लच्छू की रूह के आजाद होते ही पूरी हवेली में एक ऐसा भयंकर तूफान उठा जैसे धरती फट जाने वाली हो। बंजारन की चीख ने हवाओं की रफ्तार को हजारों किलोमीटर की स्पीड दे दी थी।
पूरी हवेली ताश के पत्तों की तरह हिल रही थी, पत्थर गिर रहे थे, लेकिन हनुमान जी के सिद्ध सिंदूर और पुजारी जी के सुरक्षा चक्र के कारण जहां सभी दोस्त खड़े थे, वहां हवा का एक झोंका भी उन्हें छू नहीं पा रहा था।
तभी तहखाने के उस डरावने अंधेरे के बीच वही सुंदर लड़की—लाल जोड़े में सजी वह मायावी दुल्हन—अचानक प्रकट हो गई।
उसकी आंखों में एक अजीब सा सम्मोहन था। उसने बड़े प्यार से हाथ फैलाए और अपनी मधुर आवाज में जादू सा घोल दिया।
उसने कृष्ण की ओर हाथ बढ़ाते हुए कहा, "आओ मेरे राजा... देखो मैं तुम्हारा ही इंतजार कर रही थी। आज हमारी शादी है।
फिर वह रश्मि (जिसे वह रोशनी कह रही थी) की तरफ मुड़ी, "रोशनी मेरी सखी, तुम मेरे पास आओ।
और सृष्टि, तुम कितनी प्यारी दोस्त हो, हम तो पहले भी मिल चुके हैं न? आओ ना, मुझे अच्छे से सजाओ, मुझे अपने पति लच्छू से फिर से मिलना है।"
उसकी बातों में ऐसी कशिश थी कि कृष्ण, रश्मि और सृष्टि के कदम लड़खड़ाने लगे। उनकी आंखों में धुंध छा गई और वे सम्मोहित होकर उस 'खूबसूरत चुड़ैल' की ओर खिंचे चले जाने लगे।
मानव का दिव्य प्रहार और सत्य का दर्शन
मानव यह सब देख रहा था। उसे समझ आ गया कि यह बंजारन अब अपनी अंतिम और सबसे खतरनाक चाल चल रही है।
उसने तुरंत अपनी कमर में बंधी पोटली से अभिमंत्रित भस्म (राख) निकाली। वह भस्म उसके पिता ने विशेष रूप से ऐसे 'छलावे' को तोड़ने के लिए दी थी।
मानव ने पूरी शक्ति से चिल्लाकर कहा, "सब रुक जाओ! यह मौत का जाल है!"
जैसे ही उसने वह दिव्य भस्म हवा में उछाली और मंत्र पढ़कर अपने दोस्तों पर डाली, एक बिजली सी कड़की।
भस्म के स्पर्श होते ही कृष्ण, रश्मि और बाकी सभी दोस्तों के आँखों के सामने से पर्दा हट गया। वे जोर से झटके के साथ होश में आए और पीछे हट गए।
भयानक रूप का प्रकटीकरण:
जैसे ही वह भस्म उस सुंदर लड़की पर पड़ी, उसकी खूबसूरती धुएँ की तरह उड़ गई। उसकी जगह एक भयानक और खौफनाक रूप सामने खड़ा था।
उसके बाल सफेद और जमीन तक लटके हुए थे, चेहरा झुर्रियों से भरा और डरावना था, और आंखों से प्रतिशोध की आग निकल रही थी।
उसने दहाड़ते हुए कहा, "तुमने मेरे लच्छू को मुझसे दूर कर दिया! अब मैं तुम में से किसी को भी यहाँ से जिंदा नहीं जाने दूँगी!"
तहखाने की दीवारें थर्रा रही थीं। वह भयानक रूप धारण कर चुकी बंजारन पार्वती जैसे ही कृष्ण और रश्मि की ओर झपटी, अचानक एक जोरदार कड़ाका हुआ।
जमीन से एक धुंधलका सा उभरा और उन सबके सामने एक बेहद ऊंचा, लंबा और हट्टा-कट्टा व्यक्ति प्रकट हुआ।
उसकी कद-काठी किसी भीमकाय योद्धा जैसी थी, लेकिन उसकी आंखों में नफरत, क्रोध और लालच की वही पुरानी आग धधक रही थी।
वह और कोई नहीं, रश्मि के पूर्वज जागीरदार रतन सिंह की रूह थी। सौ साल की कैद ने उसे और भी हिंसक बना दिया था।
जागीरदार की रूह और बंजारन पार्वती अब आमने-सामने थे। जागीरदार ने गरजकर कहा, "सौ साल से तूने मुझे इस नर्क में तड़पाया है, आज मैं तेरा वजूद मिटा दूँगा!"
