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*डॉक्टर और सीईओ - भाग 1: पहली भेंट*
मुंबई के सबसे बड़े निजी अस्पताल, लाइफकेयर मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल की सातवीं मंजिल पर स्थित केबिन नंबर 704 में डॉ. अनन्या शर्मा अपने मरीजों की फाइलें देख रही थीं। उम्र तीस वर्ष, आँखों पर पतला चश्मा, सफेद कोट और चेहरे पर एक अजीब सी गंभीरता। वह शहर की सबसे युवा हृदय रोग विशेषज्ञ थीं। लोग कहते थे कि उनके हाथों में जादू है, पर अनन्या जानती थी कि जादू हाथों में नहीं, धैर्य में होता है।
उसी दिन अस्पताल के बोर्ड रूम में एक आपातकालीन बैठक बुलाई गई थी। अस्पताल का अधिग्रहण करने वाली कंपनी, आर्यन ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज के मुख्य कार्यकारी अधिकारी, सीईओ आर्यन मल्होत्रा स्वयं आने वाले थे। आर्यन मल्होत्रा, उम्र पैंतीस वर्ष, भारत के सबसे कम उम्र के अरबपति उद्यमियों में से एक। तकनीक, रियल एस्टेट और अब स्वास्थ्य क्षेत्र में भी उनका साम्राज्य फैल रहा था।
अनन्या को इस अधिग्रहण से कोई लेना-देना नहीं था। उसका काम मरीजों का इलाज करना था, न कि शेयर बाजार के आंकड़े देखना। इसलिए जब उसकी सहेली डॉ. निधि ने कहा, "अनन्या, सीईओ आ रहा है, चल नीचे, सबको बुलाया है," तो अनन्या ने मना कर दिया। "मुझे ओपीडी देखनी है, निधि। मुझे इन कॉर्पोरेट लोगों में कोई रुचि नहीं है।"
पर नियति को कुछ और ही मंजूर था।
दोपहर के दो बजे, अनन्या वार्ड राउंड पर थी। वार्ड नंबर 3 में एक वृद्ध महिला भर्ती थीं, जिनकी एंजियोप्लास्टी उसी सुबह हुई थी। अनन्या उनके पास खड़ी उनकी रिपोर्ट समझा रही थी, तभी पीछे से एक तेज आवाज आई, "ये क्या लापरवाही है?"
अनन्या ने मुड़कर देखा। एक लंबा, गठीला व्यक्ति, गहरे नीले रंग के सूट में, आँखों पर महंगा चश्मा लगाए खड़ा था। उसके साथ अस्पताल के डायरेक्टर और चार-पाँच लोग और थे। वह व्यक्ति वार्ड की ओर इशारा करते हुए कह रहा था, "मैंने आपसे कहा था कि मेरे आने से पहले इस विंग को खाली करवाया जाए। यहाँ धूल है, बदबू है। एक सीईओ के लिए यह वातावरण उपयुक्त नहीं है।"
डायरेक्टर हकलाते हुए बोले, "सर, ये जनरल वार्ड है, यहाँ मरीज..."
आर्यन ने उसकी बात काट दी, "मुझे मरीजों से कोई समस्या नहीं है, मुझे अव्यवस्था से समस्या है।"
अनन्या को यह बात बहुत बुरी लगी। वह आगे बढ़ी और बिना डरे बोली, "क्षमा कीजिए, पर यह अस्पताल है, कोई फाइव स्टार होटल नहीं। यहाँ धूल नहीं, जीवन है। और जहाँ तक बदबू की बात है, वह दवाओं और रोगाणुनाशकों की गंध है, जो आपके सूट के परफ्यूम से कहीं अधिक पवित्र है।"
पूरे वार्ड में सन्नाटा छा गया। डायरेक्टर का चेहरा पीला पड़ गया। निधि ने पीछे से अनन्या की बाजू खींची, पर अनन्या वहीं खड़ी रही।
आर्यन मल्होत्रा ने धीरे-धीरे अपना चश्मा उतारा और पहली बार अनन्या की ओर सीधे देखा। उसकी आँखों में क्रोध नहीं, आश्चर्य था। आज तक किसी ने उससे इस तरह बात नहीं की थी।
"आप कौन हैं?" आर्यन ने पूछा।
"मैं डॉ. अनन्या शर्मा, कार्डियोलॉजी विभाग," अनन्या ने उतनी ही दृढ़ता से उत्तर दिया।
