Roshni, what a struggle of life in Hindi Drama by RAAHULL SHARMA books and stories PDF | रोशनी जिंदगी की कैसी कशमकश - 12

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रोशनी जिंदगी की कैसी कशमकश - 12

आदित्य की खुशी का ठिकाना नहीं था। बरसों पुराना यार, जिसने जवानी के दिनों में कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया था, वह वापस आ रहा था। रात भर के खौफनाक मंजर के बाद, मोहन जोगी के आने की खबर किसी ठंडी फुहार की तरह आई थी।
सुबह की पहली किरण के साथ ही आदित्य ने पूरे घर को सजाने का हुक्म दे दिया। रश्मि के चेहरे पर भी दिनों बाद मुस्कान लौटी थी। रसोई में पकवानों की खुशबू महकने लगी और रात की वह दहशत, वह मिट्टी के निशान और वह डरावना खत... जैसे सब एक धुंधली याद बनकर पीछे छूट गए हों।
स्वागत की तैयारी और एक अनसुनी आहट
हवेली के मुख्य द्वार को फूलों से सजाया गया था। आदित्य बार-बार अपनी घड़ी देख रहे थे। मुन्ना मामा भी अपनी रिवॉल्वर बेल्ट से निकालकर अलमारी में रख चुके थे, क्योंकि आज घर में दुश्मन नहीं, दोस्त आने वाला था।
तभी हवेली के बाहर एक काली गाड़ी आकर रुकी।
आदित्य दौड़कर बाहर निकले। गाड़ी का दरवाज़ा खुला और बाहर निकला एक लंबा, रोबीला शख्स—वही जाना-पहचाना चेहरा, वही हँसती हुई आँखें।
"मोहन!" आदित्य ने चिल्लाकर उसे गले लगा लिया।
"आदित्य मेरे भाई! कैसा है तू?" मोहन की आवाज़ में वही पुरानी खनक थी।
पीछे से मोहन की पत्नी और उसके दो बच्चे भी उतरे। रश्मि और कोमल मामी ने आरती उतारकर सबका स्वागत किया। माहौल पूरी तरह बदल चुका था। हवेली जो कल तक मातम और डर के साये में थी, आज ठहाकों से गूँज रही थी।
आदित्य के घर में खुशियों का माहौल था। रश्मि ने जैसे ही मोहन की आरती उतारी और कोमल मामी ने तिलक लगाया, पूरा बरामदा हंसी-ठिठोली से गूँज उठा। मोहन एक-एक करके सबसे बड़े गर्मजोशी से मिल रहा था। उसने मुन्ना मामा के गले लगकर उनकी रिवॉल्वर पर चुटकी ली और आदित्य के कंधे पर हाथ रखकर पुरानी यादें ताज़ा करने लगा।
लेकिन जैसे ही मोहन की नज़र पीछे खड़ी रोशनी पर पड़ी, वह एक पल के लिए ठिठक गया। उसके चेहरे पर डर नहीं, बल्कि एक गहरा अचंभा और हैरानी थी। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं,
मोहन ने जब रोशनी को देखा, तो उसके चेहरे पर हैरानी के भाव साफ नजर आ रहे थे। उसने बड़े ही दोस्ताना अंदाज में आदित्य का कंधा थपथपाया और मुस्कुराते हुए पूछा, "अरे आदित्य, यह प्यारी सी लड़की कौन है? सच कहूं तो इसे देखकर मैं थोड़ा चकरा गया हूं, क्योंकि इसे तो मैं पहली बार देख रहा हूं!"
आदित्य ने बड़े गर्व और प्यार से रोशनी की ओर देखा और कहा, "अरे मोहन, यह मेरी बेटी है, रोशनी।"
मोहन की मुस्कुराहट एक पल के लिए रुकी और उसने थोड़ा अचरज से पूछा, "तेरी बेटी? लेकिन भाई, जहाँ तक मुझे याद है, तेरा तो सिर्फ एक ही बेटा था। ये... ये दूसरी संतान कब हुई? तूने तो मुझे कभी बताया ही नहीं!"
