फिल्म लेख :_ खून से सनी फिल्में और संगीत बनाते विशाल भारद्वाज
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सोचें आपने एक मीठी,मधुर शब्दावली और रेशम जैसे संगीत की लहरियों को सुनकर सुकून महसूस किया। कुछ पल ही बिताए थे कि अगले दृश्य में बेदर्दी से कत्ल करता हूं गाना गुनगुनाता व्यक्ति!!
चलिए,एक बार हो गया। पर नहीं फिर एक में ऐसी स्त्री जो अपने प्रेमी को प्यार करती,उसके साथ रहती है।पर जैसे ही वह उसकी बात नहीं मानता,परेशान करता है तो अगले ही दिन उसका कत्ल। फिर कोई और तो उसका भी कत्ल करती वह स्त्री। जो खुद ही उनके बाह्य गुणों से प्रभावित होकर अपनी जिंदगी में उन्हें शामिल करती है फिर मार भी देती है।।
यह भी छोड़ें ।अच्छा खासा अब्बाजी,उनका साम्राज्य, उनकी खूबसूरत पत्नी और वहां भी उनका सेवक और पत्नी में प्यार (??) फिर कत्ल।
फिर एक नहीं.. नहीं ... दो,तीन फिल्में (इश्किया, डेढ़ इश्किया,हैदर ) नाजुक शायरी करता व्यक्ति और स्त्री के मोहपाश में हत्याएं भी करता जाता। अजनबियों की नहीं बल्कि अपने ही पुराने संबंधों की। और नाम शेक्सपियर जैसे पोएटिक व्यक्ति का,की यह ट्रेजडी,ओथेलो,मैकबेथ आदि उन्होंने लिखी,हमारे इस भारतीय फिल्मकार ने केवल फिल्माया,पर्दे पर भारतीय परिवेश में उतारा।
पर हर बार,लगातार यही विषय? शेक्सपियर के भी कई खूबसूरत पोएटिक किताबें हैं। ओ हेनरी से लेकर मारियो वर्गिस लोसा, मार्खिस, हेमिंग्वे आदि जिन्हें साहित्य के लिए नोबल तक मिला, भी हैं,आपकी दृष्टि उस ओर क्यों नहीं गई? सिनेमैटिक लिबर्टी वहां भी लेकर , कुछ फिल्में उन पर भी बनाते?
पर यह व्यक्तिगत पसंद और अंदर मन में बैठे अल्फ़ा जीन,सोच पर निर्भर करता है कि आप क्या बनाते और दर्शकों को देते हैं? वैसे भी फिल्मकार और फिल्मों से नैतिकता की उम्मीद रखना ऐसा ही है जैसे ट्रम्प से बुद्धिमानी की।
पर एक दूसरा पहलू उससे भी दिलचस्प है । संगीत में भारतीयता, सुरों और शब्दों में बेहद आत्मीयता, प्यार, काव्यता और नाजुक नाजुक दिल को छू लेने का अंदाज।
कुछ मोती देखें, " दिल तो बच्चा है जी/थोड़ा कच्चा है जी," फिर आगे ,दिल सा कोई कमीना नहीं।
"छई छप छई,छपाक छई/
पानियों में छींटे उड़ाती हुई लड़की" या फिर चप्पा चप्पा चरखा चले,ससुराल गेंदा फूल और अभी अभी आया गीत , "हल्का हल्का फीवर है,साँस भी थोड़ी मद्धम है, मुझे प्यार हुआ है या ...होने वाला है।"
बेहद अच्छी,मधुर,मेलोडियस और सुकून देने वाली धुनें भी ऊपर खून खराबे,बेवफाई, जासूसी और अविश्वास पर फिल्में बनाने वाले विशाल भारद्वाज ने ही बनाई हैं।
दोहरा व्यक्तित्व या अपने को खोजने की बेचैनी?
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मनोविज्ञान यह कहता (और मानता भी ) है कि मनुष्य के अंदर एक,दो नहीं बल्कि कई कई परतें होती हैं। अच्छी भी,बुरी भी और ग्रे भी। सभी जानते हैं पर उन्हें एक्सप्लोर या कहें सकारात्मक,कला के माध्यम से बाहर कोई कोई ही ला पाता है। अधिकांश हिपोक्रेसी का शिकार होते हैं।
या फिर पूरी तरह नकारात्मक दिशा,अपराध,ड्रग्स, यौन हिंसा की तरफ मुड़ जाते हैं।
परन्तु फिल्मकार के रूप में कुछ ही ऐसा कर पाते हैं। लेकिन इस तरह का स्याह फिल्में और सफेद बेहतरीन संगीत इन दो विपरीत सीमाओं में आवा जाही विशाल भारद्वाज ही कर पाते हैं।
लेकिन इसका दूसरा पहलू भी यह। यह दोहरा व्यक्तित्व है क्या और क्यों?
यह हमारे अंदर की घुटन,बेबसी, आक्रोश की अभिव्यक्ति बन जाता है। फ्रायड, जुंग कई मनोवैज्ञानिक इड़ा, आदि के माध्यम से बता चुके हैं कि जब जिस तरह का माहौल और राह मिलती है उसी तरह का व्यवहार और प्रतिक्रिया हमारा मन और दिल करता है।भले ही हम दिल जो छोटा सा हिस्सा माने जिसमें कोई खास बात नजर नहीं आती सिवाय इसके कि यह आपके जीवित रहने का एकमात्र उपाय है। पर दिल अनुभव भी करता है और दिमाग को संकेत भी भेजता है,जो अक्सर दिमाग के फैसलों के विपरीत होते हैं।
पर अक्सर व्यक्ति दिल की नहीं दिमाग की सुनता है।मुझे लगता है विशाल दिल की सुनते हैं जो उन्हें नकारात्मक गलियों के बंद,अंधेरे कोनो में ही पता नहीं क्यों ले जाता है?
