जैसे-जैसे दिन बीत रहे थे, देवपुर राजमहल में काल का सन्नाटा और गहराता जा रहा था।
एक-एक दिन भारी पत्थरों की तरह कट रहा था। हवा में सीलन, कपूर और चंदन का मिला-जुला अजीब सा वातावरण बना हुआ था।
उधर नासिक के ज्योतिर्मठ के मठाधीश पंडित विश्वनाथ दीनानाथ त्रिवेदी अपनी संपूर्ण तंत्र साधना और योगबल के साथ उस अंतिम महायज्ञ की तैयारी में लीन थे।
वे जानते थे कि प्रेतात्मा कोई साधारण भटकती हुई रूह नहीं है, बल्कि वह एक सती की अतृप्त और प्रचंड क्रोध से भरी आत्मा है।
इसलिए वे दिव्य मंत्रों का एक ऐसा अक्षय कवच तैयार कर रहे थे, जिसे भेद पाना किसी भी नकारात्मक शक्ति के वश में न हो।
दूसरी ओर, उस सीलन भरे काले तहखाने के भीतर जकड़ी हुई रूपमती की अतृप्त रूह भी शांत नहीं बैठी थी।
वह भी अपनी आघात-शक्तियों और आसुरी ऊर्जा को भीतर ही भीतर सहेज रही थी। वह एक अलग ही नकारात्मक सिद्धि प्राप्त करती जा रही थी,
खुद को पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली बना रही थी। उसकी सफेद, खौफनाक आँखें अंधकार में किसी अंगारे की भांति चमकती थीं।
उसे इस बात का पूर्ण विश्वास था कि आज नहीं तो कल, वर्षों या सदियों बाद, यह अज्ञानी संसार अपने इतिहास के काले पन्नों को भूल जाएगा।
कोई न कोई मूर्ख या अधर्मी शासक फिर इस देवपुर की धरती पर कदम रखेगा। कोई न कोई फिर से किसी असहाय नारी के चरित्र और मर्यादा पर हाथ डालने का दुस्साहस करेगा।
और जैसे ही इस राजमहल की चारदीवारी में वह घिनौना पाप दोहराया जाएगा, उसका यह मंत्र-बंधन स्वतः ही छिन्न-भिन्न हो जाएगा! वह मन ही मन हुंकार भर रही थी—
'उस दिन जब मैं आज़ाद होऊँगी, तब ना कोई पंडित विश्वनाथ होगा, ना ही कोई वेद-मंत्र! उस दिन मेरा ऐसा महातांडव होगा कि यह संपूर्ण देवपुर रियासत सदा-सदा के लिए जलकर राख का खंडहर बन जाएगी!'
इसी भांति 13 दिन का कठिन और भयभीत कर देने वाला समय समाप्त हुआ। आज महाराज देववर्धन, मंत्री बुक्का सोलंकी और मृत सैनिकों की तेरहवीं का विधान था।
पूरे देवपुर नगर और राजमहल के प्रांगण में अभूतपूर्व हलचल मची हुई थी। आर्यावर्त और संपूर्ण भारतवर्ष से हज़ारों जाने-माने ऋषि-मुनि, वेदाचार्य और तांत्रिक विद्वान पधारे हुए थे।
विशाल वेदियों से महाआहुतियों का धुआं उठ रहा था, वेद-मंत्रों की गंभीर ध्वनियों से पूरा आकाश गूंज रहा था। अंग्रेजों के बड़े-बड़े गवर्नर और भारत की अन्य रियासतों के राजा-महाराजा इस ऐतिहासिक तेरहवीं का हिस्सा बनने आए थे।
सब अपने-अपने कार्यों में व्यस्त थे, परंतु महारानी रुक्मिणी के हृदय में एक अजीब सी कसमसाहट, खालीपन और गहरी वेदना चल रही थी।
उन्हें भली-भांति ज्ञात था कि जैसे ही यह हवन कुंड शांत होगा, उन्हें अपने ३ महीने के अबोध राजकुमार, अपनी वफादार दासी और बची हुई विधवा रानियों के साथ इस मातृभूमि, इस अपने प्रिय महल को त्यागकर हमेशा-हमेशा के लिए सात समंदर पार जाना होगा।
वे अश्रुपूरित नेत्रों से, अपने नवजात बालक को सीने से चिपकाए हुए, ऋषिवर पंडित विश्वनाथ के समीप पहुँचीं।
