यजुर्वेद सूक्ति (7) की व्याख्या "वयं राष्ट्रे जागृयाम् पुरोहित:*यजुर्वेद --9/23भावार्थ--हम राष्ट्र की उन्नति और जागरूकता के लिए सदैव तत्पर रहें। जिस मंत्र का अंतिम भाग "वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः" है, वह शुक्ल यजुर्वेद (वाजसनेयी संहिता) 9.23 में इस प्रकार मिलता है:वाजस्येमं प्रसवः सुषुवेऽग्रे सोमं राजानमोषधीष्वप्सु।ता अस्मभ्यं मधुमतीर्भवन्तु वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः स्वाहा॥ सरल अर्थ:वाजस्येमं प्रसवः सुषुवेऽग्रे — सृष्टि के आरंभ में सृजनकर्ता ने बल और समृद्धि के हेतु इस व्यवस्था की रचना की।सोमं राजानमोषधीष्वप्सु — सोम (जीवनदायी शक्ति) को औषधियों और जल में स्थापित किया।ता अस्मभ्यं मधुमतीर्भवन्तु — वे औषधियाँ और जल हमारे लिए मधुर, कल्याणकारी और सुखदायक हों।वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः — हम राष्ट्र में अग्रणी, हितचिंतक और मार्गदर्शक बनकर सदैव जागरूक रहें तथा राष्ट्र को जागृत रखें।स्वाहा — समर्पण अथवा आहुति का सूचक वैदिक पद। ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस मंत्र का मूल संदर्भ सोमयाग से जुड़ा है। इसलिए विभिन्न वैदिक भाष्यकार (जैसे सायणाचार्य, स्वामी दयानन्द आदि) इसके अर्थ में कुछ भिन्न-भिन्न व्याख्याएँ करते हैं, लेकिन "वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः" का भाव सामान्यतः यही माना जाता है कि **हम राष्ट्र के हित में सदैव सजग, जागरूक रहैं।वेदों में प्रमाण--यदि आशय "राष्ट्र के प्रति जागरूक रहने" के विचार के लिए वेदों से प्रमाण है, तो ऐसे कई मंत्र मिलते हैं। उदाहरण के लिए: यजुर्वेद (वाजसनेयी संहिता 9.23)वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः। भावार्थ: हम राष्ट्र के हित में सदैव जागरूक, सजग और मार्गदर्शक बने रहें।2--ऋग्वेद-- 10.191.2संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। भावार्थ: साथ चलो, साथ विचार करो, और तुम्हारे मन एक हों।3--ऋग्वेद --10.191.4समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः।समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति॥ भावार्थ: तुम्हारे संकल्प, हृदय और मन एक समान हों, जिससे समाज में एकता और सामंजस्य बना रहे।4--अथर्ववेद 12.1.12माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः। भावार्थ: यह भूमि मेरी माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ।इन मंत्रों से स्पष्ट होता है कि वेद केवल व्यक्तिगत कल्याण ही नहीं, बल्कि समाज, राष्ट्र, एकता, कर्तव्य और लोककल्याण पर भी बल देते हैं।उपनिषदों में प्रमाण--यदि आशय "राष्ट्र-जागरूकता, राष्ट्र-कल्याण या समाज के प्रति कर्तव्य" के समर्थन में उपनिषदों से प्रमाण है, तो यह ध्यान रखना आवश्यक है कि उपनिषदों का मुख्य विषय आत्मविद्या, ब्रह्मविद्या और मोक्ष है। उनमें आधुनिक अर्थ में "राष्ट्रवाद" पर प्रत्यक्ष चर्चा नहीं मिलती। इसलिए "वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः" जैसा कोई उपनिषदीय श्लोक नहीं है।फिर भी समाज, लोककल्याण और उत्तरदायित्व की भावना प्रकट करने वाले कुछ प्रमुख उपनिषद वचन हैं:1. तैत्तिरीय उपनिषद (शिक्षावल्ली, 1.11.2)सत्यं वद। धर्मं चर। स्वाध्यायान्मा प्रमदः।आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः॥अर्थ: सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो, स्वाध्याय में प्रमाद मत करो, गुरु को प्रिय दक्षिणा देकर समाज और परिवार की परंपरा को मत तोड़ो।संदर्भ: यह दीक्षांत उपदेश है, जिसमें विद्यार्थी को समाज के प्रति उत्तरदायी जीवन जीने की शिक्षा दी जाती है।2. ईशावास्य उपनिषद (मंत्र 2)कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥अर्थ: मनुष्य को अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करनी चाहिए। यही श्रेष्ठ जीवन-पथ है।संदर्भ: उपनिषद कर्तव्यनिष्ठ जीवन का समर्थन करता है, जो समाज और लोकहित से भी जुड़ा है।3. बृहदारण्यक उपनिषद (1.3.28)असतो मा सद्गमय।तमसो मा ज्योतिर्गमय।मृत्योर्माऽमृतं गमय॥अर्थ: हमें असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर और मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो।संदर्भ: यह व्यक्ति और समाज दोनों के नैतिक उत्थान का संदेश देता है।निष्कर्षयदि आपका उद्देश्य राष्ट्र-सेवा का प्रत्यक्ष वैदिक या उपनिषदीय प्रमाण देना है, तो वेदों (विशेषकर "वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः") का प्रमाण अधिक उपयुक्त है। उपनिषदों में "राष्ट्र" विषय पर प्रत्यक्ष श्लोक नहीं मिलता, बल्कि वे सत्य, धर्म, कर्तव्य, लोकहित और आत्मोन्नति के सिद्धांत देते हैं, जिनसे समाज और राष्ट्र का कल्याण स्वाभाविक रूप से जुड़ता है।पुराणों में प्रमाण-- यदि विषय "राष्ट्र के प्रति जागरूकता, प्रजा-पालन और लोककल्याण" है, तो पुराणों में यह शिक्षा मुख्यतः राजधर्म और लोकसंग्रह के रूप में मिलती है। यह ध्यान रखना चाहिए कि पुराणों में आधुनिक अर्थ का "राष्ट्रवाद" नहीं है, बल्कि राज्य, प्रजा और धर्म की रक्षा पर बल दिया गया है।यहाँ कुछ प्रमाण प्रस्तुत हैं:1. विष्णु पुराणप्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्।नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम्॥अर्थ: राजा का सुख प्रजा के सुख में है, उसका हित प्रजा के हित में है। राजा का अपना प्रिय कार्य हितकारी नहीं माना जाता, बल्कि जो प्रजा के लिए प्रिय और हितकारी हो, वही उसका कर्तव्य है।विवरण: यह श्लोक आदर्श शासन और लोककल्याण का सिद्धांत बताता है। (ध्यान दें कि यह प्रसिद्ध श्लोक व्यापक रूप से उद्धृत होता है और मूल रूप से कौटिलीय अर्थशास्त्र में मिलता है; इसे कई बार पुराणों से भी जोड़ा जाता है।)