London's history lies beneath the pavement in Hindi Magazine by Vivek Ranjan Shrivastava books and stories PDF | फुटपाथ के नीचे भी लंदन का इतिहास

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फुटपाथ के नीचे भी लंदन का इतिहास

लंदन डायरी
विवेक रंजन श्रीवास्तव 

फुटपाथ के नीचे भी लंदन का इतिहास

लंदन में घूमते हुए हमारी निगाहें अक्सर ऊपर रहती हैं, पुरानी इमारतों की नक्काशी, चर्च के शिखर, लाल डबल-डेकर बसें और सड़क के किनारे पेड़। लेकिन कभी-कभी ऊपर नहीं, नीचे भी देखना चाहिए।

फुटपाथ पर चलते हुए अचानक नजर एक गोल, लोहे के ढक्कन पर पड़ी। पहली नजर में वह वैसा ही लगा जैसा किसी भी शहर की सड़क पर दिखाई देने वाला कोई साधारण ढक्कन हो। पर लंदन में साधारण वस्तुएँ भी अक्सर अपने भीतर असाधारण इतिहास छिपाए मिलती हैं।

पुराने मकानों के सामने फुटपाथ में लगे ऐसे धातु के ढक्कनों को coal-hole covers कहा जाता है। कभी इनके नीचे बने रास्तों से कोयला सीधे मकानों के तहखानों तक पहुँचाया जाता था। 
तब घरों को गर्म रखने और रसोई चलाने के लिए कोयला जीवन की अनिवार्य जरूरत था। सड़क पर खड़ी गाड़ी से कोयले की बोरियाँ ऊपर से नीचे तहखाने में पहुँचती थीं और घर के भीतर का चूल्हा जलता था।
 आज वह सब गैस, बिजली और आधुनिक हीटिंग पर चलता है, लेकिन फुटपाथ के नीचे पड़ा वह गोल ढक्कन उस समय की एक छोटी-सी स्मृति की तरह बचा हुआ है।

यह देखकर लगा कि इतिहास हमेशा संग्रहालय में सुरक्षित नहीं रहता। वह कभी-कभी हमारे पैरों के नीचे भी होता है , जो अनदेखा रह जाता है, पर उसे समझना दिलचस्प होता है।

लंदन की सड़कों पर चलते हुए ऐसे अनेक संकेत मिलते हैं, पुराने पत्थर, लोहे की रेलिंग, सड़क की सीमाएँ बताने वाले छोटे निशान, पुराने लैम्प पोस्ट और कभी किसी दुकान के बाहर लगाए गए धातु के चिह्न। ये सब मिलकर शहर की ऐसी जीवनी लिखते हैं, जिसे पढ़ने के लिए किसी टिकट की जरूरत नहीं और न किसी संग्रहालय की कतार में लगना पड़ता है।

मुझे इसमें लंदन की एक विशेषता दिखाई देती है। यह शहर अपने अतीत को केवल स्मारक बनाकर नहीं रखता, बल्कि उसे दैनिक जीवन में घुला मिला रहने देता है। कोई उठाई गीर धातु के ये ढक्कन जो अब उपयोग में भी नहीं रह गए हैं, उठाकर कबाड़ी को बेच नहीं देता । नया फुटपाथ पुराने ढक्कन के आसपास बन जाता है, नई सड़क पुराने निशान को अपने साथ लेकर आगे बढ़ती है और आधुनिक शहर के बीच अतीत चुपचाप अपनी जगह बनाए रखता है।
दीवारो पर लगे नीले छोटे से बोर्ड भवन का इतिहास बताते हैं, कभी कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति उसमें रहता था, यह सूचना सड़क पर घूमने वालो को सहज ही इस तरह मिल जाती है।

भारत में भी ऐसे अनेक निशान हैं। पुराने शहरों की गलियों में पत्थर, कुएँ, हवेलियों के दरवाजे, शिलालेख और बाजारों के नाम हमें बीते समय की ओर ले जाते हैं। फर्क यह है कि हममें से बहुत-से लोग उन्हें तब तक नहीं देखते, जब तक कोई उन्हें दिखाने वाला न हो। या तो हम इतने परिवर्तन पसंद हैं कि हम पुराना ध्वस्त कर नया बना देते हैं। पुराने नाम बदलने में हमें सरकारी समर्थन मिलता है।
हम शायद इतिहास संजोने से ज्यादा नया इतिहास बनाने में रुचि रखते हैं। 

पर यहां ब्रिटेन में देख कर चलिए संभव है, आपके पैरों के नीचे पड़ा कोई साधारण-सा लोहे का ढक्कन आपको दो सौ वर्ष पीछे ले जाए।