Wo Gaav jo har raat Gaayab ho jata tha - 1 in Hindi Horror Stories by wow mission successful books and stories PDF | वो गाँव जो हर रात गायब हो जाता था - 1

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वो गाँव जो हर रात गायब हो जाता था - 1

Part 1 — जिस गाँव का रास्ता रात में खत्म हो जाता था बिहार के एक छोटे-से जिले में एक गाँव था—भैरवपुर।नक्शे में उसका नाम था।सरकारी कागजों में उसका नाम था।वहाँ रहने वाले लोगों के राशन कार्ड, जमीन के कागज, स्कूल का रजिस्टर और पंचायत की फाइलों में भी उसका नाम मौजूद था।लेकिन पिछले कुछ महीनों से आसपास के गाँवों के लोग एक अजीब बात कहने लगे थे।भैरवपुर रात में गायब हो जाता था।पहली बार जब यह बात फैली, तो किसी ने विश्वास नहीं किया।लोगों ने कहा—“अरे, गाँव कोई चादर है क्या जो रात में गायब हो जाएगा?”किसी ने इसे अफवाह बताया।किसी ने शराबी चरवाहे की कहानी कहा।किसी ने कहा कि शायद रात में घना कोहरा पड़ता होगा और रास्ता दिखाई नहीं देता होगा।लेकिन धीरे-धीरे ऐसी बातें बढ़ने लगीं कि आसपास के लोग सूर्यास्त के बाद भैरवपुर की तरफ जाने से डरने लगे।क्योंकि जो भी रात में उस गाँव तक जाने की कोशिश करता…सुबह उसे गाँव नहीं मिलता था।यही बात सुनकर शहर में रहने वाला आरव भैरवपुर पहुँचा था।आरव करीब छब्बीस साल का था। पेशे से पत्रकार नहीं था, लेकिन रहस्यमयी घटनाओं पर लिखने का शौक था। वह छोटे-छोटे वीडियो और कहानियाँ बनाता था और इंटरनेट पर लोगों से उन घटनाओं की जानकारी लेता था जिनका कोई साफ जवाब नहीं मिलता था।करीब दस दिन पहले उसके पास एक अनजान नंबर से फोन आया था।फोन करने वाले आदमी की आवाज काँप रही थी।“अगर तुम्हें सच में रहस्य पसंद हैं… तो भैरवपुर जाओ।”आरव ने हँसते हुए पूछा था—“वहाँ ऐसा क्या है?”कुछ सेकंड तक सामने वाला चुप रहा।फिर बोला—“दिन में जाओगे तो गाँव मिलेगा।”“और रात में?”दूसरी तरफ से धीमी आवाज आई—“रात में… गाँव नहीं मिलेगा।”इसके बाद फोन कट गया।आरव ने नंबर दोबारा मिलाया।नंबर बंद था।उसी रात उसने इंटरनेट पर भैरवपुर के बारे में खोजा।अजीब बात यह थी कि गाँव के बारे में बहुत कम जानकारी थी।कुछ पुराने सरकारी रिकॉर्ड थे।एक स्कूल का नाम था।एक पंचायत भवन का रिकॉर्ड था।लेकिन इंटरनेट पर गाँव की एक भी हाल की तस्वीर नहीं थी।आरव ने सोचा कि शायद इंटरनेट पर जानकारी कम होगी।लेकिन फिर उसे एक पुराना नक्शा मिला।उस नक्शे में भैरवपुर के ठीक बीच में एक छोटा-सा काला निशान बना था।उसके नीचे लिखा था—“पुराना मंदिर।”आरव को सबसे ज्यादा हैरानी इस बात पर हुई कि उसी जगह के आसपास आज की सैटेलाइट तस्वीर में कुछ भी साफ दिखाई नहीं दे रहा था।बस पेड़।खेत।