दूसरा भैरवपुरआरव कुछ सेकंड तक बिल्कुल स्थिर खड़ा रहा।उसके सामने जो चेहरा था…वह उसका अपना था।बिल्कुल वही आँखें।वही बाल।वही चेहरा।वही काली जैकेट।यहाँ तक कि उसकी ठुड्डी के पास मौजूद छोटा-सा निशान भी बिल्कुल वैसा ही था।लेकिन सबसे डरावनी बात यह नहीं थी कि सामने वाला उसके जैसा दिख रहा था।सबसे डरावनी बात यह थी कि…वह मुस्कुरा रहा था।आरव पीछे हट गया।उसका पैर बिस्तर से टकराया।“तुम… कौन हो?”सामने खड़ा दूसरा आरव कुछ नहीं बोला।बस उसे देखता रहा।फिर धीरे-धीरे उसने अपना हाथ उठाया और दरवाजे की तरफ इशारा किया।आरव ने दरवाजे की तरफ देखा।दरवाजा खुला था।कुछ सेकंड पहले तक उसे याद था कि उसने दरवाजा अंदर से बंद किया था।वह वापस सामने देखने लगा।दूसरा आरव गायब था।कमरा खाली था।आरव ने तेजी से चारों तरफ देखा।“कहाँ गया?”कोई जवाब नहीं।बाहर घना अंधेरा था।आरव ने मोबाइल उठाया।स्क्रीन पर समय था—10:17 PMउसने नेटवर्क चेक किया।कोई नेटवर्क नहीं।उसने कैमरा खोला।बैटरी 74 प्रतिशत थी।वह दरवाजे के पास गया।बाहर कदम रखने से पहले उसने खुद को रोक लिया।उसे बूढ़े की बात याद आई—“रात में बाहर मत निकलना।”फिर उसे उस बच्चे की आवाज याद आई—“भैया… मुझे अंदर आने दो।”और उसके बाद वही आवाज—“मैं रघु नहीं हूँ।”आरव ने दरवाजा बंद कर दिया।“नहीं…”उसने खुद से कहा।“जो भी है, सुबह तक इंतजार करूँगा।”वह वापस बिस्तर पर बैठ गया।लेकिन तभी उसे कुछ महसूस हुआ।कमरे में एक अजीब-सी गंध थी।गीली मिट्टी जैसी।और उसके साथ…पुराने धुएँ की गंध।आरव ने नाक के पास हाथ ले जाकर हवा सूँघी।उसी समय उसकी नजर दीवार पर पड़ी।वहाँ पहले सिर्फ नमी थी।लेकिन अब नमी के बीच कुछ लिखा हुआ था।आरव धीरे-धीरे उसके पास गया।दीवार पर उँगली से जैसे किसी ने ताजा मिट्टी से लिखा था—“पहली रात है।”आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।उसने नीचे देखा।दीवार पर दूसरा वाक्य था—“अभी छह रात बाकी हैं।”आरव के हाथ से मोबाइल लगभग गिर गया।“छह रात?”उसने तुरंत अपना मोबाइल निकाला और तारीख देखी।26 अगस्त।फिर उसने दीवार को दोबारा देखा।वह लिखावट धीरे-धीरे बदल रही थी।पहले शब्द मिटे।फिर नए शब्द दिखाई देने लगे।“तुम्हें सातवीं रात तक जाना होगा।”आरव कुछ समझ नहीं पा रहा था।“कौन लिख रहा है?”कोई जवाब नहीं।तभी बाहर से आवाज आई—ठक… ठक… ठक…दरवाजे पर तीन दस्तक।आरव ने साँस रोक ली।कुछ सेकंड बाद फिर—ठक… ठक… ठक…फिर वही आवाज।“आरव…”इस बार आवाज बिल्कुल उसके पिता जैसी थी।आरव के चेहरे का रंग बदल गया।उसके पिता की मृत्यु कई साल पहले हो चुकी थी।वह आवाज सुनकर कुछ सेकंड के लिए उसे लगा कि शायद उसका दिमाग उसके साथ खेल रहा है।“बेटा…”बाहर से आवाज आई।“दरवाजा खोलो।”आरव की आँखें भर आईं।आवाज बिल्कुल वैसी ही थी।उसी तरह का बोलने का तरीका।उसी तरह की धीमी आवाज।लेकिन आरव जानता था—वह उसके पिता नहीं हो सकते।उसने अपने कान बंद कर लिए।“नहीं…”वह बुदबुदाया।“मैं नहीं खोलूँगा।”