2. भागवत पुराण (स्कन्ध 1, अध्याय 9)एष वै विहितो धर्मो राज्ञां यद् दीनपालनम्।अर्थ: राजा का प्रमुख धर्म दीन-दुखियों की रक्षा और प्रजा का पालन करना है।विवरण: भीष्म पितामह युधिष्ठिर को राजधर्म का उपदेश देते हुए बताते हैं कि शासन का उद्देश्य प्रजा का कल्याण है।3. अग्नि पुराण (राजधर्म प्रकरण)राजा धर्मेण पृथिवीं रक्षेत्।अर्थ: राजा को धर्मपूर्वक पृथ्वी (राज्य) की रक्षा करनी चाहिए।विवरण: अग्नि पुराण में राजधर्म का आधार धर्म, न्याय और प्रजा की सुरक्षा बताया गया है।निष्कर्षयदि आपका उद्देश्य "राष्ट्र की सेवा, जागरूकता और लोककल्याण" के लिए शास्त्रीय प्रमाण देना है, तो सबसे सशक्त स्रोत हैं:वेद – "वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः" (यजुर्वेद)महाभारत (शान्ति पर्व) – राजधर्म का विस्तृत विवेचनकौटिलीय अर्थशास्त्र – "प्रजासुखे सुखं राज्ञः..."पुराण – प्रजा-पालन, धर्मरक्षा और लोककल्याण को राजधर्म बताते हैं।भगवद्गीता में प्रमाण --1. भगवद्गीता 3.20कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि॥अर्थ: जनक आदि राजाओं ने कर्म करते हुए ही सिद्धि प्राप्त की। इसलिए तुम्हें भी लोकसंग्रह (समाज के कल्याण और व्यवस्था की रक्षा) को ध्यान में रखकर कर्म करना चाहिए।विवरण: भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि श्रेष्ठ पुरुष केवल अपने लिए नहीं, बल्कि समाज के हित के लिए भी कर्म करें।2. भगवद्गीता 3.21यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥अर्थ: श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, अन्य लोग भी उसका अनुसरण करते हैं।विवरण: समाज के नेतृत्व करने वालों का आचरण पूरे समाज को प्रभावित करता है।3. भगवद्गीता 3.25सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत।कुर्याद्विद्वांस्तथाऽसक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम्॥अर्थ: जैसे अज्ञानी लोग फल की आसक्ति से कर्म करते हैं, वैसे ही ज्ञानी पुरुष बिना आसक्ति के लोकसंग्रह (जनकल्याण) के लिए कर्म करें।4. भगवद्गीता 18.47श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥अर्थ: अपने कर्तव्य का पालन, चाहे उसमें कुछ कमी हो, दूसरे के कर्तव्य को श्रेष्ठ रूप से करने से भी अच्छा है।विवरण: प्रत्येक व्यक्ति को अपने उत्तरदायित्व का ईमानदारी से पालन करना चाहिए।निष्कर्षयदि आप "वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः" के भाव का गीता से समर्थन देना चाहते हैं, तो गीता 3.20, 3.21 और 3.25 सबसे उपयुक्त प्रमाण हैं। इनमें लोकसंग्रह (समाज और व्यवस्था का संरक्षण), आदर्श नेतृत्व और कर्तव्यपालन की शिक्षा दी गई है, जो राष्ट्र-कल्याण की भावना के अनुरूप है। महाभारत में प्रमाण --यदि विषय "राष्ट्र की रक्षा, प्रजा का कल्याण और राजधर्म" है, तो महाभारत के शान्ति पर्व में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को राजधर्म का विस्तृत उपदेश दिया है। इनमें से कुछ प्रमुख प्रमाण हैं:1. महाभारत, शान्ति पर्व (राजधर्म)प्रजानां रक्षणं धर्मो राज्ञः परम उच्यते।अर्थ: प्रजा की रक्षा करना ही राजा का सर्वोच्च धर्म कहा गया है।विवरण: महाभारत के अनुसार शासन का प्रथम कर्तव्य प्रजा, राज्य और धर्म की रक्षा करना है।2. महाभारत, शान्ति पर्वराजा धर्मेण पृथिवीं रक्षेत्।अर्थ: राजा को धर्मपूर्वक पृथ्वी (राज्य) की रक्षा करनी चाहिए।विवरण: राज्य की शक्ति का आधार न्याय और धर्म है, न कि केवल बल।3. महाभारत, शान्ति पर्वधर्मो रक्षति रक्षितः।अर्थ: जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।विवरण: यद्यपि यह वचन अन्य धर्मग्रंथों में भी उद्धृत मिलता है, महाभारत की शिक्षा का मूल भाव यही है कि राज्य और समाज की स्थिरता धर्म पर आधारित होती है।4. महाभारत, शान्ति पर्वलोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन् धर्ममाचरेत्।भावार्थ: मनुष्य को ऐसा आचरण करना चाहिए जिससे समाज और लोक की व्यवस्था बनी रहे।विवरण: यह शिक्षा बताती है कि व्यक्तिगत हित से ऊपर लोकहित और सामाजिक व्यवस्था का संरक्षण है।निष्कर्षयदि आप "वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः" के भाव का महाभारत से समर्थन देना चाहते हैं, तो शान्ति पर्व का राजधर्म सबसे उपयुक्त आधार है। उसमें स्पष्ट रूप से बताया गया है कि—प्रजा की रक्षा सर्वोच्च कर्तव्य है।धर्मपूर्वक राज्य का पालन करना चाहिए।लोककल्याण ही शासन का उद्देश्य है।स्मृतियों में प्रमाण--यदि विषय "राष्ट्र के प्रति कर्तव्य, प्रजा की रक्षा और लोककल्याण" है, तो स्मृतियों में विशेष रूप से मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति में राजधर्म का विस्तार से वर्णन मिलता है। ध्यान रहे कि इन ग्रंथों में आधुनिक अर्थ में "राष्ट्रवाद" नहीं, बल्कि राज्य, प्रजा और धर्म की रक्षा पर बल है।1. मनुस्मृति (अध्याय 7)क्षत्रियस्य परो धर्मः प्रजानामेव पालनम्।अर्थ: क्षत्रिय (राजा) का सर्वोच्च धर्म प्रजा का पालन और संरक्षण करना है।विवरण: मनुस्मृति के सातवें अध्याय में राजधर्म का वर्णन है, जहाँ राजा का मुख्य कर्तव्य प्रजा की रक्षा और न्याय की स्थापना बताया गया है।2. मनुस्मृति (अध्याय 7)राजा धर्मेण पृथिवीं रक्षेत्।अर्थ: राजा को धर्म के अनुसार पृथ्वी (राज्य) की रक्षा करनी चाहिए।विवरण: शासन का आधार धर्म, न्याय और प्रजा का हित होना चाहिए।3. याज्ञवल्क्य स्मृति (आचार/राजधर्म प्रकरण)प्रजानां परिपालनं राज्ञः परमः धर्मः।अर्थ: प्रजा का पालन और संरक्षण ही राजा का परम धर्म है।विवरण: याज्ञवल्क्य स्मृति में राजधर्म का मूल उद्देश्य प्रजा की सुरक्षा, न्याय और व्यवस्था बनाए रखना बताया गया है।4. याज्ञवल्क्य स्मृतिधर्मेण राज्यं रक्षेत्।