childhood memories in Hindi Letter by Vandna Sharma books and stories PDF | यादों के झरोखे से त्योहार

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यादों के झरोखे से त्योहार



यादों के झरोखे से - त्योहार

कोई सा भी त्योहार हो अकेले नहीं मना सकते। बड़े पूर्वजों ने भी बहुत-सोच-समझकर त्योहार बनाए। इन्हीं बहानों से बोरिंग जिंदगी में रंग भर जाते हैं। रोज की दिनचर्या में कुछ बदलाव आ जाता है। इन्हीं त्योहारों के बहाने रिश्तेदार आपस में मिलते हैं। बहनों को मायके जाने का मौका मिल जाता है। ये तीज त्योहार न हो तो सोचो कितनी बोरिंग हो जाएगी जिंदगी। रोज एक ही काम, एक ही दिनचर्या। परिवर्तन संसार का नियम है और जरूरी भी है।

भले ही अब इन त्योहारों का रूप बदल गया है लेकिन दौड़ती-भागती जिंदगी में संघर्ष की तपन से राहत देती बारिश की बूंदों की तरह ये त्योहार आते हैं और जिंदगी को नई ऊर्जा से भर देते हैं।

मैं निजी अनुभव के आधार पर यह कहना चाहती हूं कि एक लड़की के लिए शादी से पूर्व के त्योहार व शादी के बाद के त्योहार में जमीन आसमान का अंतर होता है। शायद सभी महिलाएं मेरी इस बात से सहमत हों।

शादी से पहले जब मैं छोटी थी, मुझे तीज का त्योहार बहुत अच्छा लगता था। झूला झूलने का बहुत शौक था। घर के आंगन में ही सात दिन पहले से ही झूला पड़ जाता था। स्कूल से आते ही मैं झूले पर बैठ जाती और फिर तो सब काम झूले पर ही होते। आज भी जब किसी पार्क में झूले दिख जाते हैं तो झूलने का लोभ नहीं छोड़ पाती। जिसने भी सर्वप्रथम झूले का आविष्कार किया होगा, बड़ा धन्य व्यक्ति होगा। क्या अद्भुत आविष्कार किया है।

राधा रानी भी झूला झूले कान्हा संग, गौरा माँ भी झूला झूले भोले बाबा संग। मतलब सृष्टि के आरंभ से ही महिलाओं का प्रिय त्योहार। उसपर घेवर की मीठी-मीठी सुगंध। मन भी दुविधा में पड़ जाए घेवर खाऊं या नहीं। घेवर मीठा होता है, अब मीठा खाऊं तो वजन बढ़ने की चिंता, ना खाऊं तो मन ललचाए।

संध्या होते ही सहेलियों की महफिल लगने लगती। सभी सखियां हरे-हरे वस्त्रों में सोलह श्रृंगार किए एक से एक बढ़ जब सावन के गीत गाती तो एक अलग ही मधुर वातावरण सा बन जाता।

राखी के त्योहार का भी हम दिन गिनते रहते। मुझे अपनी बुआ के आने का बेसब्री से इंतजार रहता। हम दोनों बहनें सुबह जल्दी उठकर नहा लेते, पूजन के बाद पहले अपने भाइयों को राखी बांधते फिर हम पापाजी को राखी बांधते। पापा जी हम चारों भाई-बहनों को बराबर ही नेग देते। फिर हम अपनी मम्मी के साथ मामा जी के घर जाते राखी बांधने। संयोग से हमारे मामा जी भी शुरू से हमारे पड़ोस में ही रहते बस दो गली पीछे। वहां से शीघ्र आ जाते क्योंकि बुआ जी से राखी बंधवाने का उतावलापन रहता था। शाम को तीनों बुआ जी और हम चारों भाई-बहन की महफिल सजती। देर रात तक सब अपने किस्से सुनाते।

दशहरा यानि विजय दशमी के दिन हमारे यहां यज्ञ का आयोजन होता। सब अपने-अपने शस्त्रों की पूजा करते। मम्मी का अस्त्र जैसे बेलन, चमचा, पापा जी की बंदूक, हम बच्चे अपनी किताबें रखकर पूजा करते। फिर उनकी चौक में एक जगह चारपाई पर रख परिक्रमा करते सात बार। सभी किताबों और घर के हर कोने में घर पर उगाए जौ के नवीन पौधे (नौरते) रखते। एक-दूसरे के कान पर भी रखते बदले में बड़ो से उपहार मिलते। मम्मी सबको दही बताशे का प्रसाद देती। फिर हम उड़द-चावल और लौकी का रायता खाते। हमारी तरफ एक कहावत है "पायते में रायता नहीं खाया तो क्या खाया"।

