Nuakhai (Not a festival, but a feeling) in Hindi Spiritual Stories by Anamika books and stories PDF | नुआखाई (पर्व नहीं एक एहसास)

The Author
Featured Books
Categories
Share

नुआखाई (पर्व नहीं एक एहसास)

स्मृतियों की थाली में नुआखाई का नवान्न :

​भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष पंचमी (गणेश चतुर्थी के अगले दिन) जब भी करीब आती है, हवा में एक सोंधी सी खुशबू घुलने लगती है। पश्चिमी ओडिशा का यह लोकपर्व 'नुआखाई'—जहाँ 'नुआ' का अर्थ नया और 'खाई' का अर्थ भोजन (नया अनाज खाने का पर्व) होता है—सिर्फ नए धान के स्वागत का उत्सव नहीं, बल्कि स्मृतियों की एक पूरी किताब खोल देता है।

​शादी से पहले के वे दिन याद आते हैं, तो चेहरे पर अपने आप मुस्कान तैर जाती है। त्योहार के हफ़्तों पहले से ही भाई-बहनों के बीच एक अलग ही हुड़दंग मचा रहता था। "तुमने कौन सा सूट लिया?", "मेरी ज्वेलरी इससे मैच करेगी या नहीं?", "अरे, तुमने अपने कपड़े खरीद भी लिए?"—बस यही बातें, वही खिलखिलाहटें।

​दूसरी तरफ, माँ की दुनिया तीन-चार दिन पहले से ही रसोई और पूजा घर के इर्द-गिर्द सिमट जाती थी। खेतों से आए नए धान को सहेजना, उसे कूटना-भांजना और एक दिन पहले से ही अरिसा पीठा (चावल के आटे और गुड़ से बनने वाला ओडिशा का पारंपरिक मीठा पकवान) की सोंधी महक से पूरे घर को भर देना। नुआखाई के दिन तो तड़के दो-तीन बजे ही माँ उठ जाती थीं। उस नए धान के पोहा में गुड़, केला, दूध और बहत कुछ मिलाकर नवान्न (पूजा के लिए तैयार नया पवित्र अन्न) तैयार करना, फिर हमारी इष्ट देवी माँ माणिकेश्वरी और माँ मंगला के चरणों में भोग लगाना।

​पूजा के बाद जब पूरा परिवार एक साथ बैठकर नवान्न ग्रहण करता, और 'नुआखाई जुहार' (अपनों से बड़े-बुजुर्गों के चरण स्पर्श करके आशीर्वाद लेने और छोटों को प्यार देने की सुंदर परंपरा) कहकर बड़ों का आशीर्वाद लिया जाता, तो लगता था जैसे पूरी दुनिया की खुशियाँ उसी आँगन में सिमट आई हैं।

​आज शादी को पाँच साल बीत चुके हैं। अब मैं किसी की बेटी होने के साथ-साथ एक बहू और माँ की जिम्मेदारियों के केंद्र में हूँ। नुआखाई आज भी आ रहा है, पर अब वो बेफ़िक्र चंचलता और कपड़ों की मैचिंग वाली उत्तेजना नहीं है। अब जिम्मेदारियों का शांत अहसास है—सुबह जल्दी उठकर सब कुछ समय पर संभालना, परंपराओं को नए घर में वही आदर देना।

​मायके की वे यादें आज भी दिल के किसी कोने में महकती हैं। लेकिन अब समझ आता है कि त्यौहार बदला नहीं है, बस मेरा किरदार बदल गया है। कल तक जो खुशियाँ मुझे सजी-सजाई मिलती थीं, आज उन्हें अपनों के लिए सजाने की जिम्मेदारी मेरी है।

उत्सव का इंतज़ार और परंपरा की जड़ें :

​इस साल भी नुआखाई करीब आ रहा है। शादी के इन 5 सालों में बहुत कुछ बदल गया है। अब मैं सिर्फ मायके की यादों में खोने वाली बेटी नहीं, बल्कि एक गृहणी हूँ जिसके सिर पर नए घर में त्यौहार को सहेजने की जिम्मेदारी है। पूजा की तैयारियों की योजना बनाते-बनाते आज मन में अचानक एक विचार कौंधा—यह त्यौहार जिसे मैं बचपन से मनाती आ रही हूँ, आखिर इसकी शुरुआत कहाँ से हुई होगी?

