हवेली के उस सन्नाटे में लालटेन की हल्की रोशनी और काँपते हुए हाथों में पकड़ी हुई ढिबरी ही एकमात्र सहारा थी। बाहर मूसलाधार बारिश की आवाज़ थी, लेकिन अंदर का सन्नाटा उससे कहीं ज़्यादा डरावना था।
रागिनी ने कमज़ोर कदमों से आगे बढ़ते हुए धूल और मकड़ी के जालों से घिरे उस विशाल प्राचीन आईने पर नजर डाली। यह वही आईना था जिसके बारे में उसके दादाजी अक्सर चेतावनी दिया करते थे—“यह दर्पण सिर्फ सूरत नहीं, अतीत की उन परछाइयों को दिखाता है जिन्हें दफ़्न हो जाना चाहिए।”
रागिनी का दिल जोरों से धड़क रहा था। उसने एक बार अपनी काँपती हुई परछाई को आईने में देखा, और तभी उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। आईने के भीतर जो अक्स उभर रहा था, वह उसका अपना नहीं था!
आईने के उस पार एक भयानक, बिखरे बालों और खूनी आँखों वाली साया-रुह खड़ी थी, जिसका चेहरा गुस्से से विकृत था। वह धीरे-धीरे आईने के शीशे पर अपने नुकीले नाखून रगड़ने लगी, जैसे वह इस कांच की दीवार को तोड़कर बाहर आना चाहती हो।
“क्या दर्पण कभी झूठ बोलते हैं?” रागिनी के मन में गूँजा वह पुराना सवाल अब हकीकत बन चुका था।
इससे पहले कि वह पीछे हटती, आईने के भीतर से एक ठंडी और डरावनी आवाज़ गूँजी—“तूने हमें फिर से जगा दिया है, रागिनी... अब तू यहाँ से कभी वापस नहीं जा पाएगी!”
आईने का कांच चटकने लगा था, और उस साए के हाथ धीरे-धीरे बाहर आने लगे थे...
शीशा चटकने की आवाज़ के साथ ही कमरे की हवा अचानक से इतनी ठंडी हो गई कि रागिनी की साँसें जमने लगीं। उसने घबराकर पीछे हटना चाहा, लेकिन उसके पैर जैसे ज़मीन से चिपक गए थे।
आईने के उस पार से निकला वह भयानक साया अब कांच की सीमा पार कर चुका था। उसके शरीर से सड़ी हुई मिट्टी और पुरानी बंद हवेली की सीलन जैसी बू आ रही थी। रागिनी ने डर के मारे अपनी आँखें बंद कर लीं और लालटेन उसके हाथ से छूटकर नीचे गिरते-गिरते बची।
तभी हवेली के पुराने घड़ी-घर में रात के ठीक 12:00 बजे का भयानक सन्नाटा चीरता हुआ भारी गूँज उठा।
उस साये ने अपने ठंडे और नुकीले हाथ रागिनी के गले की तरफ बढ़ाए और फुसफुसाते हुए बोली—“बरसों पहले जिस रात तूने इस आईने को पोंछा था, तभी हमने तुझे अपना बना लिया था... अब तेरा शरीर हमारा नया घर बनेगा।”
रागिनी को एहसास हुआ कि वह परछाई कोई और नहीं, बल्कि उसी हवेली की मालकिन थी जिसे पचास साल पहले इसी कमरे में रहस्यमय हालात में दफनाया गया था और उस राज को छुपाने के लिए इस आईने को उस पर टंगवाया गया था।
अपनी आखिरी ताकत जुटाकर, रागिनी ने ज़मीन पर पड़ी अपनी लालटेन को उठाया और पूरी ताकत से उस भयानक साये पर फेंक दिया। लालटेन के फूटते ही तेज़ आग की लपटें फैलीं और एक चीख के साथ वह साया हवा में विलीन हो गया।
पूरी हवेली एक झटके में शांत हो गई। रागिनी ने हाँफते हुए सामने टूटे हुए आईने में देखा—वहाँ सिर्फ उसका अपना काँपता हुआ अक्स था। लेकिन जाते-जाते आईने के टूटे टुकड़ों पर खून से एक आखिरी संदेश लिखा गया था—"मैं लौटकर आऊँगी... अगली पूर्णिमा की रात।