आदित्य का चेहरा थोड़ा गंभीर हुआ, लेकिन उसकी आँखों में रोशनी के लिए वही पिता वाला प्यार था। उसने मोहन को सोफे पर बैठाया और शांति से अपनी कहानी सुनानी शुरू की।
नदी का वह किनारा और एक नई ज़िंदगी
मोहन ने आदित्य की पूरी बात बहुत ध्यान से सुनी। जैसे-जैसे आदित्य नदी के किनारे और उस मासूम बच्ची के मिलने का किस्सा सुना रहा था, मोहन का चेहरा भावुक होता गया। उसकी आँखों में एक अजीब सी नमी आ गई और वह कुछ पलों के लिए खामोश हो गया।
उसने एक लंबी और गहरी साँस ली, फिर आदित्य के दोनों हाथ अपने हाथों में थाम लिए। उसका गला भर आया था।
मोहन भावुक होकर बोला:
"आदित्य यार... तू सच में बेमिसाल है। आज के जमाने में जहाँ लोग अपनों को छोड़ देते हैं, तूने एक अनजान बच्ची को कलेजे से लगा लिया। तेरी अमीरी तो पूरी दुनिया देखती है, पर तेरा दिल कितना बड़ा है, यह आज मैंने देख लिया। तू सच में पैसों का ही अमीर नहीं है भाई, तेरा दिल तो उससे भी कहीं ज्यादा बड़ा है। तूने वाकई बहुत नेक काम किया है।"
मोहन ने फिर रोशनी की तरफ देखा, उसकी आँखों में अब और भी ज्यादा प्यार था। उसने रोशनी को अपने पास बुलाया और बड़े लाड़ से कहा:
"बेटा रोशनी, आज से मैं सिर्फ तुम्हारे पापा का दोस्त नहीं, तुम्हारा 'मोहन ताऊ' भी हूँ। और आदित्य, तूने आज मुझे गर्व करने का एक और मौका दे दिया। धन्य है रश्मि भाभी भी, जिन्होंने बिना सोचे एक अनजान बच्ची को अपनी ममता दे दी।"
हवेली का माहौल, जो सुबह तक किसी अनजाने डर की गिरफ्त में था, अब पूरी तरह से सकारात्मकता और भावनाओं से भर गया था। रश्मि और कोमल मामी की आँखों में भी खुशी के आँसू थे।
आदित्य ने मुस्कुराते हुए मोहन के कंधे पर हाथ रखा, "बस कर भाई, अब मुझे और शर्मिंदा मत कर। यह सब तो उस ऊपर वाले की मर्जी थी।"
भावुक बातों और यादों के इस सिलसिले के बीच मोहन ने अचानक अपनी घड़ी देखी और उसे कुछ याद आया। उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान के साथ अपने परिवार के प्रति जिम्मेदारी का भाव भी आ गया।
उसने आदित्य के हाथ थामे और बड़े सहज अंदाज़ में कहा:
"अरे भाई! बातों-बातों में तो मैं वक्त का अंदाज़ा ही नहीं लगा पाया। मेरी माँ और बाबूजी घर पर हमारा बेसब्री से इंतज़ार कर रहे होंगे। उन्हें अच्छी तरह पता है कि मोहन इंडिया उतरेगा तो सबसे पहले अपने यार आदित्य के घर ही जाएगा। काफी देर हो गई है भाई, अब हमें निकलना चाहिए।"
आदित्य ने उसे रोकने की कोशिश की, "अरे मोहन, खाना तो खाकर जा भाई! रश्मि ने इतनी तैयारी की है।"
लेकिन मोहन ने बड़े प्यार से मना करते हुए कहा, "नहीं भाई, माँ के हाथ के खाने का वादा करके आया हूँ। अगर आज वहाँ नहीं पहुँचा तो वह नाराज़ हो जाएँगी। फिर किसी दिन फुर्सत से परिवार समेत आऊँगा।"
इसके बाद मोहन ने रश्मि भाभी और मुन्ना मामा से विदा ली। उसने रोशनी के सिर पर हाथ रखकर उसे ढेर सारा आशीर्वाद दिया।
मोहन, उसकी पत्नी और दोनों बच्चे मुस्कुराते हुए अपनी कार में जाकर बैठ गए। जैसे ही गाड़ी स्टार्ट हुई, मोहन ने खिड़की से हाथ हिलाकर सबको 'बाय' कहा। गाड़ी धीरे-धीरे हवेली के बड़े फाटक से बाहर निकल गई और आदित्य का परिवार तब तक बाहर खड़ा रहा जब तक कि गाड़ी आँखों से ओझल नहीं हो गई।
हवेली में अब एक अजीब सी शांति थी, लेकिन यह शांति कल रात जैसी डरावनी नहीं थी, बल्कि एक पुराने दोस्त के