I'm Done - An Awakening Story in Hindi Spiritual Stories by prem chand hembram books and stories PDF | मेरा काम हो गया - एक जागृति कथा

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मेरा काम हो गया - एक जागृति कथा


पुरुलिया जिले के रूकनी गाँव के समीप हारु कमार का घर था। मिट्टी की दीवारें, फूस की छत और बाँस का दरवाजा—बस यही उसकी गृहस्थी की पहचान थी।
बात सन 1976 की है।
हारु ने जब से होश सँभाला, तभी से वह अपने पिता नेबु कमार की धुकानी में जा बैठता था। आग की लपटों, लोहे की खनक और हथौड़े की चोटों के बीच ही उसका बचपन बीता था। सीखने की उसमें गजब की ललक थी। दूसरे बच्चे जब खेलते थे, हारु अपने पिता के हाथों की गति और औजारों की चाल को ध्यान से देखा करता।
कुछ ही वर्षों में उसने लोहे, तांबे और एल्युमिनियम के अनेक काम सीख लिए।
नेबु कमार को विश्वास हो गया कि अब हारु घर-गृहस्थी सँभाल सकता है।
फिर क्या था, पास के गाँव में हनु कमार की बेटी मंगली के साथ उसका विवाह तय हो गया।
उस समय गाँवों की अर्थव्यवस्था आज जैसी नहीं थी। किसान कुल्हाड़ी, चाकू, हँसिया, सब्बल, गैंती और दूसरे कृषि-औजारों में धार लगवाने या उनकी मरम्मत कराने के बदले हमेशा नगद पैसा नहीं देते थे। साल भर के काम का हिसाब अक्सर अनाज से चुकाया जाता।
अगहन का महीना आते-आते हारु का घर धान से भर जाता। साल भर के भोजन का इंतजाम हो जाता।
गाँवों में तब मड़ुआ, कोदो, बाजरा और मकई की खेती होती थी। अधिकांश घरों में गाय-बैल बँधे रहते। खेतों में अनाज था और घरों में सादगी।
हारु की कारीगरी की चर्चा धीरे-धीरे आसपास के गाँवों में फैलने लगी । लोग दूर-दराज के कारीगरों के पास जाने के बजाय हारु के पास आना पसंद करते।
समय बीतता गया।
हारु चार बच्चों का पिता बन गया।
उधर उसके माता-पिता ने भी अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी कर ली थीं। एक दिन नेबु कमार और उनकी पत्नी ने कमर सीधी की और बाबा शिव के दर्शन के लिए पैदल ही चिड़का धाम चले गए।
वहाँ बाबा शिव के स्थान पर उन्हें स्वप्न में अयोध्या जाने का निर्देश मिला।
दोनों ने इसे ईश्वरीय संकेत माना और वहीं से अयोध्या के लिए प्रस्थान कर गए।
हारु के लिए यह बड़ा परिवर्तन था।
अब तक वह माता-पिता की छत्रछाया में जीवन जी रहा था। अचानक उसे लगा जैसे वह अनाथ हो गया हो।
लेकिन उसके मन में एक खुशी भी थी—बाबा ने उसके माता-पिता को जो निर्देश दिया था, उसमें अवश्य ही परिवार की भलाई छिपी होगी।
समय बीतता गया।
बच्चे थोड़े बड़े होने लगे।
लेकिन हारु के जीवन में धीरे-धीरे एक दूसरा परिवर्तन आने लगा।
पहले वह छिप-छिपकर कच्ची महुआ पी लिया करता था। अब उसने खुलकर पीना शुरू कर दिया।
मंगली उसे बहुत समझाती, लेकिन उसकी बातों का कोई असर नहीं होता।
एक दिन मंगली ने फिर उसे समझाने का प्रयास किया।
हारु झुँझलाकर बोला—
“दिन भर हथौड़ा चलाता हूँ और थोड़ी-सी पी लेता हूँ तो क्या पहाड़ टूट पड़ता है? आग के सामने खून-पसीना एक कर देता हूँ, उसकी तुझे कभी चिंता हुई?”
