Virasat ki Roti - Story of every household in Hindi Drama by Aman Mishra books and stories PDF | Virasat ki Roti - घर घर की कहानी

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Virasat ki Roti - घर घर की कहानी

यह कहानी एक काल्पनिक है.
हमारी कहानी की शुरुवात कुछ ऐसे पात्रों से होती है. जो एक ही परिवार के सदस्य थे. हमारी कहानी की शुरुवात होती है पाठक परिवार के पांच सदस्य से. जो एक साथ एक ही घर मे रहा करते थे. यह परिवार मे हमारी कहानी के मुख्या पात्रा है राहुल पाठक. राहुल अपने माता पिता माँ का नाम निर्मला पाठक, पिता का नाम राजेश पाठक और उसके बडे भाई एवं बहन के साथ रहता था.
बडे भाई का नाम किशोर पाठक और बडी बहन का नाम जानकी पाठक था. राहुल के पिता फैक्ट्री मे एक सुपरवाइजर के पोस्ट पर काम करते थे. और माँ निर्मला पाठक घर की सारी जिम्मेदारियां संभालती थी. बडा भाई किशोर पाठक एक सरकारी दफ्तर मे काम करता था. और मंजलि बहन जानकी पाठक Collage मे एक प्रोफेसर थी. और राहुल अभी अभी अपनी पढाई पूरी कर घर वापस लौटा था. घर मे अक्सर छोटी छोटी बातों को लेकर राहुल अपने बडे भाई बहन के साथ छोटी मोटी नोक झोक होती रहती थी. राहुल के पिता राजेश पाठक जी का स्वभाव थोडा गुस्सैल था. उनका मिजाज हमेशा गरम रहता था. या यु कहलो की उन्हें हमेशा छोटी छोटी बातों पर गुस्सा करने या डाटने की आदत थी. उनका स्वभाव शुरू से ही बडा अनुशाशन प्रिय रहा है. कोई उनके बनाये हुए नियम को तोडता था तब वह अपने गुस्से पर काबू नहीं रख पते. वह अक्सर छोटी छोटी बातो पर राहुल से या परिवार मे किसी अन्य सदस्य से नाराज हो जाते. और कभी कभी बात ज्यादा बढ जाने पर उनकी पिटाई भी कर दिया करते.
उनके इसी स्वभाव के कारण उनके घरवाले अक्सर परेशान रहा करते. उनके इसी स्वभाव के कारण उनके राजेश पाठक जी के अपने छोटे बेटे राहुल पाठक से बिलकुल भी नहीं बनती थी. वह अक्सर अपनी माँ निर्मला पाठक से अपने पिता की शिकायत करता था. परन्तु निर्मला जी अपने बेटे राहुल को यह कहकर समझती" बेटा तुम्हारे पिता पर घर की सारी जिम्मेदारियां है और उनपर अपने काम का कुछ ज्यादा ही बोज है इसी कारण आज कल वो थोडे चिडचिडे स्वभाव के हो गए है. राहुल की माँ निर्मला जी अक्सर अपने बेटे को ऐसे समझाकर उसकी बातों को नजर अंदाज कर दिया करती थी. यह स्तिथि राहुल की अपने भाई बहन के साथ भी थी. वह जब भी इस विषय पर उनसे बात करता तोह वह लोग उसे डाट कर चुप करा देते की" तू अभी बहोत छोटा है तुझे ये सब की समझ नहीं"
ऐसे ही करते करते कही महीने बीत गए.
