A common woman travels in a common compartment in Hindi Travel stories by Neelam Kulshreshtha books and stories PDF | आम औरत की आम डिब्बे में यात्रा

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आम औरत की आम डिब्बे में यात्रा

नीलम कुलश्रेष्ठ

 मैं सूटकेस उठाये सीढ़ियों से प्लेटफ़ॉर्म  नंबर चार पर उतर रही थी. अब आप पूछ सकते हैं कि यह प्लेटफ़ॉर्म  कौन से स्टेशन का है? बस, समझ लीजिए कि उस स्टेशन का नाम है अनजानपुर और मुझे वहाँ से दिल्ली जाना है. पुल की आखिरी सीढ़ियों पर तीन युवक खडे हुए थे. जैसे ही मैं पहले वाले के पास से गुजरी, उस ने फुसफुसाते अंदाज में पूछा, "मैडम, एक्सप्रेस में सीट चाहिये?"

 मैं ने अपनी गर्दन थोड़ी अकड़ा ली, "नहीं चाहिए, मेरा तो आरक्षण है." कहते हुए मैं सीढ़ियां उतर गई. मैं ने उन से पीछा छुड़ाने के लिए झूठ बोला था. दरअसल मामाजी की गंभीर अवस्था का तार पा कर मैं सूटकेस में कुछ कपड़े ठूंस कर चल दी थी.

स्टेशन पर खड़ी भीड़ को देख कर मेरे पसीने छूट रहे थे. पूरी रात का सफर था. मैं प्लेटफ़ॉर्म  पर एक बैंच  पर बैठ गई, जहां गाड़ी का साधारण डिब्बा  रुकने वाला था.

 तभी एक परिवार अपने सामान के साथ बैंच  के पास आया. सीढ़ियों के पास खड़े लड़कों में से एक लड़का उन के साथ था. उस ने अपने हाथ का बैग बैंच  के पास रखा. गले में बंधे लाल स्माल को खोल कर माथे का पसीना पोंछा और बोला, "अब आप भीड़ की फिकर मत करना." फिर वह एक नज़र मुझ पर डालता भीड़ में गुम हो गया.

 थोड़ी देर बाद गाड़ी रेंगती हुई प्लेटफ़ॉर्म  पर आने लगी. मेरे आस पास के लोग हाथ में छोटा छोटा सामान उठाए कुछ इस तरह से तन कर खड़े हो गए जैसे कि चील एक चुहिया को झपटने के लिए मुस्तैदी से खड़ी हो जाती है. भीड़ देख कर मेरा दिल बैठा जा रहा था कि डिब्बा  एक होगा, इतनी भीड़ इसमें कैसे समाएगी?

 जैसे ही सामने डिब्बा  रुका, भीड़ उस पर टूट पड़ी. लोग एक दूसरे को दबाते, रगड़ते से उस में  घुसे जा रहे थे. मैं भीड़ से थोड़ा पीछे सहमी सी सूटकेस उठाए खड़ी थी. कल तक दिल्ली पहुंचना जरूरी था. पता नहीं मामाजी कैसे होंगे. जिदगी के एक बड़े हिस्से पर उन का प्यार दुलार ही छाया हुआ था. ऐसा लग रहा था, दौड़ कर कैसे दिल्ली पहुंचूं और उन्हें देखूं, लेकिन सामने भीड़ से भरा डिब्बा  था.

भीड़ जब चढ़ गई तो मैं भी अंदर पहुंची. सारा डिब्बा  ठसाठस भर चुका था.आगे जाने के लिए एक छोटा सा रास्ता था. लेकिन उस रास्ते को घेरे खड़े थे वही प्लेटफ़ॉर्म  की सीढ़ियों पर मिलने वाले तीनों लड़के. अंदर की हर बर्थ पर कोई न कोई लड़का बैठा या लेटा हुआ था. उन के कपड़ों व चेहरे की लापरवाह आवारगी देख कर लग रहा था कि वह उन्हीं तीनों लड़कों के साथी हैं.

