Mitalika - Ek Adhuri Prem Kahani - Part 16 in Hindi Horror Stories by fiza saifi books and stories PDF | Mitalika - Ek Adhuri Prem Kahani - Part 16

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Mitalika - Ek Adhuri Prem Kahani - Part 16

समीर ने सख्त आवाज में कहा. लेकिन तू अपनी हालत देख! तू अभी- अभी Hospital से लौटा है और रिया अभी भी वहीं पडी है!

विवेक ने बीच में टोकते हुए कहा, हम कोई और रास्ता निकाल सकते हैं, लेकिन वहाँ जाना मतलब मौत के मुँह में जाना है!

फिर उसने समीर की तरफ देखा—" विवेक, तू कुछ बोलता क्यों नहीं? तू समझ रहा है न ये कितना खतरनाक है!

विवेक ने बारी- बारी से अक्षय और समीर की तरफ देखा. उसके चेहरे पर बेचैनी साफ दिखाई दे रही थी.

अक्षय. क्या सच में कोई और रास्ता नहीं निकल सकता? उसने धीमी लेकिन उम्मीद भरी आवाज में कहा. हम किसी सिद्ध तांत्रिक से मिलेंगे. शायद वो कोई उपाय बता दे. कोई ऐसा रास्ता, जिसमें तुझे अपनी जान जोखिम में न डालनी पडे.

कुछ पल के लिए कमरे में खामोशी छा गई. अक्षय की आँखों में एक दर्द- भरी परछाईं उभरी. उसने धीरे से सिर झुका लिया.

विवेक. उसकी आवाज भारी हो गई, तू भूल रहा है. हम पहले भी एक बाबा से मिले थे.

विवेक का चेहरा अचानक सख्त पड गया. उस घटना की याद आते ही तीनों के मन में एक सिहरन- सी दौड गई.

उनकी जान चली गई थी. अक्षय ने मुश्किल से शब्द निकाले, और उसकी वजह हम थे.

समीर की मुट्ठियाँ अपने आप भींच गईं. अक्षय आगे बोला—“ मैं आज तक खुद को उस बात के लिए माफ नहीं कर पाया. वो हमारी मदद करना चाहते थे. लेकिन बदले में उन्हें अपनी जान गंवानी पडी.

उसकी आवाज भर्रा गई. मैं किसी और की जिंदगी खतरे में नहीं डाल सकता. अब नहीं.

विवेक कुछ कहना चाहता था, लेकिन शब्द उसके गले में ही अटक गए. लेकिन अकेले जाना भी कोई हल नहीं है! समीर लगभग चिल्ला पडा. तुझे क्या लगता है? अगर तुझे कुछ हो गया तो हम चैन से जी पाएँगे? अक्षय ने उसकी तरफ देखा. उसकी आँखों में डर नहीं था. बस एक अजीब- सी स्वीकृति थी. हो सकता है मैं वापस आ जाऊँ. वह धीमे से बोला. और हो सकता है नहीं भी. बस! समीर ने गुस्से में मेज पर मुक्का मार दिया.

धडाम! आवाज पूरे कमरे में गूँज उठी, बार- बार मौत की बात मत कर! उसकी आँखें लाल हो चुकी थीं. तू हमारा दोस्त है. कोई बलि का बकरा नहीं! अक्षय चुप रहा. विवेक ने महसूस किया कि बात अब सिर्फ प्रतापगढ जाने की नहीं रह गई थी.

असल डर प्रतापगढ नहीं था. असल डर था कि कहीं यह सफर उनसे अक्षय को हमेशा के लिए न छीन ले.

कमरे में फिर सन्नाटा फैल गया. बाहर रात और गहरी हो चुकी थी. और उस गहरी रात की तरह ही, उनके सामने खडा रास्ता भी अंधेरे में डूबा हुआ था. किसी को नहीं पता था कि प्रतापगढ में उनका इंतजार क्या कर रहा था. लेकिन इतना जरूर था कि वहाँ जाने के बाद उनकी जिंदगी पहले जैसी नहीं रहने वाली थी.

