Burden of Lies - Part 3 in Hindi Women Focused by deepanshi garg books and stories PDF | झूठ का बोझ - भाग 3

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झूठ का बोझ - भाग 3

आर्यन के पिता अब भी अस्पताल में भर्ती थे। डॉक्टरों की पूरी कोशिश के बावजूद उनकी हालत में कोई खास सुधार नहीं हो रहा था। इधर आर्यन और उसकी माँ को जमानत मिल चुकी थी। कानून ने भले ही उन्हें निर्दोष मान लिया था, लेकिन समाज की नज़रों में वे आज भी दोषी ही थे। मोहल्ले के लोग उन्हें देखकर तरह-तरह की बातें करते, कुछ लोग उनसे नज़रें चुराकर निकल जाते, तो कुछ उन्हें तानों भरी निगाहों से देखते। यह सब देखकर आर्यन का दिल हर दिन थोड़ा-थोड़ा टूटता जा रहा था।
पिछले कई दिनों से उसकी ज़िंदगी अस्पताल और घर के बीच ही सिमटकर रह गई थी। न जाने कितनी रातें उसने अस्पताल की ठंडी बेंच पर अपने पिता के कमरे के बाहर सोते हुए बिताई थीं। कभी डॉक्टरों का इंतज़ार, कभी दवाइयों की चिंता और कभी अस्पताल के बढ़ते बिल... यही उसकी ज़िंदगी बन चुकी थी।
उधर उसकी माँ की हालत भी उससे अलग नहीं थी। दिनभर अस्पताल में पति की सेवा करना और रात को जब कभी घर लौटतीं, तो पूरा घर उन्हें काटने दौड़ता। पति अस्पताल में, बेटा अस्पताल की बेंच पर और वह अकेली... अपने कमरे में कंबल ओढ़कर चुपचाप आँसू बहाती रहतीं। उन्हें समझ नहीं आता था कि आखिर उनके परिवार की गलती क्या थी, जिसकी इतनी बड़ी सज़ा उन्हें मिल रही थी।
एक सुबह आर्यन अपनी माँ के साथ अस्पताल में अपने पिता के पास बैठा था। तीनों धीरे-धीरे बातें कर रहे थे कि तभी आर्यन का मोबाइल बज उठा।
स्क्रीन पर किसी अनजान नंबर से कॉल आ रही थी।
आर्यन ने मोबाइल की तरफ़ देखा और बिना कॉल उठाए उसे साइलेंट कर दिया।
उसकी माँ ने कहा, "बेटा, फोन बज रहा है... देख तो किसका है।"
आर्यन ने थकी हुई आवाज़ में कहा, "छोड़िए माँ... किसी मोबाइल कंपनी वालों का होगा।"
अभी दो ही मिनट बीते थे कि फिर वही नंबर कॉल करने लगा।
इस बार आर्यन झुंझलाकर फोन उठाता है और दूसरी तरफ़ से कोई कुछ कह पाता, उससे पहले ही गुस्से में बोल पड़ता,
"आप लोगों को समझ नहीं आता क्या? मुझे कोई रिचार्ज नहीं करवाना। बार-बार फोन क्यों कर रहे हैं?"
इतना कहकर उसने बिना जवाब सुने ही कॉल काट दिया।
कुछ देर बाद फिर से मोबाइल की घंटी बजी।
इस बार नंबर अलग था।
आर्यन ने अनमने मन से फोन उठाया।
"हेलो..."
दूसरी तरफ़ से एक शांत आवाज़ आई,
"आर्यन जी, मैं मिस्टर हर्षवर्धन सिंघल का सेक्रेटरी बोल रहा हूँ। सर आपसे मिलना चाहते हैं। अगर आप आज शाम सात बजे उनके ऑफिस आ जाएँ तो..."
हर्षवर्धन सिंघल का नाम सुनते ही आर्यन की आँखों में गुस्सा उतर आया।
वह तेज़ आवाज़ में बोला,
"अपने साहब से कह देना कि मुझे उनसे कोई बात नहीं करनी। और अगर उन्हें सच में मुझसे मिलना है, तो इस बार वो खुद मेरे घर आएँ।"
इतना कहकर उसने फोन काट दिया।
फोन कटने के बाद उसकी माँ ने पूछा, "किसका फोन था बेटा?"
