My children taught me how to live in Hindi Moral Stories by Chandni choudhary books and stories PDF | बच्चों ने मुझे जीना सिखाया

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बच्चों ने मुझे जीना सिखाया

बच्चों ने मुझे जीना सिखाया


“दीदी-दीदी! हम सब आ गए। देखो दीदी, आज हम सब जल्दी आ गए, क्योंकि हमें आपके पास रहना अच्छा लगता है। आप हमसे कितना स्नेह करती हैं।”


मैंने मुस्कुराकर कहा, “बिल्कुल बच्चों, मैं आप सभी से स्नेह करती हूँ।”


तभी सभी बच्चे एक साथ कहने लगे, “दीदी, आज हम डांस करेंगे और आप देखना कि हममें से कौन अच्छा डांस करता है। अब आप हमारा पसंद का गाना लगा दीजिए। और हाँ, जब तक हम सब यहाँ हैं, आप कहीं नहीं जाएँगी।”


मैंने कहा, “ठीक है, मैं कहीं नहीं जाऊँगी।”


इन बच्चों के नाम राधा, रागिनी, रोशनी और रिद्धि थे। इनके साथ तीन साल का एक छोटा-सा प्यारा बच्चा वासु भी था। वह बहुत ही प्यारा और मासूम बच्चा था।


वासु अक्सर कहता, “दीदी, मैं तो हमेशा आपके पास ही रहना चाहता हूँ, लेकिन मम्मी मुझे ले जाती हैं।”


एक दिन उसने बड़े प्यार से कहा, “दीदी, आप मुझे बहुत अच्छी लगती हैं। मैं बड़ा होकर आपका ख्याल रखूँगा और हमेशा आपके साथ रहूँगा।”


मैंने हँसते हुए कहा, “बेटा, पहले तुम बड़े तो हो जाओ, फिर मेरा ख्याल रखना। अभी तो मुझे ही तुम्हारा ख्याल रखना है।”


वासु ने कहा, “हाँ दीदी!” और फिर हँसने लगा।


वैसे ये सभी बच्चे हमारी कॉलोनी के हैं। वे मेरे साथ समय व्यतीत करने के लिए मेरे पास आते हैं और मैं भी उनकी छोटी-बड़ी चीजों का ध्यान रखती हूँ। वे यहाँ आकर खूब खेलते हैं, नाचते हैं, हँसते हैं, गाते हैं, झूमते हैं और कहानियाँ सुनते हैं। उनकी इन छोटी-छोटी खुशियों को देखकर मेरा मन भी खुशी से भर जाता है।


मैं भी इनकी खुशी में अपनी खुशी ढूँढ़ लेती हूँ।


शायद इसका एक कारण यह भी है कि मुझे बचपन से ही एकांत में रहना पसंद था। मैं ज्यादा किसी से बात नहीं करती थी और अक्सर घर पर ही रहती थी। मेरे मन में एक सपना था कि मैं एक कवयित्री बनूँ और अपनी रचनाएँ लिखूँ।


मैं रचनाएँ लिखती तो थी, लेकिन उन्हें किसी को दिखाती नहीं थी। मेरे मन में एक डर रहता था कि कहीं लोग मेरा मजाक न उड़ाएँ। मुझे लगता था कि लोग कहेंगे—तुम कवयित्री नहीं बन पाओगी, तुम इतनी अच्छी रचनाएँ कैसे लिख सकती हो?


इसी डर के कारण मैं अपनी भावनाओं को अपने तक ही रखती थी।


लेकिन फिर एक दिन मैंने ठान लिया कि चाहे कुछ भी हो जाए, मैं हार नहीं मानूँगी। यदि मेरे भीतर कुछ कहने की इच्छा है, तो मुझे उसे शब्दों में व्यक्त करने का प्रयास जरूर करना चाहिए।


मैंने किसी के सहारे और मार्गदर्शन से अपनी रचनाओं को प्रकाशित करवाना शुरू किया। जब मेरी रचनाएँ लोगों तक पहुँचीं और लोगों ने उनमें छिपे भावों को समझने की कोशिश की, तब मेरे भीतर अपने सपने के प्रति आत्मविश्वास बढ़ने लगा।