ठीक उसी समय, पंडित जी ने तेरहवीं का मुख्य हवन संपन्न किया था और अपने सबसे योग्य शिष्य को उस गुप्त तहखाने के लोहे के भारी द्वार पर एक अभिमंत्रित 'महामुद्रा ताला' (मंत्र-कीलित ताला) लगाने का आदेश दिया था।
वह कोई साधारण ताला नहीं था—उस पर ऐसी दिव्य शक्तियों का लेप और महामंत्र अंकित थे, जिन्हें ना तो कोई भौतिक शक्ति तोड़ सकती थी और ना ही कोई आसुरी प्रेतात्मा लांघ सकती थी।
ताला लगने की भारी आवाज़ 'खटाक...' करके पूरे प्रांगण में गूंज उठी, मानो इतिहास पर एक भारी ताला जड़ दिया गया हो।
महारानी रुक्मिणी ने कांपते हाथों से ऋषिवर के चरणों में प्रणाम किया। पंडित जी ने अपनी आँखें खोलीं, उनके चेहरे पर असीम शांति और अध्यात्म का तेज था।
महारानी ने रुंधे गले से कहा, "ऋषिवर! आज मेरे संसार का अंत हो गया है।
जिस महल को मैंने अपने हाथों से सींचा, जिसे अपना घर माना, आज वही महल मेरे लिए श्मशान बन चुका है। तेरहवीं के ये सारे धार्मिक विधान पूर्ण हो चुके हैं।
अब आप ही मेरा मार्ग प्रशस्त कीजिए... आप ही बताइए कि इस अनाथ बालक को लेकर मैं किस दिशा में जाऊं?
मेरा कौन सा ठिकाना होगा जहाँ मेरे इस बच्चे पर उस पापी अतीत की छाया न पड़े?"
नासिक के ज्योतिर्मठ के मठाधीश पंडित विश्वनाथ दीनानाथ त्रिवेदी ने अपने दाहिने हाथ से महारानी और उस अबोध बालक को अभय आशीर्वाद दिया। वे अत्यंत सौम्य और वात्सल्य भरे स्वर में बोले:
"महारानी! तुम तनिक भी चिंता मत करो। ईश्वर ने तुम्हें धैर्य और यह तेजस्वी राजकुमार रूपी अमूल्य रत्न दिया है। जो घटित हुआ, वह नियति का चक्र था।
जो रानियाँ और कुल के लोग शेष बचे हैं, उन सभी को अपने साथ संभालो।
याद करो महारानी, तुम्हारे पति महाराज देववर्धन ने वर्षों पूर्व बड़े प्रेम से इंग्लैंड (लंदन) की पावन धरती पर एक भव्य और सुरक्षित प्रासाद (महल) बनवाया था।
आज के बाद तुम और तुम्हारा यह संपूर्ण राजपरिवार उसी निवास स्थान पर रहोगे। वहीं तुम्हारे इस बालक का पालन-पोषण होगा।"
महारानी रुक्मिणी की आँखों से आंसुओं की धार बह निकली। उन्होंने उदास होकर कहा,
"ऋषिवर! इंग्लैंड? वह तो पराई धरती है, सात समंदर पार! अपनी इस पावन मातृभूमि, देवपुर की मिट्टी को छोड़कर मैं परदेस में कैसे जियूंगी?
क्या मेरा यह बेटा कभी अपनी इस जन्मभूमि को देख नहीं पाएगा? क्या हम कभी वापस इस महल में लौटकर नहीं आ सकते?"
पंडित विश्वनाथ जी का चेहरा अचानक अत्यंत गंभीर और कठोर हो गया। उनकी आँखों में एक अलौकिक कड़क आ गई। वे महारानी के नेत्रों में देखते हुए बोले:
"सावधान महारानी! अपनी भावनाओं के आवेग में आकर धर्म और नीति की मर्यादा मत भूलो।
यह देवपुर राजमहल अब कोई साधारण निवास स्थान नहीं रहा। यह एक शापित भूमि बन चुकी है, जहाँ एक सती की अतृप्त रूह का पहरा है।
यदि तुम या तुम्हारा यह बालक यहाँ रहोगे, तो उस आत्मा का क्रोध तुम्हें कभी चैन से जीने नहीं देगा।"
पंडित जी ने अपनी उंगली उठाते हुए अत्यंत कड़े शब्दों में अंतिम आदेश दिया:
"मेरी यह बात अपने हृदय के पटल पर पत्थर की लकीर मानकर अंकित कर लो महारानी...
