बच्चा हुआ, तो भैया तीन दिन तक अस्पताल में सोए नहीं। वो हमेशा मेरे साथ खड़े रहे।"
प्रिया ने अपनी साड़ी का पल्लू आँखों पर लगाया। उसकी आँखें भी नम हो रही थीं।
"लेकिन भाभी, मैं यहाँ आपसे माफ़ी माँगने आई हूँ," राधिका ने घुटनों के बल बैठने की कोशिश की, लेकिन प्रिया ने उसे पकड़ लिया।
"नहीं, उठो," प्रिया की आवाज़ अब नरम हो चुकी थी।
"भाभी, मैंने भैया से कहा है, आगे से कोई पैसा नहीं लूँगी। मेरे पति को नई नौकरी मिल गई है। हम अब अपने पैरों पर खड़े हो जाएँगे। और जो पैसे भैया ने भेजे हैं, मैं धीरे धीरे वापस कर दूँगी।"
प्रिया ने राधिका को गले लगा लिया। दोनों बहनें रोने लगीं। रसोई में ये दृश्य देखकर बुआजी भी आँखें पोंछने लगीं। बाहर बैठे बाबूजी ने अपनी दाढ़ी सहलाई, और उनके होठों पर एक हल्की सी मुस्कान आई।
अमित, जो ये सब दरवाज़े से देख रहा था, उसके पैर ज़मीन से जुड़ गए। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे। उसने देखा, उसकी पत्नी और बहन एक दूसरे से लिपटी हुई हैं। वो आगे बढ़ा, लेकिन फिर रुक गया। उसे लगा, शायद अभी उसकी जगह नहीं है।
शाम को, जब राधिका जाने लगी, तो प्रिया ने उसे खुद दरवाज़े तक छोड़ा। "राधिका, तुम जब भी आना, ये घर तुम्हारा ही है। और पैसों की बात मत करना। तुम्हारे भैया ने जो किया, वो उनका फर्ज़ था। लेकिन हाँ, अगली बार जब भी कोई ज़रूरत हो, सीधे मुझे फोन करना। हम दोनों मिलकर सोचेंगे।"
राधिका ने प्रिया के पैर छुए। "धन्यवाद भाभी। आप सच में देवी हैं।"
प्रिया ने उसे उठाया, और उसके माथे पर चूमा। "जाओ, अपने बच्चों का खयाल रखना।"
रात को, जब घर में सब सो चुके थे, प्रिया अपने कमरे में आई। अमित बिस्तर पर बैठा था, एक पुरानी तस्वीर देख रहा था। तस्वीर में, छोटा अमित अपनी छोटी बहन राधिका को गोद में लिए हुए था, और दोनों हँस रहे थे।
प्रिया बिस्तर पर बैठी। अमित ने मुड़कर देखा। दोनों की आँखें मिलीं। कुछ पल की खामोशी रही।
"मुझे माफ़ कर दो प्रिया," अमित ने धीरे से कहा। "मैंने तुम्हें दर्द दिया। मैंने तुम्हें अपनी जीवन संगिनी होने का दर्जा नहीं दिया। मैंने सोचा, मैं सब संभाल लूँगा। लेकिन मैं भूल गया, कि शादी का मतलब ही यही है, कि दो लोग मिलकर हर मुश्किल को संभालें।"
प्रिया ने अपना हाथ आगे बढ़ाया, और अमित का हाथ अपने हाथ में ले लिया। "नहीं अमित, मुझे भी माफ़ कर दो। मैंने तीन महीने तुमसे बात नहीं की। मैंने तुम्हें अकेला छोड़ दिया। मुझे समझना चाहिए था, कि तुम्हारा दिल कितना बड़ा है। तुम अपनी बहन से प्यार करते हो, ये कोई गुनाह नहीं है। गुनाह था, कि तुमने मुझे बताया नहीं।"
अमित ने प्रिया का हाथ कसकर पकड़ा। "आगे से कभी नहीं। आगे से हर फैसला, हम मिलकर लेंगे।"
प्रिया ने अपना सिर अमित के कंधे पर रख दिया। "वादा?"
