The distinctive workings of the RSS in Hindi Magazine by Vivek Ranjan Shrivastava books and stories PDF | आर एस एस की विशिष्ट कार्यप्रणाली

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आर एस एस की विशिष्ट कार्यप्रणाली

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विशिष्ट कार्यप्रणाली

-विवेक रंजन श्रीवास्तव 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को समझने के लिए केवल उसके इतिहास, विचारधारा या वर्तमान सामाजिक प्रभाव को जानना पर्याप्त नहीं है। लगभग एक शताब्दी से निरंतर सक्रिय इस संगठन की सबसे विशिष्ट पहचान उसकी कार्यपद्धति है, जिसका आधार नियमित संपर्क, स्वयंसेवा, अनुशासन, प्रशिक्षण और दीर्घकालीन संगठन निर्माण है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में की थी। संघ के अनुसार इसके मूल उद्देश्यों में समाज का संगठन, व्यक्ति के चरित्र एवं व्यक्तित्व का विकास तथा राष्ट्रीय जीवन में सामाजिक एकता और उत्तरदायित्व की भावना को सुदृढ़ करना शामिल है।

संघ की कार्यप्रणाली का सबसे प्रमुख माध्यम शाखा है। शाखा सामान्य अर्थ में किसी संस्था का ब्रांच कार्यालय नहीं, बल्कि एक निर्धारित स्थान पर नियमित रूप से आयोजित होने वाला सामूहिक नियमित कार्यक्रम है। इसमें शारीरिक व्यायाम, खेल, योग, सूर्य नमस्कार, समूहगत गतिविधियाँ, गीत, चर्चा और प्रार्थना आदि शामिल होते हैं। संघ के अनुसार शाखा का उद्देश्य केवल शारीरिक प्रशिक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वयंसेवकों के बीच अनुशासन, पारस्परिक संबंध, नेतृत्व क्षमता और सामाजिक चेतना का विकास भी है।

शाखा की प्रमुख विशेषता उसकी नियमितता है। संगठन निर्माण किसी एक बड़े आयोजन से नहीं, बल्कि निरंतर और क्रमिक संपर्कों के माध्यम से होता है। शाखा में आने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे अन्य स्वयंसेवकों से परिचित होता है, संगठन की कार्यप्रणाली को समझता है और अपनी क्षमता के अनुसार जिम्मेदारियाँ ग्रहण करता है। इस प्रकार संघ की दृष्टि में व्यक्ति केवल सदस्य नहीं रहता, बल्कि स्वयंसेवक और आगे चलकर कार्यकर्ता बनने की एक क्रमिक प्रक्रिया से गुजरता है।

इसी कारण संघ की व्यवस्था में कार्यकर्ता निर्माण को विशेष महत्व दिया जाता है। स्वयंसेवक को संगठन के विभिन्न कार्यों में भागीदारी का अवसर मिलता है और अनुभव एवं प्रशिक्षण के आधार पर योग्यता के अनुसार उसे क्रमशः अधिक जिम्मेदारियाँ सौंपी जाती हैं। यह प्रक्रिया स्थानीय शाखा संचालन से लेकर विभिन्न स्तरों पर संगठनात्मक दायित्वों तक विस्तृत होती है।

संघ की संगठनात्मक संरचना विभिन्न स्तरों पर विकसित है। शाखा इसकी मूल स्थानीय इकाई है। इसके ऊपर नगर, जिला, विभाग, प्रांत और क्षेत्र जैसे संगठनात्मक स्तर हैं तथा अखिल भारतीय स्तर पर भी विभिन्न दायित्व निर्धारित हैं। सरसंघचालक संगठन के सर्वोच्च मार्गदर्शक माने जाते हैं, जबकि सरकार्यवाह संगठन के कार्यकारी संचालन की प्रमुख जिम्मेदारी निभाते हैं। इस व्यवस्था में दायित्वों का उद्देश्य अधिकार के केंद्रीकरण के बजाय विभिन्न स्तरों पर कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी प्रदान करना है।