​उत्सुकतावश जब मैंने इसके बारे में जाना, तो समझ आया कि नुआखाई सिर्फ हमारे घर-आँगन की परंपरा नहीं है, बल्कि इसका इतिहास सदियों पुराना है। विद्वानों के अनुसार, इस पर्व का मूल स्रोत वैदिक काल के 'प्रलम्बन यज्ञ' (फसल कटने पर पहला अन्न देवताओं को अर्पित करने का प्राचीन यज्ञ) से जुड़ा है।

​इतिहास पन्ने पलटता है तो पता चलता है कि 14वीं शताब्दी में पाटणागढ़ (वर्तमान बलांगीर) के प्रथम चौहान राजा रमाई देव ने इस पर्व को एक बड़े 'गणपर्व' (जन-उत्सव) का रूप दिया था। उस दौर में उन्होंने शिकार की जगह कृषि कार्य को बढ़ावा देने के लिए नुआखाई को आधिकारिक मान्यता दी थी। पहले हर गाँव अपनी सुविधा के अनुसार अलग-अलग दिनों में नुआखाई मनाता था, लेकिन 1991 में ओडिशा सरकार ने इसे भाद्रपद शुक्ल पंचमी के दिन पूरे राज्य में एक साथ मनाने की घोषणा की और सरकारी छुट्टी तय की।

​इतिहास के इन पन्नों को जानकर इस बार नुआखाई का इंतज़ार मेरे लिए और भी खास हो गया है।

​अब जब नुआखाई में कुछ ही दिन बाकी हैं, तो मन में एक अजीब सी उत्सुकता और गर्व की अनुभूति है। शादी के 5 साल बाद आज जब मैं अपने हाथों से माँ माणिकेश्वरी और माँ मंगला के लिए नवान्न तैयार करने की सोचती हूँ, तो लगता है जैसे सदियों पुरानी उस समृद्ध विरासत की एक छोटी सी कड़ी अब मैं भी हूँ।

​आने वाले इस नुआखाई पर, जब पूरा परिवार एक साथ बैठकर 'नुआखाई जुहार' कहेगा, तो मैं अपने इस नए किरदार को पूरी निष्ठा से निभाऊँगी। वक्त बदला है, भूमिका बदली है, लेकिन नुआखाई की सोंधी महक और अपनों को जोड़ने वाला यह धागा आज भी उतना ही मजबूत है।

स्मृतियों की थाली में नुआखाई का नवान्न (अंतिम हिस्सा):

​इतिहास के इन पन्नों को जानकर इस बार नुआखाई का इंतज़ार मेरे लिए और भी खास हो गया है।

​अब जब नुआखाई में कुछ ही दिन बाकी हैं, तो मन में एक अजीब सी उत्सुकता और गर्व की अनुभूति है। इस पर्व का हर एक रंग अब और स्पष्ट होकर सामने आने लगा है—चाहे वह बेहेराना और लग्न देखा से लेकर डाक-हाक, सफ़ा-सुतुरा, किना-बिका और नुआ धान खोजा तक की नौ-नौ पवित्र रीतियों का पालन हो, या बालि पका की पावन तैयारी। अब समझ आता है कि यह सिर्फ एक दिन का भोजन नहीं, बल्कि जीवन को अनुशासित और समृद्ध बनाने का एक पूरा विधान है।

​शादी के 5 साल बाद आज जब मैं अपने हाथों से माँ माणिकेश्वरी और माँ मंगला के लिए नए धान से 'नवान्न' तैयार करने की सोचती हूँ, तो लगता है जैसे सदियों पुरानी उस समृद्ध विरासत की एक छोटी सी कड़ी अब मैं भी हूँ। वही नवान्न—जिसे पारंपरिक रूप से कुरई के पत्तों पर परोसा जाता है—उसकी सोंधी महक में मुझे अपने अतीत और वर्तमान दोनों की खुशबू आती है।

​आने वाले इस नुआखाई पर, जब सुबह को संबलपुरी साड़ी के आंचल लहराएंगे और ढोल, मादर तथा निशान वाद्य की थाप पर वातावरण गूंजेगा, तब पूरा परिवार एक साथ बैठकर 'नुआखाई जुहार' कहेगा। जुहार भेट की यही तो सबसे बड़ी खूबसूरती है—पुराने सारे मनमुटाव और शिकायतों को भुलाकर एक-दूसरे को गले लगा लेना और बड़ों के चरण स्पर्श कर आशीष पाना।

​मैं अपने इस नए किरदार को पूरी निष्ठा से निभाऊँगी। वक्त बदला है, भूमिका बदली है, लेकिन नुआखाई की सोंधी महक और अपनों को जोड़ने वाला यह धागा आज भी उतना ही मजबूत है।