इंसान का सम्मान करो, उसे भगवान मत बनाओ
मनुष्य में दिव्यता का अंश अवश्य है। यदि "भगवान" का अर्थ करुणा, प्रेम, सेवा और चेतना है, तो प्रत्येक मनुष्य में वह संभावना विद्यमान है। परंतु इसी कारण किसी व्यक्ति को पूजनीय देवता बना देना उचित नहीं है।
समस्या तब शुरू होती है जब कोई साधारण मनुष्य सेवा, चमत्कार या धार्मिक मुखौटा पहनकर स्वयं को "भगवान" कहलवाने लगता है। वहीं से विवेक समाप्त होता है और अंधविश्वास जन्म लेता है। सम्मान दीजिए, प्रेम कीजिए, कृतज्ञ रहिए, पर किसी मनुष्य को ईश्वर का अंतिम रूप मत बना दीजिए।
वास्तविक दिव्यता किसी पद, वस्त्र, आश्रम या उपाधि में नहीं, बल्कि उस क्षण में प्रकट होती है जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे के जीवन का सहारा बन जाता है।
प्यास से मरते हुए व्यक्ति को यदि कोई एक गिलास पानी पिला दे, तो उस क्षण वही उसके लिए भगवान है। सड़क दुर्घटना में घायल व्यक्ति को यदि कोई तुरंत अस्पताल पहुँचा दे, तो उसी क्षण वही भगवान है। निराश व्यक्ति को यदि कोई आशा दे दे, भूखे को भोजन दे दे, भयभीत को सुरक्षा दे दे, तो वही दिव्यता का कार्य है।
इसलिए भगवान कोई स्थायी पद नहीं, बल्कि करुणा से उत्पन्न होने वाला एक क्षणिक अनुभव है।
आज दुर्भाग्य यह है कि धर्म का बड़ा भाग सेवा से अधिक "पुण्य के निवेश" का साधन बन गया है। लोग दूर-दूर के तीर्थों में दान देते हैं, बड़े-बड़े बोर्ड लगाते हैं, पर उनके सामने घट रही पीड़ा उन्हें दिखाई नहीं देती। कहीं पशुओं की उपेक्षा करके गोशालाओं में दान दिया जाता है, कहीं पड़ोसी भूखा है और दान किसी प्रसिद्ध स्थान पर पहुँचता है। ऐसी सेवा अक्सर वर्तमान की आवश्यकता नहीं, बल्कि भविष्य के पुण्य की गणना बन जाती है।
सच्ची सेवा योजना बनाकर नहीं, संवेदनशीलता से होती है। जहाँ पीड़ा उपस्थित हो, वहीं धर्म उपस्थित होना चाहिए। जो कार्य उस क्षण सबसे अधिक आवश्यक है, वही सर्वोच्च सेवा है।
सनातन परंपरा की अनेक कथाएँ भी यही संकेत देती हैं कि कृपा, आशीर्वाद और परिवर्तन किसी बड़े आयोजन से नहीं, बल्कि समयानुकूल करुणा और सहज कर्म से घटित हुए। धर्म का सार जीवित प्राणी की तत्काल आवश्यकता को पहचानना है, न कि केवल धार्मिक व्यवस्थाओं का पालन करना।
इसलिए मनुष्य का सम्मान कीजिए, उसके भीतर की चेतना को प्रणाम कीजिए, पर उसे भगवान बनाकर अपनी बुद्धि समर्पित मत कीजिए। सच्चा धर्म मूर्तियों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि ऐसे मनुष्यों की संख्या बढ़ाना है जो सही समय पर किसी दूसरे के लिए भगवान बन सकें।
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विचार के शास्त्रों में बहुत सीधे उदाहरण हैं -
1. भागवत पुराण - जहाँ मूर्ति पूजा से बड़ी जीव-सेवा बताई गई है
कपिल मुनि माता देवहूति से कहते हैं -
यो मां सर्वेषु भूतेषु सन्तमात्मानमीश्वरम्।
हित्वार्चां भजते मौढ्याद् भस्मन्येव जुहोति सः।।
अर्थ: जो सब प्राणियों में बैठे हुए मुझ ईश्वर को छोड़कर केवल मूर्ति में मेरी पूजा करता है, वह राख में आहुति डालता है।
यही आपके "पुण्य के निवेश" वाले बिंदु का खंडन है। सामने जीव की उपेक्षा करके दूर तीर्थ में दान, शास्त्र की दृष्टि में भस्म में हवन है।
2. गीता - सम्मान का अर्थ समदृष्टि है, भगवान बनाना नहीं
विद्या-विनय-सम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः।। 5.18
पंडित वह नहीं जो किसी एक को भगवान बनाकर पूजे, पंडित वह है जो विद्वान ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और चांडाल में भी समान चेतना देखे। सम्मान सबका, पूजा सत्य की।
इसी को आगे कहा -
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन - जैसे अपने सुख दुख को देखता है, वैसे ही सबके सुख दुख को देखे। यही योग है।
3. राजा रन्तिदेव की कथा - भगवान क्षणिक अनुभव है
भागवत और महाभारत दोनों में रन्तिदेव का वर्णन है। 48 दिन भूखे रहने के बाद उन्हें थोड़ा अन्न जल मिला। तभी एक ब्राह्मण, एक शूद्र, कुत्तों सहित एक चांडाल और एक भूखा अतिथि आ गए। रन्तिदेव ने सब बांट दिया। स्वयं भूखे रह गए और कहा -
न त्वहं कामये राज्यं न स्व
र्गं नापुनर्भवम्।
कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम्।।
मुझे राज्य नहीं चाहिए, स्वर्ग नहीं चाहिए, मोक्ष भी नहीं चाहिए। मेरा तो एक ही काम है, दुख से तप रहे प्राणियों का दुख मिट जाए।
यह आपके "प्यासे को पानी पिलाने वाला ही उस क्षण भगवान है" का साक्षात् शास्त्रीय रूप है।
4. महाभारत में तुलाधर और जाजलि संवाद - योजना से नहीं, संवेदनशीलता से धर्म
जाजलि बड़े तपस्वी थे, उन्हें अभिमान था। आकाशवाणी ने कहा, तुलाधर वैश्य से धर्म सीखो। तुलाधर कोई यज्ञ नहीं करता था, बस तराजू से ईमानदारी से व्यापार करता था और जहाँ पीड़ा देखता, वहीं मदद करता। उसने कहा, सच्चा धर्म बड़े आयोजनों में नहीं, रोज के छोटे सत्य, संयम और समय पर की गई मदद में है।
सच्ची सेवा योजना बनाकर नहीं, संवेदनशीलता से होती है। जहाँ पीड़ा उपस्थित हो, वहीं धर्म उपस्थित होना चाहिए।
इन सबका सार एक ही है - सनातन में कहा गया है ममैवांशो जीवलोके - हर जीव में मेरा अंश है। अंश का सम्मान करो, पर अंश को ही पूर्ण मानकर अपनी बुद्धि मत सौंपो। पूर्णता तो उस करुणा के क्षण में ही प्रकट होती है।