"वादा," अमित ने उसके बालों को सहलाया।
उसी रात, दोनों ने एक दूसरे को बहुत दिनों बाद गले लगाया। बाहर बारिश तो नहीं हो रही थी, लेकिन आसमान में तारे चमक रहे थे। और कहीं दूर, एक ट्रेन की सीटी बजी, जैसे खुदा खुद इस पल की गवाही दे रहा हो।
कुछ दिन बीत गए। घर में फिर से वही खुशियाँ लौट आईं। प्रिया और अमित साथ में बाज़ार जाने लगे। रिया अपने माँ बाप के बीच हाथ पकड़कर चलती, और कभी कभी उन दोनों को एक दूसरे की तरफ देखकर खिलखिला उठती।
एक रविवार की सुबह, पूरा परिवार छत पर बैठा था। बाबूजी अपनी पुरानी चारपाई पर लेटे हुए थे, और बुआजी पास में बैठी सूत कात रही थीं। अमित अख़बार पढ़ रहा था, और प्रिया रिया के साथ सांप सीढ़ी खेल रही थी।
"बाबूजी," अमित ने अख़बार नीचे रखा। "एक बात पूछूँ?"
"पूछो बेटा," बाबूजी ने अपनी आँखें बंद रखीं।
"आपको पता था ना, कि प्रिया और मेरे बीच क्या चल रहा था?"
बाबूजी ने आँखें खोलीं। उनकी आँखों में एक चमक थी, जो सालों के अनुभव की गवाह थी। "बेटा, मैंने सत्तर साल इस दुनिया में देखे हैं। मैंने अपने माँ बाप को लड़ते देखा, अपने भाई बहनों को लड़ते देखा, और अपने बच्चों को भी। हर घर में एक दरार होती है। लेकिन जो घर, उस दरार को प्यार से भर दे, वो घर हमेशा खड़ा रहता है।"
बुआजी ने सूत का काम रोका। "अमित बेटा, तुम्हारे बाबूजी ने एक बार मुझसे तीन महीने बात नहीं की थी।"
"क्या?" प्रिया ने आश्चर्य से पूछा।
"हाँ," बुआजी मुस्कुराईं। "तुम्हारे ससुर जी, जब नौजवान थे, तो एक बार उन्होंने मेरी मर्ज़ी के बिना हमारी ज़मीन का एक हिस्सा अपने दोस्त को बेच दिया। मुझे इतना गुस्सा आया, कि मैंने तीन महीने उनसे आँख नहीं मिलाई।"
बाबूजी हँसने लगे। "और फिर एक दिन, इसी छत पर, तुम्हारी बुआजी ने मुझे एक गिलास लस्सी दी, और बोली, 'अब बस भी करो।'"
सब हँसने लगे। रिया समझ नहीं पा रही थी कि क्या हो रहा है, लेकिन वो भी खिलखिला उठी।
"देखो बच्चों," बाबूजी ने अमित और प्रिया की तरफ देखा। "शादी में लड़ाई झगड़े होंगे। ये तो ज़रूरी है। लेकिन ज़रूरी ये है, कि तुम दोनों एक दूसरे का हाथ कभी ना छोड़ो। क्योंकि हाथ छोड़ने से, दिल भी छूट जाते हैं।"
अमित ने प्रिया का हाथ पकड़ा। प्रिया ने उसकी तरफ देखा, और दोनों ने एक दूसरे को वो नज़र से देखा, जो सिर्फ प्यार करने वाले ही समझ सकते हैं।
उसी शाम, प्रिया ने रसोई में एक खास खाना बनाया। अमित की पसंद की दाल, बाबूजी की पसंद की सब्ज़ी, और रिया के लिए गुलाब जामुन। पूरा परिवार ज़मीन पर बैठकर खाना खा रहा था। बुआजी ने अमित की थाली में एक एक करके रोटियाँ रखीं, और बाबूजी ने प्रिया के सिर पर हाथ फेरा।
"बहू," बाबूजी ने कहा, "तुमने इस घर को बचा लिया।"
प्रिया ने शर्माते हुए कहा, "नहीं माँजी, ये घर तो आप लोगों की दुआओं से चलता है। मैं तो बस एक हिस्सा हूँ।"
"नहीं," बाबूजी ने गंभीरता से कहा। "तुम इस घर की धड़कन हो। बिना धड़कन के, दिल नहीं चलता।"
रिया ने अपनी छोटी सी आवाज़ में कहा, "मम्मी, आप धड़कन हो?"