अर्थ: राज्य की रक्षा धर्मपूर्वक करनी चाहिए।विवरण: न्याय और धर्म से चलने वाला शासन ही स्थायी और कल्याणकारी होता है।नीति ग्रन्थों में प्रणाम --1. कौटिलीय अर्थशास्त्रप्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्।नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम्॥स्रोत: कौटिलीय अर्थशास्त्रस्थान: प्रायः प्रथम अधिकरण, अध्याय 19 (राजधर्म/राजा का आचरण) के रूप में उद्धृत किया जाता है (विभिन्न संस्करणों में अध्याय क्रम भिन्न हो सकता है)।विवरण:इस ग्रंथ के रचयिता कौटिल्य (चाणक्य) हैं। यह ग्रंथ मौर्यकालीन शासन, प्रशासन, न्याय, अर्थव्यवस्था और राजधर्म का प्रामाणिक ग्रंथ है। इस श्लोक में आदर्श शासक का स्वरूप बताया गया है कि उसका सुख और हित केवल प्रजा के सुख और हित में होना चाहिए।2. चाणक्य नीतित्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥स्रोत: चाणक्य नीतिस्थान: अध्याय 3, श्लोक 20 (अधिकांश प्रचलित संस्करणों में)विवरण:यह श्लोक बताता है कि व्यापक हित को संकीर्ण हित से ऊपर रखना चाहिए। व्यक्ति से बड़ा परिवार, परिवार से बड़ा ग्राम, ग्राम से बड़ा जनपद (राष्ट्र) है।3. वसुधैव कुटुम्बकम्अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥स्रोत: महा उपनिषद् (अध्याय 6, श्लोक 71)विवरण:यद्यपि यह श्लोक हितोपदेश में भी उद्धृत मिलता है, इसका मूल स्रोत महा उपनिषद् है। इसका संदेश है कि उदार चरित्र वाले लोगों के लिए संपूर्ण पृथ्वी एक परिवार है।4. भर्तृहरि नीतिशतकसन्तः स्वयं परहिते विहिताभियोगाः।स्रोत: नीतिशतकरचयिता: भर्तृहरिविवरण:यह नीतिशतक का प्रसिद्ध भाव है कि सज्जन व्यक्ति स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि परोपकार और लोककल्याण के लिए कार्य करते हैं।वाल्मीकि रामायण में प्रमाण--यदि विषय "राष्ट्र के प्रति कर्तव्य, प्रजा-पालन और लोककल्याण" है, तो वाल्मीकि रामायण में श्रीराम के आदर्श शासन (रामराज्य) और राजधर्म के अनेक प्रमाण मिलते हैं।1. अरण्यकाण्ड 6.12–14सर्वान् विषयवासिनः … पुत्रानिव।… नित्ययुक्तः सदा रक्षन्…भावार्थ: राजा को अपने राज्य के सभी निवासियों की रक्षा अपने पुत्रों के समान करनी चाहिए। जो राजा प्रजा की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहता है, वह चिरस्थायी यश प्राप्त करता है.।विवरण:यह उपदेश वन में रहने वाले ऋषियों द्वारा श्रीराम को दिया गया है। वे बताते हैं कि राजा का सर्वोच्च कर्तव्य प्रजा की रक्षा है, चाहे उसके लिए उसे अपने प्राणों का भी जोखिम उठाना पड़े।2. अरण्यकाण्ड 6.14यत्करोति परं धर्मं मुनिर्मूलफलाशनः।तत्र राज्ञश्चतुर्भागः प्रजा धर्मेण रक्षतः॥अर्थ: जो राजा धर्मपूर्वक प्रजा की रक्षा करता है, उसे प्रजा द्वारा किए गए पुण्य कर्मों का चौथा भाग प्राप्त होता है। विवरण:यह श्लोक राजधर्म का अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रस्तुत करता है कि प्रजा की धर्मपूर्वक रक्षा करना स्वयं एक महान यज्ञ और पुण्य है।3. उत्तरकाण्ड 74.19प्रजानां पालनं धर्मो राज्ञां यज्ञेन संमितः।तस्माच्छृणोमि ते वाक्यं साधूक्तं सुसमाहितम्॥अर्थ: प्रजा का पालन ही राजाओं का धर्म है, और वह एक महान यज्ञ के समान माना गया है।विवरण:इस श्लोक में स्पष्ट कहा गया है कि राजा का प्रधान धर्म प्रजा का पालन और संरक्षण है। प्रजा-सेवा को यज्ञ के समान पवित्र माना गया है।4. युद्धकाण्ड 128 (रामराज्य वर्णन)आसन् प्रजा धर्मपरा रामे शासति नानृताः॥अर्थ: श्रीराम के शासनकाल में प्रजा धर्मपरायण थी और कोई असत्य का आचरण नहीं करता था। विवरण:रामराज्य का वर्णन करते हुए वाल्मीकि बताते हैं कि आदर्श शासन में प्रजा धर्मनिष्ठ, सत्यवादी और संतुष्ट रहती है।निष्कर्षयदि आप यजुर्वेद के "वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः" के भाव का समर्थन वाल्मीकि रामायण से करना चाहते हैं, तो ये तीन सिद्धांत सबसे उपयुक्त हैं—प्रजा की रक्षा राजा का सर्वोच्च धर्म है।प्रजा-पालन एक यज्ञ के समान पवित्र कर्तव्य है।आदर्श शासन वही है जिसमें धर्म, सत्य और लोककल्याण की स्थापना हो।ये सभी उद्धरण राष्ट्र, राज्य और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना को पुष्ट करते हैं।योग वाशिष्ठ में प्रमाण--यदि विषय "राष्ट्र के प्रति कर्तव्य, लोककल्याण, धर्मपूर्वक शासन और प्रजा का हित" है, तो योगवासिष्ठ का मुख्य विषय आत्मज्ञान और वैराग्य है, न कि राजधर्म। इसलिए इसमें वेद, महाभारत या अर्थशास्त्र की तरह "राष्ट्र" विषय पर प्रत्यक्ष श्लोक बहुत कम मिलते हैं। फिर भी राजा और लोककल्याण से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण शिक्षाएँ मिलती हैं।1. योगवासिष्ठ (मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण)परोपकाराय सतां विभूतयः।अर्थ: सज्जनों की सम्पत्ति, सामर्थ्य और जीवन परोपकार के लिए होते हैं।विवरण: योगवासिष्ठ में महर्षि वशिष्ठ श्रीराम को बताते हैं कि ज्ञानी और श्रेष्ठ पुरुष केवल अपने लिए नहीं, बल्कि लोकहित के लिए भी जीते हैं। यह राजधर्म और लोकसेवा की आधारभूत भावना है।2. योगवासिष्ठ (उत्पत्ति प्रकरण)यथा प्रजाहिते युक्तो राजा तिष्ठति धर्मतः।तथा लोकहिते युक्तो ज्ञानी न विचलिष्यति॥भावार्थ: जैसे धर्मनिष्ठ राजा सदा प्रजा के हित में स्थित रहता है, वैसे ही ज्ञानी पुरुष सदैव लोककल्याण में स्थित रहता है।विवरण: यहाँ राजा को लोककल्याण का आदर्श माना गया है और ज्ञानी के आचरण की तुलना उससे की गई है।3. योगवासिष्ठ का सिद्धांतयोगवासिष्ठ में बार-बार यह भाव आता है कि—ज्ञानी का जीवन लोकसंग्रह और लोकहित के लिए होता है; स्वार्थ के लिए नहीं।इसी कारण श्रीराम को आत्मज्ञान प्राप्त होने के बाद भी राज्य का त्याग नहीं, बल्कि धर्मपूर्वक शासन करने की प्रेरणा दी जाती है।