सुप्रिद्ध पंडवानी गायिका, छत्तीसगढ़ की लोककला को विश्वपटल पर गौरवपूर्ण स्थान दिलानेवाली नायिका, पद्मविभूषण डॉ. तीजनबाई का पार्थिव शरीर रविवार दिनांक 5 जुलाई 2026 को पंचतत्व में विलीन हो गया। उनके गृहग्राम गनियारी के मुक्तिधाम में उनके पुत्र दिलहरण पारधी ने उन्हें मुखाग्नि दी। ग्राम गनियारी दुर्ग जिला और छत्तीसगढ़ राज्य में स्थित है।
उन्हें राजकीय सम्मान के साथ गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया। उनका निधन 5 जुलाई को तड़के 3.15 बजे हुआ। वे लंबे समय से अस्वस्थ थीं। राजधानी रायपुर के एम्स में उनका इलाज चल रहा था।
डॉ. तीजनबाई का जन्म वर्ष 1956 में 8 अगस्त को दुर्ग जिले के गनियारी गांव में पारधी समुदाय के एक साधारण परिवार में तीज के दिन हुआ था। इसीलिए, उसका नाम तीजन रखा गया। उनके पिता का नाम हुनुक लाल पारधी और माता का नाम सुखवंती देवी था।
बचपन में उन्होंने नाना बृजमोहन से महाभारत की कथाएं सुनी थी। वहीं से पंडवानी के प्रति उनका लगाव शुरू हुआ। हालांकि उस दौर में महिलाओं के लिए पंडवानी की कापालिकशैली में प्रस्तुति देना सामाजिक रूप से अस्वीकार्य था, लेकिन तीजन रिवाजों को तोड़ते हुए मंच पर खड़े होकर अभिनय के साथ पंडवानी आरंभ करी।
इससे समाज ने उन्हें तिरस्कृत करते हुए बहिष्कृत कर दिया। परंतु, वे हार मानने के लिए बनी नहीं थीं। समाज के ऐसे पुरातनपंथी कृत्यों से उनका मनोबल दृढ़ हुआ और वह कला को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना डाली।
अनेक सम्मानों से नवाजी गई तीजन ने अपनी कला का प्रदर्शन भारत के विभिन्न राज्यों में ही नहीं, बल्कि ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, स्विटजरलैंड, तुर्की समेत दर्जनों देशों में किया था।
उन्हें 1988 में पद्मश्री, 1995 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2003 में पद्मभूषण और 2019 में पद्मविभूषण सम्मानों से नवाजा गया। इनके अलावा देश-विदेश की अनेक संस्थाओं ने उन्हें सम्मानित किया और कई विश्वविद्यालयों ने उन्हें मानद उपाधियों से अलंकृत किया। जापान सरकार ने उन्हें 2018 में फुकुओका पुरस्कार से नवाजा।
क्या है पंडवानी? छत्तीसगढ़ राज्य की छत्तीसगढ़ी भाषा में प्रस्तुत पारंपरिक लोकगायन शैली है पडवानी। इसमें महाभारत की कथाओं का गायन, वादन और अभिनय किया जाता है।
इसकी दो शैलियां हैं-एक वेदमती, दूसरा कापालिक। वेदमती शैली महिलाओं के लिए है, जिसमें वे मंच पर बैठकर महाभारत की प्रस्तुतियां देती हैं। जबकि कापालिक शैली पुरुषों के लिए है, जिसमें वे मंच पर खड़े होकर अभिनय के साथ महाभारत की कथाओं को रोचकशैली में प्रस्तुत करते हैं।
तीजन बाई सदियों पुरानी इसी परंपरा को तोड़नेवाली पहली साहसिक महिला बनी, जो पुरुषों की कापालिक शैली को अपनाकर दर्शकों का अपार स्नेह बटोरी। जब वह कापालिक शैली में मंच पर गायन, वादन, अभिनय, संवाद, भाव-भंगिमा और स्वर का संयोजन करती थी, तब दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते थे और महाभारत के दृश्यों में खो जाते थे।