सब हँसने लगे। प्रिया ने रिया को गोद में उठाया। "हाँ बेटा, और तुम इस धड़कन की धुन हो।"
रात को, जब सब सो गए, अमित और प्रिया छत पर आए। आसमान में चाँद पूरा था, और तारे चमक रहे थे। अमित ने प्रिया को अपनी बाँहों में भर लिया।
"प्रिया," उसने धीरे से कहा।
"हाँ," प्रिया ने अपना सिर उसके सीने पर रखा।
"मैंने आज राधिका से बात की।"
"हाँ?"
"उसके पति की नौकरी लग गई। और उसने कहा है, कि पहली तनख़्वाह से वो हमें एक डिनर पर बुलाएगी।"
प्रिया मुस्कुराई। "ठीक है, जाएँगे। लेकिन इस बार, मैं गिफ्ट लेकर जाऊँगी। उसके बच्चों के लिए कपड़े।"
"तुम्हारी मर्ज़ी," अमित ने उसके माथे पर चूमा।
"और अमित," प्रिया ने उठकर देखा।
"हाँ?"
"अगली बार जब भी तुम्हें लगे कि तुम्हें अपनी बहन की मदद करनी है, मुझे बताना। हम मिलकर तय करेंगे कितना करना है। लेकिन कभी अकेले नहीं।"
अमित ने उसके हाथ अपने हाथों में लिए। "कसम खाता हूँ।"
चाँद की रोशनी में, दोनों के चेहरे चमक रहे थे। वो दोनों जानते थे, कि उनकी शादी में एक दरार आई थी, लेकिन उन्होंने उसे प्यार से भर दिया था। और अब वो दरार, उनके रिश्ते की सबसे मज़बूत जगह बन गई थी।
कुछ हफ़्ते बीत गए। एक दिन सुबह, जब अमित दफ्तर जाने की तैयारी कर रहा था, प्रिया ने उसे एक लिफाफा दिया।
"ये क्या है?" अमित ने पूछा।
"खोलो," प्रिया मुस्कुरा रही थी।
अमित ने लिफाफा खोला। उसमें एक चिट्ठी थी। प्रिया के हाथ की लिखावट में। अमित ने पढ़ना शुरू किया।
"प्यारे अमित, तुमसे शादी के छह साल हो गए। इन छह सालों में तुमने मुझे हर खुशी दी। लेकिन मैंने भी एक गलती की। मैंने तीन महीने तुमसे दूर रही। मैंने सोचा, तुम्हें सज़ा दे रही हूँ। लेकिन असल में, मैं खुद को सज़ा दे रही थी। तुम्हारे बिना, मैं अधूरी हूँ। आज से, हर महीने, हम अपनी बचत का दस प्रतिशत राधिका के लिए रखेंगे। नहीं तो उसके लिए, तो इसलिए कि हम एक परिवार हैं। और परिवार, एक दूसरे के लिए होता है। तुम्हारी प्रिया।"
अमित की आँखें नम हो गईं। उसने प्रिया को गले लगाया। "धन्यवाद प्रिया। धन्यवाद।"
"अब जाओ," प्रिया ने उसकी टाई ठीक की। "देर हो रही है।"
अमित ने रिया को चूमा, बुआजी और बाबूजी को प्रणाम किया, और घर से निकल गया। लेकिन आज उसके कदम हल्के थे। उसके दिल में एक अजीब सी शांति थी, जो कई दिनों बाद मिली थी।
उस शाम, जब अमित वापस आया, तो घर में एक अजीब सी खुशबू थी। प्रिया ने उसके लिए उसकी माँ की याद दिलाने वाली खीर बनाई थी। पूरा परिवार मेज़ पर बैठा था। बाबूजी ने अपनी पुरानी आदत से, खाने से पहले एक निवाला कुत्ते के लिए नीचे रखा। बुआजी ने सबको रोटी परोसी। और रिया, छोटी सी रिया, ने अपने हाथों से अपने पापा को एक रोटी दी।
"पापा, आप खाओ," उसने अपनी मासूम आँखों से कहा।
अमित ने वो रोटी ली, और उसमें से एक टुकड़ा तोड़कर खाया। उसे लगा, जैसे ये दुनिया की सबसे मीठी रोटी है। नहीं, खीर नहीं, नहीं दाल नहीं। ये रोटी मीठी इसलिए थी, क्योंकि इसमें उसकी बेटी का प्यार था, उसकी पत्नी की मेहनत थी, और उसके माता पिता की दुआएँ थीं।
खाने के बाद, पूरा परिवार बाहर आँगन में बैठा। बाबूजी ने अपनी पुरानी हुक्का निकाला, लेकिन बुआजी ने एक नज़र डाली, तो उन्होंने वापस रख दिया। सब हँसने लगे।
"बाबूजी," अमित ने कहा, "एक बात कहूँ?"