क्योंकि पिछले वर्षों में फिल्मों के शीर्षक भी कमीने से होते हुए कुत्ते, मर्डर्स,ओ रोमियो तक पहुंच गए हैं।
पर इस दिलचस्प व्यक्तित्व से उन लाखों लोगों का भला हो रहा जो क्राइम फिल्में अच्छे निर्देशन में देखना चाहते हैं। वहां भी विशाल का एक निर्देशकीय रूप सामने आता है।संवाद और पटकथा तो अपनी फिल्मों के अलावा बाहर की भी लिखते हैं राजी,नीरजा,सेम बहादुर के संवाद और पटकथा इन्हीं की थी।
ऊपर से गुलज़ार भी विशाल का साथ नब्बे के दशक से मिलने से अपने को खोजने लग पड़े। पहले वह लिखते थे, मोरा गोरा रंग लईले,श्याम रंग दईदे, या "तुम आ गए हो नूर आ गया है"
फिर वह छैया छैया पर आए । आगे विशाल भारद्वाज मिल गए तो फिर असर कहें या खुद को रि करने की कोशिश,चप्पा चप्पा चरखा से कल्लू मामा,गोली मार भेजे में, बीड़ी जलाई ले, पांव में जूता जैसे बेतुके,फूहड़ गाने पर उतर आए।
कुछ तो असर होना ही हुआ पर यहां पूरा बदल गया।
उधर इस बदलाव की वजह वह खुद भी "कमीने ", एजेंडा फिल्म हैदर ,सात खून माफ, जिसमें सात खून होते भी हैं, मकबूल,इश्किया,डेढ़ इश्किया फिर अभी पिछले वर्ष आई कुत्ते और दो जासूसी फिल्म तब्बू और यामिका गब्बी के साथ बनाई। कुछ चली कुछ नहीं चली। अभी एक सुपारी किलर उस्तरा पर ओ रोमियो बनाई जो ठीकठाक चल गई।
गुलजार ने इसमें अच्छा गीत दिया, हल्का हल्का फीवर है, शाम में मन नहीं लगता, मुझे इश्क हुआ है या होने वाला है।
कला का या मन की परतों का विस्तार?
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यह कला है कि आप संगीत अच्छा और दिल को छूने वाला बनाते हैं। पर फिर बाजार और फिल्म स्तर को देखते हुए आपको काफी सारे पैसे भी चाहिए तो आप आज के समय के गीत और बोल लेते हो। वैसे यह रणनीति सही है क्योंकि लोक,देशज शब्दों से जुड़े गुलजार के (निचले) स्तर के गीत और वैसा ही विशाल का संगीत यह अहसास करवाता है मानो एक रिक्शे वाला,गाड़ीवाला, देशज आदमी बढ़िया होटल में बैठा चाय पानी कर रहा है। यह भी कोई कम नहीं।
पर यह ऐसा ही है कि आप सारे सुरों को एक साथ लगाने की कोशिश कर रहे जो सफल नहीं होती। आप कभी कोई ऐसा सिनेमा नहीं बना सकते जो लोक और उच्च वर्ग को एक साथ पसंद आए।
विशाल भारद्वाज इसे कितना समझे या नहीं यह तो उनके गीतों और लगातार खून खराबा बढ़ाती फिल्मों,वेब सीरीज से जाहिर होता है। अच्छी बात (?) कहें तो यह कि वह टुकड़े टुकड़े गैंग का हिस्सा भी हैं और उससे अलग भी दिखाने की कोशिश भी करते हैं। फिल्मों और संगीत (जो अब समझ नहीं आता)से वह कहा जाए एकतरफा नैरेटिव ही दिखाते हैं। इबादतगाह,अपराधी ,हार्डकोर का,मानवीय पक्ष, कश्मीर के अलगाव वादियों के साथ खड़ा फिल्मकार उस दोराहे पर है जहां रास्ता कुछ आगे खत्म हो रहा। वापसी की राह भी जरूर इन्होंने सोची हुई होगी। कला सभी को ऊंचा उठाती है और यदि आप महत्वाकांक्षी हैं तो आपको धन,लोकप्रियता भी देती है भले ही आप उसे संभाल नहीं पाएं।
विशाल की ताकत उसका खास समूह है। इत्फाक से सभी छुपे एजेंडे वाले चौकन्ने ,डरे हुए,मौके का इंतजार करते लोग हैं। पर यदि हम राजनीतिक एजेंडा कला के माध्यम से चलाएंगे तो कला पक्ष निसंदेह उपेक्षित होगा ,आपकी फिल्में फ्लॉप होंगी। बहुत लोग निपट गए। आप देश के लोगों को जब तब कमतर,कोई समझ नहीं,कहीं भी हाँक दो, जैसा समझेंगे तब तक तो आपकी या ऐसे हिडन एजेंडा वाले लोगों की बात नहीं बनेंगी।
जनता,जेन जी सभी बहुत समझदार न सही पर अपने दिल और दिमाग की एक रखने वाली है।वह समझती है और बार बार भड़कावे में नहीं आती।
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(डॉ. संदीप अवस्थी ,फिल्म आलोचक और पटकथा लेखक
7737407061)