इस संरचना में प्रचारक की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रचारक पूर्णकालिक समर्पित कार्यकर्ता होते हैं, जो संगठन के विस्तार, संपर्क, प्रशिक्षण और कार्यकर्ता निर्माण में अपना संपूर्ण समय समर्पित करते हैं। वे विभिन्न क्षेत्रों में जाकर शाखाओं और कार्यकर्ताओं से निरंतर संपर्क बनाए रखते हैं तथा नए क्षेत्रों में संगठन के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस व्यवस्था ने संघ को स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं का एक व्यापक और सतत सक्रिय नेटवर्क विकसित करने में अद्भुत सफलता प्रदान की है।

संघ की कार्यपद्धति में प्रशिक्षण का भी विशेष स्थान है। विभिन्न स्तरों पर आयोजित प्रशिक्षण वर्गों में शारीरिक प्रशिक्षण के साथ-साथ संगठन संचालन, सामाजिक विषयों, नेतृत्व क्षमता और सेवा कार्यों से संबंधित प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है। संघ की जुलाई 2026 की अखिल भारतीय प्रांत प्रचारक बैठक में देशभर में आयोजित प्रशिक्षण वर्गों, शाखाओं और संगठनात्मक गतिविधियों की समीक्षा की गई थी। इससे स्पष्ट होता है कि प्रशिक्षण संघ की नियमित संगठनात्मक प्रक्रिया का अभिन्न अंग है, न कि कोई आकस्मिक गतिविधि।

संघ के कार्य का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र सेवा भी है। प्राकृतिक आपदाओं, बाढ़, महामारी तथा अन्य संकटों के समय स्वयंसेवकों द्वारा राहत एवं सेवा कार्यों के अनेक उदाहरण मिलते हैं। इसके अतिरिक्त शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्राम विकास, सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण और अन्य क्षेत्रों में भी संघ से जुड़े स्वयंसेवक एवं संस्थाएँ सक्रिय रूप से कार्य करती हैं। संघ की रिपोर्टों में इन गतिविधियों का विस्तृत विवरण उपलब्ध है।

इस संदर्भ में संघ की कार्यप्रणाली की एक महत्वपूर्ण विशेषता स्पष्ट होती है। संघ एक केंद्रीय संगठन के रूप में अपनी शाखाओं और कार्यकर्ताओं के माध्यम से कार्य करता है, किंतु उसकी विचारधारा से प्रेरित अनेक स्वतंत्र संस्थाएँ विभिन्न सामाजिक क्षेत्रों में सक्रिय हैं। शिक्षा, विद्यार्थी, श्रमिक, किसान, सेवा, प्रबुद्ध वर्ग,आदिवासी कार्य और सामाजिक विकास जैसे अनेक क्षेत्रों में ऐसी संस्थाएँ कार्यरत हैं। संघ के अनुसार इन संस्थाओं की अपनी स्वतंत्र संगठनात्मक संरचना और पदाधिकारी होते हैं।

इस प्रकार संघ की सामाजिक पहुँच को केवल शाखाओं की संख्या के आधार पर समझना अपर्याप्त है। उसकी कार्यप्रणाली में शाखाएँ, स्वयंसेवक, पूर्णकालिक प्रचारक, प्रशिक्षण व्यवस्था तथा विभिन्न सामाजिक क्षेत्रों में कार्यरत संगठनों का एक व्यापक नेटवर्क सम्मिलित है।

संघ की कार्यप्रणाली का एक महत्वपूर्ण पक्ष व्यक्तिगत संपर्क है। शाखा के अतिरिक्त स्वयंसेवक अपने क्षेत्र के लोगों और परिवारों से निरंतर संपर्क बनाए रखते हैं। सामाजिक कार्यक्रमों, सेवा गतिविधियों और स्थानीय समस्याओं के माध्यम से जनसंपर्क स्थापित किया जाता है। संगठन की दृष्टि से यह संपर्क केवल कार्यक्रमों में भागीदारी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दीर्घकालीन सामाजिक संबंधों के रूप में विकसित करने का प्रयास किया जाता है।

इसी निरंतर संपर्क और प्रशिक्षण के कारण संघ का संगठनात्मक विस्तार किसी चुनावी समय-सारणी पर निर्भर नहीं रहता। राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलने के बावजूद शाखा और संगठनात्मक गतिविधियाँ नियमित रूप से संचालित होती रहती हैं। यही दीर्घकालीन निरंतरता संघ की कार्यप्रणाली को अनेक अन्य संगठनों से अलग पहचान प्रदान करती है।