आर्यन कुछ क्षण उसे देखता रहा, फिर बिना कुछ कहे वहाँ से चला गया। डायरेक्टर उसके पीछे भागे।
निधि ने अनन्या से कहा, "तू पागल हो गई है! जानती है वो कौन था? वो अब इस अस्पताल का मालिक है। वो तुझे नौकरी से निकलवा देगा।"
अनन्या ने मुस्कुराते हुए कहा, "नौकरी से निकाल देगा तो दूसरा अस्पताल मिल जाएगा, पर अगर मैं आज चुप रहती, तो अपने आप को कभी क्षमा नहीं कर पाती।"
शाम को अनन्या अपना केबिन बंद करके निकल ही रही थी कि उसे रिसेप्शन से फोन आया, "डॉ. अनन्या, आपको बोर्ड रूम में बुलाया गया है। मिस्टर मल्होत्रा आपसे मिलना चाहते हैं।"
अनन्या का दिल एक क्षण के लिए जोर से धड़का। उसे लगा, अब उसे इस्तीफा देना पड़ेगा। वह बोर्ड रूम में पहुँची। वहाँ केवल आर्यन अकेला बैठा था। मेज पर दो कप कॉफी रखी थी।
"बैठिए, डॉक्टर शर्मा," आर्यन ने कहा। उसकी आवाज अब सुबह जैसी कठोर नहीं थी।
अनन्या बैठ गई।
आर्यन ने कहा, "सुबह के लिए मैं क्षमा चाहता हूँ। आप सही कह रही थीं। मैं पिछले दो महीनों से केवल बैलेंस शीट देख रहा था। मैं भूल गया था कि अस्पताल का असली मूल्य उसकी दीवारों में नहीं, उसके डॉक्टरों में है।"
अनन्या चुप रही।
आर्यन ने आगे कहा, "मैंने आपकी प्रोफाइल देखी। आपने एम्स से पढ़ाई की है, आपकी रिसर्च पेपर्स अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में छपे हैं। आप यहाँ क्यों हैं? आप तो लंदन या अमेरिका में हो सकती थीं।"
अनन्या ने उत्तर दिया, "क्योंकि मेरे पिता इसी शहर में एक छोटे से क्लिनिक में प्रैक्टिस करते थे। वह कहते थे कि भारत में अच्छे डॉक्टरों की कमी नहीं, अच्छे इरादों की कमी है। मैं वहीं इरादा लेकर यहाँ हूँ।"
आर्यन मुस्कुराया, पहली बार दिल से। "मेरे पिता भी यही कहते थे। पर मैं बड़ा होकर पैसा कमाने लगा और उनका इरादा भूल गया।"
दोनों के बीच कुछ देर शांति रही। फिर आर्यन ने कहा, "मैं चाहता हूँ कि आप इस अस्पताल के नए कार्डियक सेंटर की प्रमुख बनें। मैं आपको पूरी स्वतंत्रता दूँगा। कोई कॉर्पोरेट दबाव नहीं।"
अनन्या ने आश्चर्य से देखा, "आप मुझे, सुबह आपसे बहस करने के बाद, प्रमोशन दे रहे हैं?"
"मैं बहस करने वाले लोगों को पसंद करता हूँ, जी हजूर कहने वालों को नहीं," आर्यन ने कहा। "तो क्या आपका उत्तर हाँ है?"
अनन्या ने कुछ सोचा और कहा, "मेरी एक शर्त है।"
"कहिए।"
"जनरल वार्ड को कभी बंद नहीं किया जाएगा। और हर महीने, आपके ग्रुप के लाभ का एक प्रतिशत गरीब मरीजों के मुफ्त इलाज के लिए रखा जाएगा।"
आर्यन ने हँसते हुए हाथ आगे बढ़ाया, "स्वीकार है, डॉक्टर साहिबा।"
अनन्या ने भी हाथ मिलाया। यह केवल एक समझौता नहीं था, यह दो अलग-अलग दुनियाओं, एक डॉक्टर की संवेदना और एक सीईओ की महत्वाकांक्षा की पहली भेंट थी।
उस रात जब अनन्या घर लौटी, तो उसे लगा कि आज अस्पताल की हवा कुछ बदल गई है। और आर्यन जब अपनी गाड़ी में बैठा, तो पहली बार उसे लगा कि उसने केवल एक अस्पताल नहीं खरीदा, एक दृष्टिकोण भी पाया है।
कहानी अभी शुरू ही हुई थी।
*[क्रमशः - भाग 2 में: क्या अनन्या नया कार्डियक सेंटर संभाल पाएगी? और आर्यन के बोर्ड मेंबर्स इस फैसले का विरोध क्यों करेंगे?]*