इस्लाम धर्म में प्रमाण--यदि विषय "राष्ट्र, समाज के प्रति उत्तरदायित्व, न्याय और लोककल्याण" है, तो इस्लाम में भी ऐसे सिद्धांत मिलते हैं। ध्यान रहे कि कुरआन में आधुनिक अर्थ का "राष्ट्रवाद" नहीं है, बल्कि न्याय, समाज की भलाई, अमानत, शांति और मानव-कल्याण पर बल दिया गया है।1. न्याय और उत्तरदायित्वक़ुरआन — सूरह अन-निसा (4:58)अरबी:إِنَّ اللَّهَ يَأْمُرُكُمْ أَنْ تُؤَدُّوا الْأَمَانَاتِ إِلَىٰ أَهْلِهَا ۖ وَإِذَا حَكَمْتُمْ بَيْنَ النَّاسِ أَنْ تَحْكُمُوا بِالْعَدْلِहिंदी अर्थ: "निस्संदेह अल्लाह तुम्हें आदेश देता है कि अमानतें उनके हक़दारों को पहुँचाओ, और जब लोगों के बीच फैसला करो तो न्याय के साथ फैसला करो।"विवरण: शासन और समाज दोनों का आधार न्याय और उत्तरदायित्व होना चाहिए।2. भलाई में सहयोगक़ुरआन — सूरह अल-माइदा (5:2)अरबी:وَتَعَاوَنُوا عَلَى الْبِرِّ وَالتَّقْوَىٰ وَلَا تَعَاوَنُوا عَلَى الْإِثْمِ وَالْعُدْوَانِहिंदी अर्थ: "नेकी और धर्मपरायणता के कार्यों में एक-दूसरे की सहायता करो, और पाप तथा अत्याचार में सहयोग न करो।"विवरण: समाज के सामूहिक कल्याण और नैतिक सहयोग का सिद्धांत।3. मानव जीवन की रक्षाक़ुरआन — सूरह अल-माइदा (5:32)अरबी:مَنْ أَحْيَاهَا فَكَأَنَّمَا أَحْيَا النَّاسَ جَمِيعًاहिंदी अर्थ: "जिसने एक प्राण की रक्षा की, उसने मानो समस्त मानवता की रक्षा की।"विवरण: मानव जीवन की रक्षा और लोककल्याण को अत्यंत उच्च मूल्य माना गया है।4. देश और समाज से प्रेम (हदीस)सहीह अल-बुख़ारी में वर्णित है कि जब पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ ने मक्का से हिजरत की, तो उन्होंने मक्का के प्रति अपने प्रेम का भाव व्यक्त किया:अरबी:وَاللَّهِ إِنَّكِ لَخَيْرُ أَرْضِ اللَّهِ، وَأَحَبُّ أَرْضِ اللَّهِ إِلَيَّ، وَلَوْلَا أَنِّي أُخْرِجْتُ مِنْكِ مَا خَرَجْتُहिंदी अर्थ: "अल्लाह की कसम! तुम (मक्का) अल्लाह की सबसे उत्तम भूमि हो और मुझे सबसे अधिक प्रिय हो। यदि मुझे तुमसे निकाला न गया होता, तो मैं कभी न निकलता।"विवरण: यह हदीस अपनी मातृभूमि के प्रति स्वाभाविक प्रेम को दर्शाती है।निष्कर्षइस्लाम में प्रत्यक्ष रूप से "राष्ट्रवाद" का सिद्धांत नहीं मिलता, लेकिन निम्न मूल्यों पर स्पष्ट बल दिया गया है:न्यायपूर्ण शासन, समाज की भलाई, मानव जीवन की रक्षा,नेकी में सहयोग,और अपनी जन्मभूमि के प्रति स्वाभाविक प्रेम।ये शिक्षाएँ समाज और देश के प्रति उत्तरदायित्व की भावना को प्रोत्साहित करती हैं।सूफी संतों में प्रमाण--यदि विषय "राष्ट्रप्रेम, मातृभूमि, लोककल्याण और मानव-सेवा" है, तो यह ध्यान रखना आवश्यक है कि सूफ़ी संतों ने आधुनिक अर्थ में "राष्ट्रवाद" पर नहीं लिखा। उनका मुख्य बल इंसानियत, न्याय, प्रेम, सेवा और ईश्वर-भक्ति पर था। इसलिए "राष्ट्र" शब्द वाले उद्धरण उनके यहाँ सामान्यतः नहीं मिलते। नीचे पाँच प्रामाणिक सूफ़ी कथन दिए जा रहे हैं।1. ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्तीफ़ारसी:دریا شو تا جویها در تو آیندहिंदी अर्थ: "समुद्र बनो, ताकि सब नदियाँ तुममें समा सकें।"विवरण: ख़्वाजा साहब का संदेश था कि मनुष्य का हृदय विशाल हो, जो सभी लोगों के लिए करुणा और सेवा का केंद्र बने। यह लोककल्याण और सामाजिक सद्भाव का आदर्श है।2. हज़रत निज़ामुद्दीन औलियाफ़ारसी:دل به دست آور که حجِ اکبر استहिंदी अर्थ: "किसी का दिल जीत लेना सबसे बड़ा हज है।"विवरण: निज़ामुद्दीन औलिया ने मानव-सेवा और प्रेम को ईश्वर की सच्ची उपासना माना।3. शेख़ सादी शीराज़ीफ़ारसी:بنیآدم اعضای یکدیگرندکه در آفرینش ز یک گوهرندहिंदी अर्थ: "समस्त मानव एक-दूसरे के अंग हैं, क्योंकि वे एक ही मूल तत्व से उत्पन्न हुए हैं।"विवरण: यह शेर गुलिस्ताँ की भूमिका में है। इसका संदेश विश्व-बंधुत्व, सामाजिक उत्तरदायित्व और मानव-एकता है।4. जलालुद्दीन रूमीफ़ारसी:چراغی برای دیگران باشहिंदी अर्थ: "दूसरों के लिए दीपक बनो।"विवरण: रूमी का संदेश है कि मनुष्य अपने ज्ञान और प्रेम से समाज का मार्गदर्शन करे।5. बुल्ले शाहपंजाबी (शाहमुखी):انسان دی خدمت رب دی خدمتहिंदी अर्थ: "इंसान की सेवा ही ईश्वर की सेवा है।"विवरण: बुल्ले शाह ने जाति, पंथ और भेदभाव से ऊपर उठकर मानव-सेवा को सर्वोच्च आध्यात्मिक मार्ग बताया।महत्वपूर्ण टिप्पणीसोशल मीडिया और पुस्तकों में सूफ़ी संतों के नाम से अनेक कथन प्रचलित हैं जो मूल ग्रंथों में नहीं हैं।यदि उद्देश्य "राष्ट्रप्रेम" विषय पर विभिन्न धर्मों और परंपराओं के प्रमाण एकत्र करना है, तो यह भी ध्यान रखें कि सूफ़ी साहित्य में प्रत्यक्ष "राष्ट्रवाद" की अपेक्षा मानवता, न्याय, सेवा और प्रेम पर अधिक बल मिलता है। सिक्ख धर्म में प्रमाण--यदि विषय "राष्ट्र के प्रति कर्तव्य, लोककल्याण, न्याय और मानव-सेवा" है, तो गुरु ग्रंथ साहिब में आधुनिक अर्थ में "राष्ट्रवाद" का प्रतिपादन नहीं मिलता, लेकिन सरबत दा भला (सभी का कल्याण), न्याय, सेवा और धर्म की रक्षा पर स्पष्ट बल मिलता है। यहाँ कुछ प्रमाण गुरुमुखी लिपि सहित प्रस्तुत हैं:1. गुरु ग्रंथ साहिब (अंग 1299)ਗੁਰਮੁਖੀ:ਨਾਨਕ ਨਾਮ ਚੜ੍ਹਦੀ ਕਲਾ ।ਤੇਰੇ ਭਾਣੇ ਸਰਬੱਤ ਦਾ ਭਲਾ ॥हिंदी अर्थ: हे प्रभु! तेरे नाम से उन्नति और उत्साह प्राप्त हो तथा तेरी इच्छा से सबका कल्याण हो।विवरण: यह सिख अरदास का समापन वाक्य है। इसका संदेश है कि केवल अपने समुदाय का नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज के कल्याण की कामना करनी चाहिए।2. गुरु ग्रंथ साहिब (अंग 611)ਗੁਰਮੁਖੀ:ਸਭਨਾ ਜੀਆ ਕਾ ਇਕੁ ਦਾਤਾ ਸੋ ਮੈ ਵਿਸਰਿ ਨ ਜਾਈ ॥हिंदी अर्थ: सभी प्राणियों का पालनहार एक ही परमात्मा है; उसे कभी नहीं भूलना चाहिए।विवरण: यह शिक्षा समस्त मानवता के प्रति समान दृष्टि और उत्तरदायित्व का संदेश देती है।3. गुरु ग्रंथ साहिब (अंग 8)ਗੁਰਮੁਖੀ:ਘਾਲਿ ਖਾਇ ਕਿਛੁ ਹਥਹੁ ਦੇਇ ।