magician of words in Hindi Biography by Vandna Sharma books and stories PDF | शब्दों की जादूगर

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शब्दों की जादूगर



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मेरी गुरु माँ : डॉ. सविता मिश्रा जी  
एक संस्मरण - वंदना शर्मा

सन 2007 में जब मैंने रानी भाग्य देवी महिला महाविद्यालय, एम.ए. हिंदी में प्रवेश लिया, तो मेरा परिचय डॉ. सविता मिश्रा जी से हुआ। उन्होंने मुझे कहानी, नाटक और आधुनिक काव्य पढ़ाया। 

उनका व्यक्तित्व 
उनका व्यक्तित्व गरिमामय था। शांत मुख मंडल, आभा से दमकता चेहरा और वाणी में इतनी मिठास कि सामने वाला अपनी बात कहना भूल जाए, बस सविता जी को सुनता रहे। उनका हेयर स्टाइल हमेशा एक जैसा रहता - आगे से बालों का पफ बनाकर पीछे एक जूड़ा। करीने से बंधी साड़ी। 

वो ममता भरे हृदय वाली गुरु माँ थीं। सभी छात्राओं पर वात्सल्य लुटातीं, सबको आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करतीं। उनकी एक खास बात थी - उनकी बच्चों जैसी उन्मुक्त हंसी और भोलापन। उनका सहज व्यवहार सबको आकर्षित करता था। सभी छात्राओं की प्रिय मैम, हमेशा छात्राओं की सहायता के लिए तत्पर रहतीं। कुछ छात्राएं तो उनसे 'अरे वाह' सुनने के लिए लालायित रहती थीं। उनके शब्दों में वो जादू था जो साधारण छात्रा को असाधारण बना देता था।

मुझे लिखने की प्रेरणा देने वाली गुरु
वो सभी छात्राओं को लिखने के लिए प्रेरित करतीं, उनका हौंसला बढ़ातीं। महाविद्यालय में सितंबर माह में जब हिंदी पखवाड़ा मनाया जाता तो सबसे व्यस्त सविता जी रहतीं। सारे दिन छात्राएं उन्हें घेरे रहतीं, क्योंकि उनमें जरा भी घमंड नहीं था। सबकी बात ध्यान से सुनतीं, सबको सम्मान देतीं।

नई-नई रचनात्मक गतिविधियां करातीं - पत्र-लेखन, डायरी लेखन, पुस्तक लेखन, समाचार-पत्र लेखन। हर छात्रा खुद को संपादक बनकर फूली नहीं समाती थी। 

मेरा उनसे भावनात्मक जुड़ाव अधिक ही था, क्योंकि उनका स्नेह पाकर ही तो मैंने लिखना शुरू किया। जब कभी भी मैं निराश होकर लिखना छोड़ देती, तो वो मुझे फिर से लिखने की नई ऊर्जा देतीं, मेरा मनोबल बढ़ातीं। 

मुझे याद है, सर्वप्रथम 2007में उन्होंने ही मुझे 'चाणक्य विचार' पत्रिका लखनऊ से प्रकाशितपत्रिका दी पढ़ने के लिए और उसपर प्रतिक्रिया पत्र लिखने को कहा। वो पत्रिका में प्रकाशित भी हुआ। और तब से विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं प्रकाशित होने लगीं। मैं जब भी मैम के घर जाती हूं, तो वो मुझे बहुत सारी पत्रिकाएं और किताबें देती हैं पढ़ने को और प्रेरित करती हैं कि इनमें अपनी रचनाएं भेजो। साहित्य अमृत, आजकल, पाखी, जैसी पत्रिकाओं से परिचय कराया।

एक अविस्मरणीय घटना
एक बार की घटना मुझे आज भी याद है। महाविद्यालय से हिंदी पखवाड़े के लिए कोई रैली निकलनी थी। मेरे विद्यालय पहुंचने से पहले ही सविता जी रैली के साथ चली गई थीं। उनके आने पर मैं बच्चों की तरह उनसे शिकायत करने लगी - "मुझे क्यों नहीं ले गई साथ? मुझे भी साथ ले जाना था।" 

उसके बाद मैं हर समारोह, गोष्ठी में हमेशा उनके साथ रहती। इतनी सारी यादें उनके साथ हैं कि पूरी किताब बन जाएगी।

लेखिका सविता मित्र
साहित्य जगत में प्रसिद्ध सविता जी अब तक अनेक काव्य-संग्रह और कहानी संग्रह लिख चुकी हैं। जैसे "इस बार बसंत में", "मुट्ठी में कैद धूप", "उत्तर दो समय"। क्षमा करें, मुझे सबके नाम याद नहीं। 

उनकी लेखन शैली इतनी अद्भुत है कि पाठक पढ़ते ही खुद को उससे जुड़ा महसूस करता है। प्रकृति से उन्हें बेहद लगाव है। एक नन्हीं चिड़िया उनके भीतर हमेशा चहकती रहती है। धूप का एक कोना भी उनकी सखी बन जाता है। 

सविता जी का भोलापन उन्हें सबसे जोड़ता है। एक लेखक हर समय अपनी कल्पनाओं में खोया रहता है, छोटी-छोटी बात भूल जाता है। ऐसे ही प्यारी सविता जी अक्सर अपना सामान भूल जातीं। राष्ट्रीय सेवा शिविर में कभी अपनी किताब, कभी फोन, कभी पर्स ही भूल जातीं।

उपसंहार
मुझे शुरू से ही सविता जी का व्यक्तित्व आकर्षित करता था। मन ही मन मैं भी उनके जैसा बनने का ख्वाब देखती थी। एक सशक्त महिला, जो अपने निर्णय स्वयं लेने में सक्षम है। आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर, हमेशा दूसरे की सहायता के लिए तत्पर।

गुरु-शिष्य के बीच ऐसा प्रेम, वात्सल्य आजकल देखने को नहीं मिलता। मेरा सौभाग्य रहा कि मुझे ऐसी ममतामयी गुरु माँ मिलीं। आजकल की युवा पीढ़ी इस दुलार से वंचित है।

डॉ. सविता मित्र जी ने मुझे सिर्फ साहित्य नहीं पढ़ाया। उन्होंने मुझे जीना सिखाया, लिखना सिखाया और उड़ना सिखाया।

—— समाप्त ——