तो फिर हम तीनों साथ चलेंगे. जो होगा, देखा जाएगा! समीर ने दृढ आवाज में कहा.

उसकी आँखों में डर तो था, लेकिन उससे कहीं ज्यादा अपने दोस्त को अकेला न छोडने का जज्बा था.

अक्षय कुछ पल उसे देखता रहा. फिर उसने शांत स्वर में कहा,

समीर. यहाँ रहकर रिया और बाकी सबका ख्याल भी तो रखना होगा. इसलिए ये मुमकिन नहीं है.

कैसे मुमकिन नहीं है, अक्षय? कम से कम हममें से कोई एक तो तेरे साथ चल सकता है ना! समीर ने जिद भरे स्वर में कहा.

अक्षय कुछ बोल पाता, उससे पहले विवेक अपनी कुर्सी से उठ खडा हुआ.

उसने दोनों की तरफ देखा और फिर दृढ आवाज में बोला,

अक्षय अकेला नहीं जाएगा.

कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया.

मैं उसके साथ चलूँगा.

विवेक. अक्षय ने कुछ कहना चाहा, लेकिन विवेक ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया.

नहीं, मेरी बात सुन. तू चाहे जितना मना कर ले, लेकिन मैं तुझे अकेले उस नरक में नहीं जाने दूँगा.

समीर तुरंत बोला, तो फिर मैं भी चलता हूँ!

नहीं! इस बार विवेक की आवाज कठोर थी.

समीर चौंककर उसकी तरफ देखने लगा.

विवेक उसके पास आया और उसके कंधे पर हाथ रख दिया.

समीर, किसी का यहाँ रहना भी उतना ही जरूरी है जितना हमारा वहाँ जाना.

लेकिन—”

मेरी बात पूरी सुन, विवेक ने उसे बीच में ही रोक दिया. रिया अभी अस्पताल में है. उसकी देखभाल कौन करेगा? अगर यहाँ कुछ और हुआ, अगर कोई नई मुसीबत आई, तो हमें खबर कौन देगा?

समीर चुप हो गया.

विवेक आगे बोला,

मैं अक्षय के साथ जाऊँगा. और तू यहाँ रहकर रिया का ख्याल रखेगा. साथ ही यहाँ के हालात पर भी नजर रखेगा और हमें हर बात से आगाह करता रहेगा.

अक्षय ने पहली बार सहमति में सिर हिलाया.

विवेक सही कह रहा है, उसने शांत स्वर में कहा. मुझे वहाँ किसी ऐसे इंसान की जरूरत है जिस पर मैं अपनी जान से भी ज्यादा भरोसा कर सकूँ. और यहाँ भी किसी भरोसेमंद आदमी का रहना जरूरी है.

समीर की मुट्ठियाँ कस गईं.

उसे यह फैसला बिल्कुल पसंद नहीं आया था.

मतलब तुम दोनों मुझे यहीं छोडकर चले जाओगे? उसने धीमे लेकिन नाराज स्वर में पूछा.

छोडकर नहीं, विवेक ने कहा, जिम्मेदारी देकर.

रिया की सुरक्षा. यहाँ के हालात. और हमसे संपर्क बनाए रखना. ये सब तेरे बिना मुमकिन नहीं है.

समीर ने कुछ पल तक दोनों को देखा.

फिर उसने गहरी साँस छोडी और कुर्सी पर वापस बैठ गया.

ठीक है. उसने अनमने ढंग से कहा. लेकिन एक बात याद रखना. अगर मुझे लगा कि तुम दोनों किसी मुसीबत में हो, तो मैं किसी की नहीं सुनूँगा और सीधे प्रतापगढ पहुँच जाऊँगा.

उसकी बात सुनकर विवेक के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई.

ये तो हमें पहले से पता है.

लेकिन अक्षय मुस्कुराया नहीं.

उसकी नजरें कहीं दूर टिकी हुई थीं.

