my teacher dr Meena ji in Hindi Biography by Vandna Sharma books and stories PDF | गुरु मां डॉ मीना अग्रवाल जी

Featured Books
Categories
Share

गुरु मां डॉ मीना अग्रवाल जी




*संस्मरण - डॉ. मीना अग्रवाल जी*

सन 2007, जुलाई माह। पहली बार रानी भाग्य देवी महिला महाविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रवेश फार्म जमा करने गई। वहाँ मेरा सबसे पहला परिचय डॉ. मीना अग्रवाल जी से ही हुआ। पहला सवाल उनका यही था - "जब बी.एस.सी. गणित से किया है तो एम.ए. हिन्दी से क्यों करना चाहती हो।" मैंने बड़ी विनम्रता से उत्तर दिया - "मैम मुझे साहित्य पढ़ना अच्छा लगता है और कविताएं लिखना भी। मुझे लगता है गणित से एम.एससी. करके तो मैं गुम हो जाऊंगी कहीं। लेकिन साहित्य पढ़कर अपनी पहचान बना सकती हूँ।"

"कब से आना है मैम क्लास लेने।" मीना मैम ने अगले सोमवार से ठीक नौ बजे आने को कहा। मैं भी ठीक नौ बजे पहुंच गई। हिन्दी विभाग। कोई और छात्रा नहीं आई थी अभी तक। मुझे प्रश्न पूछने की बहुत आदत थी। मैम टाइम टेबल बता दीजिए। किताबें कहाँ से मिलेंगी। किताबों का नाम क्या है।

हिन्दी विभाग में उपस्थित तीनों प्रोफेसर हंस पड़े मेरी बातों पर। ये मेरा सौभाग्य रहा कि पहली कक्षा से बी.एड. क्लास तक सभी गुरु बहुत अच्छे मिले। आरबी डी महाविद्यालय का हिन्दी विभाग तो स्वप्न गुरुकुल था। एक से एक विद्वान हीरे थे। डॉ. मीना अग्रवाल के साथ, डॉ. सविता मित्र और विभागाध्यक्ष डॉ. विदुषी भारद्वाज तीनों ही मेरी मां जैसी ममतामयी गुरु बनीं और मुझे पुत्री समान स्नेह दिया। मुझे तराशा, निखारा और संवारा। पर यहां मैं सिर्फ डॉ. मीना अग्रवाल जी के विषय में लिखना चाहूंगी।

डॉ. विदुषी भारद्वाज जी ने मुझे काव्य दर्शन और काव्यगत सौन्दर्य विषय पढ़ाया। डॉ. सविता मित्र ने आधुनिक काव्य और कहानी विद्या को पढ़ाया। डॉ. मीना अग्रवाल जी ने आदिकालीन काव्य, भक्तिरस के कवि, सूरदास, तुलसीदास, कबीरदास और मीराबाई पढ़ाए।

डॉ. मीना अग्रवाल का व्यक्तित्व गौरवपूर्ण, ममतामयी, सादगी से भरा रहा। विनम्रता, उदारता और ज्ञान का भण्डार। आदरणीय मीना जी से मेरा भावनात्मक रिश्ता भी रहा है। शुरू में विज्ञान की छात्रा होने के कारण मैं तर्कात्मक व्याख्या लिखती थी। मीना जी ने मुझे सिखाया कि किसी भी दोहे या पद की व्याख्या कैसे लिखते हैं। पहले दोहे का शाब्दिक अर्थ, भावार्थ और व्याख्या लिखने के बाद काव्यगत सौन्दर्य भी लिखा जाता है, जिसमें रस, छंद, अलंकार भी पहचान कर लिखने होते हैं।

क्योंकि मैं विज्ञान की छात्रा थी, प्रश्न बहुत पूछती थी - इसमें कौन सा अलंकार है, क्यों है, और कौन से अलंकार हो सकते हैं। ये क्यों नहीं हो सकता, इत्यादि। धैर्य और विनम्रता की प्रतिमूर्ति डॉ. मीना जी ने कभी मुझ पर क्रोध नहीं किया। हमेशा मेरे सवालों का धैर्य से उत्तर दिया। हमेशा मेरा उत्साह बढ़ाया। 