मंगली ने शांत लेकिन तीखे स्वर में कहा—
“खेपा, भी साल भर हथौड़ा चलाता है वह तो नहीं पीता ? तुम्हारे जैसा घना हथौड़ा चलाने वाला तुम्हारा बाप भी था। उसने तो कभी नहीं पी।”
हारु को बात चुभ गई।
“आजकल तेरा मुँह बहुत चलने लगा है। दिन भर बच्चे कहाँ दौड़ते रहते हैं, तू खबर भी रखती है? कल ही निताई चाचा के अमरूद के बागान में चरकू और छोटू ने क्या उत्पात मचाया था! दोनों के कान कैसे लाल किए थे उन्होंने, देखा था?”
मंगली चुप रही।
हारु फिर बोला—
“मुझे सीख देने चली है! अपना काम ठीक से कर। नहीं तो तेरे बाप का घर सामने है—चलती बन।”
मंगली का चेहरा तमतमा उठा।
“हाँ, हाँ! खबरदार, मेरे मायके का नाम लिया तो। मेरा बाप अगर जिंदा होता न, तो मैं उसे खूब खरी-खोटी सुनाती।”
"मेरा ही भाग फूटा है जो तू मिला "
उसी समय कोयदु चाचा वहाँ आ गए।
उन्होंने अपनी लाठी एक ओर रखी और टूटी खटिया के पिछले हिस्से पर बैठते हुए हारु को गौर से देखा।
“छि! शर्म कर हारु।”
हारु चुप हो गया।
कोयदु चाचा बोले—
“तेरे माँ-बाप ने कितने पुण्य किए होंगे, जो उन्हें बाबा शिव का ऐसा सपना मिला। कितनों को मिलता है ऐसा अवसर? आज वे माया से दूर अयोध्या में राम नाम में मगन होंगे।”
फिर उन्होंने हारु की ओर देखते हुए कहा—
“और तू किस नशे में विभोर है? महुआ के नशे में?”
हारु ने सिर झुका लिया।
कोयदु चाचा आगे बोले—
“तू देख रहा है, तेरी नशे की लत ने तेरे ही ग्राहकों को खेपा को दे दिया है।”
उन्होंने मंगली की ओर देखा।
“बहू, इसकी आमदनी नहीं घटी है क्या ?
मंगली ने धीमे स्वर में कहा—
“हाँ चाचा।”
हारु ने भी पहली बार स्वीकार किया—
“आप ठीक कहते हैं चाचा। मेरी आमदनी आधी से भी कम हो गई है।”
कोयदु चाचा ने लंबी साँस ली।
“बेटा, तेरे माँ-बाप बड़े पुण्यात्मा हैं। उनकी कोख से अवश्य ही कोई सु-संतान जन्मी है । तू उनका इकलौता वारिस है। उन्होंने बड़ी उम्मीद से तुझे जन्म दिया है।”
इतना कहकर उन्होंने साल के पत्ते की बीड़ी बनाई, उसमें तंबाकू भरा, बीड़ी सुलगाई और धीरे-धीरे वहाँ से चले गए।
लेकिन उनके शब्द वहीं रह गए।
हारु के भीतर।
उन शब्दों ने उसे भीतर तक हिला दिया था।
वह उठा, बैटरी वाली टॉर्च हाथ में ली और गाँव की नदी की ओर चल पड़ा।
रात गहरी थी।
नदी के किनारे पहुँचकर वह चुपचाप बैठ गया।
बार-बार उसके सामने अपने माता-पिता का चेहरा आने लगा।
“कितने लोग उन्हें सम्मान देते थे...”
