Postmortem of the Ego - Part 11 in Hindi Spiritual Stories by Shivraj Bhokare books and stories PDF | अहंकार का पोस्टमार्टम - भाग 11

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अहंकार का पोस्टमार्टम - भाग 11

दोहा : 21

कबीर माया तजी तो क्या भया, मान तजा नहीं जाय।
मान बड़े मुनिवर गिले, मान सबन को खाय॥

 कहानी: सोने का कमंडल और लंगोट का गौरव

स्वामी विरक्तनंद ने जवानी में ही अपना आलीशान घर और भरा-पूरा परिवार छोड़ दिया था। वे पिछले बीस सालों से हिमालय की एक गुफा में सिर्फ एक लंगोट पहनकर रह रहे थे। उनके पास संपत्ति के नाम पर सिर्फ एक मिट्टी का कमंडल था। लोग उनके इस कड़े त्याग को देखकर उनके चरणों में गिर जाते थे और स्वामी जी को अपने इस महात्याग पर गहरा गर्व था।
एक दिन एक राजा ने उनकी प्रसिद्धि सुनकर उन्हें सोने का एक सुंदर, नक्काशीदार कमंडल भेंट कर दिया। स्वामी जी ने सोचा, "सोना तो मिट्टी ही है," और उसे रख लिया। लेकिन जब वे भिक्षा मांगने गाँव पहुँचे, तो लोग उनके त्याग की जगह उस सोने के चमचमाते कमंडल की चर्चा करने लगे। स्वामी जी को यह बात चुभ गई। उनका अहंकार आहत हुआ कि लोग उन्हें त्यागी के रूप में नहीं देख रहे हैं।
वे तुरंत कुटिया पर लौटे और गुस्से में उस सोने के कमंडल को नदी में फेंक दिया। वे ज़ोर से हँसे और बोले, "देखा! मैंने सोने को भी लात मार दी। मुझ जैसा त्यागी कोई नहीं हो सकता।"
तभी वहाँ खड़े एक साधारण लकड़हारे ने उन्हें देखा और मुस्कुराकर बोला, "महाराज! आपने सोना तो नदी में फेंक दिया, लेकिन 'मैंने त्याग किया' का यह सोने जैसा भारी अहंकार अपनी छाती से चिपका रखा है। अगर सच में त्याग दिया था, तो फेंकने के बाद खुद की पीठ थपथपाने की क्या ज़रूरत थी?" स्वामी जी अवाक रह गए। उन्हें समझ आ गया कि चीज़ें छोड़ना आसान है, लेकिन 'त्यागी होने का गौरव' छोड़ना सबसे मुश्किल है।

सीख:

बात पकड़ में आ रही है? तुमने घर छोड़ दिया, दुकान छोड़ दी, बीवी-बच्चे छोड़ दिए और जंगल भाग गए। फिर वहाँ बैठकर गिन रहे हो कि "मैंने क्या-क्या छोड़ दिया।" अरे! जो छूट गया, उसकी उल्टी गिनती क्यों रख रहे हो? अगर कचरा साफ कर दिया, तो क्या कचरे की लिस्ट बनाकर जेब में घूमते हो कि 'देखो मैंने इतना कचरा फेंका है'?
यह तुम्हारा त्याग नहीं है, यह अहंकार का नया धंधा है। पहले तुम्हें अपनी 'दौलत' पर घमंड था, अब तुम्हें अपने 'त्याग' पर घमंड है। पहले तुम नोटों की गड्डी दिखाकर अपनी छाती चौड़ी करते थे, अब तुम अपनी फटी लंगोट दिखाकर दुनिया से सम्मान मांग रहे हो। जब तक भीतर यह ग्रंथि बैठी है कि "मैं त्यागी हूँ और बाकी दुनिया संसारी है", तब तक तुमने कुछ नहीं छोड़ा। तुमने बस अपने अहंकार का ब्रांड (Brand) बदल लिया है!
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 दोहा :22