"कहो बेटा।"
"मैंने सोचा है, कि राधिका के यहाँ इस दीवाली पर हम सब जाएँगे।"
बाबूजी ने मुस्कुराते हुए कहा, "यही तो मैं चाहता था। परिवार, एक साथ।"
बुआजी ने हाथ जोड़े। "भगवान करे, सब ठीक रहे।"
प्रिया ने अमित का हाथ पकड़ा। "हम सब जाएँगे। और इस बार, मैं खुद सब खाना बनाकर लेकर जाऊँगी।"
"मम्मी, मैं भी जाऊँगी?" रिया ने कूदते हुए पूछा।
"हाँ बेटा, तुम भी जाओगी। और अपने मौसी के बच्चों के साथ खेलना," प्रिया ने उसके गाल चूमे।
रात गहरी होने लगी। एक एक करके सब अपने कमरों में गए। अमित और प्रिया अपने कमरे में आए। खिड़की से चाँद की रोशनी आ रही थी। अमित ने खिड़की बंद की, और प्रिया ने दीये में बाती डाली।
"प्रिया," अमित ने कहा।
"हाँ," प्रिया ने मुड़कर देखा।
"मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ," अमित ने धीरे से कहा।
प्रिया की आँखों में आँसू आ गए। लेकिन ये आँसू खुशी के थे। "मैं भी अमित। मैं भी।"
दोनों ने एक दूसरे को गले लगाया। और उसी पल, कहीं दूर से मंदिर की घंटियाँ बजीं। जैसे खुदा खुद इस रिश्ते को आशीर्वाद दे रहा हो।
उस रात, अमित ने सपना देखा। उसने देखा कि वो एक बड़े से मैदान में है, और उसके आस पास उसका पूरा परिवार है। बाबूजी हँस रहे हैं, बुआजी प्रसाद बाँट रही हैं, राधिका अपने बच्चों के साथ खेल रही है, और प्रिया, उसकी प्यारी प्रिया, उसका हाथ पकड़े हुए है। रिया दौड़ रही है, और उसकी किलकारियाँ पूरे मैदान में गूँज रही हैं।
अमित जागा। सुबह हो चुकी थी। प्रिया उसके बगल में सो रही थी, और उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान थी। शायद उसने भी वही सपना देखा था।
अमित उठा, खिड़की खोली, और बाहर देखा। सूरज निकल रहा था, और पंछी चहचहा रहे थे। उसने गहरी साँस ली, और अपने दिल में कहा, "धन्यवाद भगवान। मेरा परिवार ठीक है। मेरा सब कुछ ठीक है।"
और वो सच में ठीक था। क्योंकि परिवार में लड़ाई झगड़े होते हैं, गलतफहमियाँ होती हैं, दर्द होता है। लेकिन जब दिल में प्यार हो, और नीयत साफ़ हो, तो हर दरार, एक नए रिश्ते की शुरुआत बन जाती है।
शर्मा परिवार का ये घर, रामनगर की उस पुरानी गली में, आज भी खड़ा है। और आज भी, हर सुबह, बाबूजी तुलसी के पास हाथ जोड़े खड़े होते हैं, और बुआजी चाय की केतली चढ़ाती हैं। अमित अपने दफ्तर जाता है, प्रिया स्कूल, और रिया अपनी दादी की गोद में कहानियाँ सुनती है।
लेकिन अब, हर शाम, जब अमित वापस आता है, तो प्रिया दरवाज़े पर खड़ी होती है, एक मुस्कान के साथ। और अमित, अपनी थकी हुई आँखों में, उस मुस्कान को देखकर, सारी थकान भूल जाता है।
क्योंकि परिवार, यही तो है। गलतियाँ, माफ़ी, प्यार, और फिर से एक साथ। हमेशा एक साथ।
दिल की दुआ, यही है। कि हर घर में प्यार रहे, हर दिल में समझ रहे, और हर रिश्ता, हमेशा के लिए बना रहे।
ॐ शांति।