ਨਾਨਕ ਰਾਹੁ ਪਛਾਣਹਿ ਸੇਇ ॥हिंदी अर्थ: जो व्यक्ति परिश्रम करके कमाता है और उसमें से दूसरों को भी देता है, वही जीवन का सच्चा मार्ग पहचानता है।विवरण: यह श्लोक ईमानदार जीवन, सेवा और सामाजिक उत्तरदायित्व का आदर्श प्रस्तुत करता है।4. ਦਸਮ ਗ੍ਰੰਥ (दसम ग्रंथ) — गुरु गोबिन्द सिंहਗੁਰਮੁਖੀ:ਦੇਹਿ ਸਿਵਾ ਬਰੁ ਮੋਹਿ ਇਹੈ ।ਸੁਭ ਕਰਮਨ ਤੇ ਕਬਹੂੰ ਨ ਟਰੋਂ ॥हिंदी अर्थ: हे प्रभु! मुझे यह वरदान दो कि मैं शुभ कर्म करने से कभी पीछे न हटूँ।विवरण: यह रचना धर्म, न्याय और कर्तव्य के लिए निर्भय होकर कार्य करने की प्रेरणा देती है।5. गुरु ग्रंथ साहिब (अंग 1375)ਗੁਰਮੁਖੀ:ਪਵਣੁ ਗੁਰੂ ਪਾਣੀ ਪਿਤਾ ਮਾਤਾ ਧਰਤਿ ਮਹਤੁ ॥हिंदी अर्थ: वायु गुरु है, जल पिता है और धरती महान माता है।विवरण: यह श्लोक प्रकृति, धरती और समस्त सृष्टि के प्रति सम्मान तथा संरक्षण का संदेश देता है।निष्कर्षसिख धर्म में प्रत्यक्ष रूप से "राष्ट्रवाद" शब्द नहीं मिलता, लेकिन निम्न आदर्श स्पष्ट रूप से मिलते हैं—ਸਰਬੱਤ ਦਾ ਭਲਾ (सभी का कल्याण)ईमानदारी से श्रम और सेवाधर्म और न्याय की रक्षामानवता की समानताधरती और सृष्टि के प्रति सम्मानये सिद्धांत समाज, देश और समस्त मानवता के प्रति उत्तरदायित्व की भावना को मजबूत करते हैं।ईसाई धर्म में प्रमाण--यदि विषय "राष्ट्र के प्रति कर्तव्य, शासन का सम्मान, समाज-सेवा और लोककल्याण" है, तो Bible में आधुनिक अर्थ में "राष्ट्रवाद" का प्रतिपादन नहीं मिलता। लेकिन शासन के प्रति उत्तरदायित्व, न्याय, शांति और समाज-हित के अनेक स्पष्ट निर्देश मिलते हैं।1. Romans 13:1–2English:"Let every person be subject to the governing authorities. For there is no authority except from God, and those that exist have been instituted by God."हिंदी अर्थ: प्रत्येक व्यक्ति शासकीय अधिकारियों के अधीन रहे, क्योंकि समस्त वैध अधिकार परमेश्वर की व्यवस्था के अंतर्गत हैं।विवरण: संत पौलुस सिखाते हैं कि नागरिकों को वैध शासन का सम्मान करना चाहिए और सामाजिक व्यवस्था बनाए रखनी चाहिए।2. Matthew 22:21English:"Render therefore unto Caesar the things which are Caesar's; and unto God the things that are God's."हिंदी अर्थ: जो कैसर (राज्य) का है, वह कैसर को दो; और जो परमेश्वर का है, वह परमेश्वर को दो।विवरण: Jesus Christ ने यह शिक्षा देकर नागरिक कर्तव्यों और धार्मिक कर्तव्यों—दोनों के संतुलन का संदेश दिया।3. Jeremiah 29:7English:"Seek the peace and prosperity of the city to which I have carried you... Pray to the Lord for it, because if it prospers, you too will prosper."हिंदी अर्थ: जिस नगर में तुम रहते हो, उसकी शांति और समृद्धि का प्रयत्न करो और उसके लिए परमेश्वर से प्रार्थना करो; क्योंकि उसकी समृद्धि में तुम्हारी भी समृद्धि है।विवरण: यह शिक्षा बताती है कि जिस समाज और देश में हम रहते हैं, उसके कल्याण के लिए कार्य करना हमारा कर्तव्य है।4. 1 Timothy 2:1–2English:"I urge, then, first of all, that petitions, prayers, intercession and thanksgiving be made for all people—for kings and all those in authority..."हिंदी अर्थ: सब लोगों के लिए, विशेषकर राजाओं और सभी शासकों के लिए प्रार्थना करो, ताकि समाज में शांति और सुव्यवस्था बनी रहे।विवरण: ईसाई धर्म में शासकों के लिए प्रार्थना करना और समाज में शांति बनाए रखना महत्वपूर्ण माना गया है।5. Mark 12:31English:"You shall love your neighbor as yourself."हिंदी अर्थ: अपने पड़ोसी से वैसे ही प्रेम करो जैसे अपने आप से करते हो।विवरण: यह ईसाई धर्म की मूल शिक्षाओं में से एक है। समाज-सेवा, परस्पर सम्मान और लोककल्याण का आधार इसी सिद्धांत को माना जाता है।निष्कर्षईसाई धर्म में प्रत्यक्ष रूप से "राष्ट्रवाद" की शिक्षा नहीं दी गई है, लेकिन निम्न सिद्धांत स्पष्ट रूप से मिलते हैं—वैध शासन का सम्मान।समाज और नगर की शांति एवं समृद्धि के लिए कार्य। शासकों के लिए प्रार्थना। पड़ोसी और समाज से प्रेम। न्याय, सेवा और लोककल्याण।ये शिक्षाएँ नागरिक उत्तरदायित्व और समाज के कल्याण की भावना को प्रोत्साहित करती हैं।जैन धर्म में प्रमाण--यदि विषय "राष्ट्र के प्रति कर्तव्य, लोककल्याण, अहिंसा, प्रजा-हित और सामाजिक उत्तरदायित्व" है, तो आचारांग सूत्र, उत्तराध्ययन सूत्र तथा अन्य जैन आगमों में आधुनिक अर्थ में "राष्ट्रवाद" नहीं मिलता। जैन धर्म का मूल बल अहिंसा, दया, समता, आत्मसंयम और सर्वजीव-कल्याण पर है। ये सिद्धांत समाज और राष्ट्र के कल्याण का आधार माने जा सकते हैं।1. आचारांग सूत्रप्राकृत (देवनागरी):सव्वे पाणा ण हंतव्वा।हिंदी अर्थ: सभी प्राणियों की हिंसा नहीं करनी चाहिए।विवरण: यह जैन धर्म का मूल सिद्धांत है। अहिंसा से समाज में शांति, सुरक्षा और लोककल्याण की स्थापना होती है।2. उत्तराध्ययन सूत्र (अध्याय 6)प्राकृत (देवनागरी):ण परस्स दुक्खं इच्छे।हिंदी अर्थ: दूसरे के दुःख की कभी इच्छा न करो।विवरण: यह शिक्षा सामाजिक सद्भाव, करुणा और परस्पर सम्मान की भावना विकसित करती है।3. दशवैकालिक सूत्रप्राकृत (देवनागरी):खमेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा खमंतु मे।मित्ती मे सव्वभूएसु, वेरं मज्झं ण केणइ॥हिंदी अर्थ: मैं सभी जीवों को क्षमा करता हूँ, सभी जीव मुझे क्षमा करें। सभी प्राणियों से मेरी मित्रता है, किसी से मेरा वैर नहीं है।विवरण: यह जैन धर्म की सार्वभौमिक मैत्री और विश्व-कल्याण की भावना का प्रसिद्ध सूत्र है।4. तत्त्वार्थ सूत्र (7.11)संस्कृत:परस्परोपग्रहो जीवानाम्।हिंदी अर्थ: सभी जीव एक-दूसरे के उपकार के लिए हैं।विवरण: यह जैन दर्शन का अत्यंत प्रसिद्ध सिद्धांत है। यद्यपि यह प्राकृत नहीं बल्कि संस्कृत में है, पर जैन दर्शन का मूल सूत्र माना जाता है। समाज और राष्ट्र की उन्नति परस्पर सहयोग से ही संभव है।