शाम को हम सारे बच्चे पापा जी और मामा जी के साथ रामलीला देखने जाते। वहां झूला झूलते और वहां से खिलौने वाले से त्रिशूल, गदा, तलवार और धनुष लेकर आते और घर आकर हम चारों भी रामलीला का अभिनय करते। सब एक साथ दही जलेबी खाते और देर रात तक बतियाते।

दीवाली का त्योहार हमारा सबसे प्रिय त्योहार है। क्योंकि यह त्योहार पांच दिन तक मनाया जाता है। हम कैलेंडर में एक-एक दिन गिनते। अभी और कितने दिन शेष हैं। धनतेरस से ही घर में रौनक हो जाती। भैया और पापा मिलकर बिजली की झालर और फूल मालाओं से घर सजाते। धनतेरस के दिन शॉपिंग जरूर करते। एक बर्तन, झाडू और धनिया जरूर खरीदा जाता। कहीं-कहीं दीए और कुबेर जी की मूर्ति भी खरीदते हैं। धनतेरस से अगले दिन नरका चौदस या रूप चौदस भी कहते हैं। इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने नरकासुर का वध किया था। इस दिन को हम छोटी दीवाली भी कहते हैं, क्योंकि इसी दिन शाम को पूजन के बाद दीए जलाते हैं। मुख्य द्वार पर दो दीए, एक-एक रसोई व मंदिर में और एक डस्टबिन के पास भी जरूर रखा जाता।

अगले दिन बड़ी दीवाली के दिन सारा घर सजाते, शाम को पूजन करते। पूजन के बाद सभी जगह हर कोने में दिए जलाए जाते। फिर हम चारों भाई-बहन छत पर जाकर अनार और फुलझड़ियां छोड़ते। सब एक साथ खाना खाते। छत से सारे शहर को जगमगाते हुए देखना एक अद्भुत नजारा होता। रोशनी में नहाया शहर, टिमटिमाते जुगनू जैसा प्रतीत होता है जैसे आकाश के तारे धरती पर उतर आए हों।

अगले दिन गोवर्धन वाले दिन हम सभी पड़ोसियों को मिठाई बांटने जाते। तीनों बुआ शाम तक आ जाती। हम शहर में रहते थे और हमारे घर गाय नहीं थी इसीलिए गोवर्धन वाली पूजा नहीं होती थी।

अगले दिन भाई-दूज का त्योहार धूम-धाम से मनाया जाता। तीनों बुआ, पापा और भैया का टीका करती उन्हें गिफ्ट देती। वो हम दोनों बहनों का टीका नहीं करती। मेरे पूछने पर बुआ ने बताया कि सिर्फ भाई-भतीजे का टीका करते हैं। लड़कियों का नहीं। मैंने उसी समय प्रण लिया जब मैं बुआ बनूंगी तो कोई भेदभाव नहीं करूंगी। मेरे लिए दोनों समान हैं भतीजा-भतीजी दोनों मेरी आंख के तारे हैं। और शादी के बाद से, जबसे मैंने भाई-दूज करनी शुरू की है मैं अपनी भतीजी का भी टीका करती हूं। उसे भी नारियल और उपहार देती हूं। इतने मेहमान तो आजकल किसी की शादी में भी नहीं जुड़ते जितने हमारे घर भाई दूज के दिन जुड़ते थे। तीनों बुआ जी उनके बच्चे, चाची आती थी गांव से, ताऊ जी की दोनों लड़कियां भी साथ आती। हम चारों भाई-बहन सब मिलकर धूम मचाते। पूरे सप्ताह घर में रौनक रहती, उत्सव का माहौल रहता। मेरे पापा सभी के लिए साड़ी और उपहार देते साथ में मिठाई का डिब्बा भी।

वर्तमान में लौट आती हूं तो देखती हूं जबसे मेरी शादी हुई, सभी त्योहार बोरिंग हो गए। एक तो ससुराल रूढ़िवादी मिल गई जहां बहुओं का काम सिर्फ चूल्हा-चौका तक ही सीमित है। अब तो सारा दिन घर की साफ-सफाई और रसोई में खाना बनाने में निकल जाता है। अब मुझे कोई त्योहार अच्छा नहीं लगता। राखी और भाई दूज पर तो मायके व ससुराल के बीच फंस कर पिस जाती है मेरे जैसी रिश्ता निभाने वाली लड़कियां। सबको खुश करने के चक्कर में खुद के अरमानों का गला घोटते रहो, फिर भी कोई खुश नहीं होता। हाय मैं इतनी बड़ी क्यूं हो गई, क्यूं शादी की। मेरी तो दुनिया ही बेरंग हो गई। वो बचपन वाले त्योहार अब नहीं आते।

डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली