दूर आसमान में, जहाँ सफ़ेद और नीले बादल आपस में आँख-मिचौली खेलते थे, वहाँ हवा में तैरता हुआ एक अद्भुत महल था। इस महल का नाम था—'दास्तान-ए-जादू'। इस महल की खासियत यह थी कि इसकी दीवारें कांच की नहीं, बल्कि पुरानी जादुई किताबों के पन्नों से बनी थीं। जब भी ठंडी हवा चलती, तो महल की दीवारों से किताबों के पन्ने फड़फड़ाते और उनमें से परियों की हँसी और बोलते हुए शेरों की दहाड़ सुनाई देती थी। यहाँ की ज़मीन पर मखमली घास की जगह रंग-बिरंगे अक्षरों के कालीन बिछे थे, जिन पर पैर रखते ही गुदगुदी होती थी।इस जादुई महल की देखरेख करने वाली थीं हमारी प्यारी 'दादी अम्मा'। उनके बाल चांदी जैसे चमकते थे और चेहरा हमेशा ममता से भरा रहता था। उनके पास एक चांदी की लाठी थी, जिसके ऊपर एक चमकता हुआ सितारा लगा था। जब भी दादी अपनी लाठी से ज़मीन पर तीन बार थपथपातीं, तो 'दास्तान-ए-जादू' की दीवारों से नई-नई कहानियाँ निकलकर हवा में तैरने लगती थीं।एक दिन, दादी अम्मा ने आरव और काव्या को अपने पास बुलाया। उन्होंने अपनी जादुई लाठी हवा में लहराई और महल के ठीक बीचों-बीच एक अदृश्य दरवाज़ा खुल गया।"बच्चों!" दादी ने प्यार से मुस्कुराते हुए कहा, "आज तुम दोनों 'दास्तान-ए-जादू' के सबसे बड़े रहस्य से मिलने जा रहे हो। इस दरवाज़े के पार 'परियों का देश' और 'बोलते जानवरों का अनोखा संसार' है। वहाँ 'चीकू' नाम का एक उड़ने वाला हाथी रहता है, जो अपनी जादुई सूँठ से आसमान में रंग-बिरंगे खिलौनों की बारिश करता है। लेकिन..."दादी की बात अधूरी ही थी कि अचानक आसमान में काले बादल छा गए। महल की दीवारों पर लिखे अक्षर डर के मारे कांपने लगे। तभी वहाँ एक तेज़ आँधी आई और उस आँधी के बीच से प्रकट हुआ—'सन्नाटासुर'। यह एक ऐसा दुष्ट राक्षस था जिसे कहानियों की आवाज़, बच्चों की हँसी और परियों का संगीत बिल्कुल पसंद नहीं था। वह हर जगह सिर्फ सन्नाटा चाहता था।सन्नाटासुर ने अपनी काली जादुई छड़ी घुमाई और 'दास्तान-ए-जादू' महल की सभी कहानियों की आवाज़ चुरा ली। देखते ही देखते महल की दीवारें बेजान हो गईं और चारों तरफ एक गहरा सन्नाटा छा गया। यहाँ तक कि उड़ने वाले हाथी चीकू के पंख भी गायब हो गए और वह ज़मीन पर गिरकर उदास हो गया।"हाहाहा!" सन्नाटासुर ज़ोर से हँसा, "अब इस महल में कोई कहानी नहीं गूँजेगी! अब सब चुप रहेंगे!" और वह उड़कर बादलों के पीछे अपने 'काले किले' में छिप गया।दादी अम्मा की जादुई लाठी की चमक भी धुंधली पड़ गई थी। उन्होंने आरव और काव्या की तरफ देखा और कहा, "बच्चों, सन्नाटासुर को सिर्फ एक ही चीज़ हरा सकती है—दादी-नानी की कहानियों का वो अनमोल सच और प्यार, जो बच्चों के दिलों में होता है। क्या तुम 'दास्तान-ए-जादू' का संगीत वापस लाओगे?"आरव और काव्या ने हिम्मत जुटाई और एक-दूसरे का हाथ पकड़कर उस अदृश्य दरवाज़े के पार, बादलों के रास्ते सन्नाटासुर के काले किले की तरफ बढ़ चले।किले के मुख्य दरवाज़े पर पहुँचते ही उनका रास्ता दो विशालकाय काले पत्थरों ने रोक लिया। उन पत्थरों पर लाल रंग के जादुई अक्षर उभर आए। एक भारी आवाज़ गूँजी, "सन्नाटासुर के किले में केवल वही जा सकता है, जो हमारी तीन अनोखी पहेलियों के सही जवाब देगा। अगर एक भी जवाब गलत हुआ, तो तुम यहीं पत्थर के बन जाओगे!"आरव और काव्या ने एक-दूसरे को देखा और सिर हिलाया। वे तैयार थे।पहली पहेली:पत्थर ने पूछा, "पैर नहीं फिर भी चलती है, बिना तेल के ही जलती है। उजाला देना उसका काम, बताओ क्या है उसका नाम?"आरव ने कुछ देर सोचा। दादी की सुनाई एक पुरानी कहानी उसे याद आई। उसने मुस्कुराते हुए कहा, "सूरज!"