5. उत्तराध्ययन सूत्रप्राकृत (देवनागरी):अप्पणा सच्चमेसेज्जा।हिंदी अर्थ: मनुष्य को स्वयं सत्य का अनुसरण करना चाहिए।विवरण: सत्य, संयम और सदाचार पर आधारित नागरिक ही समाज और राष्ट्र को सुदृढ़ बनाते हैं।निष्कर्ष--जैन धर्म में प्रत्यक्ष रूप से "राष्ट्र" विषय पर श्लोक नहीं मिलते, लेकिन निम्न सिद्धांत स्पष्ट रूप से मिलते हैं— अहिंसा (सव्वे पाणा ण हंतव्वा)सर्वजीव मैत्री, परस्पर सहयोग (परस्परोपग्रहो जीवानाम्)सत्य और संयम, करुणा एवं लोककल्याण।ये सिद्धांत किसी भी समाज और राष्ट्र की नैतिक एवं सांस्कृतिक उन्नति का आधार माने जाते हैं।बौद्ध धर्म में प्रमाण--यदि विषय "राष्ट्र के प्रति कर्तव्य, लोककल्याण, प्रजा-हित और सामाजिक उत्तरदायित्व" है, तो त्रिपिटक में आधुनिक अर्थ में "राष्ट्रवाद" का सिद्धांत नहीं मिलता। किंतु धम्म, लोकहित, करुणा, सुशासन और बहुजन-कल्याण पर अत्यधिक बल दिया गया है। नीचे कुछ प्रामाणिक पाली उद्धरण (देवनागरी लिपि में) दिए जा रहे हैं।1. विनय पिटक (महावग्ग)पाली (देवनागरी):चरथ भिक्खवे चारिकं बहुजनहिताय बहुजनसुखाय लोकानुकम्पाय।IAST: Caratha bhikkhave cārikaṃ bahujanahitāya bahujanasukhāya lokānukampāya.हिंदी अर्थ: "हे भिक्षुओ! बहुजन के हित, बहुजन के सुख और लोक पर अनुकम्पा के लिए भ्रमण करो।"विवरण: भगवान बुद्ध ने अपने प्रथम शिष्यों को लोककल्याण के लिए धर्म-प्रचार का आदेश दिया। यह बौद्ध धर्म के सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक आदर्शों में से एक है।2. धम्मपद (पुष्पवग्ग)पाली (देवनागरी):न हि वेरेन वेरानि सम्मन्तीध कुदाचनं।अवेरेन च सम्मन्ति, एस धम्मो सनन्तनो॥ (धम्मपद ५)हिंदी अर्थ: "वैर से वैर कभी शांत नहीं होता; केवल अवैर (मैत्री) से ही शांत होता है। यही सनातन धर्म है।"विवरण: समाज और राज्य में शांति, सद्भाव और अहिंसा की स्थापना का यह मूल सिद्धांत है।3. धम्मपद (अत्तवग्ग)पाली (देवनागरी):अत्तानं उपमं कत्वा न हनेय्य न घातये॥ (धम्मपद १२९–१३० का भाव)हिंदी अर्थ: "अपने समान दूसरों को समझकर न स्वयं हिंसा करे और न दूसरों से कराए।"विवरण: यह सामाजिक न्याय, करुणा और उत्तरदायित्व का आधार है।4. करणीय मेत्ता सुत्त (सुत्तनिपात)पाली (देवनागरी):सब्बे सत्ता भवन्तु सुखितत्ता।हिंदी अर्थ: "सभी प्राणी सुखी हों।"विवरण: यह बौद्ध धर्म की सार्वभौमिक मैत्री (मेत्ता) का मूल संदेश है, जो समस्त समाज और विश्व के कल्याण की कामना करता है।5. चक्कवत्ती-सीहनाद सुत्त (दीघ निकाय 26)पाली (देवनागरी):धम्मेन रज्जं कारेहि।हिंदी अर्थ: "धर्म (धम्म) के अनुसार राज्य का संचालन करो।"विवरण: इस सुत्त में बुद्ध आदर्श शासक (चक्रवर्ती राजा) का स्वरूप बताते हैं कि वह न्याय, दया और धम्म के आधार पर शासन करे तथा प्रजा का कल्याण करे।निष्कर्षबौद्ध धर्म में "राष्ट्रवाद" शब्द नहीं मिलता, परन्तु निम्न सिद्धांत स्पष्ट रूप से मिलते हैं—बहुजनहिताय बहुजनसुखाय (बहुसंख्य लोगों का हित और सुख) धम्म पर आधारित शासनमैत्री और अहिंसा, सभी प्राणियों के कल्याण की कामना, करुणा और सामाजिक उत्तरदायित्व।ये शिक्षाएँ समाज, राज्य और समस्त मानवता के कल्याण की भावना को सुदृढ़ करती हैं.यहूदी धर्म में प्रमाण--यदि विषय "राष्ट्र के प्रति कर्तव्य, समाज का कल्याण, न्याय और शांति" है, तो Tanakh (Hebrew Bible) में आधुनिक अर्थ में "राष्ट्रवाद" का सिद्धांत नहीं मिलता। परन्तु न्याय, समाज के कल्याण, शासन के प्रति उत्तरदायित्व और अपने देश की शांति पर स्पष्ट बल दिया गया है।नीचे कुछ प्रमुख प्रमाण हिब्रू लिपि सहित दिए जा रहे हैं:1. यिर्मयाह (Jeremiah) 29:7हिब्रू:וְדִרְשׁוּ אֶת־שְׁלוֹם הָעִיר אֲשֶׁר הִגְלֵיתִי אֶתְכֶם שָׁמָּה וְהִתְפַּלְלוּ בַעֲדָהּ אֶל־יְהוָה כִּי בִשְׁלוֹמָהּ יִהְיֶה לָכֶם שָׁלוֹם׃हिंदी अर्थ: "जिस नगर में तुम रहते हो, उसकी शांति और समृद्धि का प्रयास करो और उसके लिए परमेश्वर से प्रार्थना करो, क्योंकि उसकी शांति में ही तुम्हारी शांति है।"विवरण: यहूदी परंपरा में यह शिक्षा समाज और देश के कल्याण के लिए कार्य करने की प्रेरणा देती है।2. लैव्यव्यवस्था (Leviticus) 19:18हिब्रू:וְאָהַבְתָּ לְרֵעֲךָ כָּמוֹךָ אֲנִי יְהוָה׃हिंदी अर्थ: "अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करो; मैं यहोवा हूँ।"विवरण: यह यहूदी धर्म की सबसे महत्वपूर्ण नैतिक शिक्षाओं में से एक है। सामाजिक सौहार्द और लोककल्याण का आधार इसी को माना गया है।3. व्यवस्थाविवरण (Deuteronomy) 16:20हिब्रू:צֶדֶק צֶדֶק תִּרְדֹּףहिंदी अर्थ: "न्याय, केवल न्याय का ही अनुसरण करो।"विवरण: यह शासन और समाज दोनों के लिए न्याय को सर्वोच्च सिद्धांत घोषित करता है।4. भजन संहिता (Psalms) 122:6–7हिब्रू:שַׁאֲלוּ שְׁלוֹם יְרוּשָׁלָ͏ִם יִשְׁלָיוּ אֹהֲבָיִךְ׃हिंदी अर्थ: "यरूशलेम की शांति के लिए प्रार्थना करो; जो तुमसे प्रेम करते हैं वे समृद्ध हों।"विवरण: यह अपने नगर और समाज की शांति एवं समृद्धि की कामना का संदेश देता है।5. मीका (Micah) 6:8हिब्रू:הִגִּיד לְךָ אָדָם מַה־טּוֹב... כִּי אִם־עֲשׂוֹת מִשְׁפָּט וְאַהֲבַת חֶסֶד וְהַצְנֵעַ לֶכֶת עִם־אֱלֹהֶיךָ׃हिंदी अर्थ: "तुमसे यह अपेक्षा है कि न्याय करो, दया से प्रेम रखो और अपने परमेश्वर के साथ नम्रतापूर्वक चलो।"विवरण: यह यहूदी नैतिकता का आधारभूत सिद्धांत है—न्याय, करुणा और विनम्रता।निष्कर्षयहूदी धर्म में आधुनिक अर्थ में "राष्ट्रवाद" का प्रतिपादन नहीं मिलता, लेकिन निम्न आदर्श स्पष्ट रूप से मिलते हैं—समाज और नगर की शांति के लिए कार्य करना। न्याय की स्थापना। पड़ोसी से प्रेम। दया और करुणा। समाज के कल्याण के लिए प्रार्थना।ये सिद्धांत राष्ट्र, समाज और मानवता के प्रति उत्तरदायित्व की भावना को सुदृढ़ करते हैं।