बाहर कुछ देर तक शांति रही।फिर आवाज बदल गई।अब वही आवाज उसकी माँ की थी।“आरव… दरवाजा खोल दे।”आरव काँप गया।फिर उसकी माँ की आवाज भी बदल गई।अब बाहर एक बूढ़ा आदमी हँस रहा था।फिर एक बच्चा।फिर कोई औरत।फिर…उसकी अपनी आवाज।“आरव…”वह आवाज बाहर से नहीं आई।वह कमरे के अंदर से आई थी।आरव ने धीरे से पीछे देखा।उसकी गर्दन के पीछे ठंडी हवा लगी।वह घूमने ही वाला था कि मोबाइल की स्क्रीन अपने आप जल उठी।कैमरा खुला था।स्क्रीन पर कमरे का दृश्य दिखाई दे रहा था।लेकिन स्क्रीन में…आरव के पीछे कोई खड़ा था।एक आदमी।काला कपड़ा पहने।चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।आरव ने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।कुछ नहीं।फिर मोबाइल की स्क्रीन देखी।वहाँ भी कुछ नहीं था।आरव ने कैमरा बंद कर दिया।उसका शरीर काँप रहा था।तभी उसे कमरे के कोने में रखी पुरानी अलमारी दिखाई दी।अलमारी का एक दरवाजा थोड़ा खुला था।जब वह कमरे में आया था, तब वह पूरी तरह बंद था।आरव धीरे-धीरे उसके पास गया।दरवाजा खोला।अंदर पुराने कपड़े नहीं थे।बल्कि एक मोटी-सी डायरी रखी थी।डायरी के ऊपर धूल जमी थी।उसके कवर पर लाल स्याही से लिखा था—“भैरवपुर — रात की डायरी”आरव ने डायरी उठाई।पहला पन्ना खोला।ऊपर तारीख थी—14 अगस्त 1987नीचे लिखा था—“आज गाँव में पहली बार ऐसा हुआ कि सूर्यास्त के बाद मंदिर की घंटी अपने आप बजी।”आरव ने अगला पन्ना पलटा।“15 अगस्त 1987—कल रात गाँव के तीन लोग गायब हो गए।सुबह वे वापस मिले।लेकिन उन्हें रात की कोई बात याद नहीं थी।”अगला पन्ना।“17 अगस्त—अब लोग कहने लगे हैं कि रात में गाँव का रास्ता बदल जाता है।”अगला पन्ना।“21 अगस्त—आज पहली बार पूरा गाँव गायब हुआ।”आरव की आँखें उसी लाइन पर टिक गईं।उसने तेजी से अगला पन्ना पलटा।लेकिन वह पन्ना फटा हुआ था।उसने अगला पन्ना खोला।वहाँ सिर्फ एक वाक्य था—“जो गाँव दिन में दिखाई देता है, वह असली गाँव नहीं है।”आरव ने डायरी बंद कर दी।उसके माथे पर पसीना आ गया।“तो फिर असली गाँव कहाँ है?”तभी पीछे से आवाज आई—“यहीं।”आरव पलट गया।कमरे में कोई नहीं था।लेकिन आवाज फिर आई—“तुम्हारे सामने।”आरव ने नीचे देखा।कमरे के फर्श पर हल्की दरार दिखाई दे रही थी।दरार पहले बहुत छोटी थी।फिर धीरे-धीरे फैलने लगी।आरव पीछे हट गया।फर्श के नीचे से ठंडी हवा निकलने लगी।दरार के अंदर अंधेरा था।और उस अंधेरे से…घंटी की आवाज आ रही थी।टन…आरव के हाथ से डायरी छूट गई।अचानक फर्श की दरार बंद हो गई।सब कुछ सामान्य।जैसे कुछ हुआ ही नहीं।आरव ने कुछ देर तक उस जगह को देखा।फिर उसने डायरी उठाई।इस बार उसने आखिरी पन्ने पलटने शुरू किए।कई पन्ने खाली थे।फिर एक जगह उसे एक तस्वीर मिली।पुरानी काली-सफेद तस्वीर।तस्वीर में पूरा भैरवपुर दिखाई दे रहा था।गाँव के बीच मंदिर।बगल में कुआँ।पीछे बड़े-बड़े पेड़।और सामने करीब तीस लोग खड़े थे।आरव ने तस्वीर को ध्यान से देखा।तभी उसकी साँस अटक गई।