और एक खाली-सा इलाका।आरव ने उसी दिन फैसला कर लिया।वह भैरवपुर जाएगा।लेकिन उसे अंदाजा नहीं था कि यह फैसला उसकी जिंदगी का सबसे खतरनाक फैसला बनने वाला था।दोपहर करीब तीन बजे आरव की बाइक भैरवपुर की तरफ बढ़ रही थी।आसमान साफ था।सड़क सुनसान।दोनों तरफ खेत थे।करीब बीस किलोमीटर तक उसे कोई आदमी नहीं मिला।फिर अचानक उसे एक चाय की छोटी-सी दुकान दिखाई दी।दुकान के बाहर एक बूढ़ा आदमी लकड़ी की बेंच पर बैठा था।आरव ने बाइक रोकी।“चाचा, भैरवपुर कितनी दूर है?”बूढ़े ने उसे देखा।फिर उसकी नजर बाइक से हटकर आरव के चेहरे पर टिक गई।“भैरवपुर क्यों जाना है?”आरव थोड़ा मुस्कुराया।“बस ऐसे ही। वहाँ कुछ लोगों से मिलना है।”बूढ़े ने तुरंत सिर हिलाया।“आज मत जाओ।”आरव ने पूछा—“क्यों?”बूढ़े ने कोई जवाब नहीं दिया।वह चुपचाप चाय बनाने लगा।आरव ने फिर पूछा—“गाँव में कोई परेशानी है क्या?”बूढ़े के हाथ अचानक रुक गए।उसने धीरे से कहा—“परेशानी गाँव में नहीं है।”“तो?”बूढ़े ने सड़क की तरफ देखा।“परेशानी उस समय शुरू होती है… जब सूरज डूब जाता है।”आरव हँस पड़ा।“आप भी वही कहानी सुनाने लगे?”बूढ़े ने उसकी तरफ देखा।इस बार उसकी आँखों में मजाक नहीं था।“तुम्हें किसने भेजा है?”आरव चौंका।“किसी ने नहीं।”“झूठ मत बोलो।”आरव कुछ सेकंड चुप रहा।फिर उसने उस अनजान फोन वाली बात बता दी।बूढ़े का चेहरा अचानक पीला पड़ गया।उसने चाय का गिलास नीचे रख दिया।“उसने तुम्हें फोन किया?”“हाँ।”“कैसा था?”“आवाज आदमी की थी।”बूढ़ा धीरे से बोला—“आवाज आदमी की थी… लेकिन जरूरी नहीं कि फोन करने वाला आदमी ही हो।”आरव की हँसी गायब हो गई।“आप कहना क्या चाहते हैं?”बूढ़े ने जवाब नहीं दिया।उसने बस एक दिशा में उंगली उठाई।“सीधे जाओ। लगभग सात किलोमीटर बाद एक टूटा हुआ पुल मिलेगा। उसके बाद कच्ची सड़क है। वही भैरवपुर जाता है।”आरव बाइक स्टार्ट करने लगा।तभी बूढ़े ने उसे पीछे से आवाज दी।“सुनो!”आरव रुका।“सूरज डूबने से पहले गाँव छोड़ देना।”आरव ने पलटकर पूछा—“अगर नहीं छोड़ा तो?”बूढ़े ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—“फिर सुबह तक… शायद तुम भी गाँव के साथ गायब हो जाओ।”शाम के करीब पाँच बजे आरव भैरवपुर पहुँचा।गाँव बिल्कुल सामान्य था।मिट्टी के घर।कुछ पक्के मकान।बच्चे खेल रहे थे।औरतें कुएँ से पानी भर रही थीं।कुछ किसान खेत से लौट रहे थे।आरव ने मन ही मन सोचा—“लोग बेवजह डरते हैं।”उसने बाइक पंचायत भवन के पास खड़ी की और मोबाइल निकाला।नेटवर्क था।उसने गाँव की कुछ तस्वीरें खींचीं।फिर एक बुजुर्ग आदमी से पूछा—“चाचा, यहाँ रहने के लिए कोई कमरा मिल जाएगा?”बुजुर्ग ने उसे सिर से पैर तक देखा।“बाहर के हो?”“हाँ।”“कहाँ से आए हो?”“पटना।”