उसने स्वयं से कहा—
“मुझे तो कोई सम्मान नहीं देता। आखिर लोग मुझे क्यों सम्मान देंगे? मेरे पास वैसा कुछ विशेष चरित्र भी तो नहीं है।”
उसके मन-मस्तिष्क में विचारों का तूफान उठ रहा था।
कभी-कभी विपत्ति आती नहीं, मनुष्य स्वयं उसे अपने दरवाजे तक बुला लाता है।
हारु के साथ भी शायद यही हुआ।
लगातार दो वर्षों तक खेती ठीक से नहीं हुई। घर के सामने बच्चों को खिलाने के लिए अन्न की समस्या उत्पन्न हो गई।
हारु ने कई लोगों से कर्ज लिया, लेकिन समय पर चुका नहीं सका।
अंततः एक दिन वह चुपचाप बाल-बच्चों समेत पुरुलिया के कालिंदी टोला चला आया।
थोड़ी-सी जमीन पर ताल के पत्तों और बाँस से एक झोपड़ी बनाई और वहीं अपनी कारीगरी शुरू कर दी।
पुरुलिया बाजार था और हारु कई तरह के काम में माहिर था। धीरे-धीरे उसकी कारीगरी की चर्चा फिर फैलने लगी।
पुरुलिया की कई बड़ी थोक दुकानों से उसे सामान बनाने के ऑर्डर मिलने लगे।
काम बढ़ा तो उसने कुछ कारीगर भी रख लिए।
धीरे-धीरे उसने थोड़ा पैसा जोड़कर जमीन भी खरीद ली।
जीवन फिर पटरी पर आने लगा था।
लेकिन हारु के भीतर की गिरावट अभी पूरी तरह रुकी नहीं थी।
तभी एक सुबह उसका चचेरा भाई मगन घर आया।
उसके चेहरे पर गंभीरता थी।
“हारु, अयोध्या से तार आया है। तुम्हें शीघ्र बुलाया गया है। माँ-पिताजी की अंतिम इच्छा है कि वे तुम्हें देखना चाहते हैं।”
हारु के हाथ-पाँव ठंडे पड़ गए।
वह पास के मास्टर के पास गया और तार पढ़वाया।
अगले ही दिन वह अयोध्या के लिए निकल पड़ा।
अयोध्या पहुँचकर उसने अपने पिता को देखा।
निबू कमार अब वहाँ निवारण बाबा के नाम से प्रसिद्ध थे।
लंबी दाढ़ी, गोरा चेहरा और शांत आँखें।
लोग बताते थे कि कठिन तपस्या के कारण उन्होंने कुछ सिद्धियाँ प्राप्त की थीं। उस समय गाँवों और कस्बों में टीबी और टाइफाइड जैसी बीमारियों से बहुत लोग मरते थे। निवारण बाबा लोगों को एक विशेष जड़ी दिया करते थे।
आश्चर्यजनक रूप से अनेक लोग ठीक हो जाते।
धीरे-धीरे उनका नाम ही पड़ गया—निवारण बाबा।
करीब पंद्रह वर्षों बाद हारु अपने पिता के सामने खड़ा था।
समय ने दोनों के चेहरों पर अपनी रेखाएँ खींच दी थीं।
हारु ने अपने पिता को प्रणाम किया।
निवारण बाबा ने उसे गौर से देखा।
कुछ क्षण तक दोनों के बीच कोई शब्द नहीं था।
फिर पिता ने हाथ उठाकर उसके माथे पर रखा।
“बेटा... मैंने अपनी जिंदगी दूसरों के लिए खर्च की।”
उनका स्वर बहुत धीमा था।
“जो प्रेम और सम्मान के लिए जीवन देता है, निश्चित ही वैसा ही जीवन लाभ करता है।”
हारु की आँखें झुक गईं।
निवारण बाबा ने कहा—
“तुझे नशा ही करना है तो बीज नाम का नशा कर।”
हारु ने पिता की ओर देखा।
“मुझे उम्मीद है, मेरे जाने के बाद तू मुझे सदा जीवित रखेगा। मैं तेरे चरित्र में सदा जीवित रहूँगा।”
इतना कहकर निवारण बाबा शांत हो गए।
हारु अपने पिता को देखता रहा।
आसपास अनेक विद्वान, साधु और सम्मानित लोग बैठे थे।
अपने पिता के व्यक्तित्व के सामने उसे स्वयं का जीवन बहुत छोटा दिखाई दे रहा था।
तभी किसी ने कहा—
“यह निवारण बाबा का लड़का है। इसके पिता के पुण्य कर्म का फल अवश्य ही इसकी संतान को मिलेगा।”
लेकिन हारु जानता था कि वह भीतर से कितना कमजोर है।
शराब का आदी।
चरित्र और नीति से दूर।
उस दिन वहाँ शोक से अधिक आनंद का वातावरण था। जैसे सभी जानते हों कि निवारण बाबा ने अपना जीवन पूरा कर लिया है।
हारु अपनी माँ के साथ पुरुलिया लौट आया।
रास्ते भर वह सोचता रहा—
“मैं अपने पूज्य पिता को अपने चरित्र में कैसे जीवित रखूँगा?”