आने वाले कम से कम 100 वर्षों तक, तुम्हारे राजवंश का कोई भी वंशज या वारिस इस देवपुर की मातृभूमि पर अपना पहला कदम भी नहीं रखेगा!
जब तक समय का एक पूरा महाचक्र (एक शताब्दी) समाप्त नहीं हो जाता, तब तक तुम्हारा कुल इस शापित राजमहल से सैकड़ों मील दूर ही रहेगा।
यदि 100 वर्षों से पूर्व तुम्हारे कुल का कोई भी प्राणी इस चौखट को लांघने का दुस्साहस करेगा, तो वह स्वयं अपने विनाश को निमंत्रण देगा!"
महारानी रुक्मिणी ने ऋषिवर की इस कठोर चेतावनी के आगे अपना शीश झुका लिया।
वे समझ गईं कि इस आदेश में ही उनके पुत्र और कुल की रक्षा छिपी हुई है। उन्होंने कांपते स्वर में कहा,
"मैं वचन देती हूँ ऋषिवर! जब तक इस सूर्य और चंद्रमा का चक्र रहेगा, मेरे कुल का कोई भी प्राणी 100 वर्षों से पहले इस धरती पर कदम नहीं रखेगा।"
तेरहवीं का संपूर्ण धार्मिक कार्यक्रम धीरे-धीरे समाप्त हुआ।
हज़ारों साधु-संतों, वेदाचार्यों, अंग्रेज अफसरों और संपूर्ण देवपुर की प्रजा को अंतिम बार विशाल महाभोज कराया गया।
नागरिकों की आँखें अपनी महारानी और उस नन्हे राजकुमार को अंतिम बार देखकर नम थीं।
वे जानते थे कि आज के बाद उनका राजपरिवार उनसे हमेशा के लिए दूर जा रहा है।
संध्या ढलते-ढलते सभी साधु-संत और अतिथि अपने-अपने आश्रमों व राज्यों की ओर लौटने लगे।
पंडित विश्वनाथ दीनानाथ त्रिवेदी ने भी महारानी के मस्तक पर अपना अंतिम आशीर्वाद हस्त रखा, अपने शिष्यों को संभाला और वापस अपने नासिक स्थित ज्योतिर्मठ की ओर प्रस्थान कर गए।
अगले दिन की पहली सुनहरी किरण फूटते ही, महारानी रुक्मिणी ने अपनी समस्त अमूल्य धन-संपदा, राजशाही खज़ाने और अपने आभूषणों को रथों पर सुरक्षित लाद दिया।
महारानी ने अपने एक अति-विश्वस्त अंग्रेज मित्र और शाही रक्षकों के कड़े पहरे के बीच उस अबोध राजकुमार को सीने से कसकर लिपटाया।
उन्होंने राजमहल की मुख्य चौखट पर खड़े होकर अंतिम बार देवपुर की मिट्टी को स्पर्श किया।
अपने माथे से लगाया और अश्रुपूरित नेत्रों से उस विशाल महल को देखा, जो अब एक वीरान खंडहर जैसा प्रतीत हो रहा था।
महारानी ने भारी मन से अपने कदम आगे बढ़ाए और हमेशा-हमेशा के लिए लंदन (इंग्लैंड) के लिए महाप्रस्थान कर दिया।
राजमहल के विशाल लोहे के किवाड़ एक भयानक गूंज के साथ बंद कर दिए गए। चारों तरफ सन्नाटा छा गया।
पीछे छूट गया—वह भव्य, आलीशान और स्वर्णिम देवपुर का राजमहल...
जो अब पूरी तरह निर्जन, सुनसान और उस काले गुप्त तहखाने के भीतर अभिमंत्रित ताले में बंद रूपमती की अतृप्त रूह के भयानक साए में सिमट चुका था।
एक ऐसा सन्नाटा जो आने वाले 100 वर्षों तक उस महल की दीवारों में गूंजने वाला था।