बरसाना में यमुना किनारे सावित्री नाम की एक बूढ़ी मैया रहती थी। उसका इस संसार में कोई नहीं था। पति बहुत साल पहले गुजर गए थे, बच्चे नहीं थे। उसका बस एक ही सहारा था, एक ही परिवार था - राधा रानी।
सावित्री मैया हर रोज ब्रह्म मुहूर्त में चार बजे उठ जाती थी। चाहे सर्दी हो, गर्मी हो या बारिश हो, वह हाथ में झाड़ू लेकर राधा रानी के मंदिर जाने वाले रास्ते को साफ करती थी। लोग उसे देखते और कहते, मैया तुझे इस काम के पैसे कौन देता है। मैया हंसकर कहती, बेटा मुझे पैसे नहीं चाहिए, मुझे तो मेरी लाडली का प्यार चाहिए। यही मेरी सबसे बड़ी कमाई है।
मैया बहुत गरीब थी। उसका छोटा सा घर था, छत टूटी हुई थी। खाने के लिए उसके पास कुछ नहीं होता था। मंदिर में जो भक्त प्रसाद चढ़ाते थे, पुजारी जी उसी में से थोड़ा सा प्रसाद मैया को दे देते थे। उसी से उसका जीवन चलता था। कभी-कभी तो उसे भूखा भी सोना पड़ता था, पर उसने कभी किसी से कुछ नहीं माँगा। वह बस राधे-राधे जपती रहती थी।
एक बार बरसाना में लगातार सात दिनों तक बहुत तेज बारिश हुई। मूसलाधार बारिश के कारण यमुना जी का जलस्तर बढ़ गया। सारी गलियां पानी से भर गईं। लोगों का घर से निकलना मुश्किल हो गया। मंदिर के पट भी बंद कर दिए गए।
तीन दिन से सावित्री मैया ने कुछ नहीं खाया था। उसके घर में अनाज का एक दाना भी नहीं बचा था। वह अपनी झोपड़ी में बैठी ठंड से कांप रही थी और राधा रानी की तस्वीर के सामने रो रही थी। वह कह रही थी, हे लाडली जी, क्या आप अपनी इस बेटी को भूल गईं।
रात के लगभग नौ बजे, जब बारिश और तेज हो गई, तब किसी ने उसके दरवाजे पर दस्तक दी। खट-खट की आवाज सुनकर मैया उठी। उसने दरवाजा खोला तो देखा सामने एक बारह साल की छोटी सी कन्या खड़ी है। उसने सुंदर नीला लहंगा और पीली ओढ़नी पहनी हुई थी। उसकी आंखें बहुत बड़ी और सुंदर थीं, जैसे कमल का फूल हो। बारिश में भी उसके कपड़े बिल्कुल सूखे थे।
कन्या बोली, मैया, मुझे बहुत जोर से भूख लगी है। क्या तुम्हारे पास कुछ खाने को है।
सावित्री मैया ने कहा, बेटी, मेरे पास तो खुद के लिए भी कुछ नहीं है। बस कल का थोड़ा सा सूखा तुलसी दल वाला प्रसाद रखा है। अगर तुम कहो तो वही ले आऊं।
मैया अंदर गई और अपना आखिरी बचा हुआ प्रसाद ले आई। उसने वह प्रसाद उस छोटी कन्या को दे दिया। कन्या ने बड़े प्रेम से वह प्रसाद खाया। प्रसाद खाने के बाद वह मुस्कुराई और बोली, मैया, तुमने अपना आखिरी टुकड़ा भी मुझे दे दिया। तुम कितनी दयालु हो। राधा रानी तुमसे बहुत प्रसन्न हैं। अब तुम्हें कभी कोई दुख नहीं होगा।
इतना कहकर वह कन्या बारिश में ही चली गई। मैया उसे देखती ही रह गई।
अगली सुबह जब मैया की आंख खुली तो वह अपने जीवन की सबसे बड़ी चमत्कार देख कर हैरान रह गई। उसकी टूटी हुई झोपड़ी एक सुंदर घर बन गई थी। अंदर अनाज की कई बोरियां भरी थीं, घी, दूध, फल सब कुछ रखा था। और उसकी खाट पर एक सुंदर सी चिट्ठी रखी थी।
चिट्ठी में लिखा था, मैया, मैं ही तुम्हारी राधा रानी हूं। कल मैं तुम्हारी परीक्षा लेने आई थी। तुमने सच्चे मन से सेवा की है। आज से तुम्हें किसी चीज की कमी नहीं होगी।
यह पढ़कर मैया की आंखों से आंसू बहने लगे और वह जोर-जोर से राधे-राधे चिल्लाने लगी।
*शिक्षा: जो दूसरों की मदद करता है, राधा रानी उसकी मदद जरूर करती हैं।*