The Game of Seven Kingdom - 1 in Hindi Adventure Stories by jay singh books and stories PDF | The Game of Seven Kingdom - 1

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The Game of Seven Kingdom - 1


अध्याय 1 — वो किताब


दिल्ली की एक पुरानी-सी गली में मौजूद वह छोटी-सी किताबों की दुकान बाहर से देखने पर बिल्कुल सामान्य लगती थी।
लकड़ी का पुराना दरवाज़ा, धूल से ढकी खिड़कियाँ और अंदर तक जाती हुई किताबों की अनगिनत अलमारियाँ।
लेकिन उस दुकान की सबसे अजीब बात थी—
वहाँ कोई दुकानदार नहीं था।
“मैं कह रही हूँ, हमें यहाँ नहीं आना चाहिए था।”
प्रेक्षा ने चारों तरफ देखते हुए धीमी आवाज़ में कहा।
उसके पीछे आद्रित एक किताबों की अलमारी खंगाल रहा था।
“तुम हर जगह यही बोलती हो।”
“क्योंकि हर जगह कुछ न कुछ गड़बड़ होती है।”
स्नेहा ने हँसते हुए कहा, “प्रेक्षा, तुम भूतों से डरती हो क्या?”
“भूतों से नहीं।”
प्रेक्षा ने गंभीर चेहरा बनाया।
“लेकिन उन लोगों से जरूर डरती हूँ जो भूतों की कहानियाँ सुनाकर रात में मुझे अकेला छोड़ देते हैं।”
वीर तुरंत बोला—
“मैंने कब छोड़ा?”
तीनों उसकी तरफ देखने लगे।
वीर ने दो सेकंड सोचा।
“ठीक है… दो-तीन बार।”
“वीर!”
चारों की हँसी पूरी दुकान में गूँज गई।
वे चारों कॉलेज के दोस्त थे—आद्रित, प्रेक्षा, स्नेहा और वीर।
आज वे पुराने शहर में एक प्रोजेक्ट के लिए किताबें खोजने आए थे। प्रोजेक्ट का विषय था—
“प्राचीन लोककथाएँ और उनके पीछे छिपे रहस्य।”
लेकिन उन्हें बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि आज उन्हें एक ऐसी कहानी मिलने वाली है…
जो सिर्फ कहानी नहीं थी।
वह एक दरवाज़ा थी।
“इधर देखो।”
आद्रित की आवाज़ सुनकर तीनों उसके पास पहुँचे।
अलमारी के सबसे नीचे एक पुराना लकड़ी का बॉक्स रखा था।
उस पर अजीब-से चिन्ह बने थे।
एक गोल घेरा…
उसके अंदर सात छोटे निशान…
और बीच में एक आँख।
स्नेहा ने भौंहें सिकोड़ लीं।
“ये क्या है?”
वीर ने तुरंत कहा—
“खजाना।”
प्रेक्षा ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हें हर चीज़ में खजाना क्यों दिखाई देता है?”
“क्योंकि मेरी किस्मत में खजाना लिखा है।”
“तुम्हारी किस्मत में सिर्फ फेल होने का डर लिखा है।”
“बहुत मज़ाकिया हो गई हो।”
आद्रित ने बिना उनकी बहस पर ध्यान दिए बॉक्स खोल दिया।
अंदर…
एक काली किताब रखी थी।
किताब का कवर बेहद पुराना था, लेकिन उस पर बने सात चिन्ह बिल्कुल साफ थे।
आद्रित ने किताब उठाई।
जैसे ही उसकी उँगलियाँ कवर से टकराईं—
धड़ाम!
पूरी दुकान की खिड़कियाँ एक साथ बंद हो गईं।
चारों चौंक गए।
“ये… अपने आप कैसे बंद हुई?” स्नेहा ने पूछा।
वीर ने तुरंत दरवाज़े की तरफ देखा।
“शायद हवा…”
प्रेक्षा ने उसे घूरा।
