घड़ी की सुइयां रात के ठीक बारह बजा रही थीं। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी, और हवा की सनसनाहट ऐसी थी मानो कोई अदृश्य रूह खिड़कियों को झकझोर रही हो। शहर की चकाचौंंध और शोरगुल से कोसों दूर, अरावली की पहाड़ियों की तलहटी में एक वीरान हवेली खड़ी थी—'खंडहर महल'।
इस हवेली के बारे में गांव वाले कहते थे कि यहाँ सूरज ढलने के बाद इंसानों का नहीं, बल्कि उन आत्माओं का राज चलता है जो कभी अधूरी इच्छाओं के साथ इस दुनिया से रुखसत हुई थीं।
और आज, इसी हवेली के अंदर, अपने खोए हुए इतिहास को तलाशने आया था अमित—एक ऐसा लेखक जो भूतों और रहस्यों पर किताबें लिखता था, लेकिन खुद अंधविश्वासों को एक सिरे से खारिज करता था। वह अपनी इस धारणा को गलत साबित करने या सही साबित करने की जिद लिए इस खौफनाक सफर पर निकला था।
अमित ने अपनी पुरानी टॉर्च जलाई और भारी लकड़ी के मुख्य दरवाजे को धक्का दिया। दरवाजे ने एक चीखती हुई आवाज के साथ रास्ता दिया, जो सन्नाटे को चीरती हुई अंदर तक गूंज गई। अंदर कदम रखते ही एक अजीब सी घुटन और सदियों पुरानी धूल की महक ने उसका स्वागत किया।
हवेली के अंदर का हाल बाहर से भी बदतर था। दीवारों से पपड़ी बनकर चूना झड़ रहा था, और जगह-जगह मकड़ी के जाले ऐसे फैले थे मानो किसी ने जानबूझकर पूरे घर को रेशमी धागों से बांध दिया हो।
मुख्य हॉल: फर्श पर संगमरमर के टुकड़े बिखरे थे। बीचों-बीच एक विशाल सीढ़ी थी जो ऊपर अंधेरे की तरफ जाती थी।
वातावरण: हवा में ठंडक इतनी थी कि सांस लेते ही मुंह से भाप निकलने लगी थी, जबकि बाहर उमस भरा मौसम था।
अमित ने अपने बैग से कैमरा और एक डिजिटल वॉयस रिकॉर्डर निकाला। उसने रिकॉर्डर ऑन किया और अपनी भारी आवाज में बोला, "यह 18 अक्टूबर की रात है। समय ठीक बारह बजकर पंद्रह मिनट हुआ है। मैं अमित, खंडहर हवेली के मुख्य हॉल में खड़ा हूं। यहाँ सब कुछ शांत है... सिवाय मेरी अपनी सांसों और बाहर बरसती बारिश के।"
अमित ने जैसे ही यह वाक्य पूरा किया, ऊपर की मंजिल से कुछ गिरने की भारी आवाज आई—धड़ाम!
अनसुनी आवाजें और परछाइयां
अमित का दिल एक पल के लिए थम गया। उसने टॉर्च की रोशनी ऊपर की उस सीढ़ी पर डाली जो अंधेरे में गायब हो रही थी।
"कौन है?" अमित ने कड़कती आवाज में पूछा, हालांकि उसकी अपनी आवाज में एक हल्की सी कंपकंपी थी।
कोई जवाब नहीं आया। केवल हवा का एक ठंडा झोंका उसके बालों को छूते हुए गुजर गया। अमित ने हिम्मत जुटाई और एक-एक कदम सीढ़ी की तरफ बढ़ाने लगा। जैसे ही उसने पहला कदम रखा, लकड़ी की सीढ़ी ऐसे चहीं जैसे वह किसी की चेतावनी हो—आगे मत बढ़ो।
सीढ़ियां चढ़कर वह एक लंबी, संकीर्ण गैलरी में पहुंचा। गैलरी के दोनों तरफ पुरानी और धूल से भरी तस्वीरें टंगी थीं। उन तस्वीरों के चेहरे समय के साथ धुंधले हो चुके थे, लेकिन उनकी आँखें ऐसी थीं जो अमित के जिधर जाने पर भी उसी का पीछा कर रही थीं। यह किसी ऑप्टिकल भ्रम जैसा लग रहा था, लेकिन अमित की रीढ़ में एक सिहरन दौड़ गई।
अचानक, गैल के अंत में बने एक कमरे से हल्की सी रोशनी बाहर आती हुई दिखाई दी।
“लालटेन की पीली रोशनी... इस वीरान हवेली में जहाँ बरसों से बिजली नहीं है और कोई इंसान नहीं रहता, वहाँ रोशनी कहाँ से आ सकती है?”
अमित के पैर वहीं जम गए। उसने अपनी टॉर्च बंद कर दी ताकि वह चुपचाप आगे बढ़ सके। वह दबे पांव उस कमरे के दरवाजे तक पहुँचा। दरवाजा आधा खुला हुआ था।