मजूमदार विला
मजूमदार विला का अब किसी युद्ध के मैदान जैसा लग रहा था। यह एक आलीशान बंगला था, लेकिन आज इसकी दीवारों से डर और सस्पेंस की गंध आ रही थी।
मजूमदार विला के ऊंचे ऊंचे लोहे के गेट के बाहर मीडिया की ओबी वैन्स का तांता लगा था।
सैंकड़ों कैमरों की फ्लैश लाइट रात के अंधेरे को चीर रही थी बड़े-बड़े नेशनल न्यूज़ चैनल के पत्रकार चिल्ला चिल्लाकर रिपोर्टिंग कर रहे थे
क्या सुजॉय मजूमदार की मौत के पीछे शहर के किसी बड़े गिरोह का हाथ है। क्या सुजॉय मजूमदार ने अपनी बदनामी से बचने के लिए यह सुसाइड किया है क्या सुजॉय।
मजूमदार कुछ जानते थे या। वह भी अपनी बेटी के काले कारनामों में शामिल थे क्या कारण हो सकता, है जो सुजॉय मजूमदार जैसे बहुत बड़े मीडिया मलिक ने यह कदम उठाया
या फिर शहर की अब नामी व्यक्ति सुरक्षित नहीं है। किसी न किसी दिन किसी न किसी नामी व्यक्ति की हत्या या अपहरण की घटना अब, इस शहर में आम बात हो गई है।
प्रशासन खामोश क्यों है प्रशासन की नाक के नीचे यह सब हो रहा है कहीं यहां की पुलिस अब किसी काम की नहीं है
अंदर का नज़ारा और भी भयावह था। हॉल में मजूमदार के रिश्तेदार और बिजनेस पार्टनर्स सफेद चेहरों के साथ खड़े थे।
सिसकियों की आवाज़ें गूँज रही थीं, लेकिन उन सिसकियों में दुख कम और 'खौफ' ज्यादा था।
कमरे में खड़ा हर शख्स एक दूसरे को ऐसे देख रहा था कि मानो अगला नंबर किसका हो सकता है उधर मजूमदार की पत्नी सोफे पर बेसुध पड़ी थीं, जबकि उनके बिजनेस पार्टनर्स एक कोने में फुसफुसा रहे थे।
तभी गेट पर कमिश्नर भाटी की गाड़ी रुकी पीछे-पीछे दिग्विजय अब्दुल हकीम और चट्टोपाध्याय की गाड़ी धूल उड़ती हुई आई।
जैसे ही ये तीनों 'ताकतवर पिता' गाड़ी से उतरे, मीडिया उनकी तरफ टूट पड़ा।
रिपोर्टर: "दिग्विजय जी, क्या सुजॉय मजूमदार ने आपके किसी राज को छिपाने के लिए खुदकुशी की है?"
दूसरा रिपोर्टर: "अब्दुल हकीम साहब, क्या ये गैंगवार की शुरुआत है?"
अब्दुल हकीम ने अपनी ठंडी नज़रों से रिपोर्टर को देखा, तो वह पीछे हट गया। भाटी ने पुलिस बल को रास्ता साफ करने का इशारा किया।
वे सब उस जगह की ओर बढ़े जहाँ सफेद चादर से ढकी सुजॉय की लाश पड़ी थी।अंकुर और पंखुड़ी सबसे पीछे थे।
जैसे ही कमिश्नर भाटी उस हॉल में पहुंचे शहर के नामचीन लोग उनके पास पहुंच गए।मजूमदार विला का हॉल लोगों से खचाखच भरा था।
बड़े-बड़े राजनेता भाटी का रास्ता रोककर सवाल पूछ रहे थे, शहर के नामी बिजनेसमैन बड़े-बड़े कलाकार संगीतकार।
उनके कान में अपनी सुरक्षा की गुहार लगा रहे थे। लेकिन भाटी की आँखें इन चेहरों के पीछे किसी और को तलाश रही थीं।
और वह तलाश थी सुजॉय मजूमदार के
कमिश्नर भाटी की अनुभवी आंखें हॉल में मौजूद हर कृपया सुधार रसूखदार चेहरे को स्कैन कर रही थी लेकिन वह चेहरा कहीं नहीं था जिसकी उन्हें सबसे ज़्यादा तलाश थी—सुरेश नामदानी।
सुरेश सुजॉय का कोई रिश्तेदार या नौकर नहीं था बल्कि उनके सबसे बड़े बिजनेस पार्टनर थे सुजॉय की मीडिया कंपनी में 35% हिस्सेदारी के मालिक था।
सुरेश एक नाम नहीं ब्रांड था वह शहर का सबसे रईस व्यक्तियों में एक थे शराब कारोबार से लेकर होटल बिजनेस यूनिवर्सिटी अस्पताल इंफ्रास्ट्रक्चर रियल एस्टेट हर क्षेत्र में उसका कारोबार फैला था।
अपने सबसे पुराने पार्टनर और 'सबसे अच्छे दोस्त' की मौत पर मौजूद नहीं था। यह अनुपस्थिति किसी गूँजती हुई चेतावनी जैसी थी।
भाटी ने दांत पीसते हुए पास खड़े एक सिपाही को इशारे से बुलाया, "नामदानी कहाँ है? उसके बंगले पर फोन लगाया?"