तपसी सोई जो तप को तजै, औरै तजै सो त्यागी।
कहै कबीर सोई घर बारी, जो राम नाम लौ लागी॥

 कहानी: मौन व्रत और अधूरी तपस्या

एक आश्रम में बाबा मौनानंद रहते थे। उन्होंने संकल्प लिया था कि वे बारह वर्षों तक पूर्ण 'मौन' रहेंगे। पाँच साल बीतते-बीतते उनकी ख्याति चारों तरफ फैल गई। बाबा अपनी कुटिया के बाहर एक तख्ती लगाकर बैठते थे, जिस पर रोज़ लिखते थे: "आज मेरे मौन का २५००वाँ दिन है।" जो भी भक्त आता, वह तख्ती देखकर हैरान रह जाता। बाबा आँखें बंद करके आशीर्वाद देते, लेकिन भीतर ही भीतर उनका अहंकार फूल जाता कि "देखो, कैसे बड़े-बड़े लोग मेरे इस मौन के सामने झुक रहे हैं।"
एक दिन आश्रम में एक कबीरपंथी फकीर आया और ज़ोर-ज़ोर से भजन गाने लगा। बाबा मौनानंद के ध्यान में बाधा आई, तो उन्होंने गुस्से में आकर तख्ती पर लिखा: "यहाँ शोर मत करो, मैं घोर तपस्या और मौन में हूँ।" और तख्ती फकीर के सामने अड़ा दी।
फकीर ने तख्ती पढ़ी, हँसा और बोला, "बाबा, मुँह तो बंद है, पर यह तख्ती इतना ज़ोर से क्यों चिल्ला रही है?"
बाबा ने झल्लाकर फिर लिखा: "मूर्ख! मैं पांच साल से नहीं बोला हूँ। मेरी तपस्या को भंग मत कर।"
फकीर ने बड़े शांत भाव से कहा, "महाराज, मुँह से शब्द नहीं निकल रहे, लेकिन आपकी उंगलियां खड़िया पकड़कर चीख-चीख कर गवाही दे रही हैं कि 'देखो मैं कितना बड़ा तपस्वी हूँ!' आपका मौन तो सिर्फ होठों पर ताला है, भीतर तो श्रेष्ठता के अहंकार का भयंकर कोलाहल चल रहा है। इस झूठे मौन से अच्छा तो वह संसारी है जो शांति से जीता है।" बाबा मौनानंद को झटका लगा। उन्हें समझ आया कि उनका मौन सत्य के लिए नहीं, बल्कि दुनिया से अपनी तपस्या का लोहा मनवाने के लिए था l

सीख :
पकड़िए इस चाल को! मुँह बंद कर लेने से कोई मौन नहीं हो जाता। तुम उपवास रखते हो, मौन व्रत रखते हो, कांटों पर सोते हो—ये सब क्या है? यह सब शरीर पर किया जाने वाला अत्याचार है जिसे तुम 'तपस्या' का नाम देते हो। और इस तपस्या के पीछे असली मालिक कौन बैठा है? तुम्हारा वही सड़ा हुआ अहंकार!
तुम भूखे रहते हो ताकि चार लोग कहें कि "वाह! क्या दृढ़ संकल्पी महात्मा हैं।" तुम मौन रहते हो ताकि लोग तुम्हारी चुप्पी की पूजा करें। असली तपस्या किसी क्रिया को पकड़ना नहीं है, बल्कि उस 'तपस्या के अहंकार' को ही छोड़ देना है। जब तक तुम्हारे भीतर यह चाहत बची है कि दुनिया तुम्हारी साधना को देखे, उसकी सराहना करे, तब तक तुम्हारी तपस्या सिर्फ एक सर्कस का खेल है। भीतर की बकवास को बंद करो, होठों को बंद करने से कुछ नहीं होगा।
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