उसने कई बार प्रतिज्ञा की कि अब शराब को हाथ नहीं लगाएगा।
लेकिन संगति ऐसी थी कि लत छूटती नहीं थी।
पाव से पाठ और पाठ से बोतल।
फिर होश नहीं रहता।
धीरे-धीरे उसने मान लिया—
“मैं कभी अपने पिता जैसा नहीं बन पाऊँगा।”
विवेक जैसे उसका साथ छोड़ चुका था।
वह पूरी तरह मन के अधीन हो गया था।
इसी बीच एक दिन शाम को उसकी मुलाकात तुलसी महतो दा से हुई।
तुलसी महतो श्रीश्री ठाकुर अनुकूलचंद्र जी के पवित्र पंजाधारी कर्मी और सह-प्रतिऋत्विक थे।
तुलसी दा ने हारु को अपने पास बैठाया।
“सुन हारु, आज मैंने किसी को दीक्षा नहीं दी है। आज तुझे लेनी ही पड़ेगी।”
हारु हँसकर बोला—
“दादा, आज नहीं। गाँव में छूत है। फिर कभी ले लूँगा। मैं थोड़े ही भागा जा रहा हूँ।”
ऐसे ही वह रोज नए-नए बहाने बनाकर तुलसी दा को टाल देता।
लेकिन तुलसी दा ने भी मन में ठान लिया था—
“इसे दीक्षा अवश्य दिलाऊँगा।”
अब स्थिति यह हो गई कि हारु को दूर से तुलसी दा दिखाई देते तो वह पीछे के रास्ते से भाग जाता।
एक दिन तुलसी दा उसकी दुकान में जा बैठे।
“आज जब तक दीक्षा नहीं होगी, मैं दुकान से नहीं जाऊँगा।”
हारु के पास बचने का कोई रास्ता नहीं था।
बड़े अनमने मन से उसने कहा—
“दादा, मैं तो दारू, मांस-मछली सब खाता हूँ। मुझसे कुछ भी पालन नहीं होगा।”
तुलसी दा मुस्कराए।
“कोई बात नहीं। तुझे अभी कुछ भी पालन नहीं करना होगा।”
हारु ने आश्चर्य से उनकी ओर देखा।
तुलसी दा बोले—
“बस इतना करना—जब भी सोकर उठेगा, अपनी मंगल कामना के लिए प्रभु को अर्घ्य देगा। और हाँ, आज से ठाकुर जी के नाम से एक गिलास अवश्य पीना।”
हारु को लगा—यह तो बहुत सरल है।
कुछ भी छोड़ना नहीं है ।
उसने दीक्षा ग्रहण कर ली।
परिवर्तन की पहली रात
दीक्षा ग्रहण करने के बाद पहली रात हारु श्रीश्री ठाकुर जी के आज्ञाचक्र वाले चित्र के सामने बैठ गया।
घर में सभी सो चुके थे।
हारु ने आँखें बंद कीं और बीज नाम का स्मरण करने लगा।
कुछ देर बाद उसे अनेक रंगों की किरणें दिखाई देने लगीं। उसे ऐसा अनुभव हुआ मानो किसी चक्र से प्रकाश निकल रहा हो और वे किरणें उसके कपाल को स्पर्श करती हुई माथे के भीतर समा रही हों।
उसके शरीर में एक नई सिहरन दौड़ गई।
वह देर तक बैठा रहा।
उस रात शायद उसके भीतर वर्षों से सोया हुआ कोई द्वार पहली बार खुला था।
कुछ दिनों बाद एक रात उसे स्वप्न आया।
उसके पिता सामने खड़े थे।
हारु ने उन्हें देखा तो दौड़कर उनसे लिपट गया।
पिता ने उसे गले लगाया, उसकी पीठ थपथपाई और धीरे से कहा—
“मेरा काम हो गया है।”
हारु की नींद खुल गई।
वह हड़बड़ाकर उठ बैठा।
अँधेरी रात में कुछ क्षण तक वह पिता की बात का अर्थ समझने का प्रयास करता रहा।
“मेरे पिता क्या कहना चाहते हैं?”
“कौन-सा काम हो गया?”
“क्या मेरी दीक्षा से इसका कोई संबंध है?”