मैं ने जरा तेज आवाज में, उस छोटे से रास्ते पर पैर अड़ाए हुए लड़के से कहा, "जरा रास्ता छोड़िए."

"इधर जगह खाली नहीं है."

"जगह तो सारी खाली दिखाई दे रही है."

"मैं नहीं हटूंगा... कहीं और जगह देखिए."

"जगह कहां देखें... सारी रेल आरक्षित है. बस यही डिब्बा ..."

"तो हम क्या करें." दूसरा लड़का मुझे देख धृष्टता से मुसकराया, "आप तो कह रही थीं आप का आरक्षण है."

"स्टेशन पर आ कर पता लगा कि पक्का नहीं हुआ है."

"तो आप कहीं और जगह देखिए."

"आप किसी औरत को भीतर जाने से कैसे रोक सकते हैं?"

"यह बात अपने घर कहना. यह डिब्बा  खाली नहीं है." वह बुरी तरह चिल्लाया.

बदतमीजी बर्दाश्त तो मैं कभी नहीं कर पाती थी फिर भी मैं संयत आवाज में बोली, "आप चिल्ला कर क्यों बोल रहे हैं? यही बात धीमे स्वर में भी कही जा सकती है."

"बहस मत कीजिए. यहां जगह नहीं है."

प्लेटफ़ॉर्म  की बैंच  पर जो परिवार मेरे साथ बैठा था, वही दरवाजे से अंदर आता दिखाई दिया. आगे आगे था उन का बैग उठाए इसी दल का कोई लड़का. जो लड़का पैर अड़ाए खड़ा था, वह पीछे हट कर सलामी की मुद्रा में खड़ा हो गया. सारा परिवार चला गया. मैं ने भी तत्परता दिखाई. सूटकेस ले कर उन के साथ ही अंदर घुसने की कोशिश की. लेकिन फिर वह लड़का पैर अड़ा कर खड़ा हो गया, "आप से कह दिया न अंदर जगह नहीं है."

"है कैसे नहीं, ये लोग अंदर कैसे चले गए?"

"इन्होंने  पांच हज़ार रुपए दिए हैं. आप भी एक हज़ार रुपए निकालिए और अंदर आ जाइए." वह रहस्यमय ढंग से मुसकराया.           

"मैं ने रेलवे का टिकट खरीदा है. तुम मुझे रोकने वाले या मुझ से पैसे मांगने वाले कौन होते हो?" मैं बुरी तरह कोध से झनझना गई.

"मैं जो हूं सो हूं, लेकिन आप अंदर नहीं जा सकती हैं."

मैं उस छोटे से रास्ते पर बेबस सूटकेस लिए खड़ी थी और उन्हीं के दल का कोई न कोई लड़का किसी न किसी यात्री को ला रहा था. उन के आते ही वह लड़का पैर हटा देता था और सब विजयी मुस्कान से ऐसे अंदर घुस जाते थे, जैसे चक्रव्यूह बेध कर जा रहे हों. पूरी एक बर्थ भर जाती तो उस को घेरने वाला लड़का सस्ती सिगरेट फूंकता बाहर आ जाता.

अब तक मैं समझ चुकी थी कि इन दस-बारह लड़कों के दल से टक्कर लेना मेरे बस की बात नहीं है. सभी के चेहरे से आवारगी टपक रही थी. ऐसा लग रहा था कि इस सल्तनत के वे बेताज बादशाह हैं.

मैं चुपचाप डिब्बे  से बाहर प्लेटफ़ॉर्म  पर आ गई. मन पर बस एक बात छाई हुई थी कि हस्पताल के बिस्तर पर पड़े मामाजी पता नहीं कैसे होंगे. सोच कर ही आंखें भीग उठती थीं. मुझे किसी भी तरह दिल्ली पहुंचना था और सामने था ठसाठस भरा रेल का डिब्बा . तभी एक फौजी जवान लपकता हुआ आया, "आप को दिल्ली जाना है?"