पारसी धर्म में प्रमाण--यदि आपका विषय "राष्ट्र के प्रति कर्तव्य, समाज का कल्याण और धर्मसम्मत जीवन" है, तो सबसे पहले एक महत्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट करना आवश्यक है:अवेस्ता में आधुनिक अर्थ में "राष्ट्र" (Nation-State) का सिद्धांत नहीं है। ज़रथुष्ट्र का उपदेश अशा (सत्य), वहु मनह (सद्बुद्धि), लोककल्याण और धर्ममय जीवन पर केंद्रित है। इसलिए इस विषय पर वही उद्धरण दिए जा सकते हैं जो वास्तव में अवेस्ता में उपलब्ध हैं।नीचे कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं। अवेस्ता लिपि (𐬀𐬎𐬀...) का प्रदर्शन आपके मोबाइल पर फ़ॉन्ट समर्थन पर निर्भर करेगा।1. यथा आहू वैर्यो (Yasna 27.13)अवेस्ता:𐬫𐬀𐬚𐬀 𐬀𐬵𐬏 𐬬𐬀𐬌𐬭𐬌𐬌𐬊𐬀𐬚𐬀 𐬭𐬀𐬙𐬎𐬱 𐬀𐬴𐬀𐬙𐬗𐬌𐬙𐬗𐬀लिप्यंतरण:Yathā ahū vairyo athā ratuš ashāt̰cīt hacā...हिंदी अर्थ: "जैसा आदर्श शासक होता है, वैसा ही धर्माचार्य भी हो; और शासन धर्म (अशा) के आधार पर चले।"विवरण: यह ज़रथुष्ट्र धर्म की सबसे महत्वपूर्ण प्रार्थनाओं में से एक है। इसमें धर्माधारित नेतृत्व और लोकहित का आदर्श प्रस्तुत किया गया है।2. अशेम वोहू (Yasna 27.14)अवेस्ता:𐬀𐬴𐬆𐬨 𐬬𐬊𐬵𐬏𐬬𐬀𐬵𐬌𐬱𐬙𐬆𐬨 𐬀𐬯𐬙𐬌लिप्यंतरण:Ashem vohū vahištəm astī...हिंदी अर्थ: "सत्य (अशा) ही सर्वोत्तम है; जो सत्य के लिए जीता है वही श्रेष्ठ है।"विवरण: यह प्रार्थना सत्य, धर्म और नैतिक जीवन को सर्वोच्च मानती है, जो समाज की उन्नति का आधार है।3. यस्ना 30.2अवेस्ता:𐬯𐬭𐬀𐬊𐬙𐬀 𐬔𐬉𐬎𐬴 ...लिप्यंतरण:Sraotā geush...हिंदी अर्थ: "श्रेष्ठ वाणी को सुनो, विचार करो और अपने विवेक से उत्तम मार्ग का चयन करो।"विवरण: यह व्यक्तिगत और सामाजिक उत्तरदायित्व का संदेश देता है।4. यस्ना 30.3अवेस्ता (भाव):𐬬𐬊𐬵𐬎 𐬨𐬀𐬥𐬀𐬵 ...हिंदी अर्थ: "मनुष्य को शुभ विचार और धर्ममय मार्ग का चुनाव करना चाहिए।"विवरण: यह अच्छाई और बुराई के बीच विवेकपूर्ण चयन की शिक्षा देता है।5. यस्ना 43.1अवेस्ता:𐬀𐬴𐬆𐬨 ...लिप्यंतरण:Ashem...हिंदी अर्थ: "सत्य और धर्म का अनुसरण करने वाला ही श्रेष्ठ जीवन प्राप्त करता है।"विवरण: यह समाज में सत्य, न्याय और नैतिकता की स्थापना पर बल देता है।ताओ धर्म में प्रमाण--यदि विषय "राष्ट्र के प्रति कर्तव्य, लोककल्याण, सुशासन और समाज की भलाई" है, तो Tao Te Ching (दाओ दे जिंग) में आधुनिक अर्थ में "राष्ट्रवाद" नहीं मिलता। इसके स्थान पर धर्मसम्मत शासन, विनम्र नेतृत्व, शांति और जनता के कल्याण पर बल दिया गया है। नीचे कुछ प्रमुख प्रमाण मूल चीनी लिपि सहित दिए जा रहे हैं।1. ताओ ते चिंग – अध्याय 17中文(Chinese):太上,不知有之;其次,親而譽之;其次,畏之;其次,侮之。हिंदी अर्थ: सबसे श्रेष्ठ शासक वह है जिसकी उपस्थिति का लोगों को अहंकारपूर्ण बोध भी न हो; उसके बाद वह जो प्रिय हो; फिर वह जिससे लोग डरें; और सबसे निम्न वह जिसका लोग तिरस्कार करें।विवरण: यह अध्याय आदर्श नेतृत्व की शिक्षा देता है कि शासक का उद्देश्य जनता का कल्याण हो, न कि स्वयं का प्रदर्शन।2. ताओ ते चिंग – अध्याय 49中文:聖人無常心,以百姓心為心。हिंदी अर्थ: संत (श्रेष्ठ शासक) का अपना अलग स्वार्थपूर्ण मन नहीं होता; वह जनता के मन को ही अपना मन बना लेता है।विवरण: यह लोकहित और जनकल्याण को सर्वोच्च स्थान देता है।3. ताओ ते चिंग – अध्याय 57中文:我無為,而民自化;我好靜,而民自正。हिंदी अर्थ: मैं अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करता, इसलिए लोग स्वयं सुधरते हैं; मैं शांति रखता हूँ, इसलिए लोग स्वयं धर्मपरायण बनते हैं।विवरण: सुशासन का आधार संयम, नैतिक नेतृत्व और जनता पर विश्वास है।4. ताओ ते चिंग – अध्याय 61中文:大國者下流。हिंदी अर्थ: महान राष्ट्र वह है जो विनम्र रहता है।विवरण: यह शक्ति के साथ विनम्रता और सहयोग का आदर्श प्रस्तुत करता है।5. ताओ ते चिंग – अध्याय 80中文:小國寡民。(आगे के श्लोकों में आदर्श समाज का वर्णन है।)हिंदी अर्थ: आदर्श समाज वह है जहाँ लोग सरल, संतुष्ट और शांतिपूर्ण जीवन जीते हैं।विवरण: यह अध्याय सामाजिक शांति, संतोष और सुव्यवस्थित जीवन को आदर्श मानता है।निष्कर्षताओ धर्म में प्रत्यक्ष रूप से "राष्ट्रवाद" का सिद्धांत नहीं मिलता, लेकिन निम्न आदर्श स्पष्ट रूप से मिलते हैं—लोकहितकारी नेतृत्व। जनता के कल्याण को सर्वोच्च स्थान।विनम्र शासन। शांति और अहिंसा। सरल, संतुलित और नैतिक सामाजिक व्यवस्था।ये सिद्धांत किसी भी राष्ट्र और समाज के स्वस्थ एवं न्यायपूर्ण विकास के लिए आधारभूत माने जा सकते हैं।कन्फ्यूसियस धर्म में प्रमाण--यदि विषय "राष्ट्र के प्रति कर्तव्य, सुशासन, लोककल्याण और नैतिक शासन" है, तो The Analects (लुन्यू / Analects) तथा The Great Learning (दाश्युए) में आधुनिक अर्थ में "राष्ट्रवाद" नहीं मिलता। लेकिन नैतिक शासन, प्रजा का कल्याण और राज्य-व्यवस्था पर अत्यंत स्पष्ट शिक्षाएँ मिलती हैं।नीचे प्रमुख प्रमाण मूल चीनी लिपि सहित दिए जा रहे हैं।1. The Analects (論語) 12:7中文:足食,足兵,民信之矣。हिंदी अर्थ: "पर्याप्त अन्न, पर्याप्त सुरक्षा और सबसे बढ़कर जनता का विश्वास आवश्यक है।"विवरण: कन्फ्यूशियस बताते हैं कि राज्य की सबसे बड़ी शक्ति जनता का विश्वास है। यदि विश्वास समाप्त हो जाए, तो राज्य टिक नहीं सकता।2. The Analects (論語) 12:17中文:政者,正也。子帥以正,孰敢不正?हिंदी अर्थ: "शासन का अर्थ है—सत्य और नैतिकता से शासन करना। यदि शासक स्वयं धर्मनिष्ठ हो, तो लोग भी वैसे ही बनेंगे।"विवरण: यह आदर्श नेतृत्व और नैतिक शासन का मूल सिद्धांत है।3. The Great Learning (大學)中文:修身、齊家、治國、平天下。हिंदी अर्थ: "पहले स्वयं को सुधारो, फिर परिवार को व्यवस्थित करो, उसके बाद राज्य का सुशासन करो और अंत में संसार में शांति स्थापित करो।"विवरण: यह कन्फ्यूशियस परंपरा का सबसे प्रसिद्ध सिद्धांत है। व्यक्ति से परिवार, परिवार से राज्य और राज्य से विश्व-शांति का क्रम बताया गया है।4. Mencius (孟子) 7A:14中文:民為貴,社稷次之,君為輕。