मीना जी अपने विभागीय साथियों से कहती थीं कि "पहली छात्रा है वंदना जिसे पढ़ाने के लिए मुझे घर से पढ़कर आना पड़ता है। पता नहीं कब क्या पूछ ले।" पूरी क्लास में मैं अकेली छात्रा आती थी पढ़ने रोज और तीनों मैम मुझ अकेली को ही पढ़ातीं पूरी तन्मयता के साथ।

डॉ. मीना जी ने अनेक बार मुझे क्लास में अपने संघर्ष के किस्से सुनाए। 

डॉ. मीना अग्रवाल काका हाथरसी की भतीजी हैं। विश्व प्रसिद्ध साहित्य रत्न अशोक चक्रधर उनके भाई हैं। और श्रद्धेय डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल उनके पति हैं, जो हिन्दी साहित्य निकेतन के संस्थापक, शोध दिशा पत्रिका के संपादक भी हैं। अनेक कीर्तिमान उनके नाम हैं, लेकिन अज्ञानतावश मैं उल्लेख करने में असमर्थ हूँ। क्षमा करें।

मीना जी की शादी शीघ्र 18 वर्षीय अवस्था में हो गई थी। पति ने आगे पढ़ाई में पूरा सहयोग किया। संयुक्त परिवार में रहते हुए दो बच्चों की जिम्मेदारी निभाते हुए, जो भी समय मिलता, रातों को जाग-जाग कर उन्होंने अपनी डॉक्टर उपाधि प्राप्त की। उनकी मेहनत, लगन और परिश्रम से हम सबको प्रेरणा मिलती है कि अपने अथक परिश्रम और लगन से अपनी पहचान कैसे बनाते हैं।

डॉ. मीना अग्रवाल स्वयं एक प्रसिद्ध लेखिका हैं। कहानी, कविता, हाइकु, मुक्तक लगभग हर विद्या में उनका उत्कृष्ट लेखन मिलता है। साहित्य जगत में उनका नाम स्वर्णिम अक्षरों में है।

मीना मैम ने सदैव मुझे लिखने के लिए प्रेरित किया और मेरा उत्साहवर्धन किया। उन्होंने ही मेरी वर्तनी शुद्ध कराई। मुझे टोक-टोक कर, एक लेख को ही बार-बार लिखवाकर मेरी लिखावट को त्रुटि हीन बनाया। बड़े ध्यान से कॉपी चेक करती थीं मैम। बारीक सी गलती भी उनकी नजर में आ जाती थी।

मीना मैम हर काम पूर्णता के साथ करतीं। अपनी मेज, अलमारी सभी को व्यवस्थित रखतीं। उन्हें कोई भी सामान बिखरा हुआ पसंद नहीं था। हिन्दी विभाग भी उनके निर्देशन में हमेशा सुसज्जित रहता।

मीना जी अपनी अलमारी या अपना काम कभी बच्चों से नहीं करातीं। स्वयं सुसज्जित एवं व्यवस्थित करतीं। जरा भी घमण्ड नहीं था उनमें। सभी को सम्मान देतीं।

उनकी एक और खास बात ये है कि वो हमेशा काले पेन का प्रयोग करतीं लिखने में। मैं भी उनकी इसी आदत का अनुसरण करती हूँ। अधिकतर लिखने में काली स्याही वाले पेन का ही प्रयोग करती हूँ।

मीना जी का पर्स जादुई पिटारे से कम नहीं था। कोई भी जरूरत की चीज हो - स्टेपलर, इरेजर, पेन, पेंसिल, रिमूवर, हाइलाइटर, सुई धागा, आलपिन, रबरबैंड, सब उनके पर्स में से मिल जाता है। उनके विशाल हृदय में सभी के लिए प्यार और ममता थी। हमेशा सब की सहायता के लिए तत्पर रहतीं।

मेरी प्यारी मैम मीना जी का स्वास्थ्य इन दिनों ठीक नहीं है। ईश्वर से प्रार्थना है कि उन्हें शीघ्र स्वस्थ करें जिससे मैं एक बार उनसे पुनः मिल सकूं और उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकूं।
उनकी एक शिष्या 
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली 
*—— x ——*