मैं ने `हां` में सिर हिला दिया.

"मैं अभी इंतजाम करता हूं." वह तेजी से डिब्बे  में चढ़ गया, लेकिन थोड़ी देर में ही नीचे उतर आया. डिब्बा  बुरी तरह भर चुका था. उन लड़कों से तो वह भी कुछ नहीं कह पाया.

मुझे पता था, यही होना है. उसीं दल का एक लड़का एक आदमी के साथ मेरे पास मुझे सुनाता हुआ गुज़रा, "साहब बस चार सीटें खाली रह गई हैं. शुक्र है, आप समय से आ गए."

अच्छे डील डौल वाले साहब पिद्दी से सूखे लड़के को देख कर मुसकरा दिए जैसे कह रहे  हों आजकल क्या कुछ नहीं खरीदा जा सकता.

 मेरा मन हुआ, उन से पूछूं कि आप अगर एक झापड़ भी इसे मार दोगे तो सूखा सा लड़का चकरघिन्नी जैसा घूम जाएगा. आप किस बात से डर कर इसे हज़ार रुपए दे रहे हैं? लेकिन मैं खामोश ही रही.

मैं ने घड़ी पर नजर डाली, समय खिसकता जा रहा था. मुझे सुबह जरूर दिल्ली पहुंचना था. इस तरह से हज़ार रुपए देने की बात मैं सोच भी नहीं सकती थी. कभी प्लेटफ़ॉर्म  पर तो कभी डिब्बे पर नजर डालती. उस दल के बाहर खड़े दो-तीन लड़के कुटिल मुसकराहट से मेरी बेबसी देखते सिगरेट फूंक रहे थे.

तभी मेरी नजर सामने से आ रहे एक सिपाही पर पड़ी. मैं दौड़ती सी उस की तरफ भागी कि भीड़ में कहीं वह भी न गुम हो जाए. उस के सामने जाते ही मैं ने संक्षेप में अपनी बात बताई. वह मेरे साथ डिब्बे  की तरफ चल दिया, "मैं देखता हूं सालों को कौन आप को अंदर बैठने से रोकता है?"

उस ने डिब्बे  के दरवाजे पर डंडा खटखटाया, "क्यों भाई, बहनजी को अंदर क्यों नहीं जाने दे रहे हो?"

"कौन रोक रहा है, इन्हें? वह लड़का जो रास्ता रोके खड़ा था, पीछे हट गया और आस पास जो लोग खड़े थे, उन्हें फटकारता हुआ बोला, "हटिए, हटिए यहां से, इन्हें अंदर जाने दीजिए."

"ठीक से जगह दो." सिपाही ने फिर डंडा दरवाजे पर बजाया.

उसी के साथी ने एक बर्थ पर लोगों को खिसका कर जगह बनाई, "आप यहां आराम से बैठिए."

सीट पर बैठते ही मेरी सांस में सांस आई कि अब मैं जरूर दिल्ली पहुंच जाऊंगी.

सिपाही जगह दिलवा कर चला गया. वह फौजी दूर से सब देख रहा था. शायद उसे भी मेरे स्त्री होने पर तरस आया होगा. वह शीघ्र ही अपने एक फौजी साथी को बुला लाया, फिर ऊंची आवाज में कहने लगा, "यदि आप को रास्ते में कोई तकलीफ हो तो इन से कह दीजिएगा. यह इसी डिब्बे  में यात्रा कर रहे हैं. मैं तो यहीं उतर रहा हूं."

उस की सहानुभूति से मुझे भी हिम्मत बंधी. डिब्बे  के इस हिस्से की भी नीचे वाली वर्थ भर गई थी. ऊपर वाली बर्थ पर भी चार-चार लोगों को बुला कर बैठा दिया था. ट्रेन के चलने का समय हो रहा था. आखिरी तीन लड़के रेल में से उतरते समय मेरे पास से निकलते हुए बोले, "इन से तो अब दो हज़ार रुपए लेना."

