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रूद्रिका की बात सुनकर रौक्षिण की भंवे सिकुड गई।
" कर्ज ? कैसा कर्ज ? ", रौक्षिण ने सवाल किया।
रूद्रिक शरारत से मुस्कुराई और अफनी पीठ पीछे बंधे हाथ आगे कर दिए। उसने अपनी मुट्ठियां खोली जिसमे पांच टॉफिया रखी थी।
उन टॉफियो को देख रौक्षिण असमंजस की स्थिती मे चला गया।
" ये क्या है मिस सोमवंशी ? ", रौक्षिण ने एक बार फिर सवाल किया।
" टॉफी ! ", रूद्रिका ने बच्चो की तरह जवाब दिया।
रौक्षिण ने अपनी आंखे गोल घुमाई और चिढ कर बोला., " वो.तो मुझे भी दिखाई दे रहा है। पर आप ये मुझे खायो दिखा रही है। "
रूद्रिका ने अपनी आंखे बडी करी और नाटकीय अंदाज मे बोली, " रौक्षिण सर , कल आपने ही तो कहा था कि मै जाकर टॉफी खाऊं । तो मैने सोचा बडे बुर्जुग की बात माना करते है। मैने मानी और टॉफी खाई। मुझे अच्छी लगी तो मैने होचा मै अपनु खडुस , सडू , अकडू प्रोफेसर के लिए भी टॉफी ले लूं ताकि उनका कडवा हा मुंह मीठा हो जाए। "
रूद्रिका की बात सुनकर रौक्षिण ने उसे घूर कर देखा तो रूद्रिका ने अफने बत्तीस के बत्तीस दांत दिखा दिए।
" ये क्या बचकानी हरकत है मिस सोमवंशी । मै कोई टॉफी नही खाने वाला । चलिए रास्ता छोडिए।", कहकर रौक्षिण रूद्रिका की बगल से निकलने लगा।
अपने प्लान को फ्लॉप होता देख रूद्रिका की आंखे बडी हो गई। वो झटके से मुडी और एक बार फिर रौक्षिण का रास्ता रोक कर खडी हो गई। इस बार वो.रौक्षिण से दो कदमो की दूरी पर थी। किसी लडकी को अपने इतने करीब खदा देख रौक्षिण की धडकने तेज हो गई और उसके कान हल्के गुलाबी पड गए।
रौक्षिण की हैरानी का फायदा उठाते हुए रूद्रिका आगे बडी और उसने हाथ बडा कर रौक्षिण के सूट की जेब मे पांचो की पांचो टॉफी डाल दी। रौक्षिण की आंखे बडक हो गई। वो कुछ कहता उससे पहले ही रूद्रिका मुडी और हँसते हुए भाग गई।
उसे देख कर रौक्षिण ने ना मे सिर हिला, बुदबुदाया , " क्रेजी गर्ल ! "
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रुद्रिका कॉरिडोर में दौड़ती हुई सीधे अपनी क्लास की तरफ आ रही थी। उसकी सांसें फूल रही थीं, और दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। जैसे ही वह क्लास के दरवाज़े पर पहुँची, उसने खुद को रोका, अपने बिखरे बालों को उंगलियों से ठीक किया और गहरी सांस ली।
"रुद्री! तू इतनी हाँफ क्यों रही है? और तेरे चेहरे पर यह कैसी 144 वोल्ट की मुस्कान है?" रिया ने उसे देखते ही अपनी सीट से बैग हटाते हुए पूछा।
रुद्रिका उसके बगल में बैठी और अपनी बेंच पर सिर टिका कर हंसने लगी। "रिया... तू सोच भी नहीं सकती कि आज यह लाल पांडा क्या करके आया है!"
"क्या किया तूने?" रिया ने आँखें बड़ी कीं।
"मैंने उस खडूस, अकड़ू और सड़े हुए चेहरे वाले मिस्टर
रायदित की जेब में खुद अपने हाथों से टॉफियाँ डाल दीं! तूने उसका चेहरा देखा होता रिया... बिल्कुल ऐसा लग रहा था जैसे उसने टॉफी नहीं, कोई टाइम बम देख लिया हो!" रुद्रिका ने धीरे से फुसफुसाते हुए कहा।
रिया ने डरकर अपना हाथ अपने मुंह पर रख लिया। "रुद्री... तू पागल हो गई है क्या? वो रौक्षिण रायदित है! अगर उसने तेरे पापा से शिकायत कर दी या यूनिवर्सिटी के ट्रस्टी से कहकर तुझे सस्पेंड करवा दिया तो?"