जैसे उसका मन पहले ही प्रतापगढ की उन वीरान गलियों में पहुँच चुका हो.

जहाँ शायद उनका इंतजार सिर्फ जवाब नहीं, बल्कि एक भयानक सच कर रहा था.


तीनों की ज़िंदगी की वो रात बाकी रातों से बिल्कुल अलग थी। रात की खामोशी के पीछे जैसे कोई बड़ा तूफ़ान करवट ले रहा था। आने वाले कल और उससे जुड़े हालात का सामना करने के लिए तीनों तैयार तो थे, लेकिन दिल के किसी कोने में एक डर लगातार दस्तक दे रहा था—आखिर उन्हें किस दिशा में जाना है, क्या करना है और इस सफ़र का अंत कहाँ होगा… किसी को कुछ नहीं पता था।

विवेक और अक्षय पूरी रात प्रतापगढ़ जाने वाले रास्तों को तलाशते रहे। नक्शे पर एक-एक रास्ते को देखते, संभावनाओं पर बात करते और हर छोटी-बड़ी चीज़ की तैयारी करते रहे। उनके चेहरों पर डर नहीं, बल्कि एक अजीब-सा दृढ़ निश्चय था। जैसे उन्हें मालूम हो कि सुबह होने के बाद उनकी ज़िंदगी पहले जैसी नहीं रहने वाली।

वहीं दूसरी तरफ़, समीर को उन्होंने बार-बार रिया और माँ की खैरियत के बारे में अपडेट लेते रहने की हिदायत दी। हर थोड़ी देर में उनसे खबर लेने को कहते, मानो उनके लिए इस वक्त सबसे बड़ी चिंता यही हो कि पीछे घर में सब सुरक्षित हैं या नहीं।

समीर अब तक काफी हद तक असमंजस में पड़ चुका था। वह चुपचाप दोनों की बातें सुन रहा था और उनकी हर हिदायत मान रहा था। लेकिन उसके भीतर सवालों का एक तूफ़ान उमड़ रहा था। वह जानता था कि दोनों किसी बेहद खतरनाक रास्ते पर कदम रखने जा रहे हैं… ऐसा रास्ता, जहाँ से लौटकर आना शायद उतना आसान नहीं होगा।

फिर भी उसने अपने डर को अपने चेहरे पर आने नहीं दिया।

वह बस मन ही मन भगवान से एक ही दुआ कर रहा था—

“हे भगवान… इन दोनों को कुछ मत होने देना। इन्हें अपना काम पूरा करने की ताकत देना। मितालिका को उसके मकसद में कामयाब मत होने देना… और मेरे इन दोनों दोस्तों को सही-सलामत वापस ले आना।”

समीर की आँखों के सामने रिया का चेहरा भी बार-बार घूम रहा था। उसकी हालत को लेकर उसका दिल और भी बेचैन था।

“बस रिया जल्दी ठीक हो जाए… और ये दोनों भी वापस आ जाएँ।”

यही सोचते-सोचते उसकी आँखें नम हो गईं।

उधर घड़ी की सुइयाँ रात को पीछे छोड़ते हुए सुबह की तरफ़ बढ़ रही थीं… लेकिन उन तीनों के लिए ये सिर्फ़ एक रात का ख़त्म होना नहीं था।

ये एक ऐसे तूफ़ान की शुरुआत थी, जो उनकी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल देने वाला था।

रात के जाने किस पहर, थकान और बेचैनी के बीच तीनों की आँखें कुछ देर के लिए लग गईं। चारों तरफ़ खामोशी थी… लेकिन शायद उस खामोशी के पीछे कोई ऐसा रहस्य जाग रहा था, जिसका एहसास अभी उन्हें होना बाकी था।