बुजुर्ग कुछ सोचकर बोला—“स्कूल के पीछे मास्टरजी का पुराना कमरा खाली है। रात वहीं रह जाना।”आरव खुश हो गया।“धन्यवाद।”लेकिन जैसे ही वह जाने लगा, बुजुर्ग ने उसका हाथ पकड़ लिया।“एक बात याद रखना।”“क्या?”“रात में अगर कोई तुम्हें नाम लेकर बुलाए…”बुजुर्ग रुक गया।“तो जवाब मत देना।”आरव ने हल्की हँसी के साथ पूछा—“क्यों?”बुजुर्ग ने हाथ छोड़ दिया।“क्योंकि हो सकता है… बुलाने वाला इंसान न हो।”शाम के छह बज चुके थे।आरव कमरे में अपना सामान रख रहा था।कमरा काफी पुराना था।दीवारों पर नमी थी।एक कोने में टूटी हुई लकड़ी की अलमारी पड़ी थी।खिड़की से पूरा गाँव दिखाई देता था।आरव ने कैमरा निकाला और रिकॉर्डिंग शुरू कर दी।“मैं इस समय भैरवपुर में हूँ। जैसा कि मैंने बताया था, लोगों का दावा है कि यह गाँव रात में गायब हो जाता है…”वह बोल ही रहा था कि बाहर अचानक मंदिर की घंटी बजी।टन…आरव रुक गया।कुछ सेकंड बाद फिर—टन…फिर तीसरी बार—टन…आरव ने खिड़की से बाहर देखा।गाँव के बीच में एक पुराना मंदिर था।लेकिन वहाँ कोई दिखाई नहीं दे रहा था।उसने कैमरा उठाया और बाहर निकल गया।मंदिर के पास पहुँचते-पहुँचते अंधेरा होने लगा था।मंदिर बहुत पुराना था।दरवाजा आधा टूटा हुआ।अंदर एक पत्थर की मूर्ति थी, जिस पर सिंदूर लगा था।आरव ने मोबाइल की रोशनी अंदर डाली।दीवार पर कुछ लिखा हुआ था।उसने धूल साफ की।कुछ शब्द दिखाई दिए—“सूरज के बाद मत गिनना…”बाकी हिस्सा मिट चुका था।आरव ने तस्वीर लेने के लिए कैमरा उठाया।तभी मंदिर के पीछे से किसी बच्चे की आवाज आई।“भैया…”आरव ने पलटकर देखा।एक करीब दस साल का लड़का खड़ा था।“हाँ?”लड़के ने मंदिर की तरफ देखते हुए पूछा—“आप यहाँ पहली बार आए हो?”“हाँ।”“तो आपको किसी ने बताया नहीं?”“क्या?”लड़के ने धीरे से कहा—“रात होने वाली है।”आरव मुस्कुराया।“तो?”लड़के ने उसकी तरफ देखा।“तो यहाँ कोई बाहर नहीं रहता।”“क्यों?”लड़का कुछ बोलता, उससे पहले गाँव के किसी घर से एक औरत चिल्लाई—“रघु! घर आ जा! अभी!”लड़का डर गया।उसने आरव को देखा।फिर भाग गया।आरव ने पीछे मुड़कर आसमान देखा।सूरज बस डूबने वाला था।और तभी उसे पहली बार कुछ अजीब लगा।गाँव में अचानक सन्नाटा फैलने लगा था।जो बच्चे कुछ देर पहले खेल रहे थे, वे गायब हो चुके थे।दरवाजे बंद होने लगे।खिड़कियाँ बंद होने लगीं।लोग तेजी से अपने घरों में जा रहे थे।आरव को लगा जैसे किसी ने पूरे गाँव को एक आदेश दे दिया हो—“अंदर चले जाओ।”वह भी वापस अपने कमरे की ओर चल पड़ा।लेकिन रास्ते में उसे एक चीज दिखाई दी।गाँव की मुख्य सड़क के किनारे एक पुरानी दीवार थी।उस पर लाल रंग से लिखा था—“आज रात कोई बाहर मत निकलना।”आरव ने कैमरा निकाला।तस्वीर लेने ही वाला था कि पीछे से आवाज आई—“आरव…”उसका हाथ रुक गया।