Uddhav Sena defeated in the battle between real and fake in Hindi Magazine by Virendra Dewangan books and stories PDF | असली-नकली के जंग में उद्धव सेना परास्त

Featured Books
Categories
Share

असली-नकली के जंग में उद्धव सेना परास्त

धांसू खबर है कि उद्वव सेना के 9 में-से 6 लोकसभा सदस्य पाला बदलकर सिंदे गुट में शामिल हो गए हैं। दलबदल के फलस्वरूप अब शिंदे सेना के सांसदों की संख्या 7 से बढ़कर 13 हो गई है। वहीं उद्वव सेना 3 सांसदों तक सिमटकर रह गई है।

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद उद्वव ठाकरे का होश ठिकाने लग जाना चाहिए कि उसने अपने स्वर्गीय पिता बाला साहेब ठाकरे के हिंदू ह्दय सम्राट की छवि व विरासत को न केवल नष्ट-भ्रष्ट कर दिया, वरन मुख्यमंत्री बनने के लालच में अपने पैरों पर आप कुल्हाड़ी मारकर उस कांग्रेस से हाथ मिला लिया, जो बाला साहेब ठाकरे की विचारधारा का घोर विरोधी है।

विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद उद्वव का यह कहना कि यह लहर नहीं, सुनामी है, इससे उसे कुछ हासिल होनेवाला नहीं है; क्योंकि वे मुस्लिमों के हिमायती बनने के चक्कर में महाराष्ट्र की राजनीति में अप्रासंगिक बन चुके हैं।

यह भी तय है कि वे हिंदुत्व के झंडाबरदार पिता के बनाए गए ऊसूलों के खिलाफ चलकर जब-जब राजनीति करेंगे, तब-तब उन्हें पराजय का मुंह देखना पड़ेगा।

महाराष्ट्र की जनता यह कभी बर्दाश्त नहीं करनेवाली कि बाला साहेब ठाकरे का बेटा अपने स्वार्थ के लिए हिंदुत्व के लिए लड़नेवाले उस महान योद्धा के सिद्धांतों को तिलांजलि दे दे और उनको भला-बुरा कहता रहे, जो उसके पिता के सिद्धातों पर चल रहे हैं।

अब, उद्वव के लिए एकमात्र रास्ता यही बचा है कि उसे उन तत्वों से दूरी बनानी चाहिए, जो उनके इर्द-गिर्द मंडराकर गुमराह करते रहते हैं और पार्टी को रसातल पर ले जाने के लिए तुले रहते हैं।

21 जून 2022 को अपने पार्टी के 40 विधायकों के साथ एकनाथ शिंदे ने बगावत कर शिवसेना को दोफाड़ कर दिया था और बीजेपी से हाथ मिलाकर महाराष्ट्र में सरकार बना लिया था।

तकरीबन, सालभर पहले अजित पवार ने भी अपने चाचा शरदचंद्र पवार को गच्चा देते हुए राकांपा के दो टुकड़े कर दिए थे। फिर अपने समर्थकों के साथ शिंदे की सरकार में शामिल हो गए थे।

ऐसी दगाबाजी के खिलाफ उद्वव सेना व शरद पवार गुट ने सुप्रीमकोर्ट व चुनाव आयोग का दरवाजा खूब खटखटाया।

चुनाव आयोग ने अपने निर्णय में यही कहा कि शिंदे की शिवसेना और अजित पवार की राकापा असली है। लिहाजा, उद्धव ठाकरे व शरद पवार को चुनाव चिन्ह के साथ पार्टी से भी हाथ धोना पड़ गया।

जब इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई, तब शीर्ष कोर्ट ने विधानसभा अध्यक्ष को इसका फैसला करने को कहा। विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर ने चुनाव आयोग के फैसले को यथावत रखा।

लेकिन, उद्वव सेना व शरद गुट इन फैसलों से संतुष्ट नहीं हुए। वे इसे अन्याय कहते रहे और उम्मीद जताया रहे कि जनता की अदालत में उन्हें न्याय मिलेगा।

जब विधानसभा चुनाव के रूप में जनता की अदालत का फैसला आया, तो उनके पैरों तले की जमीन खिसक गई।

यहां तक कि आदित्य ठाकरे, एकनाथ शिंदे को गद्दार कहा करते थे। वस्तुतः, बाला साहेब का गद्दार व वफादार कौन है, जनता के फैसले से आदित्य को पता चल गया होगा?

उद्वव की सेना को महाराष्ट्र के मतदाताओं ने 288 में-से महज 20 सीटें दिया, तो शरद गुट को 14 सीटें. इनकी तुलना में शिंदे सेना को 58 और अजित गुट की राकांपा को 41 सीटें मिली।

चुनाव नतीजों के बाद उद्वव न हिंदुओं का लीडर रहा, न मुसलमानों का। हिंदू अब उसको कभी वोट देंगे, इसमें संदेह है। लेकिन, मुसलमान उसे अपना नेता मान लेंगे, इसमें तो भारी संदेह है। क्योंकि मुसलमानों के वोटों के पीछे एक नहीं अनेक पार्टियां पड़ी हुई हैं।

उसके सहयोगी कांग्रेस व राकांपा उसको अभी से हेयदृष्टि से देखना आरंभ कर दिए हैं; क्योंकि उद्वव मुख्यमंत्री का दावेदार होकर चुनाव में कोई कमाल न कर सका। इसी तरह उसके रवैये से अब एनडीए गठबंधन में उसकी वापसी धूल-धूसरित हो चुकी है।

विधानसभा चुनाव में शर्मनाक हार से उद्वव सेना को कुछ सूझ नहीं रहा है कि हार का ठिकरा उसकी पार्टी किस पर फोड़े?