सिपाही सर कोई जवाब नहीं दे रहा है रिंग बार-बार जा रही है पर कोई फोन रिसीव नहीं कर रहा है।
कमिश्नर साहब बहुत ही आश्चर्य में थे कि ना तो सुरेश जी हैं और नहीं उसके दोनों लड़के मानव और अभिमान।
पर उन्होंने गौर से देखा तो सोफे पर एक लेडी बैठी थी सफेद साड़ी में मालविका नामदानी जो बिल्कुल सुजॉय की पत्नी के बगल में थी।
फिर समझ में भाभी ने अपने सबसे भरोसेमंद पंखुड़ी और अंकुर को अपने पास बुलाया और उनसे कहा पंखुड़ी अंकुर से निकले वह सीधा पता करो कि सुरेश और उसके दोनों लड़के कहां है।
पंखुड़ी और अंकुर ने सुरेश का नाम पहली बार सुना था इसलिए वह थोड़ी, आश्चर्य हुए कौन है यह और कमिश्नर साहब हमें उसके बारे में ऐसा क्यों बोल।
रहे हैं तब उन्होंने उसकी थोड़ी जानकारी ली उनसे पूछा कमिश्नर साहब यह कौन है तो कमिश्नर साहब ने सब कुछ बताया तो यह बात सुनकर चोक गए।
सुरागों की कशमकश
अंकुर और पंखुड़ी का बहुत ही गहरी कश्मकश में थे एक तरफ उनका सबसे बड़ा दुश्मन अंधक था तो दूसरी तरफ वह नकली चिंकी और जिसके हाथ पैर काले निशान थे वह व्यक्ति और अब सुरेश नामदानी
और खुद कमिश्नर भाटी बिना किसी को बताएं मजूमदार विला के सातवें माले पर पहुंच जाते हैं जहां से सुजॉय ने सुसाइड किया था।
कमिश्नर भाटी देखते हैं क्या सच में सुजॉय ने सुसाइड किया था या किसी ने उसे धक्का दिया था वह उसी का अनुभव कर रहे होते हैं तभी।
उनकी नजर एक शख्स पर पड़ती है जो बिल्डिंग एक कोने में खड़ी होकर किसी से फोन पर बात करती हैं वो और कोई नहीं।
बल्कि सुजॉय मजूमदार की पर्सनल अकाउंटेड हंसिका राय चौबे थी।
कमिश्नर भाटी उसे देखकर एकदम से चौंक जाते हैं
छत का सन्नाटा
जैसे ही उनकी नज़र कोने में खड़ी उस महिला पर पड़ी, उनकी भौहें तन गईं। वह कोई अजनबी नहीं थी।
कमिश्नर भाटी हंसिका तुम यहां क्या कर रही हो ?" भाटी ने भारी आवाज़ में पूछा। वह हंसिका को अच्छी तरह से जानते थे।
सुजॉय के बिजनेस और अकाउंट्स के सिलसिले में उनकी पहले भी दो-चार बार मुलाकात हो चुकी थी।
हंसिका हड़बड़ा गई, उसने जल्दी से मोबाइल कान से हटाया उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थी। भाटी एक कदम आगे बड़े और कड़ाई से पूछा, "तुम यहाँ इस वक्त क्या कर रही हो और इतनी घबराहट में किससे बात कर रही हो?"
हंसिका के होंठ कांपे, उसने हकलाते हुए कहा"सर... सर मैं... मैं 'समयोग' सर से बात कर रही हूँ।"
यह नाम सुनते ही कमिश्नर भाटी के पैरों तले जमीन खिसक गई। वह ठिठक कर वहीं रुक गए। उनके चेहरे पर अविश्वास के भाव थे।
"समयोग?" भाटी ने लगभग चिल्लाते हुए कहा। हंसिका तुम्हें क्या लगता है वह यहां आएगा? अपने पिता की मौत पर? वही समयोग जो 10 साल पहले एक लड़की के पीछे
शहर का सबसे रईस और सुजॉय का 35% का पार्टनर सुरेश नामदानी अपने बेटों (मानव और अभिमान) के साथ कहाँ गायब है? उनकी पत्नी मालविका तो विला में मौजूद हैं, लेकिन इन तीनों पुरुषों का गायब होना क्या यह इशारा करता है कि वे भी सुजॉय की मौत की साज़िश में शामिल हैं या खुद किसी बड़े खतरे में हैं?