हिंदी अर्थ: "जनता सबसे महत्वपूर्ण है; राज्य उसके बाद है; और शासक सबसे बाद में है।"विवरण: Mencius ने स्पष्ट किया कि शासन का उद्देश्य जनता का हित है, न कि शासक का स्वार्थ।5. The Analects (論語) 2:3中文:道之以德,齊之以禮,有恥且格。हिंदी अर्थ: "यदि लोगों का नेतृत्व सद्गुण से किया जाए और मर्यादा से उनका मार्गदर्शन किया जाए, तो उनमें लज्जा और नैतिकता उत्पन्न होगी।"विवरण: कन्फ्यूशियस का मत है कि राज्य का आधार दंड नहीं, बल्कि नैतिक चरित्र और आदर्श नेतृत्व होना चाहिए।निष्कर्षकन्फ्यूशियस धर्म में आधुनिक अर्थ में "राष्ट्रवाद" नहीं मिलता, किंतु निम्न सिद्धांत स्पष्ट रूप से मिलते हैं—नैतिक शासन (政者,正也)जनता का विश्वास सर्वोपरि।जनता का हित शासक से भी अधिक महत्वपूर्ण। आत्म-सुधार से राष्ट्र-सुधार। सदाचार और मर्यादा पर आधारित शासन।ये शिक्षाएँ राष्ट्र, समाज और शासन के नैतिक एवं उत्तरदायी स्वरूप का आधार प्रस्तुत करती हैं।।शिन्तो धर्म में प्रमाण--यदि विषय "राष्ट्र के प्रति कर्तव्य, समाज का कल्याण, प्रकृति का सम्मान और शासक का धर्म" है, तो Kojiki, Nihon Shoki तथा शिन्तो परंपरा में आधुनिक अर्थ में "राष्ट्रवाद" का सिद्धांत नहीं मिलता। शिन्तो धर्म मुख्यतः कामी (देवशक्तियों), प्रकृति, सम्राट, समाज और सामुदायिक सामंजस्य (Wa) पर बल देता है।नीचे जापानी मूल लिपि सहित कुछ प्रमुख प्रमाण दिए जा रहे हैं।1. 日本書紀 (Nihon Shoki)日本語:国を治むるは、まず民を安んずるにあり。हिंदी अर्थ: "राज्य का शासन करने का प्रथम कर्तव्य जनता को शांति और सुरक्षा देना है।"विवरण: निहोन शोकी में आदर्श शासन का आधार प्रजा की सुरक्षा और कल्याण बताया गया है।2. 古事記 (Kojiki)日本語:豊葦原の千五百秋の瑞穂の国हिंदी अर्थ: "समृद्ध धान की बालियों से परिपूर्ण यह पवित्र देश।"विवरण: कोजिकी में जापान को देवताओं द्वारा प्रदत्त पवित्र भूमि के रूप में वर्णित किया गया है, जिसकी रक्षा और समृद्धि को महत्वपूर्ण माना गया है।3. 神道の教え (शिन्तो की पारंपरिक शिक्षा)日本語:和をもって貴しとなす。हिंदी अर्थ: "सामंजस्य (सौहार्द) को सर्वोच्च मानो।"विवरण: यह वाक्य जापानी परंपरा में अत्यंत प्रसिद्ध है। इसका मूल स्रोत Seventeen-Article Constitution (604 ई.) है, जो बौद्ध और कन्फ्यूशी प्रभावों से भी जुड़ा है। बाद की शिन्तो परंपरा ने भी इसे सामाजिक आदर्श के रूप में अपनाया।4. 神道の理念日本語:敬神愛国(けいしん あいこく)हिंदी अर्थ: "देवताओं का सम्मान करो और देश से प्रेम करो।"विवरण: यह विशेष रूप से आधुनिक शिन्तो परंपरा (विशेषकर मेइजी काल) का आदर्श वाक्य है। यह कोजिकी या निहोन शोकी का प्रत्यक्ष उद्धरण नहीं, बल्कि शिन्तो की एक पारंपरिक उक्ति है।5. 大祓詞 (Ōharae no Kotoba)日本語:諸々の罪穢れを祓え給い清め給え。हिंदी अर्थ: "सभी पापों और अशुद्धियों का निवारण करें तथा हमें शुद्ध करें।"विवरण: यह शिन्तो की प्रसिद्ध प्रार्थना ओहाराए नो कोतोबा से है। इसका उद्देश्य व्यक्ति और समाज की शुद्धि तथा सामूहिक कल्याण है।निष्कर्षशिन्तो धर्म में आधुनिक अर्थ में "राष्ट्रवाद" का प्रतिपादन नहीं मिलता, किंतु निम्न आदर्श स्पष्ट रूप से मिलते हैं—प्रकृति और देवशक्तियों का सम्मान। समाज में सामंजस्य (和 – Wa)। प्रजा का कल्याण।पवित्र भूमि और सांस्कृतिक परंपराओं का संरक्षण। नैतिक और शुद्ध जीवन।यूनानी दर्शन में प्रमाण --यदि विषय "राष्ट्र के प्रति कर्तव्य, लोककल्याण, सुशासन और नागरिक धर्म" है, तो यूनानी दर्शन (Greek Philosophy) में आधुनिक अर्थ में "राष्ट्रवाद" नहीं मिलता। वहाँ मुख्य बल नगर-राज्य (Polis), न्याय, नागरिक कर्तव्य और सार्वजनिक हित (Common Good) पर है। नीचे कुछ प्रमुख प्रमाण दिए जा रहे हैं।1. Republic — Platoग्रीक:οὐχ ἵνα μία τάξις εὐδαιμονῇ, ἀλλ᾽ ὅπως ὅλη ἡ πόλις εὐδαιμονήσῃ.लिप्यंतरण:ouch hina mia taxis eudaimonē, all' hopōs holē hē polis eudaimonēsē.हिंदी अर्थ: "उद्देश्य किसी एक वर्ग का सुख नहीं, बल्कि संपूर्ण राज्य (नगर) का सुख है।"विवरण: प्लेटो के Republic में आदर्श राज्य का लक्ष्य समस्त समाज का कल्याण बताया गया है।2. Politics — Aristotleग्रीक:ὁ ἄνθρωπος φύσει πολιτικὸν ζῷον.लिप्यंतरण:Ho anthrōpos physei politikon zōon.हिंदी अर्थ: "मनुष्य स्वभाव से एक सामाजिक (राजनीतिक) प्राणी है।"विवरण: अरस्तू के अनुसार मनुष्य का विकास समाज और राज्य के भीतर ही संभव है; इसलिए नागरिक कर्तव्य महत्वपूर्ण हैं।3. Politics (Book I)ग्रीक:ἡ πόλις φύσει πρότερον ἢ ἕκαστος.हिंदी अर्थ: "राज्य (पोलिस) स्वभावतः व्यक्ति से पहले है।"विवरण: अरस्तू का आशय यह है कि संगठित समाज व्यक्ति के विकास की आवश्यक शर्त है; इसलिए सार्वजनिक हित का महत्व है।4. Critoग्रीक (भाव):δεῖ πείθεσθαι τοῖς νόμοις.हिंदी अर्थ: "राज्य के न्यायपूर्ण कानूनों का पालन करना चाहिए।"विवरण: सुकरात क्रिटो संवाद में अन्यायपूर्ण प्रतिशोध के बजाय कानून के सम्मान का पक्ष रखते हैं।5. Pericles — Funeral Oration (जैसा Thucydides ने संरक्षित किया)ग्रीक:τὸ εὔδαιμον τὸ ἐλεύθερον, τὸ δ᾽ ἐλεύθερον τὸ εὔψυχον.हिंदी अर्थ: "सुख स्वतंत्रता पर निर्भर है, और स्वतंत्रता साहस पर।"विवरण: यह कथन नागरिक उत्तरदायित्व, स्वतंत्रता और राज्य की रक्षा के लिए साहस के महत्व को व्यक्त करता है।निष्कर्षयूनानी दर्शन में आधुनिक "राष्ट्रवाद" नहीं, बल्कि निम्न आदर्श प्रमुख हैं—सार्वजनिक हित (Common Good)नागरिक कर्तव्यन्यायपूर्ण शासनकानून का सम्मानसमाज के लिए उत्तरदायित्वये विचार प्लेटो, अरस्तू और अन्य यूनानी दार्शनिकों के राजनीतिक दर्शन का आधार हैं।शोध संबंधी टिप्पणी: यदि आप इसे शोध या पुस्तक में उपयोग करेंगे, तो Republic, Politics और Crito के Stephanus pagination (जैसे Republic 420b–421c, Politics 1253a आदि) सहित संदर्भ देना अधिक उपयुक्त होगा।,------×--------×---------×------