अचानक अक्षय की बंद आँखों के सामने एक अजीब-सा नज़ारा उभरने लगा।

प्रतापगढ़ की हवेली पूरी तरह दुल्हन की तरह सजी हुई थी। ऐसा लग रहा था जैसे किसी बेहद खास मेहमान के आने की तैयारी हो रही हो। महल की दीवारों और दरों से जैसे संगीत की मधुर लहरें बरस रही थीं। रात के गहरे अंधेरे के बावजूद हवेली के बगीचे में खूबसूरत गुलाब के फूल खिले हुए थे।

हवा में घुली उनकी खुशबू ऐसी थी, मानो किसी के स्वागत के लिए पूरा महल साँसें थामे खड़ा हो।

तभी…

महल की चारदीवारी के भीतर से एक काली परछाईं धीरे-धीरे निकलकर मैदान में आ गई।

वह परछाईं बगीचे के खूबसूरत फूलों और पेड़ों से लिपटती हुई, पागलों की तरह झूम-झूमकर नाचने लगी। उसके नृत्य में ऐसी खुशी थी, जैसे कोई वर्षों पुराना इंतज़ार अब खत्म होने वाला हो।

और तभी उस परछाईं के मुँह से एक आवाज़ गूँजी—

“तुम आ रहे हो… रणविजय! आ जाओ… मैं तुम्हारा इंतज़ार कर रही हूँ…”

वो आवाज़ खुशी से काँप रही थी।

अक्षय ने गौर से देखा…

वो परछाईं कोई और नहीं, बल्कि मितालिका की थी।

वह खुशी से झूम रही थी। जैसे रणविजय के आने की खबर ने उसके भीतर बरसों से सोई हुई किसी चाहत को जगा दिया हो।

लेकिन तभी…

अचानक मितालिका के नाचते हुए कदमों को जैसे किसी अदृश्य ताकत ने जकड़ लिया।

उसके पैरों के चारों ओर एक काँटेदार हंटर आकर लिपट गया।

मितालिका चीखती हुई ज़मीन पर गिर पड़ी।

और बस…

यही वो पल था जब पूरा नज़ारा एक झटके में बदल गया।

जो हवेली कुछ पल पहले रोशनी और संगीत से नहाई हुई थी, अचानक वीरान हो गई। फूल मुरझा गए। संगीत बंद हो गया। हवेली की दीवारों पर जैसे अंधेरा उतर आया।

और फिर…

मितालिका का खूबसूरत चेहरा देखते ही देखते एक जले हुए कंकाल में बदल गया।

अक्षय की साँसें अटक गईं।

मितालिका ने अपनी जलती हुई आँखों से उस शख्स की तरफ़ देखा, जिसने उसके पैरों को हंटर से जकड़ा था और फिर उसके मुँह से ऐसी दिल दहला देने वाली चीख निकली कि पूरा सपना काँप उठा।

अक्षय ने उस शख्स को देखा।

वहाँ एक और परछाईं खड़ी थी…

सफेद कपड़ों में एक साधु।

उसके हाथ में वही काँटेदार हंटर था।

साधु का चेहरा साफ़ दिखाई नहीं दे रहा था, लेकिन उसकी खामोश निगाहों में ऐसा भय था कि अक्षय के पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।

अचानक—

“आऽऽऽह!”

अक्षय की तेज़ चीख कमरे में गूँज उठी।

वह हड़बड़ाकर उठ बैठा।

उसका पूरा शरीर पसीने से भीगा हुआ था। साँसें तेज़ चल रही थीं और दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था, जैसे सीने को चीरकर बाहर आ जाएगा।

कुछ पल तक वह समझ ही नहीं पाया कि वह कहाँ है।

उसने घबराकर चारों तरफ़ देखा।

फिर उसकी नज़र घड़ी पर पड़ी…

सुबह के दस बज चुके थे।

लेकिन अक्षय की आँखों में अब भी वही नज़ारा तैर रहा था—

सजी हुई प्रतापगढ़ की हवेली…

मितालिका की वो डरावनी चीख…

और सफेद कपड़ों में खड़ा वो रहस्यमयी साधु…

क्या ये महज़ एक सपना था?

या फिर आने वाले किसी भयानक सच की चेतावनी…?