London, the father of the circus in Hindi Magazine by Vivek Ranjan Shrivastava books and stories PDF | सर्कस का जनक लंदन

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सर्कस का जनक लंदन

लंदन डायरी 
आधुनिक सर्कस का जनक लंदन

-विवेक रंजन श्रीवास्तव 

क्राक्सली से मिल्टन कीन्स की ओर जाते हुए रास्ते में एक खुले मैदान में अचानक एक विशाल तंबू दिखाई दिया। सड़क आगे बढ़ रही थी, लेकिन आँखें उस तंबू पर अटक गईं। दूर से वह कपड़े का एक बड़ा-सा ढाँचा था, पर उसके भीतर कितनी रोचक दुनिया बस सकती थी, हँसी, डर, संगीत, करतब, रोशनी और कुछ देर के लिए रोजमर्रा की जिंदगी से बाहर निकल आने की बाल-सुलभ खुशी।

सर्कस का तंबू देखते ही बचपन की भूली हुई शाम लौट आती है। भारत में मेले के मैदान में दूर से दिखता तंबू, बाहर लगे जिम्नास्ट लड़कियों के पोस्टर, भीतर जाने की बेचैनी और रोशनी बुझते ही सामने आता कोई नया करतब, सर्कस केवल मनोरंजन नहीं था, वह सामूहिक मनोरंजक रोमांचक स्मृति का हिस्सा था। शायद इसी कारण ब्रिटेन की सड़क पर दिखा वह तंबू मुझे सीधे भारत ले गया।

और तब लगा, सर्कस का यह तंबू कितना अद्भुत है। उसका गोल घेरा जितना छोटा दिखता है, उसकी कहानी उतनी ही बड़ी है। सच कहें तो ब्रिटेन से निकला सर्कस का तंबू वाला गोला इतना बड़ा हुआ कि उसने धीरे-धीरे सारी दुनिया को ही घेर लिया।

सर्कस की कलाएँ दुनिया में बहुत पुरानी हैं। कलाबाजी, बाजीगरी और घुड़सवारी जैसी विधाएँ ब्रिटेन से बहुत पहले अलग-अलग सभ्यताओं में मौजूद थीं। लेकिन जिस संगठित रूप को हम आज ‘आधुनिक सर्कस’ कहते हैं, उसकी कहानी लंदन से ही शुरू होती है। 1768 में टेम्स के दक्षिणी किनारे लैम्बेथ में फिलिप एस्टली ने घुड़सवारी के करतबों के लिए गोल घेरा बनाया। वे पूर्व सैनिक थे और उनकी पत्नी पैटी भी कुशल घुड़सवार थीं। तब उनके करतब को किसी ने इसे सर्कस नहीं कहा था।

घोड़े को तेज गति से गोल घुमाते हुए करतब दिखाना सीधी रेखा में दौड़ने से कहीं अधिक प्रभावशाली था। बाद में इसी घेरे का व्यास लगभग 42 फुट, यानी करीब 13 मीटर, सर्कस की पहचान बन गया।

लेकिन एस्टली की असली प्रतिभा केवल घोड़े पर संतुलन बनाने में नहीं थी, उन्हें समझ में आ गया कि दर्शक केवल घोड़ा नहीं देखना चाहते। उन्हें आश्चर्य, हँसी, खतरा, कहानी और रोजमर्रा की जिंदगी से कुछ देर बाहर निकल आने का आनंद भी चाहिए।

घुड़सवारों के साथ कलाबाज, रस्सी पर चलने वाले कलाकार, बाजीगर और जोकर भी जुड़ते गए। अलग-अलग कलाओं को एक ही घेरे में पिरोकर एस्टली ने आधुनिक सर्कस की नींव रख दी।

एक दिलचस्प बात यह भी है कि एस्टली ने अपने तमाशे को कभी सर्कस नहीं कहा था। यह नाम बाद में चार्ल्स डिब्डिन के ‘रॉयल सर्कस’ से लोकप्रिय हुआ। इस तरह आधुनिक सर्कस की जन्मकथा में कला के साथ ब्रिटिश रंगमंच और व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा भी शामिल है।

लंदन का यह सर्कस जल्दी ही बड़ा मनोरंजन बन गया। घुड़सवारी के साथ नाटक, संगीत, हास्य और भव्य दृश्य जुड़ते गए। मोमबत्तियों की रोशनी में सामने से दौड़ता घोड़ा, ऊपर रस्सी पर संतुलन बनाता कलाकार और बीच में जोकर की हास्यास्पद हरकतें, उस समय के दर्शकों के लिए किसी जीवित चलचित्र से कम नहीं रही होंगी, आज भी हर शो में वही मजा रिप्लीकेट होता है।

उन्नीसवीं सदी में ब्रिटेन में सर्कस तेजी से फैला। शहरों और कस्बों में घूमने वाले सर्कस कुछ समय के लिए अपना संसार खड़ा करते, पोस्टर लगते, संगीत बजता और लोग पूछते, आज रात क्या देखने को मिलेगा। सर्कस की यही घुमंतू प्रकृति उसकी आत्मा बन गई।

ब्रिटेन में यह परंपरा आज भी जीवित है। ज़िप्पोज़ सर्कस और गिफर्ड्स सर्कस इसके प्रमुख नाम हैं। इतिहास में बर्ट्रम मिल्स सर्कस भी बहुत बड़ा नाम रहा, जिसने 1920 से 1966 तक ब्रिटिश सर्कस की स्मृति में खास जगह बनाई।

दर्शक कलाकार को हवा में उड़ते देखते हैं, कलाकार को पता होता है कि उस उड़ान के पीछे प्रैक्टिस में कितनी बार गिरना पड़ा है। इसलिए सर्कस केवल तमाशा नहीं, शरीर, साहस, अनुशासन और भरोसे की कला भी है।

समय बदला। सिनेमा, रेडियो, टेलीविजन और फिर मोबाइल की छोटी-सी स्क्रीन ने मनोरंजन की दुनिया बदल दी। सवाल उठा, जब दुनिया घर बैठे दिखाई दे सकती है, तब कोई सर्कस के तंबू तक क्यों आए?