जवाब सुनते ही पहला पत्थर एक तरफ हट गया और आधा रास्ता खुल गया।दूसरी पहेली:अब दूसरे पत्थर की बारी थी। उसने और मुश्किल पहेली पूछी, "एक ऐसा अनोखा पिंजरा, जिसमें बंद हैं चौबीस पंछी। जब वे गाते हैं तो खुशियाँ लाते हैं, पर बिना ताले के ही बंद रहते हैं। बताओ वह क्या है?"काव्या सोच में पड़ गई। चौबीस पंछी? बिना ताले का पिंजरा? अचानक उसने आरव को मुस्कुराते हुए देखा। काव्या समझ गई और बोली, "हमारे दाँत और हमारा मुँह! जिसमें बत्तीस या चौबीस दाँत शब्दों और मुस्कान को थामे रखते हैं।"दूसरा पत्थर भी चकित रह गया और वह भी रास्ते से हट गया। अब किले का दरवाज़ा पूरी तरह खुल चुका था।आरव और काव्या चुपके से किले के मुख्य कक्ष में पहुँचे। वहाँ सन्नाटासुर एक विशाल जादुई मटके के सामने बैठा था। उस मटके से 'दास्तान-ए-जादू' महल की कहानियों की गूँज, परियों की हँसी और चीकू हाथी की आवाज़ें बाहर निकलने के लिए छटपटा रही थीं। सन्नाटासुर उस मटके पर हमेशा के लिए एक जादुई ढक्कन लगाने की तैयारी कर रहा था।काव्या ने सूझबूझ दिखाई। उसने पीछे से ज़ोर से आवाज़ दी, "सन्नाटासुर! तुम चाहे जितना अंधेरा कर लो, लेकिन तुम हमारी तीसरी और सबसे बड़ी पहेली का जवाब कभी नहीं दे पाओगे। तुम हार जाओगे!"सन्नाटासुर को अपनी बुद्धिमानी पर बहुत घमंड था। वह गुस्से में पलटा और बोला, "क्या? मैं और हारूँगा? पूछो! क्या पहेली है तुम्हारी? अगर मैंने जवाब दे दिया, तो मैं तुम दोनों को भी हमेशा के लिए खामोश कर दूँगा!"आरव आगे आया और उसने अपनी नानी की सिखाई हुई सबसे गहरी पहेली पूछी:"वह कौन सी चीज़ है जिसे जितना ज़्यादा बाँटोगे, वह उतनी ही बढ़ती जाएगी? और अगर उसे एक जगह बंद कर दोगे, तो वह दम तोड़ देगी?"सन्नाटासुर सोच में पड़ गया। उसने अपनी जादुई किताब पलटी, काले मंत्र पढ़े, लेकिन उसे जवाब नहीं मिला। वह झुँझला गया, "सोना? धन? ज़मीन? नहीं, ये सब तो बाँटने से कम होते हैं। आखिर क्या है वह चीज़?"काव्या ने गर्व से कहा, "वह चीज़ है 'ज्ञान और कहानियाँ'! कहानियाँ जब तक एक मुँह से दूसरे मुँह तक यात्रा करती हैं, वे जीवित रहती हैं और बढ़ती हैं। जब तुम उन्हें इस मटके में बंद कर दोगे, तो वे मर जाएँगी।"जैसे ही काव्या ने 'कहानियाँ' शब्द कहा, सन्नाटासुर के पैर काँपने लगे। पहेली का सही जवाब मिलते ही उसकी जादुई छड़ी के टुकड़े-टुकड़े हो गए। जादुई मटका अपने आप टूट गया और उसमें से नीले, सुनहरे और गुलाबी रंग की हज़ारों कहानियाँ, कविताएँ और लोरियाँ आज़ाद होकर आसमान में फैल गईं।सन्नाटासुर की जादुई शक्ति पूरी तरह खत्म हो गई और वह एक छोटे, बेनुकसान काले धुएँ के रूप में बदलकर वहाँ से हमेशा के लिए भाग गया।उसी पल, उड़ने वाले हाथी चीकू के मखमली पंख वापस आ गए। वह खुशी से चिंघाड़ा और उसने आरव और काव्या को अपनी पीठ पर बैठा लिया। चीकू हवा में उड़ते हुए उन्हें वापस 'दास्तान-ए-जादू' महल ले आया।महल में पहुँचते ही दादी अम्मा ने दोनों बच्चों को गले से लगा लिया। उनकी चांदी की लाठी का सितारा फिर से सौ सूर्यों की तरह चमक रहा था। महल की दीवारें दोबारा कहानियों के सुंदर चित्रों से सज गईं और अक्षरों के कालीन पर फिर से परियाँ नाचने लगीं।'दास्तान-ए-जादू' महल एक बार फिर खुशियों और शब्दों के संगीत से गूँज उठा। दादी ने बच्चों को प्यार करते हुए कहा, "याद रखना बच्चों, दुनिया में चाहे जितना बड़ा सन्नाटा या बुराई आ जाए, हमारी लोक-कहानियों का जादू और अपनों का प्यार हमेशा जीतता है।"और इस तरह, आरव और काव्या की सूझबूझ से 'दास्तान-ए-जादू' की कहानियाँ हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो गईं।