शक्तियों का महासंग्राम
दोनों रूहें अपनी पूरी ताकत के साथ एक-दूसरे पर टूट पड़ीं। तहखाने का दृश्य किसी प्रलय से कम नहीं था।
बंजारन की शक्ति: पार्वती ने अपने बालों को हवा में लहराया, जो नागिनों की तरह जागीरदार को जकड़ने लगे। उसके हाथों से काली ऊर्जा के गोले निकल रहे थे।
जागीरदार का प्रहार: रतन सिंह अपनी रूहानी ताकत से दीवारों के पत्थर उखाड़-उखाड़कर बंजारन पर फेंक रहा था। उसकी आँखों से निकलने वाला लाल प्रकाश तहखाने के अंधेरे को चीर रहा था।
हवा की गति इतनी तेज थी कि कृष्ण और उसके दोस्तों को अपनी जगह बनाए रखना मुश्किल हो रहा था। मानव ने चिल्लाकर कहा, "सब लोग घेरा मत तोड़ना! यह पाप और प्रतिशोध की अपनी लड़ाई है, हमें इसी बीच अपना काम पूरा करना होगा!"
अंतिम हार और अंत
लड़ाई भयानक मोड़ पर पहुँच गई थी। रतन सिंह ने पूरी कोशिश की कि वह बंजारन को खत्म कर दे, लेकिन पार्वती की नफरत सौ साल की तपस्या और दर्द से बनी थी।
अचानक, पार्वती ने एक भयानक चीख मारी और अपनी जादुई शक्तियों से जागीरदार के सीने को चीर दिया।
रतन सिंह की रूह दर्द से कराह उठी। उसने हार मान ली। बंजारन ने उसे हवा में उठाकर जमीन पर दे मारा और देखते ही देखते जागीरदार की रूह धुएँ में तब्दील होकर बिखरने लगी। रतन सिंह की रूह का अंत हो चुका था।
अगला खौफनाक मोड़: रश्मि का साहस
जागीरदार को मारने के बाद बंजारन अब और भी ज्यादा ताकतवर और पागल हो चुकी थी। वह घूमकर रश्मि की तरफ मुड़ी और खिलखिलाकर हँसी, "अब तेरा खानदान खत्म हुआ! अब तेरी बारी है!"
तभी रश्मि ने देखा कि जहाँ जागीरदार गिरा था, वहीं मिट्टी के नीचे से तीन पुरानी अस्थियाँ चमक रही थीं। रश्मि ने अपनी जान की परवाह किए बिना उनकी ओर दौड़ लगाई।
तहखाने की दीवारें अब गिरने ही वाली थीं। रश्मि ने जैसे ही उन तीन चमकती अस्थियों की ओर छलांग लगाई,
बंजारन पार्वती की आँखों में साक्षात् काल उतर आया। वह समझ गई थी कि यदि ये अस्थियाँ रश्मि के हाथ लग गईं, तो सौ साल का उसका प्रतिशोध राख में मिल जाएगा।
"नहीं! मैं तुम्हें इन्हें छूने नहीं दूँगी!" बंजारन एक काली आंधी बनकर रश्मि की ओर झपटी।
लेकिन रश्मि तक पहुँचने से पहले ही, मानव एक अभेद्य दीवार बनकर उसके सामने खड़ा हो गया। मानव ने अपनी आँखों में अंगारे भरकर चीखकर हनुमान चालीसा का वह पाठ शुरू किया जो उस बंजारन के लिए जलते हुए लोहे के समान था:
"भूत पिसाच निकट नहिं आवै, महाबीर जब नाम सुनावै! नासै रोग हरै सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा!"
बंजारन उस मंत्र की शक्ति से हवा में ही रुक गई, उसका शरीर जलने लगा था, पर वह फिर भी आगे बढ़ने की कोशिश कर रही थी।
मानव ने चिल्लाकर कहा, "कृष्ण! अब देर मत कर! रश्मि को रास्ता दे और इस बंजारन के अहंकार को अपनी दिव्य कुल्हाड़ी से खत्म कर दे! इसे मारना ही होगा ताकि ये रूहें आज़ाद हो सकें!"
अंतिम संघर्ष और खुदाई
कृष्ण ने एक शेर की तरह दहाड़ मारी और अपनी कुल्हाड़ी को हवा में लहराया। कुल्हाड़ी का सिंदूरी तेज अब पूरे तहखाने को रोशनी से भर रहा था। कृष्ण बंजारन पर टूट पड़ा, ताकि उसका ध्यान रश्मि से हट जाए।
दूसरी ओर, तहखाने के कोने में एक अद्भुत दृश्य था:
रश्मि, सृष्टि, आकृति और सुमित पागलों की तरह उस गीली और ठंडी मिट्टी को खोद रहे थे। उनके पास औजार नहीं थे, वे अपने नाखूनों और हाथों से ज़मीन को खुरच रहे थे।
रश्मि की उंगलियों से खून रिसने लगा था, पर उसे दर्द महसूस नहीं हो रहा था। उसे बस वो तीन रूहें दिख रही थीं—उसका पूर्वज रतन सिंह, बेगुनाह लच्छू और यह तड़पती हुई पार्वती।
अचानक, सुमित का हाथ एक सख्त चीज़ से टकराया। उसने चिल्लाकर कहा, "मिल गईं! ये रही हड्डियाँ!"
सुमित की आवाज़ जैसे ही गूँजी—"मिल गईं! ये रही हड्डियाँ!", वैसे ही पूरे तहखाने का तापमान अचानक गिर गया। बंजारन पार्वती का चेहरा अब गुस्से से काला पड़ चुका था। उसे