भारत में भी यही जादू था। आधुनिक भारतीय सर्कस की कहानी 1880 में विष्णुपंत छत्रे के ग्रेट इंडियन सर्कस से आगे बढ़ी। बाद में ग्रेट बॉम्बे सर्कस, ग्रेट रेयमन और जेमिनी जैसे नामों ने गाँवों और शहरों तक मनोरंजन का यह घुमंतु संसार पहुँचाया।

राज कपूर का जोकर याद आते ही मुकेश की आवाज कानों में उतरती है, “जीना यहाँ, मरना यहाँ...”। शैलेन्द्र का गीत सर्कस के कलाकार की जिंदगी से निकलकर जीवन का रूपक बन गया। ‘मेरा नाम जोकर’ ने भारतीय मन में यह सवाल भी उतार दिया कि दूसरों को हँसाने वाला कलाकार अपने आँसू कहाँ रखता होगा।

मंच पर जोकर मुस्कुराता है, दर्शक हँसते हैं, लेकिन पर्दे के पीछे कलाकार का अपना सुख-दुख भी होता है। सर्कस की यही विडंबना ‘मेरा नाम जोकर’ ने भारतीय मन में बहुत गहरे उतार दी, दूसरों को हँसाने वाला आदमी अपने आँसू कहाँ रखता होगा? शायद इसी सवाल के कारण भारत में सर्कस केवल बच्चों का खेल नहीं रहा, वह कलाकार के जीवन, त्याग और अकेलेपन की कहानी भी बन गया।

आज का ब्रिटिश सर्कस पुराने अर्थों में केवल जानवरों के प्रदर्शन पर निर्भर नहीं है। पशु-कल्याण की बदलती समझ ने इसकी दिशा बदली है। इंग्लैंड में 20 जनवरी 2020 से घूमने वाले सर्कसों में जंगली जानवरों के प्रदर्शन पर कानूनन प्रतिबंध है।

यह केवल कानून का परिवर्तन नहीं, समाज की बदलती संवेदना का भी संकेत है। सर्कस ने अपनी पुरानी चमक को पकड़े रहने के बजाय समय के साथ अपना अर्थ बदलना सीखा है।

आज के समकालीन सर्कस में मनुष्य स्वयं सबसे बड़ा आश्चर्य है। शरीर की क्षमता, हवा में उड़ते कलाकार, कार या मोटरसाइकिल स्टंट , संतुलन, नृत्य, संगीत, प्रकाश और कहानी मिलकर ऐसी प्रस्तुति बनाते हैं जिसमें रोमांच के लिए जंगली जानवरों की जरूरत नहीं पड़ती।

लंदन में घूमते हुए यह सोचकर आश्चर्य होता है कि आधुनिक सर्कस की कहानी इसी शहर के दक्षिणी हिस्से से शुरू हुई थी। आज एस्टली का वह एम्फीथिएटर नहीं है, लेकिन उसकी कल्पना जीवित है। दुनिया के किसी भी हिस्से में सर्कस का गोल घेरा देखिए, उसके पीछे कहीं न कहीं लैम्बेथ का वह पुराना मैदान छिपा दिखाई देगा। भारत में उसी घेरे को याद करते हुए जेमिनी सर्कस का तंबू, राज कपूर का जोकर और बचपन की वह उत्सुकता याद आती है, जब शहर में सर्कस आना किसी त्योहार से कम नहीं लगता था।

और मुझे लगता है, सर्कस का असली जादू यही है। हम जानते हैं कि कलाकार गिरने वाला नहीं है, फिर भी उसके हवा में उठते ही साँस रुक जाती है। जोकर का गिरना अभिनय है, फिर भी हम हँसते हैं। रस्सी पर चलने वाले कलाकार के साथ हमारा दिल भी धड़कता है। सर्कस हमें कुछ देर के लिए वह चीज लौटा देता है, जिसे आधुनिक जीवन ने धीरे-धीरे हमसे दूर कर दिया है, आश्चर्य, उत्फुल्लता और खुशी ।

क्राक्सली से मिल्टन कीन्स की उस यात्रा में सड़क किनारे दिखा तंबू इसलिए देर तक आँखों में बना रहा। गाड़ी आगे निकल गई, लेकिन वह गोल तंबू मन में ठहर गया। लगा, सर्कस का यही तो कमाल है, वह कुछ घंटों के लिए आता है, अपनी दुनिया खड़ी करता है, हमें उसमें बुलाता है और फिर तंबू समेटकर आगे बढ़ जाता है। पीछे रह जाती है केवल याद।

शायद इसी कारण दूर से सर्कस का तंबू दिखाई दे तो मन आज भी कह उठता है, चलो, देखते हैं भीतर क्या है।
थैंक्यू लंदन सर्कस को दुनिया भर में इस स्वरूप में प्रस्तुत करने के लिए।

-विवेक रंजन श्रीवास्तव