वह पूरी रात सो नहीं सका।
उसने नाम का स्मरण करना शुरू कर दिया।
धीरे-धीरे उसके भीतर कुछ बदलने लगा।
अब शराब पीने की इच्छा वैसी नहीं होती थी।
जिस शराब के लिए वह कभी बेचैन रहता था, उससे मन हटने लगा।
उसने नियमित रूप से इष्टवृति देना शुरू किया और पुरुलिया मंदिर जाने लगा।
करीब छह महीने बाद तुलसी दा उसके घर आए।
छह महीने पहले के हारु और आज के हारु में बहुत अंतर था।
चेहरे का रंग बदल गया था।
आँखों में एक अलग शांति थी।
तुलसी दा ने आते ही मुस्कराकर पूछा—
“क्यों हारु, ठाकुर जी के नाम से एक गिलास पीते हो न?”
हारु की आँखें भर आईं।
“तुलसी दा, मैंने बहुत देर कर दी। काश, मैंने यह दीक्षा पहले ले ली होती।”
तुलसी दा चुपचाप उसे देखते रहे।
हारु बोला—
“मैंने कुछ नहीं छोड़ा। खुद छूट गईं। अब शराब नहीं पी सकता। बीड़ी तक को हाथ लगाने का मन नहीं करता।”
तुलसी दा ने कहा—
“जितना डूबोगे, उतना ही बेमालूम होओगे।”
फिर बोले—
“अब ठाकुर बाड़ी चलो। सामने उत्सव है। मैं तुम्हें मनुष्य दिखाऊँगा।”
हारु ने सिर झुका दिया।
“जी दादा।”
देवघर का आगमनी उत्सव
दो सितंबर का दिन था।
देवघर के सत्संग नगर में श्रीश्री ठाकुर जी के आगमनी उत्सव का आयोजन था। देश के विभिन्न हिस्सों से लोग वहाँ पहुँचे थे।
पूरा सत्संग नगर दुल्हन की तरह सजा था।
हारु ने अपने जीवन में ऐसा दृश्य पहले कभी नहीं देखा था।
लेकिन उसे सबसे अधिक आकर्षित वहाँ की सजावट ने नहीं किया।
वह लोगों को देखता रह गया।
सत्संगियों के जीवन में एक मधुरता थी। उनकी वाणी में मिठास थी। व्यवहार में अपनापन था। कहीं दिखावा नहीं, कहीं आडंबर नहीं।
लोग देने के लिए घंटों खड़े थे।
हारु के भीतर जैसे कोई बाँध टूट गया।
उसने उसी क्षण घर फोन किया।
“सुनो।”
मंगली ने पूछा—
“क्या हुआ?”
हारु ने कहा—
“आज जितना तुम लोगों को मांस-मछली खाना है, खा लो।”
मंगली चौंक गई।
“क्यों?”
“कल से घर में यह सब बंद। जिसे खाना होगा, बाहर खाएगा।”
कुछ क्षण की चुप्पी के बाद हारु बोला—
“मैंने आज से छोड़ दिया।”
मंगली को विश्वास ही नहीं हुआ।
जिस आदमी से शराब नहीं छूटती थी, शराब छूट गई।
जिसके हाथ से बीड़ी अलग नहीं होती थी, बीड़ी छूट गई।
अब मांस, मछली, अंडा, प्याज और लहसुन तक छोड़ने की बात कर रहा था।
उसने मन ही मन सोचा—
“दीक्षा ने इस आदमी के भीतर आखिर क्या बदल दिया?”