तस्वीर के बाईं तरफ एक लड़का खड़ा था।वह लड़का…बिल्कुल आरव जैसा दिखता था।आरव ने तस्वीर अपने चेहरे के पास कर ली।“ये कैसे हो सकता है?”तस्वीर के नीचे तारीख लिखी थी—1987आरव का जन्म 2000 में हुआ था।यह असंभव था।उसने तस्वीर पलट दी।पीछे सिर्फ एक नाम लिखा था—“आरव।”उसने डायरी के अगले पन्ने पलटे।वहाँ किसी ने जल्दी-जल्दी में लिखा था—“अगर कभी वह लड़का वापस आए…”“उसे सच मत बताना।”“उसे मंदिर तक मत जाने देना।”“और सबसे जरूरी…”आखिरी लाइन अधूरी थी।आरव ने पन्ना रोशनी के नीचे किया।कुछ शब्द धुंधले थे।उसने मोबाइल की फ्लैश ऑन की।अब शब्द साफ दिखाई दिए—“उसे यह मत बताना कि वह पहली बार यहाँ नहीं आया।”आरव के हाथ सुन्न पड़ गए।उसी समय बाहर किसी के दौड़ने की आवाज आई।कोई सड़क पर तेजी से भाग रहा था।आरव ने खिड़की से देखा।एक बच्चा।वही बच्चा।रघु।वह अंधेरे में भाग रहा था।आरव ने खिड़की खोल दी।“रघु!”बच्चा रुक गया।उसने पीछे मुड़कर देखा।और अचानक उसकी आँखें फैल गईं।“आपने मेरा नाम क्यों लिया?”आरव चौंक गया।“तुम ही तो रघु हो।”बच्चे ने सिर हिलाया।“नहीं।”“क्या?”“मैं रघु नहीं हूँ।”आरव को शाम की बात याद आ गई।“तो तुम कौन हो?”बच्चे ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला।लेकिन तभी मंदिर की घंटी बजी।टन…बच्चा डर गया।उसने आरव की तरफ देखा।“सुबह होने से पहले मंदिर मत जाना।”“क्यों?”बच्चा पीछे हटने लगा।“क्योंकि वहाँ…”वह रुक गया।फिर फुसफुसाया—“वहाँ तुम्हारा इंतजार कोई कर रहा है।”“कौन?”बच्चा अचानक दौड़ पड़ा।आरव खिड़की से बाहर झुककर चिल्लाया—“रुको!”लेकिन बच्चा अंधेरे में गायब हो चुका था।आरव कुछ सेकंड तक उसे ढूँढता रहा।फिर उसकी नजर जमीन पर पड़ी।जहाँ बच्चा खड़ा था, वहाँ कुछ गिरा हुआ था।आरव नीचे गया।वहाँ एक छोटी-सी लकड़ी की सीटी पड़ी थी।उसने सीटी उठाई।उस पर एक निशान बना था।एक गोल घेरा… जिसके बीच में आँख जैसी आकृति थी।उसी निशान को उसने पहले पुराने नक्शे में देखा था।और उसी निशान जैसा चिह्न मंदिर की दीवार पर भी बना था।आरव ने सीटी जेब में रख ली।वह वापस कमरे में आया।अब रात काफी गहरी हो चुकी थी।घड़ी में 1:02 AM था।आरव ने तय किया कि वह सुबह होते ही गाँव से निकल जाएगा।लेकिन तभी उसे कुछ सुनाई दिया।बहुत दूर से…जैसे कई लोग एक साथ धीरे-धीरे बोल रहे हों।वह खिड़की के पास गया।अंधेरे में उसे कई छोटी-छोटी रोशनियाँ दिखाई दीं।पहले एक।फिर दो।फिर पाँच।फिर दर्जनों।जैसे गाँव के लोग हाथों में लालटेन लेकर किसी दिशा में जा रहे हों।आरव ने कैमरा उठाया।ज़ूम किया।लोगों का एक जुलूस था।सभी लोग एक ही दिशा में जा रहे थे।मंदिर की तरफ।आरव ने कैमरे से रिकॉर्ड करना शुरू किया।फिर उसने देखा…जुलूस में एक आदमी ऐसा था जिसे देखकर उसके हाथ काँपने लगे।वह आदमी पीछे की तरफ चल रहा था।चेहरा नीचे झुका हुआ।लेकिन जैसे ही वह मंदिर के पास पहुँचा…उसने अपना चेहरा ऊपर उठाया।वह…आरव था।आरव पीछे हट गया।कैमरा उसके हाथ से गिर गया।स्क्रीन टूटने की आवाज आई।