इसीलिए वे सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ पर हमलावर हैं, ‘‘शिवसेना में बगावत के बाद यदि विधायकों की अयोग्यता पर चंद्रचूड़ ने समय रहते फैसला दे दिया होता, तो परिस्थितियां कुछ और होती।’’

उसके बकवादी प्रवक्ता ने यहां तक कह दिया, ‘‘न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने दल बदलुओं के मन से कानून का डर खत्म कर दिया। उनका नाम इतिहास में काले अक्षरों में लिखा जाएगा।’’

बहुत खूब! अपनी नाकामी के लिए दूसरों पर दोषारोपण करना आसान है, पर अपने गिरेबान में झांकना उतना ही मुश्किल।

आशय यही कि उद्वव सेना ने अब तक अपने गिरेबान में झांका तक नहीं है। झांके भी क्यों? इन्हें तो कांग्रेसियों का महारोग लग गया है। कांग्रेसी भी यही करते हैं। गर वे अपने अंदर झांकते, तो उनकी हार का कारण उन्हें बखूबी मिल जाता।

उद्वव सेना की पराजय का सर्वप्रमुख कारण है, उस कांग्रेस से हाथ मिला लेना, जिसके खिलाफ स्वर्गीय बाला साहेब ठाकरे विषवमन किया करते थे।

दूसरा बड़ा कारण है, उनका मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति पर चल पड़ना, जो शिवाजी, शंभाजी व वीर सावरकर को अपना आदर्श माननेवाले महाराष्ट्रियों का घोर अपमान है।

तीसरा बड़ा कारण है हिंदुत्व के मुद्दे को छोड़ देना और शाफ्ट हिंदुत्व अपनाकर मुस्लिमों की पैरवी आरंभ करना।

उस शरद गुट से गलबहियां करना, जिसने अपनी पार्टी का नाम तो रखा राष्ट्रवादी, पर उसका काम स्वार्थवादी व राष्ट्र-विरोधी है।

उद्वव सेना को इतनी सी बात यदि समझ में आ जाती, तो उनकी पार्टी की ऐसी दुर्गति कतई नहीं होती और वे नाच न जाने आंगन टेढ़ा कभी नहीं कहते-करते।

विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त के उपरांत उद्वव सेना का कांग्रेस से मोहभंग होने लगा है। जबकि यह समय रहते हो जाता, तो इतनी दुर्गति उद्वव सेना की कतई नहीं होती।

महाराष्ट्र विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष रहे उद्वव सेना के वरिष्ठ नेता अंबादास दानवे का बयान है, ‘‘कांग्रेस के अति आत्मविश्वास से महाविकास अघाड़ी को विधानसभा चुनाव में भारी नुकसान उठाना पड़ा है।’’

सवाल यही कि उनकी उद्वव सेना व राकांपा शरद गुट क्या चुनाव में मक्खी मार रही थी, जो हार का ठिकरा एक अकेली कांग्रेस पर फोड़ रही है? कांग्रेस तो है ही ऐसी, जो अपने कन्फ्युज नेता के दम पर चुनाव जीतना चाहती है।

दानवे ने आगे कहा,‘‘लोकसभा चुनाव में 17 सीटों पर लड कर कांग्रेस 13 सीटें जीतने के उपरांत अति आत्मविश्वास में आ गई थी। इसीलिए, उसने विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा 103 सीटों पर चुनाव लड़ा, पर उसको जीत मिली केवल 16 सीटों पर। जबकि उद्वव सेना 89 सीटों पर लड़ कर 20 व शरद गुट राकांपा 87 सीटों पर लड़ कर 10 सीटें जीतीं।’’

अंबादास ने कांग्रेस पर तंज कसते हुए यह भी कहा,‘‘वे लोग तो सूट सिलवा कर मुख्यमंत्री व अन्य मंत्री बनने के लिए तैयार बैठे थे। जबकि उनकी पार्टी उद्वव ठाकरे को मुख्यमंत्री के रूप में पेशकर चुनाव लड़ने पर जोर दे रही थी। यदि ऐसा किया गया होता, तो परिणाम कुछ और होता।’’

मतलब यही कि कांग्रेस व उद्वव सेना का सारा जोर अपना मुख्यमंत्री बनाने पर था। यही बात कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नाना पटोले ने भी अपने पक्ष में कही थी। वाह! चुनाव जीते नहीं और सरकार में मंत्री बनने चले थे ससुरे!!

विदित हो कि उद्वव सेना में एक राय ऐसी भी बनने लगी है कि आगे के सभी चुनाव महाविकास अघाड़ी से अलग होकर अपने दम पर लड़ा जाए।

देर आए, दुरुस्त आए, चलो उद्वव सेना को होश तो आया कि कांग्रेस व राकांपा से अलग हो जाने में ही उसकी भलाई है। क्योंकि ये मुस्लिमपरस्त पार्टियां होने से उसके लिए बेमेल गठबंधन हैं। उसने झारखंड मंत्रिमंडल शपथग्रहण समारोह में अपनी गैरमौजूदगी से अपना मंतव्य जाहिर भी कर दिया है।

स्थानीय निकाय चुनावों में विशेषकर महा नगरपालिका मुंबई चुनाव में भी उद्धव सेना को पराजय झेलना पड़ा। जो पार्टी अपने मूल विचारधारा से पूरी तरह से कट चुकी हो, उसके लिए स्थानीय निकायों में अच्छा प्रदर्शन करना उतना ही कठिन है, जितना कि लोकसभा व विधानसभा चुनावों को जीतना। यही वजह है कि उसे इन चुनावों में भी मुंह की खानी पड़ी।
--00--

लेख पसंद आया हो, तो अपने दोस्तों को शेयर कीजिए, समीक्षा लिखिए और लेखक को सब्सक्राइब करना मत भूलिए।