काल कोठरी ----- (21) चीची के हाथ मे देख वो पिक को वो जैसे घबरा गया। मिटू एक दम से सिर फिरा सा होकर बोला, " कया हुआ आटी को ----" चीची एक दम से पगला गया। " कया कहा तुमने ---" चीची एक से उछला। " अभी चलो कहा पर है, ले चलो मुझे " चीची सहम गया। " जिसके हाथों ने मुझे बाप की कुटाई से बचाया हो, वो भला आज कठिन बीमार समय मे मेरी प्रतिछा करती होंगी। " चीची सुन कर और घबरा गया। " बापरे किधर फ़स गया.. या फसने लगा हुँ... मन मे चल रही कड़ियों को जुड़ा उसने। " किसी का भला वो भी आटी का... जल्दी चल.....
चलते चलते सहमे सहमे वो हस्पताल मे चले गए.... " कौन हो भाई... " गेंदा राम ने पूछा।
हम सुजाता की रिश्तेदार है... मै चीची हुँ और ये मिटू है। " गेंदा राम खासते हुए बोला, ठहरो फोन कर लू।
शाम ढल नी शुरू हो चुकी थी... कितना मौसम न ठंडा न गर्म था। पंछीओ की चिहा चिहाट जाने की शायद सुचना थी कि रात होने वाली है। थोड़ी देर बाद पुलिस की गाड़ी... " लो आ गे साहब। " वही शक्श देख कर चीची की तो चू हो गयी थी। अजीत पाल ने आते ही रजिस्टर मे दोनों के अड्रेस नोट करने को गेदा राम को कहा ही था। कि चीची हाथ जोड़ कर बोला, " सर मुझ को माफ करना, गलती हो गयी। "
"कया बोलता है तू.... गलती नहीं ये काम के पैसे ही है रख लो " घबरा के चीची का हाथ जीन की फ़टी जेब मे ही रह गया। 🌹 हाथ जोड़ के बोला --- सर ये जो मेरे साथ मिंटू है, ये उसकी आटी थी... मिलना चाहता है। "
"कोई बात नहीं, पहली बात डरना नहीं। साथ चलो मेरे जीप मे आराम से बैठो। " एक टी स्टाल मे दोनों कमरे के अंदर चले गए। हवलदार दो चाये और दो तीन समोसे कह दो। " चीची खुद ही इस झझट से दूर रहना चाहता था, " मिटू तुम्हरा नाम है ! इसका नाम चीची... चीची तुम जाने की मत सोचो, निकलना चाहते हो नहीं। " अजीत पाल ने पांच फोटो एक सी वखरे पोजो की मिटू को दिखाई... "इस मे कौन आटी है तुमाहरी "
अजीत पाल ने लम्बी सास ली। फिर मिटू उनकी फोटो देखता बोला.... " सभी फोटो उनकी ही है। " फिर रुक कर बोला, " सर, ये हमारे पड़ोसी थे... गंदी बस्ती मे दिल्ली की जो अब सिकदरा बाद है, उसमे। " फिर वो गहरी सास लेकर बोला.... " सर वो कहा है ठीक है "
अजीत पाल ने बताया तो वो आंसू नहीं रोक सका... "ओह सर ये कैसे हो गया । " वो चुप थे। सारी कहानी सुनने के बाद उसे यकीन नहीं हो रहा था... " झूठ नहीं लगता आपको "--- अजीत पाल गहरी सास खींच कर बोला " नहीं बेटा, मै खुद हैरान था... ये कैसे हो गया.. हैरान हो गया मै। "
हलात कब बिगड़ जाये कोई नहीं समझ सकता। समय और नसीब कभी एक समय मै बहुत कम मिलते है... देखा है, मैंने... सोचा है मैंने।
पता नहीं कितनी बार.......... ( लगातार ऐसे ही चलता रहेगा ऐसे ही उपन्यास की हर कड़ी।)
नीरज शर्मा -----144702।