यह सुनते ही रुद्रिका की हंसी पल भर के लिए गायब हो गई। उसके दिमाग में सुबह की वो घटना कौंध गई—कैसे उसके पिता ने उसे खुद से झटके से अलग कर दिया था और वह सीढ़ियों पर गिरते-गिरते बची थी। उसकी आँखों के कोने में एक पल के लिए उदासी छाई, लेकिन उसने तुरंत उसे झटक दिया।
"नहीं करेगी वो शिकायत," रुद्रिका ने खिड़की के बाहर देखते हुए धीमे से कहा। "वो जितना बाहर से डोमिनेटिंग और सख्त दिखता है ना, अंदर से उतना ही जेंटलमैन है। वो लड़कियों से उलझने वाला इंसान नहीं है।"
"अरे वाह! दो ही दिनों में तू रायदित कॉर्पोरेशन के चाणक्य का पूरा कैरेक्टर एनालिसिस कर चुकी है?" रिया ने उसे चिढ़ाया।
"यह बिज़नेस स्ट्रेटेजी है, माय डियर फ्रेंड। दुश्मन को हराने के लिए पहले उसकी फितरत को समझना पड़ता है," रुद्रिका ने अपनी किताबों को खोलते हुए कहा, लेकिन उसका दिल जानता था कि वह सिर्फ बिज़नेस के लिए नहीं, बल्कि उस इंसान के उस अनजाने, शर्मीले रूप को दोबारा देखने के लिए यह सब कर रही थी।
ठीक 11:00 बजे रौक्षिण ने लेक्चर हॉल में कदम रखा। पूरा हॉल हमेशा की तरह शांत हो गया। आज रौक्षिण ने पोडियम पर आते ही अपनी आँखें सीधे बीच वाली रो की तरफ घुमाईं।
वहाँ रुद्रिका बैठी थी, अपनी ठुड्डी पर हाथ रखे, सीधे उसे ही देख रही थी। जैसे ही दोनों की नज़रें मिलीं, रुद्रिका ने बहुत ही धीरे से अपनी जेब से एक मैंगो बाइट टॉफी निकाली और उसे बेंच पर रखकर रौक्षिण को थम्स-अप दिखाया।
रौक्षिण ने अपनी आँखें सिकोड़ीं। उसने एक पल के लिए अपना गला साफ किया, अपने आईपैड को चालू किया और उसकी भारी, गंभीर आवाज़ हॉल में गूँजी, "लास्ट क्लास में हमने इलयुजन पर बात की थी। आज हम बात करेंगे 'मार्केट पेनिट्रेशन' और 'ट्रस्ट बिल्डिंग' पर... बिज़नेस में जब आप किसी नए मार्केट में कदम रखते हैं, तो आपका पहला कदम सामने वाले का भरोसा जीतना होना चाहिए, न कि अपनी ताकत दिखाना।"
रौक्षिण लेक्चर दे रहा था, लेकिन आज पहली बार उसका ध्यान अपनी स्लाइड्स से ज़्यादा उस लाल हुडी वाली लड़की पर था। रुद्रिका लगातार नोट्स बनाने का नाटक कर रही थी, लेकिन हर दो मिनट बाद वह कुछ ऐसा करती कि रौक्षिण का ध्यान भटक जाता। कभी वह अपनी पेन को उंगलियों पर नचाती, तो कभी जानबूझकर हवा में एक लंबी सांस छोड़ती।
"मिस्टर रायदित..." लेक्चर के बीच में रुद्रिका ने अपना हाथ उठाया।
रौक्षिण रुका। "यस, मिस सोमवंशी?"
"सर, अगर सामने वाला मार्केट कॉम्पिटिटर बहुत ही अकड़ू और खडूस हो, जो हमारी किसी भी स्ट्रेटेजी को भाव न दे रहा हो... तो क्या उसे भरोसे में लेने के लिए हमें कुछ 'मीठा' इस्तेमाल करना चाहिए?" रुद्रिका ने 'मीठा' शब्द पर ज़ोर देते हुए पूछा।
पूरी क्लास को तो यह सिर्फ एक बिज़नेस का सवाल लगा, लेकिन रौक्षिण को अच्छी तरह समझ आ गया कि यह तीर कहाँ चलाया गया था। उसकी जेब में रखी वो पाँच टॉफियाँ जैसे अचानक भारी होने लगी थीं।
रौक्षिण ने पोडियम पर दोनों हाथ टिकाए, थोड़ा आगे झुका
और अपनी गहरी भूरी आँखों से सीधे रुद्रिका को देखते हुए कहा, "मिस सोमवंशी, बिज़नेस में मीठी चीज़ें अक्सर 'डायबिटीज' यानी नुकसान का कारण बनती हैं। समझदार बिजनेसमैन मीठे झांसे में नहीं आते, वो सिर्फ फैक्ट्स और आंकड़ों पर भरोसा करते हैं। इसलिए अपनी मीठी स्ट्रेटेजी अपने पास रखिए, वो रायदित कॉर्पोरेशन पर काम नहीं करेगी।"
रुद्रिका के होंठों पर एक गहरी मुस्कान उभर आई। उसने धीरे से फुसफुसाया, "काम तो करेगी सर... और बहुत जल्द करेगी।"
लेक्चर खत्म हुआ और रौक्षिण हमेशा की तरह तेज़ी से बाहर निकल गया। लेकिन आज उसकी जेब में रखी वो टॉफियाँ सिर्फ शक्कर का टुकड़ा नहीं थीं, वो सोमवंशी और रायदितों की इस भयानक दुश्मनी के बीच एक नए, अनजाने और बेहद खूबसूरत खेल की शुरुआत थीं।
क्रमशः