चारों ओर सूखी और पथरीली ज़मीन फैली हुई थी। दूर-दूर तक छोटी-छोटी पहाड़ियाँ दिखाई दे रही थीं। उनके बीच से एक सँकरा कच्चा मार्ग निकल रहा था। उसी मार्ग के किनारे एक बड़े पत्थर पर लगभग चौदह-पंद्रह वर्ष का एक बालक शांत भाव से बैठा था। उसने साधारण वस्त्र धारण किए हुए थे, किंतु उसके चेहरे का तेज़ सहज ही बता रहा था कि वह कोई साधारण बालक नहीं था।
कुछ ही दूरी पर उसी की आयु का एक अन्य बालक काफ़ी देर से उसे देख रहा था। अंततः वह उसके पास जाकर बोला,
"आप कौन हैं? और यहाँ क्यों बैठे हैं?"
पहले बालक ने कोई उत्तर नहीं दिया। वह उसी प्रकार मौन बैठा रहा।
उसे चुप देखकर दूसरे बालक ने हल्की झुँझलाहट में कहा,
"चलिए, हमारी ललकार का उत्तर ही दे दीजिए।
हमसे सामना कर लीजिए। नहीं तो हमें यही लगेगा कि इतने वर्षों बाद कोई ऐसा प्रतिद्वंद्वी मिला था, जिसे हमने अपने योग्य समझा... पर वह भी डरा-सहमा चूहा निकला।"
फिर भी पहले बालक ने कुछ नहीं कहा।
अब दूसरे बालक ने थोड़ा ऊँचे स्वर में कहा,
"आपने सुना नहीं? हमने क्या कहा... डरा-सहमा चूहा!"
इतना सुनते ही पहले बालक ने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया और उसकी ओर देखा।
उसकी आँखों में आँसू थे।
यह देखकर दूसरे बालक का सारा क्रोध पल भर में गायब हो गया। वह घबराकर बोला,
"क्या हुआ? आपकी आँखों में आँसू क्यों हैं?"
पहले बालक ने भर्राए स्वर में कहा,
"हमारी माँ... हमें छोड़कर चली गईं।"
दूसरा बालक कुछ क्षण के लिए स्तब्ध रह गया।
फिर धीरे से बोला,
"क्या कह रहे हैं आप?"
कुछ पल रुककर उसने पूछा,
"कहाँ चली गईं?"
पहले बालक ने अपने आँसू पोंछते हुए कहा,
"सब कहते हैं... वह भगवान के पास चली गई हैं।"
यह सुनते ही दूसरे बालक का चेहरा भी उदास हो गया। पहले बालक को रोता देखकर उसे भी अपने अतीत की कुछ बातें याद आ गईं।
उसने अपने आँसू छिपाते हुए कहा,
"देखिए... हमारा उद्देश्य आपका दुःख बढ़ाना नहीं था।
बहुत जल्द यह जो माँ की कमी है, वह आपको पहले जैसी नहीं लगेगी। जो खालीपन आज आप महसूस कर रहे हैं,
वह भी धीरे-धीरे भर जाएगा। फिर आपको ऐसा लगेगा, जैसे आपकी माँ आज भी आपके साथ हैं।"
वह हल्का-सा मुस्कुराया और बोला,
"कभी-कभी किसी को अपने पास महसूस करने के लिए उसका हमारे पास होना आवश्यक नहीं होता।
ऊपर वाला स्वयं हमें इतनी शक्ति दे देता है कि हम उस कमी के साथ जीना सीख जाते हैं।"
इतना कहकर उसने पहले बालक की ओर देखा। वह अब भी उसे ध्यान से देख रहा था।
यह देखकर दूसरे बालक ने झिझकते हुए कहा,
"लगता है... हमने कुछ ज़्यादा ही कह दिया।"
पहले बालक ने सिर हिलाया।
"नहीं... हम तो बस यह सोच रहे थे कि आप अपनों को खोने के बारे में इतना सब कैसे जानते हैं?"
यह सुनते ही दूसरे बालक की मुस्कान फीकी पड़ गई। उसने नज़रें झुका लीं और धीमे स्वर में कहा,
"क्योंकि... हमने भी अपने पिता को खोया है। समय के साथ उनका बिछड़ने का दुःख थोड़ा कम हुआ। तब हमें समझ आया कि वह आज भी हमारे साथ हैं।
अब उनकी कमी पहले जैसी महसूस नहीं होती "क्योंकि हमें विश्वास है कि वह सदा हमारे साथ रहेंगे।"