उसने दोबारा खिड़की से देखा।जुलूस गायब था।मंदिर के सामने कोई नहीं था।सिर्फ एक लालटेन जमीन पर जल रही थी।आरव ने कमरे का दरवाजा बंद किया।इस बार उसने कुंडी भी लगा दी।फिर उसने डायरी खोली।उसने आखिरी पन्ना खोजा।वहाँ अब एक नई लाइन दिखाई दे रही थी।जो पहले वहाँ नहीं थी।“जब वह अपना दूसरा चेहरा देख ले… तब समझना कि गाँव ने उसे पहचान लिया है।”आरव ने पन्ना छोड़ दिया।उसके पीछे से किसी ने फुसफुसाया—“आरव…”वह जम गया।धीरे-धीरे उसने पीछे देखा।कमरा खाली था।फिर वही आवाज—“तुम्हें अभी भी लगता है कि तुम पहली बार यहाँ आए हो?”आरव ने काँपती आवाज में पूछा—“कौन हो?”अंधेरे से एक आदमी बाहर आया।उसका चेहरा साफ दिखाई नहीं दे रहा था।आरव ने मोबाइल की बची हुई रोशनी उसकी तरफ की।आदमी ने अपना चेहरा उठाया।आरव की आँखें फैल गईं।वह आदमी बूढ़ा था।लेकिन चेहरा पहचानने में उसे एक पल भी नहीं लगा।वही बूढ़ा चायवाला।आरव पीछे हट गया।“आप यहाँ कैसे आए?”बूढ़े ने कोई जवाब नहीं दिया।उसने सिर्फ डायरी की तरफ देखा।“तुमने इसे खोल लिया।”“इसमें क्या लिखा है?”बूढ़े ने कहा—“तुम्हें सच जानना है?”“हाँ।”बूढ़ा धीरे-धीरे उसके पास आया।“तो पहले यह समझो…”उसने खिड़की की तरफ इशारा किया।“जिस गाँव को तुम बाहर देख रहे हो…”आरव ने खिड़की की तरफ देखा।बूढ़ा बोला—“वह भैरवपुर नहीं है।”आरव ने उसकी तरफ देखा।“तो फिर?”बूढ़े ने धीरे से कहा—“यह उसका साया है।”आरव कुछ समझ नहीं पाया।“साया?”“हाँ।”बूढ़ा बोला।“असली भैरवपुर जमीन के ऊपर नहीं है।”कमरे की हवा अचानक ठंडी हो गई।बूढ़े ने आगे कहा—“और जो लोग रात में गायब होते हैं…”वह रुक गया।आरव ने पूछा—“वे कहाँ जाते हैं?”बूढ़े ने उसकी आँखों में देखा।“वे कहीं नहीं जाते।”“फिर?”बूढ़े के चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।“वे उसी गाँव में चले जाते हैं…”“जिसे दुनिया ने बहुत साल पहले भुला दिया।”आरव ने धीरे से पूछा—“और मुझे क्यों लाया गया है?”बूढ़े ने जवाब नहीं दिया।उसने बस कमरे के कोने की तरफ देखा।आरव ने भी उसी दिशा में देखा।वहाँ एक पुराना आईना रखा था।आरव आईने के पास गया।उसमें उसका प्रतिबिंब दिखाई दे रहा था।लेकिन प्रतिबिंब…मुस्कुरा रहा था।जबकि आरव नहीं मुस्कुरा रहा था।आईने में दिखाई देने वाला दूसरा आरव धीरे-धीरे अपना हाथ उठाने लगा।उसने आईने के अंदर से एक उँगली अपने होंठों पर रखी।फिर उसने बहुत धीरे से कहा—“श्श्श… अभी मत बताना कि तुम कौन हो।”और उसी पल…आईना टूट गया।लेकिन टूटे हुए शीशे के हर टुकड़े में…आरव का चेहरा नहीं था।हर टुकड़े में एक अलग चेहरा था।और उन सभी चेहरों की आँखें…सीधे आरव को देख रही थीं।बाहर मंदिर की घंटी फिर बजी।टन…बूढ़े ने फुसफुसाकर कहा—“अब दूसरी रात शुरू हो गई है।”आरव ने घड़ी देखी।समय था—1:13 AM।और दीवार पर अपने आप एक नया वाक्य उभर रहा था—“छह नहीं…
अब सिर्फ पाँच रात बाकी हैं।”
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