हालाँकि संघ को केवल संगठनात्मक दृष्टि से देखना पर्याप्त नहीं है। उसकी कार्यप्रणाली उसकी वैचारिक पृष्ठभूमि से गहराई से जुड़ी हुई है। हिंदू राष्ट्र, भारतीय सांस्कृतिक पहचान और राष्ट्रीय एकता संघ के वैचारिक चिंतन के प्रमुख आधार हैं। संघ हिंदू राष्ट्र की अवधारणा को सांस्कृतिक और सभ्यतागत पहचान के रूप में प्रस्तुत करता है। दूसरी ओर, इसके आलोचक इस अवधारणा को भारतीय राष्ट्रवाद, धार्मिक बहुलता और अल्पसंख्यकों की समान नागरिक पहचान के संदर्भ में प्रश्नांकित करते हैं। इसलिए संघ की भूमिका और कार्यप्रणाली का अध्ययन करते समय उसके वैचारिक दृष्टिकोण के साथ-साथ उसके आलोचनात्मक मूल्यांकन को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।

अकादमिक अध्ययनों में संघ की शाखा को केवल शारीरिक गतिविधियों का केंद्र नहीं माना गया है। इसे सामाजिक संपर्क, अनुशासन, सामूहिक पहचान और वैचारिक समाजीकरण की प्रक्रिया के रूप में भी देखा गया है। इस दृष्टि से शाखा संघ की संगठनात्मक व्यवस्था की सबसे छोटी इकाई होते हुए भी उसके विचार और व्यवहार को जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण माध्यम है।

संघ की कार्यप्रणाली को संक्षेप में समझा जाए तो इसका क्रम इस प्रकार दिखाई देता है, व्यक्ति से संपर्क, शाखा के माध्यम से नियमित सहभागिता, स्वयंसेवक के रूप में जुड़ाव, प्रशिक्षण, जिम्मेदारी, कार्यकर्ता निर्माण और अंततः समाज के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रियता।

इस पूरी प्रक्रिया में संगठन की शक्ति केवल संख्यात्मक विस्तार में नहीं, बल्कि प्रशिक्षित और सक्रिय कार्यकर्ताओं के सुदृढ़ नेटवर्क में निहित है। संघ का लगभग सौ वर्षों का अनुभव यह दर्शाता है कि किसी विचार को समाज में स्थायी रूप से स्थापित करने के लिए केवल बड़े आयोजनों या प्रचार अभियानों से अधिक महत्वपूर्ण निरंतर संपर्क, प्रशिक्षित कार्यकर्ता और सतत सामाजिक उपस्थिति होती है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यप्रणाली को स्वीकार या अस्वीकार करने का प्रश्न अलग है, किंतु संगठन के अध्ययन की दृष्टि से यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि उसने व्यक्ति निर्माण और नियमित शाखा को आधार बनाकर एक दीर्घकालीन सामाजिक संगठन विकसित किया है। इसकी कार्यपद्धति में शारीरिक अनुशासन, बौद्धिक प्रशिक्षण, व्यक्तिगत संपर्क, सामाजिक सेवा और संगठनात्मक जिम्मेदारी एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।

इसी समन्वित कार्यपद्धति ने संघ को एक ऐसे संगठन का स्वरूप प्रदान किया है जिसकी उपस्थिति केवल शाखाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं और उनसे जुड़े व्यापक सामाजिक नेटवर्क में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

संघ को समझने के लिए इसलिए केवल यह प्रश्न पर्याप्त नहीं है कि वह क्या कहता है, बल्कि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि वह अपने विचारों को कार्यकर्ताओं के जीवन और समाज में किस प्रकार व्यवहारिक रूप से रूपांतरित करता है।

यही उसकी कार्यप्रणाली का मूल आधार है,
विचार से व्यक्ति, व्यक्ति से कार्यकर्ता, कार्यकर्ता से संगठन और संगठन से समाज तक पहुँचने की एक सतत एवं सुव्यवस्थित प्रक्रिया की निरंतरता।

-विवेक रंजन श्रीवास्तव