“खिड़कियाँ अंदर की तरफ बंद होती हैं, हवा से नहीं।”
वीर चुप हो गया।
आद्रित ने किताब नीचे रखनी चाही।
लेकिन—
किताब उसके हाथ से चिपकी हुई थी।
“आद्रित?”
प्रेक्षा की आवाज़ में पहली बार डर था।
किताब के कवर पर बना आँख का निशान चमकने लगा।
फिर किताब अपने आप खुल गई।
पहला पन्ना बिल्कुल खाली था।
दूसरा भी।
तीसरे पन्ने पर केवल एक वाक्य लिखा था—
“चार यात्री आएँगे…”
चारों एक-दूसरे को देखने लगे।
अगली पंक्ति धीरे-धीरे खुद लिखने लगी।
“एक बुद्धि लेकर आएगा।”
आद्रित के सामने चमकता हुआ चिन्ह बना।
“एक हृदय लेकर आएगी।”
प्रेक्षा के सामने।
“एक जादू को समझेगी।”
स्नेहा के सामने।
फिर आखिरी शब्द उभरे—
“और एक… युद्ध को।”
वीर के सामने।
वीर का चेहरा उतर गया।
“मुझे ये गेम बिल्कुल पसंद नहीं आ रहा।”
अचानक किताब के बीच से तेज़ रोशनी निकली।
चारों ने आँखें बंद कर लीं।
आद्रित चिल्लाया—
“सब पीछे हटो!”
लेकिन देर हो चुकी थी।
उनके पैरों के नीचे जमीन पर एक विशाल गोल जादुई चिन्ह बन चुका था।
सातों निशान चमक उठे।
हवा तेजी से घूमने लगी।
किताब के पन्ने तूफान की तरह पलटने लगे।
और आखिरी पन्ने पर एक नया संदेश दिखाई दिया—
GAME START
अगले ही पल—
चारों गायब हो गए।
जब प्रेक्षा ने आँखें खोलीं…
तो सबसे पहले उसे आसमान दिखाई दिया।
लेकिन वह आसमान नीला नहीं था।
उसमें बैंगनी रंग की चमकती हुई धारियाँ थीं।
दूर कई बड़े-बड़े द्वीप हवा में तैर रहे थे।
एक पहाड़ आसमान में उल्टा लटका हुआ था।
पेड़ों की पत्तियाँ नीली थीं।
और उनके सामने…
एक विशाल शहर था।
जिसकी दीवारें सुनहरी रोशनी से चमक रही थीं।
प्रेक्षा धीरे से उठी।
“हम… कहाँ हैं?”
स्नेहा ने अपने कपड़ों पर लगी मिट्टी साफ की।
“मुझे नहीं पता।”
वीर ने चारों तरफ देखा।
“आद्रित?”
कोई जवाब नहीं।
“आद्रित!”
दूर से आवाज़ आई—
“मैं यहाँ हूँ!”
चारों आखिरकार एक-दूसरे को देख पाए।
लेकिन इससे पहले कि वे कुछ समझ पाते—
आसमान में एक विशाल स्क्रीन प्रकट हुई।
[WELCOME, PLAYERS.]
चारों के चेहरे पर एक साथ हैरानी आ गई।
स्क्रीन पर अगली लाइन दिखाई दी—
[WORLD: ELYSIA]
[MISSION: SURVIVE]
और फिर—
[RULE NO. 1 — DO NOT TRUST THE KING.]
स्क्रीन गायब हो गई।
चारों कुछ सेकंड तक बिल्कुल शांत खड़े रहे।
वीर ने धीरे से कहा—
“एक बात बताऊँ?”
प्रेक्षा ने उसे देखा।
“क्या?”
वीर ने सामने खड़े विशाल महल की ओर इशारा किया।
“मुझे लगता है… हमें राजा से मिलना ही नहीं चाहिए।”
उसी समय महल के ऊपर से एक तेज़ गर्जना सुनाई दी।
एक विशाल काला ड्रैगन बादलों को चीरता हुआ नीचे आया।
चारों के चेहरे सफेद पड़ गए।
और ड्रैगन के पीछे…
घोड़े पर सवार एक रहस्यमयी योद्धा दिखाई दिया।
उसकी आँखें सीधे उन चारों पर थीं।
उसने तलवार निकाली।
और दूर से सिर्फ इतना कहा—
“खिलाड़ी आ चुके हैं।”