अब तक मेरा हौसला बढ़ गया था. मैं ने तेज आवाज में कहा, "मैं तो एक पैसा भी नहीं देने वाली."

तभी एक लड़का कुछ धीमी आवाज में बोला, "आप ने तो हमारी रोज़ी छीन ली."

उस की बात तो जैसे मेरे दिल में घूंसे की तरह लगी. मैं ने तो किसी का हक छीनना नहीं चाहा था, बस अपना सही हक मांगा था. उन लड़कों को टोकते हुए मैं ने कहा, '`जरा मेरी बात सुनिए."

उन्हें लगा, शायद मैं कुछ रूपए उन्हें थमा रही हूं. वे बड़ी आस से मुझे देखने लगे. मैं ने कहा, "आप बुरा नहीं मानना, मैं आप लोगों से कुछ पूछना चाहती हूं. एक अखबार के लिए काम करती हूं. आप का नाम नहीं पूछंगी.बस इतना बता दीजिए कि इस उम्र में ऐसा बुरा काम करने की मजबूरी क्या है? क्या आप पढ़े-लिखे नहीं है?"

एक लड़का चिढ़ कर बोला, "मैडम, हमारे ग्रुप में सभी पढ़े लिखे हैं."

"यह शहर इतना बड़ा है. आप कोई और काम नहीं कर सकते? रेल के डिब्बे  पर गैरकानूनी कब्जा कर के लोगों से जबरदस्ती पैसा वसूलना कोई अच्छी बात तो नहीं है?"

दूसरा लड़का बोला, "मैडम, भाषण देना आसान है, लेकिन क्या आप हमें काम दिला सकती हैं?"

तीसरा बोला, "झोंपड़पट्टी की गंदगी में रह कर इतने चकाचौंध से भरे शहरों में एक लालटेन के सहारे मैं ने अपने बूते पर बी.ए. की परीक्षा पास की है. फीस देने के लिए मुझे कई बार भूखा सोना पड़ता था. अब न तो नौकरी मिलती है. न बाप की तरह जूते गांठ सकता हूं. हम पढ़ लिख कर न इधर के रहे न उधर के."

जो बेपरवाह आवारगी से सब को अपने आतंक से परेशान कर रहे थे, फिल्मी गाने गुनगुनाते आपस में कहकहे लगा रहे थे, वही तीनों अब संजीदा खड़े थे.

मेरे मुंह से यही निकल पाया, "यदि तुम चाहो तो क्या इतने बड़े शहर में तुम्हें कोई काम नहीं मिल सकता?"

"अपने अखबार वालों से कहिए कि हमें नौकरी दिलवा दें. हम यह काम कल नहीं, आज ही छोड़ देंगे." कहते हुए तीनों नीचे उतर गए. मैं उन के उठाए प्रश्नों के जाल में उलझती सी पीछे रह गई.

सामने की बर्थ पर वही परिवार बैठा था जो प्लेटफ़ॉर्म  पर मेरे साथ बैंच  पर बैठा था. उन में से एक बुजुर्ग उन की बात सुन कर बड़बड़ाए, "साले काम धंधा कुछ करना नहीं चाहते... दिखाते यह हैं कि काम नहीं मिलता. बैठ ठाले मुफ्त का पैसा मिल जाता है."

उसी परिवार की महिला बोलीं, "हम से इन लोगों ने पांच हज़ार  रुपए ले लिए."

        "लेकिन आप ने दिए क्यों. गलती तो आप की है."

"अचानक आज ससुर के मरने की खबर मिली है. हम लोगों को एकदम से चलना पड़ा. हमारे साथ तीन छोटे बच्चे हैं. बताइए बच्चों के साथ इस भीड़ में कहीं हमारा ठिकाना था?"