एक दिन राहुल के घर कुछ मेहमान आए. वह मेहमान राहुल के बडे भाई किशोर के लिए उसके विवाह का रिश्ता लेकर आए. राहुल अपने बडे भाई किशोर से बहोत प्यार करता था. अपने बडे भाई की रिश्ते की बात सुनकर वह बहोत खुश था. वह भाग भाग कर सारे काम कर रहा था. सभी के कामो मे हाथ बाटा रहा था. जल्द ही राहुल के घर किशोर के लिए अपनी बेटी का रिश्ता लेकर आए मिश्रा परिवार के दो भाई. वह ठी अंकित मिश्रा और उनका छोटा भाई साहिल मिश्रा. वह दोनों ही किशोर को देखने आए. घर मे बडा ही खुशनुमा माहौल था. राहुल अपने परिवार के साथ लखनऊ के एक किराये के मकान मे रहता था. किशोर के रिश्ते की तय होने की खुशी मे किशोर के पिता राजेश पाठक ने अपने कही रिश्तेदार को भी खाने की दावत दी थी. जल्द ही किशोर के रिश्ते के लिए आए हुए मेहमान ने किशोर के रिश्ते की बात आगे बढाई. किशोर एक सरकारी दफ्तर मे काम करता था. अंकित को यह रिश्ता बहोत पसंद आया और उसने यह रिश्ता पक्का करने की सोची. इसी विचार से उसने अपने छोटे भाई साहिल मिश्रा से बात करने की सोची. इसी विचार से उसने अपने छोटे भाई साहिल मिश्रा से बात करने की सोची. परन्तु साहिल इस रिश्ते से कुछ खास खुश नहीं दिखा. उसने अपने छोटे भाई साहिल मिश्रा से एकांत मे बात करने की सोची. और वह दोनों ने किशोर के पिता राजेश पाठक जी से यह कहा कर विदा ली" की हम हमारा फैसला विचार कर आपको जल्द ही सूचित कर देंगे" आगे कुछ ही दुरी पर जाते ही एक होटल मे दोनों भाई नाश्ता करने के लिए रुके. और दोनों भाई अंकित और साहिल मिश्रा ने इसी बात पर चर्चा शुरू कर दी.
दोनों भाई का विस्तार चर्चा मे आवरण:
अंकित, साहिल! तुम्हे यह रिश्ता कैसे लगा, क्या लगता है तुम्हे की हमारी बेटी यह सुखी रहेगी?
साहिल, भैया! किशोर एक बहोत नेक लडका है और एक सरकारी दफ्तर मे काम भी करता है किन्तु
अंकित, किन्तु! क्या साहिल तुम्हारे मन मे जो भी शंका हो साफ साफ कहो यी हमारी बेटी के भविष्य का सावल है.
साहिल, भैया! परिवार तोह भला है किन्तु वो किराये के मकान मे रहते है और उनका अपना कोई मकान नहीं है. शादी के बाद क्या हम हमारी बेटी को एक किराये के मकान मे रहने के लिए भेजेंगे! क्या यह उचित होगा?
अंकित, तुम्हारी बात तोह उचित है! तोह तुम्हारे मत से की हमे यह रिश्ता तय नहीं करना चहिए.
साहिल, जी भैया! यह करना ही सही होगा.
ऐसे आपस मे विचार विमर्श कर दोनों भाई ने यह रिश्ते को ठुकरा दिया.
इस बात से किशोर के पिता राजेश पाठक जी को बहोत बुरा लगा. और उन्होंने अपने और अपने बडे भाई के नाम की विरासत की जमीन मे अपने हिस्सा मांग कर उस पर खुद का माकन बनाने की सोची. इस बात के लिए पहले राजेश पाठक जी ने अपने परिवार से विचार विमर्श करने की सोची. और उन्होंने यह सोचा की" परिवार मे बात चित कर ही मे एक निर्णय लूंगा" और परिवार मे आपसी सलाह के बात उन्होंने अपने बडे भाई विजय पाठक को फोन लगाकर बात करने की सोची. किन्तु राजेश पाठक की पत्नी निर्मला जी ने उन्हें यह सुझाव दिया की" सुनिए जी आप आपने बडे भाई साहब को घर पर भोजन का नयौता देकर उन्हें घर बुलाइये और फिर उनसे अपने हिस्से की जमीन के लिए बात कीजिये" राजेश पाठक जी ने अपने पत्नी निर्मला जी की बात मानकर अपने बडे भाई विजय पाठक को भोजन के लिए अपने घर पर नयौता दे दिया.