लेकिन परिवर्तन केवल उसके खान-पान में नहीं था।
उसका दृष्टिकोण बदल रहा था।
उसका व्यवहार बदल रहा था।
उसका जीवन बदल रहा था।
हारु पढ़ा-लिखा नहीं था। उसने बड़े-बड़े विद्यालयों में शिक्षा नहीं पाई थी। लेकिन श्रीश्री ठाकुर को केंद्र में रखकर, दृढ़ विश्वास और साधना के साथ वह अपने जीवन को बदलता चला गया।
उसकी पुरानी पूँजी उसकी कारीगरी थी।
अब उसमें अनुशासन जुड़ गया।
काम फिर बढ़ा।
पुरुलिया में उसने बड़ा-सा वर्कशॉप खोला।
कई कारीगर उसके साथ काम करने लगे।
समय के साथ उसने फोरलेन के किनारे करोड़ों की जमीन खरीदी।
लेकिन हारु के लिए उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि जमीन और धन नहीं थी।
उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी—उसका चरित्र।
जिस घर में कभी शराब और झगड़े का अँधेरा था, उसी घर में अब बच्चों की हँसी, सत्संग और शांति थी।
उसने अपने परिवार के लोगों को भी दीक्षा दिलाई।
फिर धीरे-धीरे वह दूसरे लोगों के जीवन में भी परिवर्तन का माध्यम बनने लगा।
जिस आदमी को कभी अपनी शराब की लत पर नियंत्रण नहीं था, वही अब दूसरों से कहता—
“मनुष्य अपने पुराने जीवन का कैदी बनकर मत रहो। बदलने का द्वार हमेशा खुला है।”
उसने अपने पिता के आदर्श को अपने जीवन में उतारने का प्रयास किया।
हजारों लोगों ने उसके माध्यम से दीक्षा ग्रहण की।
लोग कहते थे—
“माता-पिता के पुण्य कर्म का फल संतान को अवश्य मिलता है।”
हारु जब यह सुनता, तो उसे अपने पिता की वही बात याद आती—
“मुझे उम्मीद है, मेरे जाने के बाद तू मुझे सदा जीवित रखेगा। मैं तेरे चरित्र में सदा जीवित रहूँगा।”
तब उसकी आँखें नम हो जातीं।
अब वह समझ चुका था कि पिता को जीवित रखने का अर्थ उनकी तस्वीर को घर में रखना नहीं है।
पिता के आदर्श को अपने जीवन में उतारना है।
निवारण बाबा ने अपना जीवन दूसरों के लिए जिया था।
हारु ने भी उसी दिशा में चलना शुरू कर दिया।
एक समय वह अपने पिता के नाम के सामने स्वयं को बहुत छोटा समझता था।
आज लोग उसी हारु को सम्मान की दृष्टि से देखते थे।
उसने धन कमाया, घर बनाया, वर्कशॉप बनाया, जमीन खरीदी—लेकिन उसके जीवन की सबसे बड़ी कमाई उसका बदला हुआ चरित्र था।
एक शराबी कारीगर से लेकर हजारों लोगों के जीवन में परिवर्तन का माध्यम बनने तक की उसकी यात्रा आसान नहीं थी।
उस यात्रा में गिरावट थी, गरीबी थी, अपमान था, पश्चाताप था, पिता की स्मृति थी, दीक्षा थी, साधना थी और सबसे बढ़कर था—अपने भीतर के मनुष्य को फिर से खोजने का प्रयास।
कभी नदी किनारे बैठकर हारु ने स्वयं से पूछा था—
“लोग मुझे सम्मान क्यों देंगे?”
समय ने उसी प्रश्न का उत्तर दे दिया था।
सम्मान माँगने से नहीं मिलता।
चरित्र से कमाया जाता है।
और एक दिन हारु ने पीछे मुड़कर अपने जीवन को देखा।
उसे लगा जैसे उसके पिता सचमुच उसके भीतर जीवित हैं।
तभी उसके मन में वही शब्द फिर गूँज उठे—
“मेरा काम हो गया है।”
शायद निवारण बाबा का काम सचमुच पूरा हो गया था।
उन्होंने अपने बेटे को केवल जन्म नहीं दिया था।
उन्होंने उसके भीतर एक ऐसे मनुष्य को जन्म दिया था, जो आगे चलकर अनेक मनुष्यों के जीवन में प्रकाश बाँटने वाला था।
और इसीलिए हारु की कहानी केवल एक शराबी के शराब छोड़ने की कहानी नहीं थी।
यह उस मनुष्य की कहानी थी, जो अपने ही पतन की राख से उठकर अपने पिता के अधूरे स्वप्न को अपने चरित्र में पूरा करने लगा।
हारु एक मिसाल था।
नशे से नाम तक की यात्रा का एक जीवंत उदाहरण।
जयगुरु🙏🏻🙏🏻🙏🏻
वंदे पुरुषोत्तमम 
चंद्रा सत्संग केंद्र 
बोकारो ( झारखंड)