आवाज बहुत धीमी थी।लेकिन उसने अपना नाम साफ सुना था।वह धीरे-धीरे पीछे मुड़ा।सड़क खाली थी।कोई नहीं था।उसने आसपास देखा।फिर कमरे की तरफ चल दिया।उसके दिमाग में बूढ़े चायवाले की बात घूम रही थी—“अगर कोई नाम लेकर बुलाए… तो जवाब मत देना।”रात के करीब दस बजे तक आरव ने खुद को समझा लिया कि यह सब सिर्फ गाँव वालों की बनाई हुई कहानी है।वह बिस्तर पर लेट गया।बाहर पूरी तरह अंधेरा था।हवा भी बंद थी।अचानक उसे दूर से घंटी की आवाज सुनाई दी।टन…आरव उठ बैठा।फिर—टन…उसने घड़ी देखी।10:13 PM.तीसरी बार घंटी बजी।टन…आरव ने खिड़की खोली।मंदिर अंधेरे में डूबा था।लेकिन उसे वहाँ कुछ हिलता हुआ दिखाई दिया।एक परछाईं।बहुत लंबी।मंदिर से निकलकर सड़क पर आई।आरव ने आँखें छोटी करके देखा।परछाईं धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ रही थी।उसने मोबाइल की टॉर्च जलाई।परछाईं गायब।आरव ने खिड़की बंद कर दी।फिर बिस्तर पर बैठ गया।तभी उसके कमरे के बाहर किसी ने दरवाजा खटखटाया।ठक… ठक…आरव का दिल तेज धड़कने लगा।उसने कोई जवाब नहीं दिया।फिर आवाज आई—“आरव…”वही आवाज।जिसने शाम को उसे सड़क पर पुकारा था।इस बार आवाज दरवाजे के बिल्कुल दूसरी तरफ से आ रही थी।“आरव… दरवाजा खोलो।”आरव चुप रहा।कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा।फिर बाहर से एक बच्चे की आवाज आई—“भैया… मुझे अंदर आने दो।”आरव को रघु याद आया।उसने दरवाजे के नीचे से बाहर देखा।वहाँ दो पैर दिखाई दे रहे थे।छोटे पैर।बिल्कुल बच्चे के।आरव धीरे-धीरे दरवाजे के करीब गया।“रघु?”बाहर खड़े पैर अचानक हिलना बंद हो गए।कुछ सेकंड तक बिल्कुल शांति रही।फिर बाहर से आवाज आई—“मैं रघु नहीं हूँ।”आरव पीछे हट गया।उसके शरीर में सिहरन दौड़ गई।बाहर खड़ा कोई धीमे-धीमे हँसने लगा।और तभी…पूरे गाँव में एक साथ सैकड़ों दरवाजे बंद होने की आवाज आई।धड़ाम!धड़ाम!धड़ाम!आरव खिड़की की तरफ दौड़ा।उसने पर्दा हटाया।और जो दृश्य उसने देखा…उसकी साँस रुक गई।भैरवपुर की सारी गलियाँ गायब थीं।जहाँ कुछ मिनट पहले घर थे…वहाँ अब सिर्फ घना काला जंगल था।आरव ने आँखें मलकर दोबारा देखा।मंदिर गायब।पंचायत भवन गायब।घर गायब।सड़क गायब।पूरा गाँव…गायब हो चुका था।लेकिन सबसे डरावनी बात अभी बाकी थी।आरव जिस कमरे में खड़ा था…वह कमरा भी अब गाँव में नहीं था।वह किसी अज्ञात जंगल के बीच अकेला खड़ा था।और दरवाजे के बाहर वही आवाज फिर आई—“आरव…”इस बार आवाज बिल्कुल उसके कान के पास से आई।“तुमने जवाब क्यों नहीं दिया?”आरव धीरे-धीरे पीछे मुड़ा।कमरे के अंदर कोई खड़ा था।अंधेरे में सिर्फ उसका चेहरा दिखाई दे रहा था।और वह चेहरा…

आरव का अपना चेहरा था।    

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