आर्यन ने गहरी साँस लेते हुए कहा, "मितिक्षा के पापा के ऑफिस से था। शायद अब भी उन्हें लगता है कि पैसे से सब कुछ खरीदा जा सकता है।"
शाम के लगभग सात बजे डोरबेल बजी।
आर्यन ने दरवाज़ा खोला तो सामने हर्षवर्धन सिंघल खड़े थे। इस बार वे अकेले आए थे।
"अंदर आइए।"
उस समय घर में केवल आर्यन ही था। उसकी माँ अस्पताल में उसके पिता के पास थीं।
आर्यन ने उन्हें सोफ़े पर बैठने का इशारा किया और पानी का गिलास लाकर उनके सामने रख दिया।
कुछ पल तक दोनों के बीच खामोशी छाई रही।
आख़िरकार हर्षवर्धन ने चुप्पी तोड़ी।
"आर्यन बेटा... मैं जानता हूँ कि तुम्हारे साथ बहुत बुरा हुआ है। ऐसा नहीं होना चाहिए था। तुम्हारे परिवार की बदनामी हुई, तुम्हारे पिता अस्पताल में हैं और तुम्हारे कारोबार का भी बहुत नुकसान हुआ है।"
आर्यन चुपचाप उनकी बातें सुनता रहा।
हर्षवर्धन ने आगे कहा,
"मैं तुम्हारे सामने एक प्रस्ताव लेकर आया हूँ। मैं तुम्हें छह करोड़ रुपये दूँगा। बदले में तुम्हें और तुम्हारे परिवार को यह घर और यह शहर हमेशा-हमेशा के लिए छोड़ना होगा। तुम्हारे रहने का पूरा इंतज़ाम भी मैं करवा दूँगा।"
कुछ क्षण रुककर उन्होंने कहा,
"और हाँ... हमारे बीच जो भी बातें हो रही हैं, वे कभी इस कमरे से बाहर नहीं जानी चाहिए।"
इतना सुनते ही आर्यन का गुस्सा फूट पड़ा।
वह अपनी जगह से खड़ा हो गया।
"आपको क्या लगता है? आपके पास पैसा है, इसलिए आप किसी को भी खरीद सकते हैं? जिसे चाहें दबा सकते हैं?"
हर्षवर्धन शांत स्वर में बोले,
"आर्यन, इतनी जल्दी किसी निर्णय पर मत पहुँचो। थोड़ा समय लो... आराम से सोचो।"
लेकिन अब आर्यन का सब्र जवाब दे चुका था।
"अपने पैसों का घमंड किसी और को दिखाइए। मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि आप कितने अमीर हैं। हो सकता है आपने अपनी दौलत से बहुत कुछ खरीद लिया हो... लेकिन मुझे नहीं खरीद सकते।"
उसने दरवाज़े की ओर इशारा करते हुए कहा,
"अगर आपको अपनी इज़्ज़त से ज़रा भी प्यार है... तो अभी इसी वक्त मेरे घर से चले जाइए।"
हर्षवर्धन कुछ पल तक उसे देखते रहे। फिर बिना कुछ कहे उठे और बाहर चले गए।
दरवाज़ा बंद होते ही आर्यन का गुस्सा फूट पड़ा।
उसने सामने रखा काँच का गिलास पूरी ताकत से दीवार पर दे मारा।
छन्न...!
गिलास टूटकर बिखर गया। काँच का एक नुकीला टुकड़ा उसके हाथ में धँस गया। उसकी हथेली से खून बहने लगा और खून की कुछ बूँदें सफ़ेद फर्श पर गिर पड़ीं।
लेकिन उस समय उसे अपने हाथ के दर्द का बिल्कुल एहसास नहीं था...
क्योंकि उसके दिल का दर्द उससे कहीं ज़्यादा गहरा था।
उधर दूसरी ओर, मितिक्षा अपने मायके में थी। वह रोज़ की तरह तैयार हो रही थी। उसे देखकर कोई यह नहीं कह सकता था कि पिछले कुछ दिनों में उसकी ज़िंदगी में इतना बड़ा तूफ़ान आया था। न उसके चेहरे पर किसी बात का पछतावा था और न ही किसी गलती का बोझ।
तैयार होने के बाद उसने फिर अपने प्रेमी का नंबर मिलाया।
लेकिन इस बार भी फोन नहीं उठा।
सुबह से वह न जाने कितनी बार उसे कॉल कर चुकी थी। पहले उसने खुद को समझाया कि शायद वह किसी ज़रूरी काम में व्यस्त होगा। लेकिन अब उसकी बेचैनी बढ़ने लगी थी।
उसने फिर कॉल लगाया...
इस बार भी कोई जवाब नहीं मिला।
उसने एक संदेश भेजा—
"तुम ठीक तो हो? सुबह से बात क्यों नहीं कर रहे?"
लेकिन संदेश पढ़ा भी नहीं गया।
अब पहली बार उसके मन में एक अनजाना डर पैदा होने लगा।
क्या उसका प्रेमी कभी उसका फोन उठाएगा?
क्या आर्यन हर्षवर्धन सिंघल की छह करोड़ रुपये वाली डील स्वीकार करेगा?
या फिर दोनों की ज़िंदगी में कोई ऐसा तूफ़ान आने वाला था, जो सब कुछ बदल देगा?
इन सभी सवालों के जवाब अभी बाकी हैं...
क्रमशः...