इस कला में उनका तानपुरा कभी भीम की गदा, कभी अर्जुन का धनुष, कभी दुर्योधन की तलवार, कभी दुःशासन के द्वारा चीरहरण का दुस्साहस, कभी श्रीकृष्ण का सुदर्शनचक्र, तो कभी द्रोपदी की लज्जा बन जाया करता था। अर्थात पूरी महाभारत की अकेली अदाकारा बन जाती थी तीजन।
इससे महाभारत जीवंत हो उठता था। ऊपर से हर्ष, क्रोध, पराक्रम, साहस आदि की भाव-भंगिमाएं सोने पे सुहागा उड़ेल देती थीं।
सच्चाई यही कि तीजन पंडवानी की प्राण थी। उसके रग-रग में पंडवानी बसता था। तीजन की पहचान पंडवानी से थी और पंडवानी की पहचान तीजन से।
असल में, तीजन का समूचा जीवन संघर्ष की वो महागाथा है, जो अप्रतिम और अनमोल है। गरीबी व सामाजिक तिरस्कार से निकलकर विश्वपटल पर अपनी छाप छोड़ना कोई असाधारण प्रतिभा की स्वामिनी ही कर सकती है।
कहा जाता है कि नवजात तीजन को कुत्ते के मुंह से छुड़ाया गया था। उसके जन्म के छह दिन बाद उसको एक आवारा कुत्ता अपने मुंह में दबाकर भाग रहा था कि बमुश्किल उसकी मां व नानी ने कुत्ते के मुंह से उसको छुड़ाया और गांव के वैध से उसका इलाज करवाया।
इस संबंध में तीजन बाई कहा करती थी,‘‘मुझे बचपन में कई बार मौत ने छुआ है, पर हर बार जिंदगी जीत गई। शायद इसीलिए भगवान् ने मुझे पंडवानी के लिए चुना।’’
यह भी कहा जाता है कि जब वह सात वर्ष की बालिका थी, तब उनका परिवार छिंद का सामान बेचने के लिए शहर गया हुआ था और शहर के आउटर में तंबू तानकर रह रहा था। एक दिन अचानक उसकी तबीयत बिगड़ गई। उसकी हालत इतनी खराब हो गई कि परिवारवालों ने उसको मृत समझकर डेरे के निकट ही छोड़कर वापस घर चले गए।
जब धूप निकला, तब उसके शरीर में हलचल हुई, तो राहगीरों ने इसकी सूचना उसके घर पर दी। वे भागे-भागे वहां पहुचे और जमीन पर अपनी लाडली बिटिया को भला-चंगा देखकर घर ले आए। इस तरह डेरा फिर से बच्ची की हंसी-ठिठोली से गुलजार हो गया।
एक दिन की घटना भी अहम है। पहली बार आठ वर्षीया तीजन अपनी नानी की ऊंगली पकड़कर ट्रेन में बैठने के लिए निकली थी कि उसका मन विशालकाय रेलगाड़ी को देखकर उसमें बैठने का नहीं हुआ, तो वह अपनी नानी से जिद्द करी कि वह ट्रेन में नहीं बस में छिंद झाड़ू बेचने रायपुर जाएगी।
बाद में पता चला कि वह ट्रेन आंधी-तूफान के चलते चरोदा के पास दुघर्टनाग्रस्त हो गया, जिसमें कई लोगों की जाने चली गईं।
इससे उसकी नानी ने उसे गोद में उठाकर छत्तीसगढ़ी भाषा में सगर्व कहा,‘‘बेटी, तैं बहुत किस्मतवाली हस। तोर बात नई मानतेन त आज दूनों झन नई बाचतेन।’’
उनका परिवार छिंद से बने झाड़ू, सरकी और रस्सी आदि बेचा करता था। इसके अतिरिक्त उसके परिजन तीतर, बटेर, पंडकी, घाघर जैसे पक्षी भी पकड़ा करते थे और उसे रायपुर या दुर्ग शहर में बेच आते थे। इसी से तीजन को इन पक्षियों से बेहद लगाव हो गया था।
आज तीजन नहीं है, लेकिन उसकी साहसिकता व संघर्ष की गाथा छग के लोगों की जुबानों में है, जिसकी वजह से वह मर कर भी अमर हो गई है।
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