मेरे पास बैठी मुसलमान महिला ने रेल चलते ही अपना बुरका उतारा और उसे तह करते हुए मुझ से कहने लगी, "मुझ से तो दो सौ  रुपए लिए हैं, मैं क्यों झूठ बोलूं." फिर उस ने सामान रखने वाली ऊपर की बर्थ पर बैठे एक आदमी से पूछा, "क्यों भाई साहब, आप ने इन को क्या दिया है?"

"हम लोगों ने तो पांच पांच सौ   रुपए दिए हैं."

सामान रखने की बर्थ पर सामान से भी बदतर स्थिति में बैठे उन हट्ठे कट्ठे लोगों को देख कर मेरा खून खौल रहा था. हर एक का स्वास्थ्य इतना अच्छा था कि एक-एक उन दो लड़कों के बराबर था फिर भी रुपए दे कर टंगे से बैठे थे.

"मुझ से तो उन्होंने दो सौ  रुपए ही लिए हैं." मेरे दाईं तरफ बैठा छात्र बोला, फिर मेरी हिकारत भरी दृष्टि से झेंप गया और अपनी सफाई देता हुआ बोला, "दरअसल मैं अपने गांव से आया हूं. पहली बार लंबी यात्रा कर रहा हूं."

मैं ने उस मुसलमान स्त्री से पूछा, "आप से उन्होंने कम रुपए कैसे लिए?"

"उन को मैं ने साफ-साफ कह दिया था. मैं विधवा हूं. मेरे पास पैसे अधिक नहीं हैं. मेरा बड़ा बेटा बीमार है, इसलिए बिना रिज़र्वेशन  जल्दी निकल पड़ी हूं."

"आप का बेटा आप के पास नहीं रहता?"

"मेरे शौहर के मरने के बाद मेरी ननद उसे अपने साथ ले गई थी. छोटा बेटा मेरे पास रहता है."

"आप की गुजरबसर..."

"इन के मरने से पहले मैं कभी बाहर नहीं आई थी. बाद में थोड़ी बहुत सिलाई शुरू की. अब तो मेरे यहां चार औरतें काम कर रही हैं."

"आप ने इन लड़कों को यह बात क्यों नहीं बताई. वे तो शहर में काम न मिलने का रोना रो रहे थे. और हाँ ,आपने अपने माथे पर बिंदी क्यों  लगाई हुई है। आपके यहां तो बिंदी नहीं लगाते। ``

 `` ज़ालिम दुनियां का पता नहीं है , विधवा औरत  को लोग खा जाते हैं। बिंदी देखकर लोग मुझे शादीवाली  समझते हैं। `` 

सामने बैठे बुजुर्ग फिर कहने लगे, "मैं ने तो आप से पहले भी कहा था कि इन्हें जरा सी मेहनत से हराम का पैसा मिल जाता है तो मेहनत क्यों करें? सारा दिन शहर में आवारागर्दी करते रहते हैं, फिल्म देखेंगे, लड़कियों को छेड़ेंगे. शाम को दादागीरी से दो ढाई घंटे की मेहनत से रुपए कमा लेते हैं. इसी से उन्होंने एक हजार कमा लिया होगा. पता नहीं कितनी गाड़ियों पर दादागीरी करते होंगे."

"ऐसा पैसा किसी को पचता नहीं है." मेरे पास बैठा छात्र बोला.

तभी ऊपर की बर्थ पर बैठा व्यक्ति भी अपने साथी से बोला, "अगर दिल्ली पहुंच कर पांच लाख  में सौदा पट गया तो समझो, इस पर दोगुना फायदा होगा." उन की बातों से लग रहा था कि चारों ही व्यवसायी हैं.