तब मुझे यह महसूस हुआ कि परिणाम चाहे कुछ भी हो, हमें कोशिश जरूर करनी चाहिए।


हर कोशिश हमें कुछ न कुछ सिखाती है। कभी सफलता मिलती है, कभी अपनी कमियों का पता चलता है, लेकिन यदि हम प्रयास करना ही छोड़ दें तो अपने भीतर छिपी प्रतिभा को पहचानने का अवसर भी खो देते हैं।


धीरे-धीरे मैंने स्वयं से भी स्नेह करना सीखा। मुझे समझ आया कि जब तक हम खुद पर विश्वास नहीं करते और स्वयं से स्नेह नहीं करते, तब तक अपने सपनों की ओर मजबूती से आगे बढ़ना कठिन होता है।


सही दिशा और सही मार्ग ही हमें हमारी मंजिल तक पहुँचाता है।


लेकिन इन बच्चों ने मुझे जीवन की एक और बहुत सुंदर सीख दी।


उन्होंने मुझे सिखाया कि जीवन में खुश रहने के लिए हमेशा बड़ी-बड़ी चीजों की आवश्यकता नहीं होती। छोटी-छोटी खुशियों में भी जीवन की बड़ी खुशी छिपी होती है।


उनका मेरे पास आना, “दीदी-दीदी” कहकर पुकारना, मेरे साथ खेलना, नाचना, गाना, हँसना और छोटी-छोटी बातों पर खुश हो जाना मेरे मन को बहुत सुकून देता है।


कभी-कभी मैं उन्हें देखती हूँ तो सोचती हूँ कि बच्चे कितनी आसानी से वर्तमान में जी लेते हैं। उन्हें इस बात की चिंता नहीं होती कि कल क्या होगा। वे बस उस पल को जीते हैं, हँसते हैं और खुश होते हैं।


शायद बड़े होते-होते हम इसी सरलता को कहीं पीछे छोड़ देते हैं। हम बड़ी खुशियों की तलाश में छोटी खुशियों को देखना भूल जाते हैं।


इन बच्चों ने मुझे फिर से यह महसूस कराया कि जीवन को केवल बड़ी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे पलों से भी सुंदर बनाया जा सकता है।


उनकी मासूमियत ने मुझे स्वयं के बारे में भी बहुत कुछ समझाया। मैंने जाना कि दूसरों को खुशी देना भी अपने लिए खुशी पाने का एक माध्यम हो सकता है।


जब मैं उन्हें हँसते हुए देखती हूँ, तो मुझे लगता है कि मेरी अपनी खुशियाँ भी उनके साथ हँस रही हैं।


और शायद यही स्नेह है—जहाँ बिना किसी स्वार्थ के किसी की खुशी में अपनी खुशी मिल जाए।


आज मुझे लगता है कि मेरे जीवन में इन बच्चों का आना भी किसी सीख से कम नहीं है। उन्होंने मुझे बताया कि अकेलेपन से बाहर निकलने के लिए हमेशा बड़े बदलाव की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी कुछ मासूम आवाजें, कुछ छोटी-सी हँसी और कुछ सच्चा अपनापन ही मन को बदलने के लिए काफी होता है।


इन बच्चों ने मुझे जीना सिखाया है।


उन्होंने मुझे सिखाया कि अपने सपनों पर विश्वास करना चाहिए, कोशिश करते रहना चाहिए, स्वयं से स्नेह करना चाहिए और जीवन में मिलने वाली छोटी-छोटी खुशियों को कभी छोटा नहीं समझना चाहिए।


आज जब ये बच्चे मेरे पास आकर कहते हैं—


“दीदी, हम सब आ गए!”


तो उनकी इस छोटी-सी आवाज में मुझे जीवन की एक बड़ी खुशी सुनाई देती है।


और तब मेरे मन में बस यही विचार आता है—


जीवन शायद बड़ी खुशियों का इंतजार करने का नाम नहीं है।

जीवन तो उन छोटी-छोटी खुशियों को पहचानने का नाम है,

जो हमारे आसपास हर दिन मौजूद रहती हैं।


इन बच्चों ने मुझे यही सिखाया है कि स्नेह बाँटिए, अपने सपनों पर विश्वास रखिए और जीवन के छोटे-छोटे पलों को पूरे मन से जीइए।


क्योंकि कई बार जीवन की सबसे बड़ी खुशी हमें वहीं मिलती है, जहाँ हम उसे खोजने की कोशिश भी नहीं करते।