थोड़ी देर बाद उन्होंने अपने खाने के डिब्बे  निकाल लिए. खाना खा कर सामने की दूसरी बर्थ पर टांगें रख कर रात के आठ बजे ही ऊंघने लगे. मैं सोचने लगी, 'इन के लिए सब कुछ कितना हिसाबी किताबी है आज अपने शहर की भागदौड़ से थक कर स्टेशन पहुंचे होंगे, दिल्ली से कुछ माल लाना होगा.  फायदा उठाने के लिए बिक्री कर कार्यालय में  रुपए तो टिकाने ही पड़ेंगे. फिर दिल्ली तक पहुंचने के लिए पांच सौ रुपए और देना क्या बड़ी बात है ?  उन सब के बीच बैठे हुए मुझे कुछ अजीब सी अनुभूति हो रही थी कि लिजलिजे बेजान हो गए हैं लोग, अपने हक के लिए भी लड़ नहीं सकते.'

"आपने तो बहुत बहादुरी दिखाई जो पुलिस को बुला लाई." उस छात्र ने मुझे प्रशंसा भरी नजरों से देखा.

"अच्छ मुझे भी लग रहा है कि मैं ने इस डिब्बे  में सीट सही तरीके से पाई है. लेकिन हो सकता है, यह पुलिस वाले का अभिनय हो. वह भी इन से मिला होगा. लेकिन थोड़ा नाटक तो करना पड़ता है."

"आप कैसी बातें करती हैं? पुलिस क्या कहीं बदमाशों से मिली होती है?"

"तुम क्या सोचते हो, रोज प्लेटफ़ॉर्म  पर सीट के लिए हो रही गुंडागर्दी की खबर रेल कर्मचारियों को नहीं होगी? पुलिस को नहीं होगी? सब के अपने अपने हिस्से बंधे होंगे. कोई मेरे जैसा अड़ियल यात्री आ जाता होगा तो सिपाही डंडा खटखटा कर नाटक कर देता होगा।``

"आप की सहायता करने के लिए दो सैनिक भी आ गए थे."

"हां, दरअसल लोग इतने निष्प्राण हो गए हैं कि अपने जायज हक की बात तक करना भूल गए हैं. एक बार आवाज तो उठाएं, लोग अपनेआप सहायता करने दौड़ पड़ेंगे." मुझे ऐसा लगने लगा था, जैसे मैं भाषण देने लगी हूं. इसीलिए चुप हो कर बैठ गई. आंखें बंद करते ही मामा जी का चेहरा फिर सामने आ गया. मेरा मन बेहद बोझिल हो रहा था.

रात गहराती जा रही थी, नींद का समय हो रहा था. लोग एक दूसरे पर लदे जा रहे थे. मेरी बर्थ के पास खड़ी एक मजदूर औरत तीसरी बार अपने बच्चे को पीट चुकी थी. "तुझ से सीधा नहीं बैठा जा रहा.

वह पांच-छ वर्ष का बच्चा बार बार नींद में मां की तरफ झुक जाता था. औरत ने एक एक बोरे पर अपने दो बच्चों को बैठा रखा था. गोदी में एक छोटे बच्चे को लादे झुंझलाई सी खड़ी थी.

"...ऐ, अपने साहबजादे को समझा दो, मेरी गोदी में ही गिरा जा रहा है." मेरे पास बैठी मुसलमान औरत बड़बड़ाने लगी. मजदूर औरत ने क्रोध में फिर एक झापड़ बेटे को लगा दिया, "क्यों धक्का मार रहा है?"

अभी तो ग्यारह ही बजे हैं, न जाने यह रात कैसे गुजरेगी? मेरे पास वाली स्त्री ने ऊंघते हुए बच्चे को सीट पर थोड़ी जगह बना कर बैठा दिया. मैं सोचने लगी कि रात कितनी भी लंबी हो, गुजर तो जानी ही है. कल फिर शाम होगी, फिर स्टेशन पर भीड़ जुटेगी. वे लड़के रेल की सीटों के लिए फिर बोली लगाएंगे, फिर वैसे ही रौब जमाएंगे. मेरे पास बैठा गांव से अभी निकला छात्र पता नहीं आज की घटना से कुछ सीख पाएगा या बिना सोचे समझे आगे बढ़ जाएगा?

 

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